विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४३४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
ततः स्नात्वा यथान्यायमायान्तं च कृतक्रियम्। उपतस्थुर्महाभागं मुनयस्ते सुतं मम॥ ९ कृतसंवन्दनांश्चाह कृतासनपरिग्रहान्। किमर्थमागता यूयमिति सत्यवतीसुतः॥ १० तमूचुः संशयं प्रष्टुं भवन्तं वयमागताः। अलं तेनास्तु तावन्नः कथ्यतामपरं त्वया॥ ११ कलिरस्साध्विति यत्प्रोक्तं शूद्रः साध्विति योषितः। यदाह भगवान् साधु धन्याश्चेति पुनः पुनः॥ १२ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामो न चेद् गुह्यं महामुने। तत्कथ्यतां ततो हृत्स्थं पृच्छामस्त्वां प्रयोजनम्॥ १३ श्रीपराशर उवाच इत्युक्तो मुनिभिर्व्यासः प्रहस्येदमथाब्रवीत्। श्रूयतां भो मुनिश्रेष्ठा यदुक्तं साधु साध्विति॥ १४ श्रीव्यास उवाच यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्। द्वापरे तच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ॥ १५ तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश्च फलं द्विजाः। प्राप्नोति पुरुषस्तेन कलिरस्साध्विति भाषितम्॥ १६ ध्यायन्कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥ १७ धर्मोत्कर्षमतीवात्र प्राप्नोति पुरुषः कलौ। अल्पायासेन धर्मज्ञास्तेन तुष्टोऽस्म्यहं कलेः॥ १८ व्रतचर्यापरैर्ग्राह्या वेदाः पूर्वं द्विजातिभिः। ततस्स्वधर्मसम्प्राप्तैर्यष्टव्यं विधिवद्धनैः॥ १९ वृथा कथा वृथा भोज्यं वृथेज्या च द्विजन्मनाम्। पतनाय ततो भाव्यं तैस्तु संयमिभिस्सदा॥ २० असम्यक्करणे दोषस्तेषां सर्वेषु वस्तुषु। भोज्यपेयादिकं चैषां नेच्छाप्राप्तिकरं द्विजाः॥ २१ पारतन्त्र्यं समस्तेषु तेषां कार्येषु वै यतः। जयन्ति ते निजाँल्लोकान्क्लेशेन महता द्विजाः॥ २२
तदनन्तर जब मेरे महाभाग पुत्र व्यासजी स्नान करनेके अनन्तर नियमानुसार नित्यकर्मसे निवृत्त होकर आये तो वे मुनिजन उनके पास पहुँचे॥ ९॥ वहाँ आकर जब वे यथायोग्य अभिवादनादिके अनन्तर आसनोंपर बैठ गये तो सत्यवतीनन्दन व्यासजीने उनसे पूछा—"आपलोग कैसे आये हैं?"॥ १०॥
तब मुनियोंने उनसे कहा—"हमलोग आपसे एक सन्देह पूछनेके लिये आये थे, किंतु इस समय उसे तो जाने दीजिये, एक और बात हमें बतलाइये॥ ११॥ भगवन्! आपने जो स्नान करते समय कई बार कहा था कि 'कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही श्रेष्ठ हैं, स्त्रियाँ ही साधु और धन्य हैं', सो क्या बात है? हम यह सम्पूर्ण विषय सुनना चाहते हैं। हे महामुने! यदि गोपनीय न हो तो कहिये। इसके पीछे हम आपसे अपना आन्तरिक सन्देह पूछेंगे"॥ १२-१३॥
श्रीपराशरजी बोले—मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीने हँसते हुए कहा—"हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने जो इन्हें बारम्बार साधु-साधु कहा था, उसका कारण सुनो"॥ १४॥
श्रीव्यासजी बोले—हे द्विजगण! जो फल सत्ययुगमें दस वर्ष तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदि करनेसे मिलता है उसे मनुष्य त्रेतामें एक वर्ष, द्वापरमें एक मास और कलियुगमें केवल एक दिन-रातमें प्राप्त कर लेता है, इस कारण ही मैंने कलियुगको श्रेष्ठ कहा है॥ १५-१६॥ जो फल सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञ और द्वापरमें देवार्चन करनेसे प्राप्त होता है वही कलियुगमें श्रीकृष्णचन्द्रका नाम-कीर्तन करनेसे मिल जाता है॥ १७॥ हे धर्मज्ञगण! कलियुगमें थोड़े-से परिश्रमसे ही पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति हो जाती है, इसीलिये मैं कलियुगसे अति सन्तुष्ट हूँ॥ १८॥
[अब शूद्र क्यों श्रेष्ठ हैं, यह बतलाते हैं] द्विजातियोंको पहले ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है और फिर स्वधर्माचरणसे उपार्जित धनके द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करने पड़ते हैं॥ १९॥ इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजन और व्यर्थ यज्ञ उनके पतनके कारण होते हैं; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक है॥ २०॥ सभी कामोंमें अनुचित (विधिके विपरीत) करनेसे उन्हें दोष लगता है; यहाँतक कि भोजन और पानादि भी वे अपने इच्छानुसार नहीं भोग सकते॥ २१॥ क्योंकि उन्हें सम्पूर्ण कार्योंमें परतन्त्रता रहती है। हे द्विजगण! इस प्रकार वे अत्यन्त क्लेशसे पुण्य-लोकोंको प्राप्त करते हैं॥ २२॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अ० २ ] * षष्ठ अंश * ४३५
द्विजशुश्रूषयैवैष पाकयज्ञाधिकारवान्।
निजाञ्जयति वै लोकाञ्छूद्रो धन्यतरस्ततः॥ २३
भक्ष्याभक्ष्येषु नास्त्यस्ति पेयापेयेषु वै यतः।
नियमो मुनिशार्दूलास्तेनासौ साध्वितीरितः॥ २४
स्वधर्मस्याविरोधेन नरैर्लब्धं धनं सदा।
प्रतिपादनीयं पात्रेषु यष्टव्यं च यथाविधि॥ २५
तस्यार्जने महाक्लेशः पालने च द्विजोत्तमाः।
तथासद्विनियोगेन विज्ञातं गहनं नृणाम्॥ २६
एवमन्यैस्तथा क्लेशैः पुरुषा द्विजसत्तमाः।
निजाञ्जयन्ति वै लोकान्प्राजापत्यादिकान्क्रमात्॥ २७
योषिच्छुश्रूषणाद्भर्त्तुः कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजाः॥ २८
नातिक्लशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषितः॥ २९
एतद्वः कथितं विप्रा यन्निमित्तमिहागताः।
तत्पृच्छत यथाकामं सर्वं वक्ष्यामि वः स्फुटम्॥ ३०
ऋषयस्ते ततः प्रोचुर्यत्प्रष्टव्यं महामुने।
अस्मिन्नेव च तत् प्रश्ने यथावत्कथितं त्वया॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रहस्य तानाह कृष्णद्वैपायनो मुनिः।
विस्मयोत्फुल्लनयनांस्तापसांस्तानुपागतान्॥ ३२
मयैष भवतां प्रश्नो ज्ञातो दिव्येन चक्षुषा।
ततो हि वः प्रसङ्गेन साधु साध्विति भाषितम्॥ ३३
स्वल्पेन हि प्रयत्नेन धर्मस्सिद्धयति वै कलौ।
नरैरात्मगुणाम्भोभिः क्षालिताखिलकिल्बिषैः॥ ३४
शूद्रैश्च द्विजशुश्रूषातत्परैर्द्विजसत्तमाः।
तथा स्त्रीभिरनायासात्पतिशुश्रूषयैव हि॥ ३५
ततस्त्रितयमप्येतन्मम धन्यतरं मतम्।
धर्मसम्पादने क्लेशो द्विजातीनां कृतादिषु॥ ३६
भवद्भिर्र्यदभिप्रेतं तदेतत्कथितं मया।
अपृष्टेनापि धर्मज्ञाः किमन्यत्क्रियतां द्विजाः॥ ३७
किंतु जिसे केवल [मन्त्रहीन] पाक-यज्ञका ही अधिकार है वह शूद्र द्विजोंकी सेवा करनेसे ही सद्गति प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह अन्य जातियोंकी अपेक्षा धन्यतर है॥ २३॥ हे मुनिशार्दूलो! शूद्रको भक्ष्याभक्ष्य अथवा पेयापेयका कोई नियम नहीं है, इसलिये मैंने उसे साधु कहा है॥ २४॥
[अब स्त्रियोंको किसलिये श्रेष्ठ कहा, यह बतलाते हैं—] पुरुषोंको अपने धर्मानुकूल प्राप्त किये हुए धनसे ही सर्वदा सुपात्रको दान और विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये॥ २५॥ हे द्विजोत्तमगण! इस द्रव्यके उपार्जन तथा रक्षणमें महान् क्लेश होता है और उसको अनुचित कार्यमें लगानेसे भी मनुष्योंको जो कष्ट भोगना पड़ता है वह मालूम ही है॥ २६॥ इस प्रकार हे द्विजसत्तमो! पुरुषगण इन तथा ऐसे ही अन्य कष्टसाध्य उपायोंसे क्रमशः प्राजापत्य आदि शुभ लोकोंको प्राप्त करते हैं॥ २७॥ किंतु स्त्रियाँ तो तन-मन-वचनसे पतिकी सेवा करनेसे ही उनकी हितकारिणी होकर पतिके समान शुभ लोकोंको अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं जो कि पुरुषोंको अत्यन्त परिश्रमसे मिलते हैं। इसीलिये मैंने तीसरी बार यह कहा था कि ‘स्त्रियाँ साधु हैं’॥ २८-२९॥ ‘हे विप्रगण! मैंने आपलोगोंसे यह [अपने साधुवादका रहस्य] कह दिया, अब आप जिसलिये पधारे हैं वह इच्छानुसार पूछिये। मैं आपसे सब बातें स्पष्ट करके कह दूँगा’॥ ३०॥ तब ऋषियोंने कहा—‘हे महामुने! हमें जो कुछ पूछना था उसका यथावत् उत्तर आपने इसी प्रश्नमें दे दिया है। [इसलिये अब हमें और कुछ पूछना नहीं है]॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले—तब मुनिवर कृष्णद्वैपायनने विस्मयसे खिले हुए नेत्रोंवाले उन समागत तपस्वियोंसे हँसकर कहा॥ ३२॥ मैं दिव्य दृष्टिसे आपके इस प्रश्नको जान गया था इसीलिये मैंने आपलोगोंके प्रसंगसे ही ‘साधु-साधु’ कहा था॥ ३३॥ जिन पुरुषोंने गुणरूप जलसे अपने समस्त दोष धो डाले हैं उनके थोड़े-से प्रयत्नसे ही कलियुगमें धर्म सिद्ध हो जाता है॥ ३४॥ हे द्विजश्रेष्ठो! शूद्रोंको द्विजसेवापरायण होनेसे और स्त्रियोंको पतिकी सेवामात्र करनेसे ही अनायास धर्मकी सिद्धि हो जाती है॥ ३५॥ इसीलिये मेरे विचारसे ये तीनों धन्यतर हैं, क्योंकि सत्ययुगादि अन्य तीन युगोंमें भी द्विजातियोंको ही धर्म सम्पादन करनेमें महान् क्लेश उठाना पड़ता है॥ ३६॥ हे धर्मज्ञ ब्राह्मणो! इस प्रकार आपलोगोंका जो अभिप्राय था वह मैंने आपके बिना पूछे ही कह दिया, अब और क्या करूँ?’॥ ३७॥
| ४३६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३ |
|---|
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| ततस्सम्पूज्य ते व्यासं प्रशंसुः पुनः पुनः ।<br>यथाऽऽगतं द्विजा जग्मुर्व्यासोक्तिकृतनिश्चयाः ॥ ३८ | तदनन्तर उन्होंने व्यासजीका पूजनकर उनकी बारम्बार प्रशंसा की और उनके कथनानुसार निश्चयकर जहाँसे आये थे वहाँ चले गये ॥ ३८ ॥ |
| भवतोऽपि महाभाग रहस्यं कथितं मया ।<br>अत्यन्तदुष्टस्य कलेरयमेको महान्गुणः ।<br>कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तबन्धः परं व्रजेत् ॥ ३९ | हे महाभाग मैत्रेयजी! आपसे भी मैंने यह रहस्य कह दिया। इस अत्यन्त दुष्ट कलियुगमें यही एक महान् गुण है कि इस युगमें केवल कृष्णचन्द्रका नाम-संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ ३९ ॥ |
| यच्चाहं भवता पृष्टो जगतामुपसंहृतिम् ।<br>प्राकृतामन्तरालां च तामप्येष वदामि ते ॥ ४० | अब आपने मुझसे जो संसारके उपसंहार—प्राकृत प्रलय और अवान्तर प्रलयके विषयमें पूछा था वह भी सुनाता हूँ ॥ ४० ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
निमेषादि काल-मान तथा नैमित्तिक प्रलयका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| सर्वेषामेव भूतानां त्रिविधः प्रतिसञ्चरः ।<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको लयः ॥ १ | सम्पूर्ण प्राणियोंका प्रलय नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक तीन प्रकारका होता है ॥ १ ॥ |
