विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 558 में से
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- पञ्च अंश *
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शिरोरोगप्रतिशयायज्वरशूलभगन्दरैः । गुल्माशः॥१॥ वयथुश्ववासच्छर्द्यादिभिरनेकधा ॥ ३ तथाक्षिरोगातीसारकुष्ठाङ्गामयसंज्ञितैः । भिद्यते देहजस्तापो मानसं श्रोतुमर्हसि ॥ ४ कामक्रोधभयद्वेषलोभमोहविषादजः । शोकासूयावमानेर्घ्यामात्सर्यादिमयस्तथा ॥ ५ मानसोऽपि द्विजश्रेष्ठ तापो भवति नैकधा । इत्येवमादिभिर्भेदैस्तापो ह्याध्यात्मिकः स्मृतः ॥ ६ मृगपक्षिमनुष्याद्यैः पिशाचोर्गराक्षसैः । सरीसृपाद्यैश्च नृणां जायते चाधिभौतिकः ॥ ७ शीतवातोष्णवर्षाम्बुवैद्युतादिसमुद्भवः । तापो द्विजवर श्रेष्ठैः कथ्यते चाधिदैविकः ॥ ८ गर्भजन्मजराजानमृत्युनारकजं तथा । दुःखं सहस्रशो भेदैर्भिद्यते मुनिसत्तम ॥ ९ सुकुमारतनुर्गर्भं जन्तुर्बहुमलावृते । उल्बसंवैष्टितो भुग्नपृष्ठग्रीवास्थिसंहतिः ॥ १० अत्यन्तकटुतीक्ष्णोष्णत्ववर्णैर्मातृभोजनैः । अत्यन्ततापैरत्यर्थं वर्द्धमानातिवेदनः ॥ ११ प्रसारणाकुञ्चनादौ नाङ्गानां प्रभुरात्मनः । शक्नुम्रूत्रमहापङ्कशायी सर्वत्र पीडितः ॥ १२ निरुच्छ्वासः सचैतन्यस्मरजन्मशतान्यथ । आस्ते गर्भेऽतिदुःखेन निजकर्मानिबन्धनः ॥ १३ जायमानः पुरीषासृङ्मूत्रशुक्राविलाननः । प्राजापत्येन वातेन पीड्यमानास्थिबन्धनः ॥ १४ अधोमुखो वै क्रियते प्रबलैस्सूतिमारुतैः । क्लेशान्निष्क्रान्तिमाप्नोति जठरान्मातुरातुरः ॥ १५ मूच्छ्रामवाप्य महतीं संस्पृष्टो बाह्यवायुना । विज्ञानभ्रंशमाप्नोति जातश्च मुनिसत्तम ॥ १६ कण्टकैरिव तुन्नाङ्गः क्रकचैरिव दारितः । पूतव्रणान्निपतितो धरण्यां कुमिको यथा ॥ १७ कण्ठूयनेऽपि चाशक्तः परिवर्तैऽप्यनीश्वरः । स्नानपानादिकाहारमप्याप्नोति परेच्छया ॥ १८
शिरोरोग, प्रतिशयाय (पीनस), ज्वर, शूल, भगन्दर, गुल्म, अर्श (बवासीर), शोथ (सूजन), श्वास (दमा), छर्दि तथा नेत्ररोग, अतिसार और कुष्ठ आदि शारीरिक कष्ट-भेदसे दैहिक तापके कितने ही भेद हैं। अब मानसिक तापोंको सुनो ॥ ३-४ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! काम, क्रोध, भय, द्वेष, लोभ, मोह, विषाद, शोक, असूया (गुणोंमें दोषारोपण), अपमान, ईर्ष्या और मात्सर्य आदि भेदोंसे मानसिक तापके अनेक भेद हैं। ऐस ही नाना प्रकारके भेदोंसे युक्त तापको आध्यात्मिक कहते हैं ॥ ५-६ ॥ मनुष्योंको जो दुःख मृग, पक्षी, मनुष्य, पिशाच, सर्प, राक्षस और सरीसृप (बिच्छू) आदिसे प्राप्त होता है उसे आधिभौतिक कहते हैं ॥ ७ ॥ तथा हे द्विजवर ! शीत, उष्ण, वायु, वर्षा, जल और विद्युत् आदिसे प्राप्त हुए दुःखको श्रेष्ठ पुरुष आधिदैविक कहते हैं ॥ ८ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ ! इनके अतिरिक्त गर्भ, जन्म, जरा, अज्ञान, मृत्यु और नरकसे उत्पन्न हुए दुःखके भी सहस्रों प्रकारके भेद हैं ॥ ९ ॥ अत्यन्त मलपूर्ण गर्भाशयमें उल्ब (गर्भकी झिल्ली)-से लिपटा हुआ यह सुकुमारशरीर जीव, जिसकी पीठ और ग्रीवाकी अस्थियाँ कुण्डलाकार मुड़ी रहती हैं, माताके खाये हुए अत्यन्त तापप्रद खट्टे, कड़वे, चरपरे, गर्म और खारे पदार्थोंसे जिसकी वेदना बहुत बढ़ जाती है, जो मल-मूत्ररूप महापंकमें पड़ा-पड़ा सम्पूर्ण अंगोंमें अत्यन्त पीड़ित होनेपर भी अपने अंगोंको फैलाने या सिकोड़नेमें समर्थ नहीं होता और चेतनायुक्त होनेपर भी श्वास नहीं ले सकता, अपने सैकड़ों पूर्वजन्मोंका स्मरण कर कर्मोंसे बँधा हुआ अत्यन्त दुःखपूर्वक गर्भमें पड़ा रहता है ॥ १०-१३ ॥ उत्पन्न होनेके समय उसका मुख मल, मूत्र, रक्त और वीर्य आदिमें लिपटा रहता है और उसके सम्पूर्ण अस्थिबन्धन प्राजापत्य (गर्भको संकुचित करनेवाली) वायुसे अत्यन्त पीड़ित होते हैं ॥ १४ ॥ प्रबल प्रसूति-वायु उसका मुख नीचेको कर देती है और वह आतुर होकर बड़े क्लेशके साथ माताके गर्भाशयसे बाहर निकल पाता है ॥ १५ ॥
हे मुनिसत्तम ! उत्पन्न होनेके अनन्तर बाह्य वायुका स्पर्श होनेसे अत्यन्त मच्छित होकर वह जीव बेसुध हो जाता है ॥ १६ ॥ उस समय वह जीव दुर्गन्धयुक्त फोड़ेमेंसे गिरे हुए किसी कण्टक-विद्ध अथवा ओरसे चिरे हुए कीड़ेके समान पृथ्वीपर गिरता है ॥ १७ ॥ उसे स्वयं खुजलाने अथवा करवट लेनेकी भी शक्ति नहीं रहती। वह स्नान तथा दुग्धपानादि आहार भी दूसरेहीकी इच्छासे प्राप्त करता है ॥ १८ ॥
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