विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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४४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| एवमेष महाञ्छब्दो मैत्रेय भगवानिति।<br>परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः॥ ७६ | हे मैत्रेय! इस प्रकार यह महान् 'भगवान्' शब्द परब्रह्मस्वरूप श्रीवासुदेवका ही वाचक है, किसी औरका नहीं॥ ७६॥ |
| तत्र पूज्यपदार्थोक्तिपरिभाषासमन्वितः।<br>शब्दोऽयं नोपचारेण त्वन्यत्र ह्युपचारतः॥ ७७ | पूज्य पदार्थोंको सूचित करनेके लक्षणसे युक्त इस 'भगवान्' शब्दका परमात्मामें मुख्य प्रयोग है तथा औरोंके लिये गौण॥ ७७॥ |
| उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।<br>वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥ ७८ | क्योंकि जो समस्त प्राणियोंके उत्पत्ति और नाश, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जानता है वही भगवान् कहलानेयोग्य है॥ ७८॥ |
| ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः।<br>भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः॥ ७९ | त्याग करनेयोग्य [त्रिविध] गुण [और उनके क्लेश] आदिको छोड़कर ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदि सद्गुण ही 'भगवत्' शब्दके वाच्य हैं॥ ७९॥ |
| सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि।<br>भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः॥ ८० | उन परमात्मामें ही समस्त भूत बसते हैं और वे स्वयं भी सबके आत्मरूपसे सकल भूतोंमें विराजमान हैं, इसलिये उन्हें वासुदेव भी कहते हैं॥ ८०॥ |
| खाण्डिक्यजनकायाह पृष्टः केशिध्वजः पुरा।<br>नामव्याख्यामनन्तस्य वासुदेवस्य तत्त्वतः॥ ८१ | पूर्वकालमें खाण्डिक्य जनकके पूछनेपर केशिध्वजने उनसे भगवान् अनन्तके 'वासुदेव' नामकी यथार्थ व्याख्या इस प्रकार की थी॥ ८१॥ |
| भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानि यत्।<br>धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः॥ ८२ | 'प्रभु समस्त भूतोंमें व्याप्त हैं और सम्पूर्ण भूत भी उन्हींमें रहते हैं तथा वे ही संसारके रचयिता और रक्षक हैं; इसलिये वे 'वासुदेव' कहलाते हैं'॥ ८२॥ |
| स सर्वभूतप्रकृतिं विकारान्-<br>$\quad$गुणादिदोषांश्च मुने व्यतीतः।<br>अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा<br>$\quad$तेनास्तृतं यद्भुवनान्तराले॥ ८३ | हे मुने! वे सर्वात्मा समस्त आवरणोंसे परे हैं। वे समस्त भूतोंकी प्रकृति, प्रकृतिके विकार तथा गुण और उनके कार्य आदि दोषोंसे विलक्षण हैं! पृथिवी और आकाशके बीचमें जो कुछ स्थित है उन्होंने वह सब व्याप्त किया है॥ ८३॥ |
| समस्तकल्याणगुणात्मकोऽसौ<br>$\quad$स्वशक्तिलेशावृतभूतवर्गः।<br>इच्छागृहीताभि मतोरुदेह-<br>$\quad$स्संसाधिताशेषजगद्धितो यः॥ ८४ | वे सम्पूर्ण कल्याण-गुणोंके स्वरूप हैं, उन्होंने अपनी मायाशक्तिके लेशमात्रसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंको व्याप्त किया है और वे अपनी इच्छासे स्वमनोऽनुकूल महान् शरीर धारणकर समस्त संसारका कल्याण-साधन करते हैं॥ ८४॥ |
| तेजोबलैश्वर्यमहावबोध-<br>$\quad$सुवीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः।<br>परः पराणां सकला न यत्र<br>$\quad$क्लेशादयस्सन्ति परावरेशे॥ ८५ | वे तेज, बल, ऐश्वर्य, महाविज्ञान, वीर्य और शक्ति आदि गुणोंकी एकमात्र राशि हैं, प्रकृति आदिसे भी परे हैं और उन परावरेश्वरमें अविद्यादि सम्पूर्ण क्लेशोंका अत्यन्ताभाव है॥ ८५॥ |
| स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपो<br>$\quad$व्यक्तस्वरूपोऽप्रकटस्वरूपः।<br>सर्वेश्वरस्सर्वदृक् सर्ववेत्ता<br>$\quad$समस्तशक्तिः परमेश्वराख्यः॥ ८६ | वे ईश्वर ही समष्टि और व्यष्टिरूप हैं, वे ही व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप हैं, वे ही सबके स्वामी, सबके साक्षी और सब कुछ जाननेवाले हैं तथा उन्हीं सर्वशक्तिमान्की परमेश्वर संज्ञा है॥ ८६॥ |
| संज्ञायते येन तदस्तदोषं<br>$\quad$शुद्धं परं निर्मलमेकरूपम्।<br>संदृश्यते वाप्यवगम्यते वा<br>$\quad$तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम् ॥ ८७ | जिसके द्वारा वे निर्दोष, विशुद्ध, निर्मल और एकरूप परमात्मा देखे या जाने जाते हैं उसीका नाम ज्ञान (परा विद्या) है और जो इसके विपरीत है वही अज्ञान (अपरा विद्या) है॥ ८७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