| ब्राह्मो नैमित्तिकस्तेषां कल्पान्ते प्रतिसञ्चरः ।<br>आत्यन्तिकस्तु मोक्षाख्यः प्राकृतो द्विपरार्द्धकः ॥ २ | उनमेंसे जो कल्पान्तमें ब्राह्म प्रलय होता है वह नैमित्तिक, जो मोक्ष नामक प्रलय है वह आत्यन्तिक और जो दो परार्द्धके अन्तमें होता है वह प्राकृत प्रलय कहलाता है ॥ २ ॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
| परार्द्धसंख्यां भगवन्ममाचक्ष्व यया तु सः ।<br>द्विगुणीकृतया ज्ञेयः प्राकृतः प्रतिसञ्चरः ॥ ३ | भगवन् ! आप मुझे परार्द्धकी संख्या बतलाइये, जिसको दूना करनेसे प्राकृत प्रलयका परिमाण जाना जा सके ॥ ३ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| स्थानात्स्थानं दशगुणमेकस्माद्गण्यते द्विज ।<br>ततोऽष्टादशमे भागे परार्द्धमभिधीयते ॥ ४ | हे द्विज ! एकसे लेकर क्रमशः दशगुण गिनते-गिनते जो अठारहवीं बार* गिनी जाती है वह संख्या परार्द्ध कहलाती है ॥ ४ ॥ |
| परार्द्धद्विगुणं यत्तु प्राकृतस्स लयो द्विज ।<br>तदाव्यक्तेऽखिलं व्यक्तं स्वहेतौ लयमेति वै ॥ ५ | हे द्विज! इस परार्द्धकी दूनी संख्यावाला प्राकृत प्रलय है, उस समय यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारण अव्यक्तमें लीन हो जाता है ॥ ५ ॥ |
| निमेषो मानुषो योऽसौ मात्रा मात्राप्रमाणतः ।<br>तैः पञ्चदशभिः काष्ठा त्रिंशत्काष्ठा कला स्मृता ॥ ६ | मनुष्यका निमेष ही एक मात्रावाले अक्षरके उच्चारण-कालके समान परिमाणवाला होनेसे मात्रा कहलाता है; उन पन्द्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाकी एक कला कही जाती है ॥ ६ ॥ |
| नाडिका तु प्रमाणेन सा कला दश पञ्च च ।<br>उन्मानेनाम्भसस्सा तु पलान्यर्द्धत्रयोदश ॥ ७ | पन्द्रह कला एक नाडिकाका प्रमाण है। वह नाडिका साढ़े बारह पल ताँबेके बने हुए जलके पात्रसे जानी जा सकती है ॥ ७ ॥ |
* वायुपुराणमें इन अठारह संख्याओंके इस प्रकार नाम हैं—एक, दस, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, न्यर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, शंख, पद्म, समुद्र, मध्य, अन्त, परार्द्ध।
अ० ३]
- षष्ठ अंश * ४३७
| मागधेन तु मानेन जलप्रस्थस्तु स स्मृतः।<br>हेममाषैः कृतच्छिद्रश्चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः॥ ८<br>नाडिकाभ्यामथ द्वाभ्यां मुहूर्तो द्विजसत्तम।<br>अहोरात्रं मुहूर्तास्तु त्रिंशन्मासो दिनैस्तथा॥ ९<br>मासैर्द्वादशभिर्वर्षमहोरात्रं तु तद्दिवि।<br>त्रिभिर्वर्षशतैर्वर्ष षष्ट्या चैवासुरद्विषाम्॥ १०<br>तैस्तु द्वादशसाहस्रैश्चतुर्युगमुदाहृतम्।<br>चतुर्युगसहस्रं तु कथ्यते ब्रह्मणो दिनम्॥ ११<br>स कल्पस्तत्र मनवश्चतुर्दश महामुने।<br>तदन्ते चैव मैत्रेय ब्राह्मो नैमित्तिको लयः॥ १२<br>तस्य स्वरूपमत्युग्रं मैत्रेय गदतो मम।<br>शृणुष्व प्राकृतं भूयस्तव वक्ष्याम्यहं लयम्॥ १३<br>चतुर्युगसहस्रान्ते क्षीणप्राये महीतले।<br>अनावृष्टििरतीवोग्रा जायते शतवार्षिकी॥ १४<br>ततो यान्यल्पसाराणि तानि सत्त्वान्यशेषतः।<br>क्षयं यान्ति मुनिश्रेष्ठ पार्थिवान्यनुपीडनात्॥ १५<br>ततः स भगवान्विष्णू रुद्ररूपधरोऽव्ययः।<br>क्षयाय यतते कर्तुमात्मस्थास्सकलाः प्रजाः॥ १६<br>ततस्स भगवान्विष्णुर्भानोस्सप्तसु रश्मिषु।<br>स्थितः पिबत्यशेषाणि जलानि मुनिसत्तम॥ १७<br>पीत्वाम्भांसि समस्तानि प्राणिभूमिगतान्यपि।<br>शोषं नयति मैत्रेय समस्तं पृथिवीतलम्॥ १८<br>समुद्रान्सरितः शैलनदीप्रस्रवणानि च।<br>पातालेषु च यत्तोयं तत्सर्वं नयति क्षयम्॥ १९<br>ततस्तस्यानुभावेन तोयाहारोपबृंहिताः।<br>त एव रश्मयस्सप्त जायन्ते सप्त भास्कराः॥ २०<br>अधश्चोर्ध्वं च ते दीप्तास्ततस्सप्त दिवाकराः।<br>दहन्त्यशेषं त्रैलोक्यं सपातालतलं द्विज॥ २१<br>दह्यमानं तु तैर्दीप्तैस्त्रैलोक्यं द्विज भास्करैः।<br>साद्रिनद्यर्णवाभोगं निस्नेहमभिजायते॥ २२<br>ततो निर्दग्धवृक्षाम्बु त्रैलोक्यमखिलं द्विज।<br>भवत्येषा च वसुधा कूर्मपृष्ठोपमाकृतिः॥ २३ | मगधदेशीय मापसे वह पात्र जलप्रस्थ कहलाता है; उसमें चार अंगुल लम्बी चार मासेकी सुवर्ण-शलाकासे छिद्र किया रहता है [उसके छिद्रको ऊपर करके जलमें डुबो देनेसे जितनी देरमें वह पात्र भर जाय उतने ही समयको एक नाडिका समझना चाहिये]॥ ८॥ हे द्विजसत्तम! ऐसी दो नाडिकाओंका एक मुहूर्त होता है, तीस मुहूर्तका एक दिन-रात होता है तथा इतने (तीस) ही दिन-रातका एक मास होता है॥ ९॥ बारह मासका एक वर्ष होता है, देवलोकमें यही एक दिन-रात होता है। ऐसे तीन सौ साठ वर्षोंका देवताओंका एक वर्ष होता है॥ १०॥ ऐसे बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है और एक हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है॥ ११॥<br>हे महामुने! यही एक कल्प है। इसमें चौदह मनु बीत जाते हैं। हे मैत्रेय! इसके अन्तमें ब्रह्माका नैमित्तिक प्रलय होता है॥ १२॥ हे मैत्रेय! सुनो, मैं उस नैमित्तिक प्रलयका अत्यन्त भयानक रूप वर्णन करता हूँ। इसके पीछे मैं तुमसे प्राकृत प्रलयका भी वर्णन करूँगा॥ १३॥ एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर जब पृथिवी क्षीणप्राय हो जाती है तो सौ वर्षतक अति घोर अनावृष्टि होती है॥ १४॥ हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय जो पार्थिव जीव अल्प शक्तिवाले होते हैं वे सब अनावृष्टिसे पीड़ित होकर सर्वथा नष्ट हो जाते हैं॥ १५॥ तदनन्तर, रुद्ररूपधारी अव्ययात्मा भगवान् विष्णु संसारका क्षय करनेके लिये सम्पूर्ण प्रजाको अपनेमें लीन कर लेनेका प्रयत्न करते हैं॥ १६॥ हे मुनिसत्तम! उस समय भगवान् विष्णु सूर्यकी सातों किरणोंमें स्थित होकर सम्पूर्ण जलको सोख लेते हैं॥ १७॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार प्राणियों तथा पृथिवीके अन्तर्गत सम्पूर्ण जलको सोखकर वे समस्त भूमण्डलको शुष्क कर देते हैं॥ १८॥ समुद्र तथा नदियोंमें, पर्वतीय सरिताओं और स्रोतोंमें तथा विभिन्न पातालोंमें जितना जल है वे उस सबको सुखा डालते हैं॥ १९॥ तब भगवान्के प्रभावसे प्रभावित होकर तथा जलपानसे पुष्ट होकर वे सातों सूर्यरश्मियाँ सात सूर्य हो जाती हैं॥ २०॥ हे द्विज! उस समय ऊपर-नीचे सब ओर देदीप्यमान होकर वे सातों सूर्य पातालपर्यन्त सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर डालते हैं॥ २१॥ हे द्विज! उन प्रदीप्त भास्करोंसे दग्ध हुई त्रिलोकी पर्वत, नदी और समुद्रादिके सहित सर्वथा नीरस हो जाती है॥ २२॥ उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीके वृक्ष और जल आदिके दग्ध हो जानेसे यह पृथिवी कछुएकी पीठके समान कठोर हो जाती है॥ २३॥ |
४३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३
| ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ भूत्वा सर्वहरो हरिः ।<br>शेषाहिश्विाससम्भूतः पातालाानि दहत्यधः ॥ २४ | तब सबको नष्ट करनेके लिये उद्यत हुए श्रीहरि कालाग्नि-रुद्ररूपसे शेषनागके मुखसे प्रकट होकर नीचेसे पातालोंको जलाना आरम्भ करते हैं ॥ २४ ॥ |
| पातालानि समस्तानि स दग्ध्वा ज्वलनो महान् ।<br>भूमिमभ्येत्य सकलं भभस्ति वसुधातलं ॥ २५ | वह महान् अग्नि समस्त पातालोंको जलाकर पृथ्वीपर पहुँचता है और सम्पूर्ण भूतलको भस्म कर डालता है ॥ २५ ॥ |
| भुवर्लोकं ततस्सर्वं स्वर्लोकं च सुदारुणः ।<br>ज्वालामालामहावर्तस्तत्रैव परिवर्तते ॥ २६ | तब वह दारुण अग्नि भुवर्लोक तथा स्वर्गलोकको जला डालता है और वह ज्वाला-समूहका महान् आवर्त वहीं चक्कर लगाने लगता है ॥ २६ ॥ |
| अम्बरीषमिवाभाति त्रैलोक्यमखिलं तदा ।<br>ज्वालावर्तपरीवारमुपक्षीणचराचरम् ॥ २७ | इस प्रकार अग्निके आवर्तोंसे घिरकर सम्पूर्ण चराचरके नष्ट हो जानेपर समस्त त्रिलोकी एक तप्त कराहके समान प्रतीत होने लगती है ॥ २७ ॥ |
| ततस्तापपरीतास्तु लोकद्वयनिवासिनः ।<br>कृताधिकारा गच्छन्ति महर्लोकं महामुने ॥ २८ | हे महामुने ! तदनन्तर अवस्थाके परिवर्तनसे परलोककी चाहवाले भुवर्लोक और स्वर्गलोकमें रहनेवाले [मन्वादि] अधिकारिगण अग्निज्वालासे सन्तप्त होकर महर्लोकको चले जाते हैं |
| तस्मादपि महातापतप्ता लोकात्ततः परम् ।<br>गच्छन्ति जनलोकं ते दशावृत्त्या परैषिणः ॥ २९ | किन्तु वहाँ भी उस उग्र कालानलके महातापसे सन्तप्त होनेके कारण वे उससे बचनेके लिये जनलोकमें चले जाते हैं ॥ २८-२९ ॥ |
| ततो दग्ध्वा जगत्सर्वं रुद्ररूपी जनार्दनः ।<br>मुखनिःश्वासजान्मेघान्करोति मुनिसत्तम ॥ ३० | हे मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर रुद्ररूपी भगवान् विष्णु सम्पूर्ण संसारको दग्ध करके अपने मुख-निःश्वाससे मेघोंको उत्पन्न करते हैं ॥ ३० ॥ |
| ततो गजकुलप्रख्यास्तडित्वन्तोऽतिनादिनः ।<br>उत्तिष्ठन्ति तथा व्योम्नि घोरास्संवर्तका घनाः ॥ ३१ | तब विद्युत्से युक्त भयंकर गर्जना करनेवाले गजसमूहके समान बृहदाकार संवर्तक नामक घोर मेघ आकाशमें उठते हैं ॥ ३१ ॥ |
| केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः ।<br>धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥ ३२ | उनमेंसे कोई मेघ नील कमलके समान श्यामवर्ण, कोई कुमुद-कुसुमके समान श्वेत, कोई धूम्रवर्ण और कोई पीतवर्ण होते हैं ॥ ३२ ॥ |
| केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारसन्निभास्तथा ।<br>केचिद्वैडूर्यसंकाशा इन्द्रनीलनिभाः क्वचित् ॥ ३३ | कोई गधेके-से वर्णवाले, कोई लाखके-से रंगवाले, कोई वैडूर्य-मणिके समान और कोई इन्द्रनील-मणिके समान होते हैं ॥ ३३ ॥ |
| शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे ।<br>इन्द्रगोपनिभाः केचित्तत्तशिखिनिभास्तथा ॥ ३४ | कोई शंख और कुन्दके समान श्वेत-वर्ण, कोई जाती (चमेली)-के समान उज्ज्वल और कोई कज्जलके समान श्यामवर्ण, कोई इन्द्रगोपके समान रक्तवर्ण और कोई मयूरके समान विचित्र वर्णवाले होते हैं ॥ ३४ ॥ |
| मनश्शिलाभाः केचिद्वै हरितालनिभाः परे ।<br>चाषपत्रनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ते महाघनाः ॥ ३५ | कोई गेरूके समान, कोई हरितालके समान और कोई महामेघ, नील-कण्ठके पंखके समान रंगवाले होते हैं ॥ ३५ ॥ |
