भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 558 में से

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पृष्ठ 455

४४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अशुचिप्रस्तरे सुप्तः कीटदंशादिभिस्तथा।<br>भक्ष्यमाणोऽपि नैवेषां समर्थो विनिवारणे ॥ १९अपवित्र (मल-मूत्रादिमें सने हुए) बिस्तरपर पड़ा रहता है, उस समय कीड़े और डाँस आदि उसे काटते हैं तथापि वह उन्हें दूर करनेमें भी समर्थ नहीं होता ॥ १९ ॥
जन्मदुःखान्यनेकानि जन्मनोऽनन्तराणि च।<br>बालभावे यदाप्नोति ह्याधिभौतिकादिकानि च ॥ २०इस प्रकार जन्मके समय और उसके अनन्तर बाल्यावस्थामें जीव आधिभौतिकादि अनेकों दुःख भोगता है ॥ २० ॥
अज्ञानतमसाऽऽच्छन्नो मूढान्तःकरणो नरः।<br>न जानाति कुतः कोऽहं क्वाहं गन्ता किमात्मनः ॥ २१अज्ञानरूप अन्धकारसे आवृत होकर मूढ़हृदय पुरुष यह नहीं जानता कि 'मैं कहाँसे आया हूँ? कौन हूँ? कहाँ जाऊँगा ? तथा मेरा स्वरूप क्या है ? ॥ २१ ॥
केन बन्धेन बद्धोऽहं कारणं किमकारणम्।<br>किं कार्यं किमकार्यं वा किं वाच्यं किं च नोच्यते ॥ २२मैं किस बन्धनसे बँधा हूँ? इस बन्धनका क्या कारण है? अथवा यह अकारण ही प्राप्त हुआ है? मुझे क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये ? तथा क्या कहना चाहिये और क्या न कहना चाहिये ? ॥ २२ ॥
को धर्मः कश्च वाधर्मः कस्मिन्व्र्तेऽथ वा कथम्।<br>किं कर्तव्यमकर्तव्यं किं वा किं गुणदोषवत् ॥ २३धर्म क्या है? अधर्म क्या है? किस अवस्थामें मुझे किस प्रकार रहना चाहिये ? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है? अथवा क्या गुणमय और क्या दोषमय है?' ॥ २३ ॥
एवं पशुसमैर्मूढैरज्ञानप्रभवं महत्।<br>अवाप्यते नरैर्दुःखं शिश्नोदरपरायणैः ॥ २४इस प्रकार पशुके समान विवेकशून्य शिश्नोदर-परायण पुरुष अज्ञानजनित महान् दुःख भोगते हैं ॥ २४ ॥
अज्ञानं तामसो भावः कार्यारम्भप्रवृत्तयः।<br>अज्ञानिनां प्रवर्तन्ते कर्मलोपास्ततो द्विज ॥ २५हे द्विज ! अज्ञान तामसिक भाव (विकार) है, अतः अज्ञानी पुरुषोंकी (तामसिक) कर्मोंके आरम्भमें प्रवृत्ति होती है; इससे वैदिक कर्मोंका लोप हो जाता है ॥ २५ ॥
नरकं कर्मणां लोपात्फलमाहुर्मनीषिणः।<br>तस्मादज्ञानिनां दुःखमिह चामुत्र चोत्तमम् ॥ २६मनीषिजनोंने कर्म-लोपका फल नरक बतलाया है; इसलिये अज्ञानी पुरुषोंको इहलोक और परलोक दोनों जगह अत्यन्त ही दुःख भोगना पड़ता है ॥ २६ ॥
जराजर्जरदेहश्च शिथिलावयवः पुमान्।<br>विगलच्छीर्णदशनो वलिस्नायुशिरावृतः ॥ २७शरीरके जरा-जर्जरित हो जानेपर पुरुषके अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाते हैं, उसके दाँत पुराने होकर उखड़ जाते हैं और शरीर झुर्रियों तथा नस-नाड़ियोंसे आवृत हो जाता है ॥ २७ ॥
दूरप्रणष्टनयनो व्योमान्तर्गततारकः।<br>नासाविवरनिर्यांतलोमपुञ्जश्चलद्वपुः ॥ २८उसकी दृष्टि दूरस्थ विषयके ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाती है, नेत्रोंके तारे गोलकोंमें घुस जाते हैं, नासिकाके रन्ध्रोंमेंसे बहुत-से रोम बाहर निकल आते हैं और शरीर काँपने लगता है ॥ २८ ॥
प्रकटीभूतसर्वास्थिर्नतपृष्ठास्थिसंहतिः।<br>उत्सन्नजठराग्नत्वादल्पाहारोऽल्पचेष्टितः ॥ २९उसकी समस्त हड्डियाँ दिखलायी देने लगती हैं, मेरुदण्ड झुक जाता है तथा जठराग्निके मन्द पड़ जानेसे उसके आहार और पुरुषार्थ कम हो जाते हैं ॥ २९ ॥
कृच्छ्राच्चङ्क्रमणोत्थानशयनासनचेष्टितः।<br>मन्दीभवच्छ्रोत्रनेत्रस्रवल्लालाविलाननः ॥ ३०उस समय उसकी चलना-फिरना, उठना-बैठना और सोना आदि सभी चेष्टाएँ बड़ी कठिनतासे होती हैं, उसके श्रोत्र और नेत्रोंकी शक्ति मन्द पड़ जाती है तथा लार बहते रहनेसे उसका मुख मलिन हो जाता है ॥ ३० ॥
अनायत्तैस्समस्तैश्च करणैर्मरणोन्मुखः।<br>तत्क्षणेऽप्यनुभूतानामस्मर्त्ताखिलवस्तुनाम् ॥ ३१अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वाधीन न रहनेके कारण वह सब प्रकार मरणासन्न हो जाता है तथा [स्मरणशक्तिके क्षीण हो जानेसे] वह उसी समय अनुभव किये हुए समस्त पदार्थोंको भी भूल जाता है ॥ ३१ ॥