भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441
४३०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यत्र कुत्र कुले जातो बली सर्वेश्वरः कलौ ।<br>सर्वेभ्य एव वर्णेभ्यो योग्यः कन्यावरोधने ॥ १२कलियुगमें जो बलवान् होगा वही सबका स्वामी होगा चाहे किसी भी कुलमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो, वह सभी वर्णोंसे कन्या ग्रहण करनेमें समर्थ होगा ॥ १२ ॥
येन केन च योगेन द्विजातिर्दीक्षितः कलौ ।<br>यैव सैव च मैत्रेय प्रायश्चित्तं कलौ क्रिया ॥ १३उस समय द्विजातिगण जिस-किसी उपायसे [अर्थात् निषिद्ध द्रव्य आदिसे] भी ‘दीक्षित’ हो जायँगे और जैसी-तैसी क्रियाएँ ही प्रायश्चित्त मान ली जायँगी ॥ १३ ॥
सर्वमेव कलौ शास्त्रं यस्य यद्वचनं द्विज ।<br>देवता च कलौ सर्वा सर्वस्सर्वस्य चाश्रमः ॥ १४हे द्विज ! कलियुगमें जिसके मुखसे जो कुछ निकल जायगा वही शास्त्र समझा जायगा; उस समय सभी (भूत-प्रेत-मशान आदि) देवता होंगे और सभीके सब आश्रम होंगे ॥ १४ ॥
उपवासस्तथायासो वित्तोत्सर्गस्तपः कलौ ।<br>धर्मो यथाभिरुचितैरनुष्ठानैरनुष्ठितः ॥ १५उपवास, तीर्थाटनादि कायक्लेश, धन-दान तथा तप आदि अपनी रुचिके अनुसार अनुष्ठान किये हुए ही धर्म समझे जायँगे ॥ १५ ॥
वित्तेन भविता पुंसां स्वल्पेनाढ्यमदः कलौ ।<br>स्त्रीणां रूपमदश्चैव केशैरेव भविष्यति ॥ १६कलियुगमें अल्प धनसे ही लोगोंको धनाढ्यताका गर्व हो जायगा और केशोंसे ही स्त्रियोंको सुन्दरताका अभिमान होगा ॥ १६ ॥
सुवर्णमणिरत्नादौ वस्त्रे चोपक्षयं गते ।<br>कलौ स्त्रियो भविष्यन्ति तदा केशैरलङ्कृताः ॥ १७उस समय सुवर्ण, मणि, रत्न और वस्त्रोंके क्षीण हो जानेसे स्त्रियाँ केश-कलापोंसे ही अपनेको विभूषित करेंगी ॥ १७ ॥
परित्यक्ष्यन्ति भर्त्तारं वित्तहीनं तथा स्त्रियः ।<br>भर्त्ता भविष्यति कलौ वित्तवानेव योषिताम् ॥ १८जो पति धनहीन होगा उसे स्त्रियाँ छोड़ देंगी। कलियुगमें धनवान् पुरुष ही स्त्रियोंका पति होगा ॥ १८ ॥
यो वै ददाति बहुलं स्वं स स्वामी सदा नृणाम् ।<br>स्वामित्वहेतुस्सम्बन्धो न चाभिजनता तथा ॥ १९जो मनुष्य [चाहे वह कितनाहू निन्द्य हो] अधिक धन देगा वही लोगोंका स्वामी होगा; यह धन-दानका सम्बन्ध ही स्वामित्वका कारण होगा, कुलीनता नहीं ॥ १९ ॥
गृहान्ता द्रव्यसङ्घाता द्रव्यान्ता च तथा मतिः ।<br>अर्थाश्चात्मोपभोग्यान्ता भविष्यन्ति कलौ युगे ॥ २०कलिमें सारा द्रव्य-संग्रह घर बनानेमें ही समाप्त हो जायगा [दान-पुण्यादिमें नहीं], बुद्धि धन-संचयमें ही लगी रहेगी [आत्मज्ञानमें नहीं], सारी सम्पत्ति अपने उपभोगमें ही नष्ट हो जायगी [उससे अतिथि-सत्कारादि न होगा] ॥ २० ॥
स्त्रियः कलौ भविष्यन्ति स्वैरिण्यो ललितस्पृहाः ।<br>अन्यायावाप्तवित्तेषु पुरुषाः स्पृहयालवः ॥ २१कलिकालमें स्त्रियाँ सुन्दर पुरुषकी कामनासे स्वेच्छाचारिणी होंगी तथा पुरुष अन्यायोपार्जित धनके इच्छुक होंगे ॥ २१ ॥
अभ्यर्थितापि सुहृदा स्वार्थहानिं न मानवाः ।<br>पणाधार्द्धाद्धंमात्रेऽपि करिष्यन्ति कलौ द्विज ॥ २२हे द्विज ! कलियुगमें अपने सुहृदोंके प्रार्थना करनेपर भी लोग एक-एक दमड़ीके लिये भी स्वार्थहानि नहीं करेंगे ॥ २२ ॥
समानपौरुषं चेतो भावि विप्रेषु वै कलौ ।<br>क्षीरप्रदानसम्बन्धि भावि गोषु च गौरवम् ॥ २३कलिमें ब्राह्मणोंके साथ शूद्र आदि समानताका दावा करेंगे और दूध देनेके कारण ही गौओंका सम्मान होगा ॥ २३ ॥
अनावृष्टिभयप्रायाः प्रजाः क्षुद्भयकातराः ।<br>भविष्यन्ति तदा सर्वे गगनासक्तदृष्टयः ॥ २४उस समय सम्पूर्ण प्रजा क्षुधाकी व्यथासे व्याकुल हो प्रायः अनावृष्टिके भयसे सदा आकाशकी ओर दृष्टि लगाये रहेगी ॥ २४ ॥
कन्दमूलफलाहारास्तापसा इव मानवाः ।<br>आत्मानं घातयिष्यन्ति ह्यनावृष्ट्यादिदुःखिताः ॥ २५मनुष्य [अन्नका अभाव होनेसे] तपस्वियोंके समान केवल कन्द, मूल और फल आदिके सहारे ही रहेंगे तथा अनावृष्टिके कारण दुःखी होकर आत्मघात करेंगे ॥ २५ ॥