विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ५ |
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प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम्।
ताभ्यामुभाभ्यां पुरुषैस्सर्वमूर्त्तिस्स इज्यते ॥ ४१
ऋग्यजुस्सामभिर्मार्गैः प्रवृत्तैरिज्यते ह्यसौ।
यज्ञेश्वरो यज्ञपुमान्युरुषैः पुरुषोत्तमः॥४२
ज्ञानात्मा ज्ञानयोगेन ज्ञानमूर्त्तिः स चेज्यते।
निवृत्ते योगिभिर्मार्गे विष्णुर्मुक्तिफलप्रदः ॥ ४३
ह्रस्वदीर्घप्लुतैर्यत्तु किञ्चिद्वस्त्वभिधीयते।
यच्च वाचामविषयं तत्सर्वं विष्णुरव्ययः ॥ ४४
व्यक्तस्स एव चाव्यक्तस्स एव पुरुषोऽव्ययः।
परमात्मा च विश्वात्मा विश्वरूपधरो हरिः ॥ ४५
व्यक्ताव्यक्तात्मिका तस्मिन्प्रकृतिस्सम्प्रलीयते।
पुरुषश्चापि मैत्रेय व्यापिन्यव्याहतात्मनि ॥ ४६
द्विपराद्धात्मकः कालः कथितो यो मया तव ।
तदहस्तस्य मैत्रेय विष्णोरीशस्य कथ्यते ॥ ४७
व्यक्ते च प्रकृतौ लीने प्रकृत्यां पुरुषे तथा।
तत्र स्थिते निशा चास्य तत्प्रमाणा महामुने ॥ ४८
नैवाहस्तस्य न निशा नित्यस्य परमात्मनः।
उपचारस्तथाप्येष तस्येशस्य द्विजोच्यते ॥ ४९
इत्येष तव मैत्रेय कथितः प्राकृतो लयः।
आत्यन्तिकमथो ब्रह्मन्निबोध प्रतिसञ्चरम् ॥ ५० | वैदिक कर्म दो प्रकारका है—प्रवृत्तिरूप (कर्मयोग) और निवृत्त रूप (सांख्ययोग)। इन दोनों प्रकारके कर्मोंसे उस सर्वभूत पुरुषोत्तमका ही यजन किया जाता है॥ ४१॥ ऋक्, यजुः और सामवेदोक्त प्रवृत्ति-मार्गसे लोग उन यज्ञपति पुरुषोत्तम यज्ञ-पुरुषका ही पूजन करते हैं॥ ४२॥ तथा निवृत्ति-मार्गमें स्थित योगिजन भी उन्हीं ज्ञानात्मा ज्ञानस्वरूप मुक्ति-फलदायक भगवान् विष्णुका ही ज्ञानयोगद्वारा यजन करते हैं॥ ४३॥ ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इन त्रिविध स्वरोंसे जो कुछ कहा जाता है तथा जो वाणीका विषय नहीं है वह सब भी अव्ययात्मा विष्णु ही है॥ ४४॥ वह विश्वरूपधारी विश्वरूप परमात्मा श्रीहरि ही व्यक्त, अव्यक्त एवं अविनाशी पुरुष हैं॥ ४५॥ हे मैत्रेय! उन सर्वव्यापक और अविकृतरूप परमात्मामें ही व्यक्ताव्यक्तरूपिणी प्रकृति और पुरुष लीन हो जाते हैं॥ ४६॥<br><br>हे मैत्रेय! मैंने तुमसे जो द्विपराद्धैकाल कहा है वह उन विष्णुभगवान्का केवल एक दिन है॥ ४७॥ हे महामुने! व्यक्त जगत्के अव्यक्त-प्रकृतिमें और प्रकृतिके पुरुषमें लीन हो जानेपर इतने ही कालकी विष्णुभगवान्की रात्रि होती है॥ ४८॥ हे द्विज! वास्तवमें तो उन नित्य परमात्माका न कोई दिन है और न रात्रि, तथापि केवल उपचार (अध्यारोप)-से ऐसा कहा जाता है॥ ४९॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे यह प्राकृत प्रलयका वर्णन किया, अब तुम आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन और सुनो॥ ५०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान्के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
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| आध्यात्मिकादि मैत्रेय ज्ञात्वा तापत्रयं बुधः।<br>उत्पन्नज्ञानवैराग्यः प्राप्नोत्यात्यन्तिकं लयम् ॥ १ | हे मैत्रेय! आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों तापोंको जानकर ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होनेपर पण्डितजन आत्यन्तिक प्रलय प्राप्त करते हैं॥ १॥ |
| आध्यात्मिकोऽपि द्विविधश्शारीरो मानसस्तथा।<br>शारीरो बहुभिर्भेदैर्भिद्यते श्रूयतां च सः॥ २ | आध्यात्मिक ताप शारीरिक और मानसिक दो प्रकारके होते हैं; उनमें शारीरिक तापके भी कितने ही भेद हैं, वह सुनो॥ २॥ |