| केचित्पुरवराकाराः केचित्पर्वतसन्निभाः ।<br>कूटागारनिभाश्चान्ये केचित्स्थलनिभा घनाः ॥ ३६ | कोई नगरके समान, कोई पर्वतके समान और कोई कूटागार (गृहविशेष)-के समान बृहदाकार होते हैं तथा कोई पृथवीतलके समान विस्तृत होते हैं ॥ ३६ ॥ |
| महारावा महाकायाः पूरयन्ति नभःस्थलम् ।<br>वर्षन्तस्ते महासारांस्तमग्निमतिभैरवम् ।<br>शमयन्त्यखिलं विप्र त्रैलोक्यान्तरधिष्ठितम् ॥ ३७ | वे घनघोर शब्द करनेवाले महाकाय मेघगण आकाशको आच्छादित कर लेते हैं और मूसलाधार जल बरसाकर त्रिलोकव्यापी भयंकर अग्निको शान्त कर देते हैं ॥ ३७ ॥ |
| नष्टे चाग्नौ च सततं वर्षमाणा ह्यहर्निशम् ।<br>प्लावयन्ति जगत्सर्वमम्भोभिर्मुनिंसत्तम ॥ ३८ | हे मुनिश्रेष्ठ ! अग्निके नष्ट हो जानेपर भी अहर्निश निरन्तर बरसते हुए वे मेघ सम्पूर्ण जगत्को जलमें डुबो देते हैं ॥ ३८ ॥ |
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अ० ४ ] * षष्ठ अंश * ४३९
| धाराभिरतिमात्राभिः प्लावयित्वाखिलं भुवम्।<br>भुवर्लोकं तथैवोर्ध्वं प्लावयन्ति हि ते द्विज ॥ ३९ | हे द्विज! अपनी अति स्थूल धाराओंसे भूर्लोकको जलमें डुबोकर वे भुवर्लोक तथा उसके भी ऊपरके लोकोंको भी जलमग्न कर देते हैं॥ ३९॥ इस प्रकार सम्पूर्ण संसारके अन्धकारमय हो जानेपर तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जीवोंके नष्ट हो जानेपर भी वे महामेघ सौ वर्षसे अधिक कालतक बरसते रहते हैं॥ ४०॥ हे मुनिश्रेष्ठ! सनातन परमात्मा वासुदेवके माहात्म्यसे कल्पान्तमें इसी प्रकार यह समस्त विप्लव होता है॥ ४१॥ |
| अन्धकारीकृते लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>वर्षन्ति ते महामेघा वर्षाणामधिकं शतम् ॥ ४० | |
| एवं भवति कल्पान्ते समस्तं मुनिसत्तम।<br>वासुदेवस्य माहात्म्यान्नित्यस्य परमात्मनः ॥ ४१ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
चौथा अध्याय
प्राकृत प्रलयका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| सप्तर्षिस्थानमाक्रम्य स्थितेऽम्भसि महामुने।<br>एकार्णवं भवत्येतत्त्रैलोक्यमखिलं ततः॥ १ | हे महामुने! जब जल सप्तर्षियोंके स्थानको भी पार कर जाता है तो यह सम्पूर्ण त्रिलोकी एक महासमुद्रके समान हो जाती है॥ १॥ |
| मुखनिःश्वासजो विष्णोर्वायुस्ताञ्जलदांस्ततः।<br>नाशयन्वाति मैत्रेय वर्षाणामपरं शतम्॥ २ | हे मैत्रेय! तदनन्तर, भगवान् विष्णुके मुख-निःश्वाससे प्रकट हुआ वायु उन मेघोंको नष्ट करके पुनः सौ वर्षतक चलता रहता है॥ २॥ |
| सर्वभूतमयोऽचिन्त्यो भगवान्भूतभावनः।<br>अनादिरादिर्विश्वस्य पीत्वा वायुमशेषतः॥ ३ | फिर जनलोकनिवासी सनकादि सिद्धगणसे स्तुत और ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए मुमुक्षुओंसे ध्यान किये जाते हुए सर्वभूतमय, अचिन्त्य, अनादि, जगत्के आदिकारण, आदिकर्ता, भूतभावन, मधुसूदन भगवान् हरि विश्वके सम्पूर्ण वायुको पीकर अपनी दिव्य-मायारूपिणी योगनिद्राका आश्रय ले अपने वासुदेवात्मक स्वरूपका चिन्तन करते हुए उस महासमुद्रमें शेषशय्यापर शयन करते हैं॥ ३-६॥ |
| एकार्णवे ततस्तस्मिञ्छेषशय्यागतः प्रभुः।<br>ब्रह्मरूपधरश्शेते भगवानादिकृद्धरिः॥ ४ | |
| जनलोकगतैस्सिद्धैस्सनकाद्यैरभिष्टुतः।<br>ब्रह्मलोकगतैश्चैव चिन्त्यमानो मुमुक्षुभिः॥ ५ | |
| आत्ममायामयीं दिव्यां योगनिद्रां समास्थितः।<br>आत्मानं वासुदेवाख्यं चिन्तयन्मधुसूदनः॥ ६ | |
| एष नैमित्तिको नाम मैत्रेय प्रतिसञ्चरः।<br>निमित्तं तत्र यच्छेते ब्रह्मरूपधरो हरिः॥ ७ | हे मैत्रेय! इस प्रलयके होनेमें ब्रह्मारूपधारी भगवान् हरिका शयन करना ही निमित्त है; इसलिये यह नैमित्तिक प्रलय कहलाता है॥ ७॥ |
| यदा जागर्ति सर्वात्मा स तदा चेष्टते जगत्।<br>निमीलयत्येतदखिलं मायाशय्यां गतेऽच्युते॥ ८ | जिस समय सर्वात्मा भगवान् विष्णु जागते रहते हैं उस समय सम्पूर्ण संसारकी चेष्टाएँ होती रहती हैं और जिस समय वे अच्युत मायारूपी शय्यापर सो जाते हैं उस समय संसार भी लीन हो जाता है॥ ८॥ |
| पद्मयोनेर्दिनं यत्तु चतुर्युगसहस्रवत्।<br>एकार्णवीकृते लोके तावती रात्रिरिष्यते॥ ९ | जिस प्रकार ब्रह्माजीका दिन एक हजार चतुर्युगका होता है उसी प्रकार संसारके एकार्णवरूप हो जानेपर उनकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी होती है॥ ९॥ |
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
४४०
- श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ४ ]
ततः प्रबुद्धो रात्र्यन्ते पुनस्सृष्टिं करोत्यजः । ब्रह्मस्वरूपधृग्विष्णुर्यथा ते कथितं पुरा ॥ १० ॥ इत्येष कल्पसंहारोऽवान्तरप्रलयो द्विज । नैमित्तिकस्ते कथितः प्राकृतं शृण्वतः परम् ॥ ११ ॥ अनावृष्ट्यादिसम्पर्कात्कृते संक्षालने मुने । समस्तेष्वेव लोकेषु पातालेष्वखिलेषु च ॥ १२ ॥ महदादेर्विकारस्य विशेषान्तस्य संक्षये । कृष्णोच्छाकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते प्रतिसञ्चरे ॥ १३ ॥ आपो ग्रसन्ति वै पूर्व भूमेर्गन्ध्यात्मकं गुणम् । आतगन्धा ततो भूमिः प्रलयत्याय कल्प्यते ॥ १४ ॥ प्रणष्टे गन्धतन्मात्रे भवत्युर्वी जलात्मिका । आपस्तदा प्रवृद्धास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥ १५ ॥ सर्वमापूरयन्तीदं तिष्ठन्ति विचरन्ति च । सलिलेनोर्मिमालेन लोका व्याप्ताः समन्ततः ॥ १६ ॥ अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिषा पीयते तु सः । नश्यन्त्यापस्ततस्ताश्च रसतन्मात्रसंक्षयात् ॥ १७ ॥ ततश्चापो ह्तरसा ज्योतिषं प्राप्नुवन्ति वै । अग्न्यवस्थे तु सलिले तेजसा सर्वतो वृते ॥ १८ ॥ स चाग्निः सर्वतो व्याप्य चादत्ते तज्जलं तथा । सर्वमापूर्यतेऽर्चिर्भिस्तदा जगदिदं शनैः ॥ १९ ॥ अर्चिर्भिस्संवृते तस्मिंस्तियर्गूर्ध्वमधस्तदा । ज्योतिषोऽपि परं रूपं वायुरिति प्रभाकरम् ॥ २० ॥ प्रलीने च ततस्तस्मिन्वायुभूतेऽखिलात्मनि । प्रणष्टे रूपतन्मात्रे ह्तरूपो विभावसुः ॥ २१ ॥ प्रशाम्यति तदा ज्योतिर्वायुर्दोर्धुयते महान् । निरालोके तथा लोके वाख्यवस्थे च तेजसि ॥ २२ ॥ ततस्तु मूलमासाद्य वायुसम्भवमात्मनः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ॥ २३ ॥ वायोरोपि गुणं स्पर्शमाकाशो ग्रसते ततः । प्रशाम्यति ततो वायुः खं तु तिष्ठत्यनावृतम् ॥ २४ ॥ अरूपरसमस्पर्शमिगन्धं न च मूर्तिमत् । सर्वमापूरयच्चैव सुमहतत्प्रकाशते ॥ २५ ॥
उस रात्रिका अन्त होनेपर अजन्मा भगवान् विष्णु जागते हैं और ब्रह्मरूप धारणकर, जैसा तुमसे पहले कहा था उसी क्रमसे फिर सृष्टि रचते हैं ॥ १० ॥
हे द्विज! इस प्रकार तुमसे कल्पान्तमें होनेवाले नैमित्तिक एवं अवान्तर-प्रलयका वर्णन किया। अब दूसरे प्राकृत प्रलयका वर्णन सुनो ॥ ११ ॥ हे मुने! अनावृष्टि आदिके संयोगसे सम्पूर्ण लोक और निखिल पातालोंके नष्ट हो जानेपर तथा भगवदिच्छासे उस प्रलयकालके उपस्थित होनेपर जब महत्त्वसे लेकर [पृथिवी आदि पंच] विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण विकार क्षीण हो जाते हैं तो प्रथम जल पृथिवीके गुण गन्धको अपनेमें लीन कर लेता है। इस प्रकार गन्ध छिन्न लिये जानेसे पृथिवीका प्रलय हो जाता है ॥ १२—१४ ॥ गन्ध-तन्मात्राके नष्ट हो जानेपर पृथिवी जलमय हो जाती है, उस समय बड़े वेगसे घोर शब्द करता हुआ जल बढ़कर इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर लेता है। यह जल कभी स्थिर होता और कभी बहने लगता है। इस प्रकार तरंगमालाओंसे पूर्ण इस जलसे सम्पूर्ण लोक सब ओरसे व्याप्त हो जाते हैं ॥ १५—१६ ॥ तदनन्तर जलके गुण रसको तेज अपनेमें लीन कर लेता है। इस प्रकार रस-तन्मात्राका क्षय हो जानेसे जल भी नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥ तब रसहीन हो जानेसे जल अग्निरूप हो जाता है तथा अग्निके सब ओर व्याप्त हो जानेसे जलके अग्निमें स्थित हो जानेपर वह अग्नि सब ओर फैलकर सम्पूर्ण जलको सोख लेता है और धीरे-धीरे यह सम्पूर्ण जगत् ज्वालासे पूर्ण हो जाता है ॥ १८—१९ ॥ जिस समय सम्पूर्ण लोक ऊपर-नीचे तथा सब ओर अग्नि-शिखाओंसे व्याप्त हो जाता है उस समय अग्निके प्रकाशक स्वरूपको वायु अपनेमें लीन कर लेता है ॥ २० ॥ सबके प्राणस्वरूप उस वायुमें जब अग्निका प्रकाशक रूप लीन हो जाता है तो रूप-तन्मात्राके नष्ट हो जानेसे अग्नि रूपहीन हो जाता है ॥ २१ ॥ उस समय संसारके प्रकाशहीन और तेजके वायुमें लीन हो जानेसे अग्नि शान्त हो जाता है और अति प्रचण्ड वायु चलने लगता है ॥ २२ ॥ तब अपने उद्भवस्थान आकाशका आश्रय कर वह प्रचण्ड वायु ऊपर-नीचे तथा सब ओर दसों दिशाओंमें बड़े वेगसे चलने लगता है ॥ २३ ॥ तदनन्तर वायुके गुण स्पर्शको आकाश लीन कर लेता है; तब वायु शान्त हो जाता है और आकाश आवरणहीन हो जाता है ॥ २४ ॥ उस समय रूप, रस, स्पर्श, गन्ध तथा आकारसे रहित अत्यन्त महान् एक आकाश ही सबको व्याप्त करके प्रकाशित होता है ॥ २५ ॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अ० ४ ] * षष्ठ अंश * ४४१
| परिमण्डलं च सुषिरमाकाशं शब्दलक्षणम्।<br>शब्दमात्रं तदाकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २६ | उस समय चारों ओरसे गोल, छिद्रस्वरूप, शब्दलक्षण आकाश ही शेष रहता है; और वह शब्दमात्र आकाश सबको आच्छादित किये रहता है॥ २६॥ |
| ततश्शब्दगुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः।<br>भूतेन्द्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै।<br>अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसस्मृतः॥ २७ | तदनन्तर, आकाशके गुण शब्दको भूतादि ग्रस लेता है। इस भूतादिमें ही एक साथ पंचभूत और इन्द्रियोंका भी लय हो जानेपर केवल अहंकारात्मक रह जानेसे यह तामस (तमःप्रधान) कहलाता है |
| भूतादिं ग्रसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः॥ २८ | फिर इस भूतादिको भी [सत्त्वप्रधान होनेसे] बुद्धिरूप महत्तत्त्व ग्रस लेता है॥ २७-२८॥ |
| उर्वी महांश्च जगतः प्रान्तेऽन्तर्बाह्यतस्तथा॥ २९ | जिस प्रकार पृथ्वी और महत्तत्त्व ब्रह्माण्डके अन्तर्जगतकी आदि-अन्त सीमाएँ हैं उसी प्रकार उसके बाह्य जगत्का भी हैं॥ २९॥ |
