विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ
श्रीमन्नारायणाय नमः
श्रीविष्णुपुराण
षष्ठ अंश
पहला अध्याय
कलिधर्मनिरूपण
श्रीमैत्रेय उवाच
व्याख्याता भवता सर्गवंशमन्वन्तरस्थितिः।
वंशानुचरितं चैव विस्तरेण महामुने॥ १
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तो यथावदुपसंहृतिम्।
महाप्रलयसंज्ञां च कल्पान्ते च महामुने॥ २
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे महामुने! आपने सृष्टिरचना, वंश-परम्परा और मन्वन्तरोंकी स्थितिका तथा वंशोंके चरित्रोंका विस्तारसे वर्णन किया॥ १॥ अब मैं आपसे कल्पान्तमें होनेवाले महाप्रलय नामक संसारके उपसंहारका यथावत् वर्णन सुनना चाहता हूँ॥ २॥
श्रीपराशर उवाच
मैत्रेय श्रूयतां मत्तो यथावदुपसंहृतिः।
कल्पान्ते प्राकृते चैव प्रलये जायते यथा॥ ३
अहोरात्रं पितॄणां तु मासोऽब्दस्त्रिदिवौकसाम्।
चतुर्युगसहस्रे तु ब्रह्मणो वै द्विजोत्तम॥ ४
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।
दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु तद्द्वादशभिरुच्यते॥ ५
चतुर्युगाण्यशेषाणि सदृशानि स्वरूपतः।
आद्यं कृतयुगं मुक्त्वा मैत्रेयान्त्यं तथा कलिम्॥ ६
आद्ये कृतयुगे सर्गो ब्रह्मणा क्रियते यथा।
क्रियते चोपसंहारस्तथान्ते च कलौ युगे॥ ७
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! कल्पान्तके समय प्राकृत प्रलयमें जिस प्रकार जीवोंका उपसंहार होता है, वह सुनो॥ ३॥ हे द्विजोत्तम! मनुष्योंका एक मास पितृगणका, एक वर्ष देवगणका और दो सहस्र चतुर्युग ब्रह्माका एक दिन-रात होता है॥ ४॥ सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग हैं, इन सबका काल मिलाकर बारह हजार दिव्य वर्ष कहा जाता है॥ ५॥ हे मैत्रेय! [प्रत्येक मन्वन्तरके] आदि कृतयुग और अन्तिम कलियुगको छोड़कर शेष सब चतुर्युग स्वरूपसे एक समान हैं॥ ६॥ जिस प्रकार आद्य (प्रथम) सत्ययुगमें ब्रह्माजी जगत्की रचना करते हैं उसी प्रकार अन्तिम कलियुगमें वे उसका उपसंहार करते हैं॥ ७॥
श्रीमैत्रेय उवाच
कलेःस्वरूपं भगवन्विस्तराद्वक्तुमर्हसि।
धर्मश्चतुष्पाद्भगवान्यस्मिन्विप्लवमृच्छति॥ ८
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे भगवन्! कलिके स्वरूपका विस्तारसे वर्णन कीजिये, जिसमें चार चरणोंवाले भगवान् धर्मका प्रायः लोप हो जाता है॥ ८॥
श्रीपराशर उवाच
कलेःस्वरूपं मैत्रेय यद्भावाच्छ्रोतुमिच्छति।
तन्निबोध समासेन वर्तते यन्महामुने॥ ९
वर्णाश्रमाचारवती प्रवृत्तिर्न कलौ नृणाम्।
न सामऋग्यजुर्धर्मविनिष्पादनहैतुकी॥ १०
विवाहा न कलौ धर्म्या न शिष्यगुरुसंस्थितिः।
न दाम्पत्यक्रमो नैव वह्निदेवात्मकः क्रमः॥ ११
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! आप जो कलियुगका स्वरूप सुनना चाहते हैं सो उस समय जो कुछ होता है वह संक्षेपसे सुनिये॥ ९॥ कलियुगमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति वर्णाश्रम-धर्मानुकूल नहीं रहती और न वह ऋक्-साम-यजुरूप त्रयी-धर्मका सम्पादन करनेवाली ही होती है॥ १०॥ उस समय धर्मविवाह, गुरु-शिष्य-सम्बन्धकी स्थिति, दाम्पत्यक्रम और अग्निमें देवयज्ञक्रियाका क्रम (अनुष्ठान) भी नहीं रहता॥ ११॥