| एवं सप्त महाबुद्धे क्रमात्प्रकृतयस्मृताः।<br>प्रत्याहारे तु तास्सर्वाः प्रविशन्ति परस्परम्॥ ३० | हे महाबुद्धे! इसी तरह जो सात आवरण बताये गये हैं वे सब भी प्रलयकालमें [पूर्ववत् पृथिवी आदि क्रमसे] परस्पर (अपने-अपने कारणोंमें) लीन हो जाते हैं॥ ३०॥ |
| येनेदमावृतं सर्वमण्डमप्सु प्रलीयते।<br>सप्तद्वीपसमुद्रान्तं सप्तलोकं सपर्वतम्॥ ३१ | जिससे यह समस्त लोक व्याप्त है वह सम्पूर्ण भूमण्डल सातों द्वीप, सातों समुद्र, सातों लोक और सकल पर्वतश्रेणियोंके सहित जलमें लीन हो जाता है॥ ३१॥ |
| उदकावरणं यत्तु ज्योतिषा पीयते तु तत्।<br>ज्योतिर्वायौ लयं याति यात्याकाशे समीरणः॥ ३२ | फिर जो जलका आवरण है उसे अग्नि पी जाता है तथा अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें लीन हो जाता है॥ ३२॥ |
| आकाशं चैव भूतादिर्ग्रसते तं तथा महान्।<br>महान्तमेभिस्सहितं प्रकृतिर्ग्रसते द्विज॥ ३३ | हे द्विज! आकाशको भूतादि (तामस अहंकार), भूतादिको महत्तत्त्व और इन सबके सहित महत्तत्त्वको मूल प्रकृति अपनेमें लीन कर लेती है॥ ३३॥ |
| गुणसाम्यमनुद्रिक्तमन्वूनं च महामुने।<br>प्रोच्यते प्रकृतिर्हेतुः प्रधानं कारणं परम्॥ ३४ | हे महामुने! न्यूनाधिकसे रहित जो सत्त्वादि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था है उसीको प्रकृति कहते हैं; इसीका नाम प्रधान भी है। यह प्रधान ही सम्पूर्ण जगत्का परम कारण है॥ ३४॥ |
| इत्येषा प्रकृतिस्सर्वा व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।<br>व्यक्तस्वरूपमव्यक्ते तस्मान्मैत्रेय लीयते॥ ३५ | यह प्रकृति व्यक्त और अव्यक्तरूपसे सर्वमयी है। हे मैत्रेय! इसीलिये अव्यक्तमें व्यक्तरूप लीन हो जाता है॥ ३५॥ |
| एकश्शुद्धोऽक्षरो नित्यस्सर्वव्यापी तथा पुमान्।<br>सोऽप्यंशस्सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः॥ ३६ | इससे पृथक् जो एक शुद्ध, अक्षर, नित्य और सर्वव्यापक पुरुष है वह भी सर्वभूत परमात्माका अंश ही है॥ ३६॥ |
| न सन्ति यत्र सर्वेशे नामजात्यादिकल्पनाः।<br>सत्तामात्रात्मके ज्ञेये ज्ञानात्मन्यात्मनः परे॥ ३७ | जिस सत्तामात्रस्वरूप आत्मा (देहादि संघात)-से पृथक् रहनेवाले ज्ञानात्मा एवं ज्ञातव्य सर्वेश्वरमें नाम और जाति आदिकी कल्पना नहीं है वही सबका परम आश्रय |
| तद्ब्रह्म परमं धाम परमात्मा स चेश्वरः।<br>स विष्णुस्सर्वमेवेदं यतो नावर्तते यतिः॥ ३८ | परब्रह्म परमात्मा है और वही ईश्वर है। वह विष्णु ही इस अखिल विश्वरूपसे अवस्थित है उसको प्राप्त हो जानेपर योगिजन फिर इस संसारमें नहीं लौटते॥ ३७-३८॥ |
| प्रकृतिर्या मयाऽऽख्याता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।<br>पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते परमात्मनि॥ ३९ | जिस व्यक्त और अव्यक्तस्वरूपिणी प्रकृतिका मैंने वर्णन किया है वह तथा पुरुष—ये दोनों भी उस परमात्मामें ही लीन हो जाते हैं॥ ३९॥ |
| परमात्मा च सर्वेषामाधारः परमेश्वरः।<br>विष्णुनामा स वेदेषु वेदान्तेषु च गीयते॥ ४० | वह परमात्मा सबका आधार और एकमात्र अधीश्वर है; उसीका वेद और वेदान्तोंमें विष्णुनामसे वर्णन किया है॥ ४०॥ |
| ४४२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ५ |
|---|
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम्।
ताभ्यामुभाभ्यां पुरुषैस्सर्वमूर्त्तिस्स इज्यते ॥ ४१
ऋग्यजुस्सामभिर्मार्गैः प्रवृत्तैरिज्यते ह्यसौ।
यज्ञेश्वरो यज्ञपुमान्युरुषैः पुरुषोत्तमः॥४२
ज्ञानात्मा ज्ञानयोगेन ज्ञानमूर्त्तिः स चेज्यते।
निवृत्ते योगिभिर्मार्गे विष्णुर्मुक्तिफलप्रदः ॥ ४३
ह्रस्वदीर्घप्लुतैर्यत्तु किञ्चिद्वस्त्वभिधीयते।
यच्च वाचामविषयं तत्सर्वं विष्णुरव्ययः ॥ ४४
व्यक्तस्स एव चाव्यक्तस्स एव पुरुषोऽव्ययः।
परमात्मा च विश्वात्मा विश्वरूपधरो हरिः ॥ ४५
व्यक्ताव्यक्तात्मिका तस्मिन्प्रकृतिस्सम्प्रलीयते।
पुरुषश्चापि मैत्रेय व्यापिन्यव्याहतात्मनि ॥ ४६
द्विपराद्धात्मकः कालः कथितो यो मया तव ।
तदहस्तस्य मैत्रेय विष्णोरीशस्य कथ्यते ॥ ४७
व्यक्ते च प्रकृतौ लीने प्रकृत्यां पुरुषे तथा।
तत्र स्थिते निशा चास्य तत्प्रमाणा महामुने ॥ ४८
नैवाहस्तस्य न निशा नित्यस्य परमात्मनः।
उपचारस्तथाप्येष तस्येशस्य द्विजोच्यते ॥ ४९
इत्येष तव मैत्रेय कथितः प्राकृतो लयः।
आत्यन्तिकमथो ब्रह्मन्निबोध प्रतिसञ्चरम् ॥ ५० | वैदिक कर्म दो प्रकारका है—प्रवृत्तिरूप (कर्मयोग) और निवृत्त रूप (सांख्ययोग)। इन दोनों प्रकारके कर्मोंसे उस सर्वभूत पुरुषोत्तमका ही यजन किया जाता है॥ ४१॥ ऋक्, यजुः और सामवेदोक्त प्रवृत्ति-मार्गसे लोग उन यज्ञपति पुरुषोत्तम यज्ञ-पुरुषका ही पूजन करते हैं॥ ४२॥ तथा निवृत्ति-मार्गमें स्थित योगिजन भी उन्हीं ज्ञानात्मा ज्ञानस्वरूप मुक्ति-फलदायक भगवान् विष्णुका ही ज्ञानयोगद्वारा यजन करते हैं॥ ४३॥ ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इन त्रिविध स्वरोंसे जो कुछ कहा जाता है तथा जो वाणीका विषय नहीं है वह सब भी अव्ययात्मा विष्णु ही है॥ ४४॥ वह विश्वरूपधारी विश्वरूप परमात्मा श्रीहरि ही व्यक्त, अव्यक्त एवं अविनाशी पुरुष हैं॥ ४५॥ हे मैत्रेय! उन सर्वव्यापक और अविकृतरूप परमात्मामें ही व्यक्ताव्यक्तरूपिणी प्रकृति और पुरुष लीन हो जाते हैं॥ ४६॥<br><br>हे मैत्रेय! मैंने तुमसे जो द्विपराद्धैकाल कहा है वह उन विष्णुभगवान्का केवल एक दिन है॥ ४७॥ हे महामुने! व्यक्त जगत्के अव्यक्त-प्रकृतिमें और प्रकृतिके पुरुषमें लीन हो जानेपर इतने ही कालकी विष्णुभगवान्की रात्रि होती है॥ ४८॥ हे द्विज! वास्तवमें तो उन नित्य परमात्माका न कोई दिन है और न रात्रि, तथापि केवल उपचार (अध्यारोप)-से ऐसा कहा जाता है॥ ४९॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे यह प्राकृत प्रलयका वर्णन किया, अब तुम आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन और सुनो॥ ५०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान्के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| आध्यात्मिकादि मैत्रेय ज्ञात्वा तापत्रयं बुधः।<br>उत्पन्नज्ञानवैराग्यः प्राप्नोत्यात्यन्तिकं लयम् ॥ १ | हे मैत्रेय! आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों तापोंको जानकर ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होनेपर पण्डितजन आत्यन्तिक प्रलय प्राप्त करते हैं॥ १॥ |
| आध्यात्मिकोऽपि द्विविधश्शारीरो मानसस्तथा।<br>शारीरो बहुभिर्भेदैर्भिद्यते श्रूयतां च सः॥ २ | आध्यात्मिक ताप शारीरिक और मानसिक दो प्रकारके होते हैं; उनमें शारीरिक तापके भी कितने ही भेद हैं, वह सुनो॥ २॥ |
अ० ५ ]
- पञ्च अंश *
४४३
शिरोरोगप्रतिशयायज्वरशूलभगन्दरैः । गुल्माशः॥१॥ वयथुश्ववासच्छर्द्यादिभिरनेकधा ॥ ३ तथाक्षिरोगातीसारकुष्ठाङ्गामयसंज्ञितैः । भिद्यते देहजस्तापो मानसं श्रोतुमर्हसि ॥ ४ कामक्रोधभयद्वेषलोभमोहविषादजः । शोकासूयावमानेर्घ्यामात्सर्यादिमयस्तथा ॥ ५ मानसोऽपि द्विजश्रेष्ठ तापो भवति नैकधा । इत्येवमादिभिर्भेदैस्तापो ह्याध्यात्मिकः स्मृतः ॥ ६ मृगपक्षिमनुष्याद्यैः पिशाचोर्गराक्षसैः । सरीसृपाद्यैश्च नृणां जायते चाधिभौतिकः ॥ ७ शीतवातोष्णवर्षाम्बुवैद्युतादिसमुद्भवः । तापो द्विजवर श्रेष्ठैः कथ्यते चाधिदैविकः ॥ ८ गर्भजन्मजराजानमृत्युनारकजं तथा । दुःखं सहस्रशो भेदैर्भिद्यते मुनिसत्तम ॥ ९ सुकुमारतनुर्गर्भं जन्तुर्बहुमलावृते । उल्बसंवैष्टितो भुग्नपृष्ठग्रीवास्थिसंहतिः ॥ १० अत्यन्तकटुतीक्ष्णोष्णत्ववर्णैर्मातृभोजनैः । अत्यन्ततापैरत्यर्थं वर्द्धमानातिवेदनः ॥ ११ प्रसारणाकुञ्चनादौ नाङ्गानां प्रभुरात्मनः । शक्नुम्रूत्रमहापङ्कशायी सर्वत्र पीडितः ॥ १२ निरुच्छ्वासः सचैतन्यस्मरजन्मशतान्यथ । आस्ते गर्भेऽतिदुःखेन निजकर्मानिबन्धनः ॥ १३ जायमानः पुरीषासृङ्मूत्रशुक्राविलाननः । प्राजापत्येन वातेन पीड्यमानास्थिबन्धनः ॥ १४ अधोमुखो वै क्रियते प्रबलैस्सूतिमारुतैः । क्लेशान्निष्क्रान्तिमाप्नोति जठरान्मातुरातुरः ॥ १५ मूच्छ्रामवाप्य महतीं संस्पृष्टो बाह्यवायुना । विज्ञानभ्रंशमाप्नोति जातश्च मुनिसत्तम ॥ १६ कण्टकैरिव तुन्नाङ्गः क्रकचैरिव दारितः । पूतव्रणान्निपतितो धरण्यां कुमिको यथा ॥ १७ कण्ठूयनेऽपि चाशक्तः परिवर्तैऽप्यनीश्वरः । स्नानपानादिकाहारमप्याप्नोति परेच्छया ॥ १८
शिरोरोग, प्रतिशयाय (पीनस), ज्वर, शूल, भगन्दर, गुल्म, अर्श (बवासीर), शोथ (सूजन), श्वास (दमा), छर्दि तथा नेत्ररोग, अतिसार और कुष्ठ आदि शारीरिक कष्ट-भेदसे दैहिक तापके कितने ही भेद हैं। अब मानसिक तापोंको सुनो ॥ ३-४ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! काम, क्रोध, भय, द्वेष, लोभ, मोह, विषाद, शोक, असूया (गुणोंमें दोषारोपण), अपमान, ईर्ष्या और मात्सर्य आदि भेदोंसे मानसिक तापके अनेक भेद हैं। ऐस ही नाना प्रकारके भेदोंसे युक्त तापको आध्यात्मिक कहते हैं ॥ ५-६ ॥ मनुष्योंको जो दुःख मृग, पक्षी, मनुष्य, पिशाच, सर्प, राक्षस और सरीसृप (बिच्छू) आदिसे प्राप्त होता है उसे आधिभौतिक कहते हैं ॥ ७ ॥ तथा हे द्विजवर ! शीत, उष्ण, वायु, वर्षा, जल और विद्युत् आदिसे प्राप्त हुए दुःखको श्रेष्ठ पुरुष आधिदैविक कहते हैं ॥ ८ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ ! इनके अतिरिक्त गर्भ, जन्म, जरा, अज्ञान, मृत्यु और नरकसे उत्पन्न हुए दुःखके भी सहस्रों प्रकारके भेद हैं ॥ ९ ॥ अत्यन्त मलपूर्ण गर्भाशयमें उल्ब (गर्भकी झिल्ली)-से लिपटा हुआ यह सुकुमारशरीर जीव, जिसकी पीठ और ग्रीवाकी अस्थियाँ कुण्डलाकार मुड़ी रहती हैं, माताके खाये हुए अत्यन्त तापप्रद खट्टे, कड़वे, चरपरे, गर्म और खारे पदार्थोंसे जिसकी वेदना बहुत बढ़ जाती है, जो मल-मूत्ररूप महापंकमें पड़ा-पड़ा सम्पूर्ण अंगोंमें अत्यन्त पीड़ित होनेपर भी अपने अंगोंको फैलाने या सिकोड़नेमें समर्थ नहीं होता और चेतनायुक्त होनेपर भी श्वास नहीं ले सकता, अपने सैकड़ों पूर्वजन्मोंका स्मरण कर कर्मोंसे बँधा हुआ अत्यन्त दुःखपूर्वक गर्भमें पड़ा रहता है ॥ १०-१३ ॥ उत्पन्न होनेके समय उसका मुख मल, मूत्र, रक्त और वीर्य आदिमें लिपटा रहता है और उसके सम्पूर्ण अस्थिबन्धन प्राजापत्य (गर्भको संकुचित करनेवाली) वायुसे अत्यन्त पीड़ित होते हैं ॥ १४ ॥ प्रबल प्रसूति-वायु उसका मुख नीचेको कर देती है और वह आतुर होकर बड़े क्लेशके साथ माताके गर्भाशयसे बाहर निकल पाता है ॥ १५ ॥
हे मुनिसत्तम ! उत्पन्न होनेके अनन्तर बाह्य वायुका स्पर्श होनेसे अत्यन्त मच्छित होकर वह जीव बेसुध हो जाता है ॥ १६ ॥ उस समय वह जीव दुर्गन्धयुक्त फोड़ेमेंसे गिरे हुए किसी कण्टक-विद्ध अथवा ओरसे चिरे हुए कीड़ेके समान पृथ्वीपर गिरता है ॥ १७ ॥ उसे स्वयं खुजलाने अथवा करवट लेनेकी भी शक्ति नहीं रहती। वह स्नान तथा दुग्धपानादि आहार भी दूसरेहीकी इच्छासे प्राप्त करता है ॥ १८ ॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अशुचिप्रस्तरे सुप्तः कीटदंशादिभिस्तथा।<br>भक्ष्यमाणोऽपि नैवेषां समर्थो विनिवारणे ॥ १९ | अपवित्र (मल-मूत्रादिमें सने हुए) बिस्तरपर पड़ा रहता है, उस समय कीड़े और डाँस आदि उसे काटते हैं तथापि वह उन्हें दूर करनेमें भी समर्थ नहीं होता ॥ १९ ॥ |
| जन्मदुःखान्यनेकानि जन्मनोऽनन्तराणि च।<br>बालभावे यदाप्नोति ह्याधिभौतिकादिकानि च ॥ २० | इस प्रकार जन्मके समय और उसके अनन्तर बाल्यावस्थामें जीव आधिभौतिकादि अनेकों दुःख भोगता है ॥ २० ॥ |
| अज्ञानतमसाऽऽच्छन्नो मूढान्तःकरणो नरः।<br>न जानाति कुतः कोऽहं क्वाहं गन्ता किमात्मनः ॥ २१ | अज्ञानरूप अन्धकारसे आवृत होकर मूढ़हृदय पुरुष यह नहीं जानता कि 'मैं कहाँसे आया हूँ? कौन हूँ? कहाँ जाऊँगा ? तथा मेरा स्वरूप क्या है ? ॥ २१ ॥ |
| केन बन्धेन बद्धोऽहं कारणं किमकारणम्।<br>किं कार्यं किमकार्यं वा किं वाच्यं किं च नोच्यते ॥ २२ | मैं किस बन्धनसे बँधा हूँ? इस बन्धनका क्या कारण है? अथवा यह अकारण ही प्राप्त हुआ है? मुझे क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये ? तथा क्या कहना चाहिये और क्या न कहना चाहिये ? ॥ २२ ॥ |
| को धर्मः कश्च वाधर्मः कस्मिन्व्र्तेऽथ वा कथम्।<br>किं कर्तव्यमकर्तव्यं किं वा किं गुणदोषवत् ॥ २३ | धर्म क्या है? अधर्म क्या है? किस अवस्थामें मुझे किस प्रकार रहना चाहिये ? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है? अथवा क्या गुणमय और क्या दोषमय है?' ॥ २३ ॥ |
| एवं पशुसमैर्मूढैरज्ञानप्रभवं महत्।<br>अवाप्यते नरैर्दुःखं शिश्नोदरपरायणैः ॥ २४ | इस प्रकार पशुके समान विवेकशून्य शिश्नोदर-परायण पुरुष अज्ञानजनित महान् दुःख भोगते हैं ॥ २४ ॥ |
| अज्ञानं तामसो भावः कार्यारम्भप्रवृत्तयः।<br>अज्ञानिनां प्रवर्तन्ते कर्मलोपास्ततो द्विज ॥ २५ | हे द्विज ! अज्ञान तामसिक भाव (विकार) है, अतः अज्ञानी पुरुषोंकी (तामसिक) कर्मोंके आरम्भमें प्रवृत्ति होती है; इससे वैदिक कर्मोंका लोप हो जाता है ॥ २५ ॥ |
| नरकं कर्मणां लोपात्फलमाहुर्मनीषिणः।<br>तस्मादज्ञानिनां दुःखमिह चामुत्र चोत्तमम् ॥ २६ | मनीषिजनोंने कर्म-लोपका फल नरक बतलाया है; इसलिये अज्ञानी पुरुषोंको इहलोक और परलोक दोनों जगह अत्यन्त ही दुःख भोगना पड़ता है ॥ २६ ॥ |
| जराजर्जरदेहश्च शिथिलावयवः पुमान्।<br>विगलच्छीर्णदशनो वलिस्नायुशिरावृतः ॥ २७ | शरीरके जरा-जर्जरित हो जानेपर पुरुषके अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाते हैं, उसके दाँत पुराने होकर उखड़ जाते हैं और शरीर झुर्रियों तथा नस-नाड़ियोंसे आवृत हो जाता है ॥ २७ ॥ |
| दूरप्रणष्टनयनो व्योमान्तर्गततारकः।<br>नासाविवरनिर्यांतलोमपुञ्जश्चलद्वपुः ॥ २८ | उसकी दृष्टि दूरस्थ विषयके ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाती है, नेत्रोंके तारे गोलकोंमें घुस जाते हैं, नासिकाके रन्ध्रोंमेंसे बहुत-से रोम बाहर निकल आते हैं और शरीर काँपने लगता है ॥ २८ ॥ |
| प्रकटीभूतसर्वास्थिर्नतपृष्ठास्थिसंहतिः।<br>उत्सन्नजठराग्नत्वादल्पाहारोऽल्पचेष्टितः ॥ २९ | उसकी समस्त हड्डियाँ दिखलायी देने लगती हैं, मेरुदण्ड झुक जाता है तथा जठराग्निके मन्द पड़ जानेसे उसके आहार और पुरुषार्थ कम हो जाते हैं ॥ २९ ॥ |
| कृच्छ्राच्चङ्क्रमणोत्थानशयनासनचेष्टितः।<br>मन्दीभवच्छ्रोत्रनेत्रस्रवल्लालाविलाननः ॥ ३० | उस समय उसकी चलना-फिरना, उठना-बैठना और सोना आदि सभी चेष्टाएँ बड़ी कठिनतासे होती हैं, उसके श्रोत्र और नेत्रोंकी शक्ति मन्द पड़ जाती है तथा लार बहते रहनेसे उसका मुख मलिन हो जाता है ॥ ३० ॥ |
| अनायत्तैस्समस्तैश्च करणैर्मरणोन्मुखः।<br>तत्क्षणेऽप्यनुभूतानामस्मर्त्ताखिलवस्तुनाम् ॥ ३१ | अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वाधीन न रहनेके कारण वह सब प्रकार मरणासन्न हो जाता है तथा [स्मरणशक्तिके क्षीण हो जानेसे] वह उसी समय अनुभव किये हुए समस्त पदार्थोंको भी भूल जाता है ॥ ३१ ॥ |
अ० ५ ] * षष्ठ अंश * ४४५
सकृदुच्चारिते वाक्ये समुद्भूतमहाश्रमः ।
श्वासकाशासमुद्भूतमहायासप्रजागरः ॥ ३२
अन्यैनोत्थाप्यतेऽन्येन तथा संवेश्यते जरी ।
भृत्यात्मपुत्रदाराणामवमानास्पदीकृतः ॥ ३३
प्रक्षीणाखिलशौचश्च विहाराहारस्पृहः ।
हास्यः परिजनस्यापि निर्विण्णाशेषबान्धवः ॥ ३४
अनुभूतमिवान्यस्मिञ्जन्मन्त्यात्मविचेष्टितम् ।
संस्मरन्यौवने दीर्घं निःश्वसत्यभितापितः ॥ ३५
एवमादीनि दुःखानि जरायामनुभूय वै ।
मरणे यानि दुःखानि प्राप्नोति शृणु तान्यपि ॥ ३६
श्लथद्ग्रीवाङ्घ्रिहस्तोऽथ व्याप्तो वेपथुना भृशम् ।
मुहुर्म्लानिपरवशो मुहुर्ज्ञानलवान्वितः ॥ ३७
हिरण्यधान्यतनयभार्याभृत्यगृहादिषु ।
एते कथं भविष्यन्तीत्यतीव ममताकुलः ॥ ३८
मर्मभिद्भिर्महारोगैः क्रकचैरिव दारुणैः ।
शरैरिवान्तकस्योग्रैश्छिद्यमानासुबन्धनः ॥ ३९
परिवर्तितताराक्षो हस्तपादं मुहुः क्षिपन् ।
संशुष्यमाणताल्वोष्ठपुटो घुरघुरायते ॥ ४०
निरुद्धकण्ठो दोषौघैरुदानश्वासपीडितः ।
तापेन महता व्याप्तस्तृषा चार्त्तस्तथा क्षुधा ॥ ४१
क्लेशादुत्क्रान्तिमाप्नोति यमकिङ्करपीडितः ।
ततश्च यातनादेहं क्लेशेन प्रतिपद्यते ॥ ४२
एतान्यन्यानि चोग्राणि दुःखानि मरणे नृणाम् ।
शृणुष्व नरके यानि प्राप्यन्ते पुरुषैर्मृतैः ॥ ४३
याम्यकिङ्करपाशादिग्रहणं दण्डताडनम् ।
यमस्य दर्शनं चोग्रमुग्रमार्गविलोकनम् ॥ ४४
[ हिन्दी अनुवाद ]
उसे एक वाक्य उच्चारण करनेमें भी महान् परिश्रम होता है तथा श्वास और खाँसी आदिके महान् कष्टके कारण वह [दिन-रात] जागता रहता है ॥ ३२ ॥ वृद्ध पुरुष औरोंकी सहायतासे ही उठता तथा औरोंके बिठानेसे ही बैठ सकता है, अतः वह अपने सेवक और स्त्री-पुत्रादिके लिये सदा अनादरका पात्र बना रहता है ॥ ३३ ॥ उसका समस्त शौचाचार नष्ट हो जाता है तथा भोग और भोजनकी लालसा बढ़ जाती है; उसके परिजन भी उसकी हँसी उड़ाते हैं और बन्धुजन उससे उदासीन हो जाते हैं ॥ ३४ ॥ अपनी युवावस्थाकी चेष्टाओंको अन्य जन्ममें अनुभव की हुई-सी स्मरण करके वह अत्यन्त सन्तापवश दीर्घ निःश्वास छोड़ता रहता है ॥ ३५ ॥
इस प्रकार वृद्धावस्थामें ऐसे ही अनेकों दुःख अनुभव कर उसे मरणकालमें जो कष्ट भोगने पड़ते हैं वे भी सुनो ॥ ३६ ॥ कण्ठ और हाथ-पैर शिथिल पड़ जाते तथा शरीरमें अत्यन्त कम्प छा जाता है। बार-बार उसे ग्लानि होती और कभी कुछ चेतना भी आ जाती है ॥ ३७ ॥ उस समय वह अपने हिरण्य (सोना), धन-धान्य, पुत्र-स्त्री, भृत्य और गृह आदिके प्रति 'इन सबका क्या होगा ?' इस प्रकार अत्यन्त ममतासे व्याकुल हो जाता है ॥ ३८ ॥ उस समय मर्मभेदी क्रकच (आरे) तथा यमराजके विकराल बाणके समान महाभयंकर रोगोंसे उसके प्राण-बन्धन कटने लगते हैं ॥ ३९ ॥ उसकी आँखोंके तारे चढ़ जाते हैं, वह अत्यन्त पीड़ासे बारम्बार हाथ-पैर पटकता है तथा उसके तालु और ओठ सूखने लगते हैं ॥ ४० ॥ फिर क्रमशः दोष-समूहसे उसका कण्ठ रुक जाता है अतः वह 'घरघर' शब्द करने लगता है; तथा ऊर्ध्वश्वाससे पीड़ित और महान् तापसे व्याप्त होकर क्षुधा-तृष्णासे व्याकुल हो उठता है ॥ ४१ ॥ ऐसी अवस्थामें भी यमदूतोंसे पीड़ित होता हुआ वह बड़े क्लेशसे शरीर छोड़ता है और अत्यन्त कष्टसे कर्मफल भोगनेके लिये यातना-देह प्राप्त करता है ॥ ४२ ॥ मरणकालमें मनुष्योंको ये और ऐसे ही अन्य भयानक कष्ट भोगने पड़ते हैं; अब, मरणोपरान्त उन्हें नरकमें जो यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं वह सुनो— ॥ ४३ ॥
प्रथम यम-किंकर अपने पाशोंमें बाँधते हैं; फिर उनके दण्ड-प्रहार सहने पड़ते हैं, तदनन्तर यमराजका दर्शन होता है और वहाँतक पहुँचनेमें बड़ा दुर्गम मार्ग देखना पड़ता है ॥ ४४ ॥
४४६
- श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ५ ]
करम्भबालुकावह्निग्रन्थशस्त्रादिभीषणे । प्रत्येकं नरके याश्च यातना द्विज दुःसहाः ॥ ४५ क्रकचैः पाट्यमानानां मूषायां चापि दहताम्* । कुठारैः कृत्यमानानां भूमौ चापि निखन्यताम् ॥ ४६ शूलैर्बाराण्यमाणानां व्याघ्रवक्त्रे प्रवेश्यताम् । गुधैस्सम्भक्ष्यमाणानां द्वीपिभिश्चोपभुज्यताम् ॥ ४७ क्वाथ्यतां तैलमध्ये च किलघतां क्षारकर्दमे । उच्चान्निपात्यमानानां क्षिप्यतां क्षेपयन्त्रकैः ॥ ४८ नरके यानि दुःखानि पापहेतूद्भवानि वै । प्राप्यन्ते नारकैर्विप्र तेषां संख्या न विद्यते ॥ ४९ न केवलं द्विजश्रेष्ठ नरके दुःखपद्धतिः । स्वर्गैऽपि पातभीतस्य क्षयिणोर्नास्ति निर्वृत्तिः ॥ ५० पुनश्च गर्भं भवति जायते च पुनः पुनः । गर्भं विलीयते भूयो जायमानोऽस्तमेति वै ॥ ५१ जातमात्रश्च प्रियते बालभावेऽथ यौवने । मध्यमं वा वयः प्राप्य बार्द्धके वाथ वा मृतिः ॥ ५२ यावज्जीवति तावच्च दुःखैर्नानाविधैः प्लुतः । तन्तुकारणपक्षमौधैरास्ते कार्पासबीजवत् ॥ ५३ द्रव्यनाशे तथोत्पत्तौ पालने च सदा नृणाम् । भवन्त्यनेकदुःखानि तथैवेष्टविपत्तिषु ॥ ५४ यद्यत्प्रीतिकरं पुंसां वस्तु मैत्रेय जायते । तदेव दुःखवृक्षस्य बीजत्वमुपगच्छति ॥ ५५ कलत्रपुत्रमित्रार्थगृहक्षेत्रधनादिकैः । क्रियते न तथा भूरि सुखं पुंसां यथाऽसुखम् ॥ ५६ इति संसारदुःखार्कतापतापितचेतसाम् । विमुक्तिपादपच्छायामृते कुत्र सुखं नृणाम् ॥ ५७ तदस्य त्रिविधस्यापि दुःखजातस्य वै मम । गर्भजन्मजराद्येषु स्थानेषु प्रभविष्यतः ॥ ५८ निरस्तातिशयाह्लादसुखभावेकलक्षणा । भेषजं भगवत्प्राप्तिरेकान्तात्यन्तिकौ मता ॥ ५९ तस्मात्तत्प्राप्तये यलः कर्तव्यः पण्डितैर्नैरैः । तत्प्राप्तिहेतुर्ज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने ॥ ६०
हे द्विज! फिर तप्त बालुका, अग्नि-यन्त्र और शस्त्रादिसे महाभयंकर नरकोंमें जो यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं वे अत्यन्त असह्य होती हैं ॥ ४५ ॥ आरसे चौर जाने, मूसमें तपाये जाने, कुल्हाड़ीसे काटे जाने, भूमिमें गाड़े जाने, शूलपर चढ़ाये जाने, सिंहके मुखमें डाले जाने, गिद्धोंके नोचने, हाथियोंसे दलित होने, तैलमें पकाये जाने, खारे दलदलमें फँसने, ऊपर ले जाकर नीचे गिराये जाने और क्षेपण-यन्त्रद्वारा दूर फेंके जानेसे नरकनिवासियोंको अपने पाप-कर्मके कारण जो-जो कष्ट उठाने पड़ते हैं उनकी गणना नहीं हो सकती ॥ ४६—४९ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ! केवल नरकमें ही दुःख हों, सो बात नहीं है, स्वर्गमें भी पतनका भय लगे रहनेसे कभी शान्ति नहीं मिलती ॥ ५० ॥ [नरक अथवा स्वर्ग-भोगके अनन्तर] बार-बार वह गर्भमें आता है और जन्म ग्रहण करता है तथा फिर कभी गर्भमें ही नष्ट हो जाता है और कभी जन्म लेते ही मर जाता है ॥ ५१ ॥ जो उत्पन्न हुआ है वह जन्मते ही, बाल्यावस्थामें, युवावस्थामें, मध्यमवयममें अथवा जराग्रस्त होनेपर अवश्य मर जाता है ॥ ५२ ॥ जबतक जीता है तबतक नाना प्रकारके कष्टोंसे घिरा रहता है, जिस तरह कि कपासका बीज तन्तुओंके कारण सूत्रोंसे घिरा रहता है ॥ ५३ ॥ द्रव्यके उपार्जन, रक्षण और नाशमें तथा इष्ट-मित्रोंके विपत्तिग्रस्त होनेपर भी मनुष्योंको अनेकों दुःख उठाने पड़ते हैं ॥ ५४ ॥
हे मैत्रेय! मनुष्योंको जो-जो वस्तुएँ प्रिय हैं, वे सभी दुःखरूपी वृक्षका बीज हो जाती हैं ॥ ५५ ॥ स्त्री, पुत्र, मित्र, अर्थ, गृह, क्षेत्र और धन आदिसे पुरुषोंको जैसा दुःख होता है वैसा सुख नहीं होता ॥ ५६ ॥ इस प्रकार सांसारिक दुःखरूप सूर्यके तापसे जिनका अन्तःकरण तप्त हो रहा है उन पुरुषोंको मोक्षरूपी वृक्षकी [घनी] छायाको छोड़कर और कहाँ सुख मिल सकता है? ॥ ५७ ॥ अतः मेरे मतमें गर्भ, जन्म और जरा आदि स्थानोंमें प्रकट होनेवाले आध्यात्मिकादि त्रिविध दुःख-समूहकी एकमात्र सनातन औषधि भगवत्प्राप्ति ही है जिसका निरतिशय आनन्दरूप सुखकी प्राप्ति कराना ही प्रधान लक्षण है ॥ ५८-५९ ॥ इसलिये पण्डितजनोंको भगवत्प्राप्तिका प्रयत्न करना चाहिये। हे महामुने! कर्म और ज्ञान—ये दो ही उसकी प्राप्तिके कारण कहे गये हैं ॥ ६० ॥
*दहतामित्यादिषु परस्मैपदमार्पम्।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अ० ५ ]
- षष्ठ अंश *
४४७
आगमोत्थं विवेकाच्च द्विधा ज्ञानं तदुच्यते । शब्दब्रह्मागममयं परं ब्रह्म विवेकजम् ॥ ६१ अन्धं तम इवाज्ञानं दीपवच्छेन्द्रियोद्भवम् । यथा सूर्यस्तथा ज्ञानं यद्विप्रर्षे विवेकजम् ॥ ६२ मनुरप्याह वेदार्थं स्मृत्वा यन्मुनिसत्तम । तदेतच्छ्रुयतामत्र सम्बन्धे गदतो मम ॥ ६३ द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ६४ द्वे वै विद्ये वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुतिः । परया त्वक्षरप्राप्तिर्हृगवेदादिमयापरा ॥ ६५ यतदव्यक्तमजरमचिन्त्यमजमव्ययम् । अनिर्देश्यमरूपं च पाणिपादाद्यसंयुतम् ॥ ६६ विभुं सर्वगतं नित्यं भूतयोनिकारणम् । व्याप्यव्याप्तं यतः सर्वं यद्दृष्टं पश्यन्ति सूरयः ॥ ६७ तद्वब्रह्म तत्परं धाम तद्धृयेयं मोक्षकाङ्क्षिभिः । श्रुतिवाक्योदितं सूक्ष्मं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ६८ तदेव भगवद्व्याच्यं स्वरूपं परमात्मनः । वाचको भगवच्छब्दस्तस्याद्यस्याक्षयात्मनः ॥ ६९ एवं निगदितार्थस्य तत्तत्त्वं तस्य तत्त्वतः । ज्ञायते येन तज्ज्ञानं परमन्यत्रवीमयम् ॥ ७० अशब्दगोचरस्यापि तस्य वै ब्रह्मणो द्विज । पूजायां भगवच्छब्दः क्रियते ह्युपचारतः ॥ ७१ शुद्धे महाविभूत्याख्ये परे ब्रह्मणि शब्दते । मैत्रेय भगवच्छब्दस्सर्वकारणकारणे ॥ ७२ सम्भर्तैति तथा भर्ता भकारोऽर्थद्वयान्वितः । नेता गमयिता स्वष्टा गकारार्थस्तथा मुने ॥ ७३ ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्चिन्नयः । ज्ञानवैराग्ययोरुचैव षण्णां भग इतीरणा ॥ ७४ वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि । स च भूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः ॥ ७५
ज्ञान दो प्रकारका हैं—शास्त्रजन्य तथा विवेकज। शब्दब्रह्मका ज्ञान शास्त्रजन्य है और परब्रह्मका बोध विवेकज ॥ ६१ ॥ हे विप्रर्षे ! अज्ञान चोर अन्धकारके समान है। उसको नष्ट करनेके लिये शास्त्रजन्य* ज्ञान दीपकवत् और विवेकज ज्ञान सूर्यके समान है ॥ ६२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! इस विषयमें वेदार्थका स्मरणकर मनुजीने जो कुछ कहा है वह बतलाता हूँ, श्रवण करो ॥ ६३ ॥
ब्रह्म दो प्रकारका है—शब्दब्रह्म और परब्रह्म। शब्दब्रह्म (शास्त्रजन्य ज्ञान) -में निपुण हो जानेपर जिज्ञासु [विवेकज ज्ञानके द्वारा] परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है ॥ ६४ ॥ अथर्ववेदकी श्रुति है कि विद्या दो प्रकारकी है—परा और अपरा। परासे अक्षर ब्रह्मकी प्राप्ति होती है और अपरा ब्रह्मादि वेदत्रयीरूपा है ॥ ६५ ॥ जो अव्यक्त, अजर, अचिन्त्य, अज, अव्यय, अनिर्देश्य, अरूप, पाणि-पादादिशून्य, व्यापक, सर्वगत, नित्य, भूतोंका आदिकारण, स्वयं कारणहीन तथा जिससे सम्पूर्ण व्याप्य और व्यापक प्रकट हुआ है और जिसे पण्डितजन [ज्ञाननेत्रोंसे] देखते हैं वह परमधाम ही ब्रह्म है, मुमुक्षुओंको उसीका ध्यान करना चाहिये और वही भगवान् विष्णुका वेदवचनोंसे प्रतिपादित अति सूक्ष्म परमपद है ॥ ६६—६८ ॥ परमात्माका वह स्वरूप ही 'भगवत्' शब्दका वाच्य है और भगवत् शब्द ही उस आद्य एवं अक्षय स्वरूपका वाचक है ॥ ६९ ॥
जिसका ऐसा स्वरूप बतलाया गया है उस परमात्माके तत्त्वका जिसके द्वारा वास्तविक ज्ञान होता है वही परमज्ञान (परा विद्या) है। त्रयीमय ज्ञान (कर्मकाण्ड) इससे पृथक् (अपरा विद्या) है ॥ ७० ॥ हे द्विज ! वह ब्रह्म यद्यपि शब्दका विषय नहीं है तथापि आदरप्रदर्शनके लिये उसका 'भगवत्' शब्दसे उपचारतः कथन किया जाता है ॥ ७१ ॥ हे मैत्रेय ! समस्त कारणोंके कारण, महाविभूतिसंज्ञक परब्रह्मके लिये ही 'भगवत्' शब्दका प्रयोग हुआ है ॥ ७२ ॥ इस ('भगवत्' शब्द) -में भकारके दो अर्थ हैं—पोषण करनेवाला और सबका आधार तथा गकारके अर्थ कर्म-फल प्राप्त करनेवाला, लय करनेवाला और रचयिता हैं ॥ ७३ ॥ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—इन छःका नाम 'भग' है ॥ ७४ ॥ उस अखिल भूतात्मामें समस्त भूतगण निवास करते हैं और वह स्वयं भी समस्त भूतोंमें विराजमान है, इसलिये वह अव्यय (परमात्मा) ही वकारका अर्थ है ॥ ७५ ॥
- श्रवण-इन्द्रियद्वारा शास्त्रका ग्रहण होता है; इसलिये शास्त्रजन्य ज्ञान ही 'इन्द्रियोद्भव' शब्दसे कहा गया है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| एवमेष महाञ्छब्दो मैत्रेय भगवानिति।<br>परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः॥ ७६ | हे मैत्रेय! इस प्रकार यह महान् 'भगवान्' शब्द परब्रह्मस्वरूप श्रीवासुदेवका ही वाचक है, किसी औरका नहीं॥ ७६॥ |
| तत्र पूज्यपदार्थोक्तिपरिभाषासमन्वितः।<br>शब्दोऽयं नोपचारेण त्वन्यत्र ह्युपचारतः॥ ७७ | पूज्य पदार्थोंको सूचित करनेके लक्षणसे युक्त इस 'भगवान्' शब्दका परमात्मामें मुख्य प्रयोग है तथा औरोंके लिये गौण॥ ७७॥ |
| उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।<br>वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥ ७८ | क्योंकि जो समस्त प्राणियोंके उत्पत्ति और नाश, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जानता है वही भगवान् कहलानेयोग्य है॥ ७८॥ |
| ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः।<br>भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः॥ ७९ | त्याग करनेयोग्य [त्रिविध] गुण [और उनके क्लेश] आदिको छोड़कर ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदि सद्गुण ही 'भगवत्' शब्दके वाच्य हैं॥ ७९॥ |
| सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि।<br>भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः॥ ८० | उन परमात्मामें ही समस्त भूत बसते हैं और वे स्वयं भी सबके आत्मरूपसे सकल भूतोंमें विराजमान हैं, इसलिये उन्हें वासुदेव भी कहते हैं॥ ८०॥ |
| खाण्डिक्यजनकायाह पृष्टः केशिध्वजः पुरा।<br>नामव्याख्यामनन्तस्य वासुदेवस्य तत्त्वतः॥ ८१ | पूर्वकालमें खाण्डिक्य जनकके पूछनेपर केशिध्वजने उनसे भगवान् अनन्तके 'वासुदेव' नामकी यथार्थ व्याख्या इस प्रकार की थी॥ ८१॥ |
| भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानि यत्।<br>धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः॥ ८२ | 'प्रभु समस्त भूतोंमें व्याप्त हैं और सम्पूर्ण भूत भी उन्हींमें रहते हैं तथा वे ही संसारके रचयिता और रक्षक हैं; इसलिये वे 'वासुदेव' कहलाते हैं'॥ ८२॥ |
| स सर्वभूतप्रकृतिं विकारान्-<br>$\quad$गुणादिदोषांश्च मुने व्यतीतः।<br>अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा<br>$\quad$तेनास्तृतं यद्भुवनान्तराले॥ ८३ | हे मुने! वे सर्वात्मा समस्त आवरणोंसे परे हैं। वे समस्त भूतोंकी प्रकृति, प्रकृतिके विकार तथा गुण और उनके कार्य आदि दोषोंसे विलक्षण हैं! पृथिवी और आकाशके बीचमें जो कुछ स्थित है उन्होंने वह सब व्याप्त किया है॥ ८३॥ |
| समस्तकल्याणगुणात्मकोऽसौ<br>$\quad$स्वशक्तिलेशावृतभूतवर्गः।<br>इच्छागृहीताभि मतोरुदेह-<br>$\quad$स्संसाधिताशेषजगद्धितो यः॥ ८४ | वे सम्पूर्ण कल्याण-गुणोंके स्वरूप हैं, उन्होंने अपनी मायाशक्तिके लेशमात्रसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंको व्याप्त किया है और वे अपनी इच्छासे स्वमनोऽनुकूल महान् शरीर धारणकर समस्त संसारका कल्याण-साधन करते हैं॥ ८४॥ |
| तेजोबलैश्वर्यमहावबोध-<br>$\quad$सुवीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः।<br>परः पराणां सकला न यत्र<br>$\quad$क्लेशादयस्सन्ति परावरेशे॥ ८५ | वे तेज, बल, ऐश्वर्य, महाविज्ञान, वीर्य और शक्ति आदि गुणोंकी एकमात्र राशि हैं, प्रकृति आदिसे भी परे हैं और उन परावरेश्वरमें अविद्यादि सम्पूर्ण क्लेशोंका अत्यन्ताभाव है॥ ८५॥ |
| स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपो<br>$\quad$व्यक्तस्वरूपोऽप्रकटस्वरूपः।<br>सर्वेश्वरस्सर्वदृक् सर्ववेत्ता<br>$\quad$समस्तशक्तिः परमेश्वराख्यः॥ ८६ | वे ईश्वर ही समष्टि और व्यष्टिरूप हैं, वे ही व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप हैं, वे ही सबके स्वामी, सबके साक्षी और सब कुछ जाननेवाले हैं तथा उन्हीं सर्वशक्तिमान्की परमेश्वर संज्ञा है॥ ८६॥ |
| संज्ञायते येन तदस्तदोषं<br>$\quad$शुद्धं परं निर्मलमेकरूपम्।<br>संदृश्यते वाप्यवगम्यते वा<br>$\quad$तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम् ॥ ८७ | जिसके द्वारा वे निर्दोष, विशुद्ध, निर्मल और एकरूप परमात्मा देखे या जाने जाते हैं उसीका नाम ज्ञान (परा विद्या) है और जो इसके विपरीत है वही अज्ञान (अपरा विद्या) है॥ ८७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अ० ६ ] * षष्ठ अंश * ४४९
छठा अध्याय
केशिध्वज और खाण्डिक्यकी कथा
श्रीपराशर उवाच
स्वाध्यायसंयमाभ्यां स दृश्यते पुरुषोत्तमः ।
तत्प्राप्तिकारणं ब्रह्म तदेतदिति पठ्यते ॥ १
**श्रीपराशरजी बोले—**वे पुरुषोत्तम स्वाध्याय और संयमद्वारा देखे जाते हैं, ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण होनेसे ये भी ब्रह्म ही कहलाते हैं॥ १॥
स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमावसेत् ।
स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥ २
स्वाध्यायसे योगका और योगसे स्वाध्यायका आश्रय करे। इस प्रकार स्वाध्याय और योगरूप सम्पत्तिसे परमात्मा प्रकाशित (ज्ञानके विषय) होते हैं॥ २॥
तदीक्षणाय स्वाध्यायश्चक्षुर्योगस्तथा परम् ।
न मांसचक्षुषा द्रष्टुं ब्रह्मभूतस्स शक्यते ॥ ३
ब्रह्मस्वरूप परमात्माको मांसमय चक्षुओंसे नहीं देखा जा सकता, उन्हें देखनेके लिये स्वाध्याय और योग ही दो नेत्र हैं॥ ३॥
श्रीमैत्रेय उवाच
भगवंस्तमहं योगं ज्ञातुमिच्छामि तं वद ।
ज्ञाते यत्राखिलाधारं पश्येयं परमेश्वरम् ॥ ४
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! जिसे जान लेनेपर मैं अखिलाधार परमेश्वरको देख सकूँगा उस योगको मैं जानना चाहता हूँ; उसका वर्णन कीजिये॥ ४॥
श्रीपराशर उवाच
यथा केशिध्वजः प्राह खाण्डिक्याय महात्मने ।
जनकाय पुरा योगं तमहं कथयामि ते ॥ ५
**श्रीपराशरजी बोले—**पूर्वकालमें जिस प्रकार इस योगका केशिध्वजने महात्मा खाण्डिक्य जनकसे वर्णन किया था मैं तुम्हें वही बतलाता हूँ॥ ५॥
श्रीमैत्रेय उवाच
खाण्डिक्यः कोऽभवद्ब्रह्मन्को वा केशिध्वजः कृती ।
कथं तयोश्च संवादो योगसम्बन्धवानभूत् ॥ ६
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**ब्रह्मन्! यह खाण्डिक्य और विद्वान् केशिध्वज कौन थे? और उनका योगसम्बन्धी संवाद किस कारणसे हुआ था? ॥ ६॥
श्रीपराशर उवाच
धर्मध्वजो वै जनकस्तस्य पुत्रोऽमितध्वजः ।
कृतध्वजश्च नाम्नासीत्सदाध्यात्मरतिर्नृपः ॥ ७
**श्रीपराशरजी बोले—**पूर्वकालमें धर्मध्वज जनक नामक एक राजा थे। उनके अमितध्वज और कृतध्वज नामक दो पुत्र हुए। इनमें कृतध्वज सर्वदा अध्यात्मशास्त्रमें रत रहता था॥ ७॥
कृतध्वजस्य पुत्रोऽभूत् ख्यातः केशिध्वजो नृपः ।
पुत्रोऽमितध्वजस्यापि खाण्डिक्यजनकोऽभवत् ॥ ८
कृतध्वजका पुत्र केशिध्वज नामसे विख्यात हुआ और अमितध्वजका पुत्र खाण्डिक्य जनक हुआ॥ ८॥
कर्ममार्गेण खाण्डिक्यः पृथिव्यामभवत्कृती ।
केशिध्वजोऽप्यतीवासीदात्मविद्याविशारदः ॥ ९
पृथिवीमण्डलमें खाण्डिक्य कर्म-मार्गमें अत्यन्त निपुण था और केशिध्वज अध्यात्मविद्याका विशेषज्ञ था॥ ९॥
तावुभावपि चैवास्तां विजिगीषू परस्परम् ।
केशिध्वजेन खाण्डिक्यस्स्वराज्यादवरोपितः ॥ १०
वे दोनों परस्पर एक-दूसरेको पराजित करनेकी चेष्टामें लगे रहते थे। अन्तमें, कालक्रमसे केशिध्वजने खाण्डिक्यको राज्यच्युत कर दिया॥ १०॥
पुरोधसा मन्त्रिभिश्च समवेतोऽल्पसाधनः ।
राज्यान्निराकृतस्सोऽथ दुर्गारण्यचरोऽभवत् ॥ ११
राज्यभ्रष्ट होनेपर खाण्डिक्य पुरोहित और मन्त्रियोंके सहित थोड़ी-सी सामग्री लेकर दुर्गम वनोंमें चला गया॥ ११॥
इयाज सोऽपि सुबहून्यज्ञाञ्ज्ञानव्यपाश्रयः ।
ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय तर्तुं मृत्युमविद्यया ॥ १२
केशिध्वज ज्ञाननिष्ठ था तो भी अविद्या (कर्म)-द्वारा मृत्युको पार करनेके लिये ज्ञानदृष्टि रखते हुए उसने अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया॥ १२॥
४५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
एकदा वर्तमानस्य यागे योगविदां वर।
धर्मधेनुं जघानोग्रश्शार्दूलो विजने वने॥ १३
ततो राजा हतां श्रुत्वा धेनुं व्याघ्रेण चर्त्विजः।
प्रायश्चित्तं स पप्रच्छ किमत्रेति विधीयताम्॥ १४
तेऽप्यूचुर्न वयं विद्मः कशेरुः पृच्छ्यतामिति।
कशेरुरपि तेनोक्तस्तथैव प्राह भार्गवम्॥ १५
शुनकं पृच्छ राजेन्द्र नाहं वेद्मि स वेत्स्यति।
स गत्वा तमपृच्छच्च सोऽप्याह शृणु यन्मुने॥ १६
न कशेरुर्न चैवाहं न चान्यः साम्प्रतं भुवि।
वेत्त्येक एव त्वच्छत्रुः खाण्डिक्यो यो जितस्त्वया॥ १७
स चाहं तं व्रजाम्येष प्रष्टुमात्मरिपुं मुने।
प्राप्त एव महायज्ञो यदि मां स हनिष्यति॥ १८
प्रायश्चित्तमशेषेण स चेत्पृष्टो वदिष्यति।
ततश्चाविकलो यागो मुनिश्रेष्ठ भविष्यति॥ १९
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा रथमारुह्य कृष्णाजिनधरो नृपः।
वनं जगाम यत्रास्ते स खाण्डिक्यो महामतिः॥ २०
तमापतन्तमालोक्य खाण्डिक्यो रिपुमात्मनः।
प्रोवाच क्रोधताम्राक्षस्स्मारोपितकार्मुकः॥ २१
खाण्डिक्य उवाच
कृष्णाजिनं त्वं कवचमाबध्यास्मान्हनिष्यसि।
कृष्णाजिनधरे वेत्सि न मयि प्रहरिष्यति॥ २२
मृगाणां वद पृष्ठेषु मूढ कृष्णाजिनं न किम्।
येषां मया त्वया चोग्राः प्रहिताशितसायकाः॥ २३
स त्वामहं हनिष्यामि न मे जीवन्विमोक्ष्यसे।
आतताय्यसि दुर्बुद्धे मम राज्यहरो रिपुः॥ २४
केशिध्वज उवाच
खाण्डिक्य संशयं प्रष्टुं भवन्तमहमागतः।
न त्वां हन्तुं विचार्यैतत्कोपं बाणं विमुञ्च वा॥ २५
श्रीपराशर उवाच
ततस्स मन्त्रिभिस्सार्द्धमेकान्ते सपुरोहितः।
मन्त्रयामास खाण्डिक्यस्सर्वैरेव महामतिः॥ २६
हे योगिश्रेष्ठ ! एक दिन जब राजा केशिध्वज यज्ञानुष्ठानमें स्थित थे उनकी धर्मधेनु (हविके लिये दूध देनेवाली गौ)-को निर्जन वनमें एक भयंकर सिंहने मार डाला॥ १३॥ व्याघ्रद्वारा गौको मारी गयी सुन राजाने ऋत्विजोंने पूछा कि 'इसमें क्या प्रायश्चित्त करना चाहिये?'॥ १४॥ ऋत्विजोंने कहा—'हम [इस विषयमें] नहीं जानते; आप कशेरुसे पूछिये।' जब राजाने कशेरुसे यह बात पूछी तो उन्होंने भी उसी प्रकार कहा कि 'हे राजेन्द्र! मैं इस विषयमें नहीं जानता। आप भृगुपुत्र शौनकसे पूछिये, वे अवश्य जानते होंगे।' हे मुने! जब राजाने शुनकसे जाकर पूछा तो उन्होंने भी जो कुछ कहा, वह सुनिये—॥ १५-१६॥
''इस समय भूमण्डलमें इस बातको न कशेरु जानता है, न मैं जानता हूँ और न कोई और ही जानता है, केवल जिसे तुमने परास्त किया है वह तुम्हारा शत्रु खाण्डिक्य ही इस बातको जानता है''॥ १७॥ यह सुनकर केशिध्वजने कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ! मैं अपने शत्रु खाण्डिक्यसे ही यह बात पूछने जाता हूँ। यदि उसने मुझे मार दिया तो भी मुझे महायज्ञका फल तो मिल ही जायगा और यदि मेरे पूछनेपर उसने मुझे सारा प्रायश्चित्त यथावत् बतला दिया तो मेरा यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जायगा'॥ १८-१९॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर राजा केशिध्वज कृष्ण मृगचर्म धारणकर रथपर आरूढ़ हो वनमें, जहाँ महामति खाण्डिक्य रहते थे, आये॥ २०॥ खाण्डिक्यने अपने शत्रुको आते देखकर धनुष चढ़ा लिया और क्रोधसे नेत्र लाल करके कहा—॥ २१॥
**खाण्डिक्य बोले—**अरे! क्या तू कृष्णाजिनरूप कवच बाँधकर हमलोगोंको मारेगा? क्या तू यह समझता है कि कृष्ण मृगचर्म धारण किये हुए मुझपर यह प्रहार नहीं करेगा?॥ २२॥ हे मूढ़! मृगोंकी पीठपर क्या कृष्ण मृगचर्म नहीं होता, जिनपर कि मैंने और तूने दोनोंहीने तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा की है॥ २३॥ अतः अब मैं तुझे अवश्य मारूँगा, तू मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकता। हे दुर्बुद्धे! तू मेरा राज्य छीननेवाला शत्रु है, इसलिये आततायी है॥ २४॥
**केशिध्वज बोले—**हे खाण्डिक्य! मैं आपसे एक सन्देह पूछनेके लिये आया हूँ, आपको मारनेके लिये नहीं आया, इस बातको सोचकर आप मुझपर क्रोध अथवा बाण छोड़ दीजिये॥ २५॥
**श्रीपराशरजी बोले—**यह सुनकर महामति
अ० ६ ] * षष्ठ अंश * ४५१
तमूचुर्मन्त्रिणो वध्यो रिपुरेष वशं गतः ।
हतेऽस्मिन्पृथिवी सर्वा तव वश्या भविष्यति ॥ २७
खाण्डिक्यश्चाह तान्सर्वानेवमेतन्न संशयः ।
हतेऽस्मिन्पृथिवी सर्वा मम वश्या भविष्यति ॥ २८
परलोकजयस्तस्य पृथिवी सकला मम ।
न हन्मि चेल्लोकजयो मम तस्य वसुन्धरा ॥ २९
नाहं मन्ये लोकजयादधिका स्याद्वसुन्धरा ।
परलोकजयोऽनन्तस्स्वल्पकालो महीजयः ॥ ३०
तस्मान्नैतं हनिष्यामि यत्पृच्छति वदामि तत् ॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
ततस्तमभ्युपेत्याह खाण्डिक्यजनको रिपुम् ।
प्रष्टव्यं यत्त्वया सर्वं तत्पृच्छस्व वदाम्यहम् ॥ ३२
ततस्सर्वं यथावृत्तं धर्मधेनुवधं द्विज ।
कथयित्वा स पप्रच्छ प्रायश्चित्तं हि तद्गतम् ॥ ३३
स चाचष्ट यथान्यायं द्विज केशिध्वजाय तत् ।
प्रायश्चित्तमशेषेण यद्वै तत्र विधीयते ॥ ३४
विदितार्थस्स तेनैव ह्यनुज्ञातो महात्मना ।
यागभूमिमुपागम्य चक्रे सर्वाः क्रियाः क्रमात् ॥ ३५
क्रमेण विधिवद्यागं नीत्वा सोऽवभृथाप्लुतः ।
कृतकृत्यस्ततो भूत्वा चिन्तयामास पार्थिवः ॥ ३६
पूजिताश्च द्विजास्सर्वे सदस्या मानिता मया ।
तथैवार्थिजनोऽप्यर्थैर्योजितोऽभिमतैर्मया ॥ ३७
यथार्हमस्य लोकस्य मया सर्वं विचेष्टितम् ।
अनिष्पन्नक्रियं चेतस्तथापि मम किं यथा ॥ ३८
इत्थं सञ्चिन्तयन्नेव सस्मार स महीपतिः ।
खाण्डिक्याय न दत्तेति मया वै गुरुदक्षिणा ॥ ३९
स जगाम तदा भूयो रथमारुह्य पार्थिवः ।
मैत्रेय दुर्गगहनं खाण्डिक्यो यत्र संस्थितः ॥ ४०
खाण्डिक्योऽपि पुनर्द्दृष्ट्वा तमायान्तं धृतायुधम् ।
तस्थौ हन्तुं कृतमतिस्तमाह स पुनर्नृपः ॥ ४१
भो नाहं तेऽपराधाय प्राप्तः खाण्डक्य मा क्रुधः ।
गुरोर्निष्क्रयदानाय मामवेहि त्वमागतम् ॥ ४२
खाण्डिक्यने अपने सम्पूर्ण पुरोहित और मन्त्रियोंसे एकान्तमें सलाह की॥ २६॥ मन्त्रियोंने कहा कि 'इस समय शत्रु आपके वशमें है, इसे मार डालना चाहिये। इसको मार देनेपर यह सम्पूर्ण पृथिवी आपके अधीन हो जायगी'॥ २७॥ खाण्डिक्यने कहा—"यह निस्सन्देह ठीक है, इसके मारे जानेपर अवश्य सम्पूर्ण पृथिवी मेरे अधीन हो जायगी; किन्तु इसे पारलौकिक जय प्राप्त होगी और मुझे सम्पूर्ण पृथिवी। परन्तु यदि इसे नहीं मारूँगा तो मुझे पारलौकिक जय प्राप्त होगी और इसे सारी पृथिवी॥ २८-२९॥ मैं पारलौकिक जयसे पृथिवीको अधिक नहीं मानता; क्योंकि परलोक-जय अनन्तकालके लिये होती है और पृथिवी तो थोड़े ही दिन रहती है। इसलिये मैं इसे मारूँगा नहीं, यह जो कुछ पूछेगा, बतला दूँगा"॥ ३०-३१॥
**श्रीपराशरजी बोले—**तब खाण्डिक्य जनकने अपने शत्रु केशिध्वजके पास आकर कहा—'तुम्हें जो कुछ पूछना हो पूछ लो, मैं उसका उत्तर दूँगा'॥ ३२॥
हे द्विज! तब केशिध्वजने जिस प्रकार धर्मधेनु मारी गयी थी वह सब वृत्तान्त खाण्डिक्यसे कहा और उसके लिये प्रायश्चित्त पूछा॥ ३३॥ खाण्डिक्यने भी वह सम्पूर्ण प्रायश्चित्त, जिसका कि उसके लिये विधान था, केशिध्वजको विधिपूर्वक बतला दिया॥ ३४॥ तदनन्तर पूछे हुए अर्थको जान लेनेपर महात्मा खाण्डिक्यकी आज्ञा लेकर वे यज्ञभूमिमें आये और क्रमशः सम्पूर्ण कर्म समाप्त किया॥ ३५॥
फिर कालक्रमसे यज्ञ समाप्त होनेपर अवभृथ (यज्ञान्त) स्नानके अनन्तर कृतकृत्य होकर राजा केशिध्वजने सोचा॥ ३६॥ "मैंने सम्पूर्ण ऋत्विज् ब्राह्मणोंका पूजन किया, समस्त सदस्योंका मान किया, याचकोंको उनकी इच्छित वस्तुएँ दीं, लोकाचारके अनुसार जो कुछ कर्तव्य था वह सभी मैंने किया, तथापि न जाने, क्यों मेरे चित्तमें किसी क्रियाका अभाव खटक रहा है?"॥ ३७-३८॥ इस प्रकार सोचते-सोचते राजाको स्मरण हुआ कि मैंने अभीतक खाण्डिक्यको गुरु-दक्षिणा नहीं दी॥ ३९॥ हे मैत्रेय! तब वे रथपर चढ़कर फिर उसी दुर्गम वनमें गये, जहाँ खाण्डिक्य रहते थे॥ ४०॥ खाण्डिक्य भी उन्हें फिर शस्त्र धारण किये आते देख मारनेके लिये उद्यत हुए। तब राजा केशिध्वजने कहा—॥ ४१॥ "खाण्डिक्य! तुम क्रोध न करो, मैं तुम्हारा कोई अनिष्ट करनेके लिये नहीं आया, बल्कि तुम्हें गुरु-दक्षिणा देनेके लिये आया हूँ—ऐसा समझो॥ ४२॥
४५२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| निष्पादितो मया यागः सम्यक्त्वदुपदेशतः।<br>सोऽहं ते दातुमिच्छामि वृणीष्व गुरुदक्षिणाम्॥ ४३ | मैंने तुम्हारे उपदेशानुसार अपना यज्ञ भली प्रकार समाप्त कर दिया है, अब मैं तुम्हें गुरु-दक्षिणा देना चाहता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो माँग लो'॥ ४३॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तब खाण्डिक्यने फिर अपने मन्त्रियोंसे परामर्श किया कि "यह मुझे गुरु-दक्षिणा देना चाहता है, मैं इससे क्या माँगूँ?"॥ ४४॥ मन्त्रियोंने कहा—"आप इससे सम्पूर्ण राज्य माँग लीजिये, बुद्धिमान् लोग शत्रुओंसे अपने सैनिकोंको कष्ट दिये बिना राज्य ही माँगा करते हैं"॥ ४५॥ तब महामति राजा खाण्डिक्यने उनसे हँसते हुए कहा—"मेरे-जैसे लोग कुछ ही दिन रहनेवाला राज्यपद कैसे माँग सकते हैं?॥ ४६॥ यह ठीक है आपलोग स्वार्थ-साधनके लिये ही परामर्श देनेवाले हैं; किन्तु 'परमार्थ क्या और कैसा है?' इस विषयमें आपको विशेष ज्ञान नहीं है"॥ ४७॥ |
| भूयस्स मन्त्रिभिस्सार्द्धं मन्त्रयामास पार्थिवः।<br>गुरुनिष्क्रयकामोऽयं किं मया प्रार्थ्यतामिति॥ ४४ | |
| तमूचुर्मन्त्रिणो राज्यमशेषं प्रार्थ्यतामयम्।<br>शत्रुभिः प्रार्थ्यते राज्यमनायासितसैनिकैः॥ ४५ | |
| प्रहस्य तानाह नृपस्स खाण्डिक्यो महामतिः।<br>स्वल्पकालं महीपाल्यं मादृशैः प्रार्थ्यते कथम्॥ ४६ | |
| एवमेतद्भवन्तोऽत्र ह्यर्थसाधनमन्त्रिणः।<br>परमार्थः कथं कोऽत्र यूयं नात्र विचक्षणाः॥ ४७ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**यह कहकर राजा खाण्डिक्य केशिध्वजके पास आये और उनसे कहा, 'क्या तुम मुझे अवश्य गुरु-दक्षिणा दोगे?'॥ ४८॥ जब केशिध्वजने कहा कि 'मैं अवश्य दूँगा' तो खाण्डिक्य बोले—"आप अध्यात्मज्ञानरूप परमार्थ-विद्यामें बड़े कुशल हैं॥ ४९॥ सो यदि आप मुझे गुरु-दक्षिणा देना ही चाहते हैं तो जो कर्म समस्त क्लेशोंकी शान्ति करनेमें समर्थ हो वह बतलाइये"॥ ५०॥ |
| इत्युक्त्वा समुपैत्यैनं स तु केशिध्वजं नृपः।<br>उवाच किमवश्यं त्वं ददासि गुरुदक्षिणाम्॥ ४८ | |
| बाढमित्येव तेनोक्तः खाण्डिक्यस्तमथाब्रवीत्।<br>भवानध्यात्मविज्ञानपरमार्थविचक्षणः॥ ४९ | |
| यदि चेद्द्यीयते मह्यं भवता गुरुनिष्क्रयः।<br>तत्क्लेशप्रशमायालं यत्कर्म तदुदीरय॥ ५० |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
ब्रह्मयोगका निर्णय
| केशिध्वज उवाच | **केशिध्वज बोले—**क्षत्रियॉँको तो राज्य-प्राप्तिसे अधिक प्रिय और कुछ भी नहीं होता, फिर तुमने मेरा निष्कण्टक राज्य क्यों नहीं माँगा?॥ १॥ |
| न प्रार्थितं त्वया कस्मादस्मद्राज्यमकण्टकम्।<br>राज्यलाभाद्दिना नान्यत्क्षत्रियाणामतिप्रियम्॥ १ | |
| खाण्डिक्य उवाच | **खाण्डिक्य बोले—**हे केशिध्वज ! मैंने जिस कारणसे तुम्हारा राज्य नहीं माँगा वह सुनो। इन राज्यादिकी आकांक्षा तो मूर्खोंको हुआ करती है॥ २॥ |
| केशिध्वज निबोध त्वं मया न प्रार्थितं यतः।<br>राज्यमेतदशेषं ते यत्र गृध्नन्त्यपण्डिताः॥ २ | |
| क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम्।<br>वधश्च धर्मयुद्धेन स्वराज्यपरिपन्थिनाम्॥ ३ | क्षत्रियोंका धर्म तो यही है कि प्रजाका पालन करें और अपने राज्यके विरोधियोंका धर्म-युद्धसे वध करें॥ ३॥ |
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५३
तत्राशक्तस्य मे दोषो नैवास्त्यपहृते त्वया।
बन्ध्यायैव भवत्येषा ह्यविद्याप्यक्रमोज्झिता ॥ ४
जन्मोपभोगलिप्सार्थमियं राज्यस्पृहा मम।
अन्येषां दोषजा सैव धर्मं वै नानुरुध्यते॥ ५
न याच्ञा क्षत्रबन्धूनां धर्मायैतत्सतं मतम्।
अतो न याचितं राज्यमविद्यान्तर्गतं तव॥ ६
राज्ये गृध्नन्त्यविद्वांसो ममत्वाहृतचेतसः।
अहंमानमहापानमदमत्ता न मादृशाः ॥ ७
श्रीपराशर उवाच
प्रहृष्टस्साध्विति प्राह ततः केशिध्वजो नृपः।
खाण्डिक्यजनकं प्रीत्या श्रूयतां वचनं मम॥ ८
अहं ह्यविद्यया मृत्युं तर्तुकामः करोमि वै।
राज्यं यागांश्च विविधान्भोगैः पुण्यक्षयं तथा॥ ९
तदिदं ते मनो दिष्ट्या विवेकैश्वर्यतां गतम्।
तच्छ्रूयतामविद्यायास्स्वरूपं कुलनन्दन॥ १०
अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या चास्वे स्वमिति या मतिः।
संसारतरुसम्भूतिबीजमेतद्द्विधा स्थितम् ॥ ११
पञ्चभूतात्मके देहे देही मोहतमोवृतः।
अहं ममैतदित्युच्चैः कुरुते कुमतिर्मतिम् ॥ १२
आकाशवावग्निजलपृथिवीभ्यः पृथक् स्थिते।
आत्मन्यात्ममयं भावं कः करोति कलेवरे॥ १३
कलेवरोपभोग्यं हि गृहक्षेत्रादिकं च कः।
अदेहे ह्यात्मनि प्राज्ञो ममेदमिति मन्यते॥ १४
इत्थं च पुत्रपौत्रेषु तद्देहोत्पादितेषु कः।
करोति पण्डितस्स्वाम्यमनात्मनि कलेवरे॥ १५
सर्वं देहोपभोगाय कुरुते कर्म मानवः।
देहश्चान्यो यदा पुंसस्तदा बन्धाय तत्परम्॥ १६
मृण्मयं हि यथा गेहं लिप्यते वै मृदम्भसा।
पार्थिवोऽयं तथा देहो मृदम्ब्वालेपनस्थितः॥ १७
हिन्दी अनुवाद
शक्तिहीन होनेके कारण यदि तुमने मेरा राज्य हरण कर लिया है, तो [असमर्थतावश प्रजापालन न करनेपर भी] मुझे कोई दोष न होगा। [किन्तु राज्याधिकार होनेपर यथावत् प्रजापालन न करनेसे दोषका भागी होना पड़ता है] क्योंकि यद्यपि यह (स्वकर्म) अविद्या ही है तथापि नियमविरुद्ध त्याग करनेपर यह बन्धनका कारण होती है॥ ४॥
यह राज्यकी चाह मुझे तो जन्मान्तरके [कर्मोंद्वारा प्राप्त] सुखभोगके लिये होती है; और वही मन्त्री आदि अन्य जनोंको राग एवं लोभ आदि दोषोंसे उत्पन्न होती है केवल धर्मानुरोधसे नहीं॥ ५॥
'उत्तम क्षत्रियोंका [राज्यादिकी] याचना करना धर्म नहीं है' यह महात्माओंका मत है। इसीलिये मैंने अविद्या (पालनादि कर्म)-के अन्तर्गत तुम्हारा राज्य नहीं माँगा॥ ६॥
जो लोग अहंकाररूपी मदिराका पान करके उन्मत्त हो रहे हैं तथा जिनका चित्त ममताग्रस्त हो रहा है वे मूढ़जन ही राज्यकी अभिलाषा करते हैं; मेरे-जैसे लोग राज्यकी इच्छा नहीं करते॥ ७॥
श्रीपराशरजी बोले— तब राजा केशिध्वजने प्रसन्न होकर खाण्डिक्य जनकको साधुवाद दिया और प्रीतिपूर्वक कहा, मेरा वचन सुनो—॥ ८॥
मैं अविद्याद्वारा मृत्युको पार करनेकी इच्छासे ही राज्य तथा विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करता हूँ और नाना भोगोंद्वारा अपने पुण्योंका क्षय कर रहा हूँ॥ ९॥
हे कुलनन्दन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा मन विवेक सम्पन्न हुआ है अतः तुम अविद्याका स्वरूप सुनो॥ १०॥
संसार-वृक्षकी बीजभूता यह अविद्या दो प्रकारकी है—अनात्मामें आत्मबुद्धि और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना॥ ११॥
यह कुमति जीव मोहरूपी अन्धकारसे आवृत होकर इस पंचभूतात्मक देहमें 'मैं' और 'मेरापन' का भाव करता है॥ १२॥
जब कि आत्मा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी आदिसे सर्वथा पृथक् है तो कौन बुद्धिमान् व्यक्ति शरीरमें आत्मबुद्धि करेगा?॥ १३॥
और आत्माके देहसे परे होनेपर भी देहके उपभोग्य गृह-क्षेत्रादिको कौन प्राज्ञ पुरुष 'अपना' मान सकता है॥ १४॥
इस प्रकार इस शरीरके अनात्मा होनेसे इससे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रादिमें भी कौन विद्वान् अपनापन करेगा॥ १५॥
मनुष्य सारे कर्म देहके ही उपभोगके लिये करता है; किन्तु जब कि यह देह अपनेसे पृथक् है, तो वे कर्म केवल बन्धन (देहोत्पत्ति)-के ही कारण होते हैं॥ १६॥
जिस प्रकार मिट्टीके घरको जल और मिट्टीसे लीपते-पोतते हैं उसी प्रकार यह पार्थिव