विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| एवमेष महाञ्छब्दो मैत्रेय भगवानिति।<br>परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः॥ ७६ | हे मैत्रेय! इस प्रकार यह महान् 'भगवान्' शब्द परब्रह्मस्वरूप श्रीवासुदेवका ही वाचक है, किसी औरका नहीं॥ ७६॥ |
| तत्र पूज्यपदार्थोक्तिपरिभाषासमन्वितः।<br>शब्दोऽयं नोपचारेण त्वन्यत्र ह्युपचारतः॥ ७७ | पूज्य पदार्थोंको सूचित करनेके लक्षणसे युक्त इस 'भगवान्' शब्दका परमात्मामें मुख्य प्रयोग है तथा औरोंके लिये गौण॥ ७७॥ |
| उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।<br>वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥ ७८ | क्योंकि जो समस्त प्राणियोंके उत्पत्ति और नाश, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जानता है वही भगवान् कहलानेयोग्य है॥ ७८॥ |
| ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः।<br>भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः॥ ७९ | त्याग करनेयोग्य [त्रिविध] गुण [और उनके क्लेश] आदिको छोड़कर ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदि सद्गुण ही 'भगवत्' शब्दके वाच्य हैं॥ ७९॥ |
| सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि।<br>भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः॥ ८० | उन परमात्मामें ही समस्त भूत बसते हैं और वे स्वयं भी सबके आत्मरूपसे सकल भूतोंमें विराजमान हैं, इसलिये उन्हें वासुदेव भी कहते हैं॥ ८०॥ |
| खाण्डिक्यजनकायाह पृष्टः केशिध्वजः पुरा।<br>नामव्याख्यामनन्तस्य वासुदेवस्य तत्त्वतः॥ ८१ | पूर्वकालमें खाण्डिक्य जनकके पूछनेपर केशिध्वजने उनसे भगवान् अनन्तके 'वासुदेव' नामकी यथार्थ व्याख्या इस प्रकार की थी॥ ८१॥ |
| भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानि यत्।<br>धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः॥ ८२ | 'प्रभु समस्त भूतोंमें व्याप्त हैं और सम्पूर्ण भूत भी उन्हींमें रहते हैं तथा वे ही संसारके रचयिता और रक्षक हैं; इसलिये वे 'वासुदेव' कहलाते हैं'॥ ८२॥ |
| स सर्वभूतप्रकृतिं विकारान्-<br>$\quad$गुणादिदोषांश्च मुने व्यतीतः।<br>अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा<br>$\quad$तेनास्तृतं यद्भुवनान्तराले॥ ८३ | हे मुने! वे सर्वात्मा समस्त आवरणोंसे परे हैं। वे समस्त भूतोंकी प्रकृति, प्रकृतिके विकार तथा गुण और उनके कार्य आदि दोषोंसे विलक्षण हैं! पृथिवी और आकाशके बीचमें जो कुछ स्थित है उन्होंने वह सब व्याप्त किया है॥ ८३॥ |
| समस्तकल्याणगुणात्मकोऽसौ<br>$\quad$स्वशक्तिलेशावृतभूतवर्गः।<br>इच्छागृहीताभि मतोरुदेह-<br>$\quad$स्संसाधिताशेषजगद्धितो यः॥ ८४ | वे सम्पूर्ण कल्याण-गुणोंके स्वरूप हैं, उन्होंने अपनी मायाशक्तिके लेशमात्रसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंको व्याप्त किया है और वे अपनी इच्छासे स्वमनोऽनुकूल महान् शरीर धारणकर समस्त संसारका कल्याण-साधन करते हैं॥ ८४॥ |
| तेजोबलैश्वर्यमहावबोध-<br>$\quad$सुवीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः।<br>परः पराणां सकला न यत्र<br>$\quad$क्लेशादयस्सन्ति परावरेशे॥ ८५ | वे तेज, बल, ऐश्वर्य, महाविज्ञान, वीर्य और शक्ति आदि गुणोंकी एकमात्र राशि हैं, प्रकृति आदिसे भी परे हैं और उन परावरेश्वरमें अविद्यादि सम्पूर्ण क्लेशोंका अत्यन्ताभाव है॥ ८५॥ |
| स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपो<br>$\quad$व्यक्तस्वरूपोऽप्रकटस्वरूपः।<br>सर्वेश्वरस्सर्वदृक् सर्ववेत्ता<br>$\quad$समस्तशक्तिः परमेश्वराख्यः॥ ८६ | वे ईश्वर ही समष्टि और व्यष्टिरूप हैं, वे ही व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप हैं, वे ही सबके स्वामी, सबके साक्षी और सब कुछ जाननेवाले हैं तथा उन्हीं सर्वशक्तिमान्की परमेश्वर संज्ञा है॥ ८६॥ |
| संज्ञायते येन तदस्तदोषं<br>$\quad$शुद्धं परं निर्मलमेकरूपम्।<br>संदृश्यते वाप्यवगम्यते वा<br>$\quad$तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम् ॥ ८७ | जिसके द्वारा वे निर्दोष, विशुद्ध, निर्मल और एकरूप परमात्मा देखे या जाने जाते हैं उसीका नाम ज्ञान (परा विद्या) है और जो इसके विपरीत है वही अज्ञान (अपरा विद्या) है॥ ८७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अ० ६ ] * षष्ठ अंश * ४४९
छठा अध्याय
केशिध्वज और खाण्डिक्यकी कथा
श्रीपराशर उवाच
स्वाध्यायसंयमाभ्यां स दृश्यते पुरुषोत्तमः ।
तत्प्राप्तिकारणं ब्रह्म तदेतदिति पठ्यते ॥ १
**श्रीपराशरजी बोले—**वे पुरुषोत्तम स्वाध्याय और संयमद्वारा देखे जाते हैं, ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण होनेसे ये भी ब्रह्म ही कहलाते हैं॥ १॥
स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमावसेत् ।
स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥ २
स्वाध्यायसे योगका और योगसे स्वाध्यायका आश्रय करे। इस प्रकार स्वाध्याय और योगरूप सम्पत्तिसे परमात्मा प्रकाशित (ज्ञानके विषय) होते हैं॥ २॥
तदीक्षणाय स्वाध्यायश्चक्षुर्योगस्तथा परम् ।
न मांसचक्षुषा द्रष्टुं ब्रह्मभूतस्स शक्यते ॥ ३
ब्रह्मस्वरूप परमात्माको मांसमय चक्षुओंसे नहीं देखा जा सकता, उन्हें देखनेके लिये स्वाध्याय और योग ही दो नेत्र हैं॥ ३॥
श्रीमैत्रेय उवाच
भगवंस्तमहं योगं ज्ञातुमिच्छामि तं वद ।
ज्ञाते यत्राखिलाधारं पश्येयं परमेश्वरम् ॥ ४
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! जिसे जान लेनेपर मैं अखिलाधार परमेश्वरको देख सकूँगा उस योगको मैं जानना चाहता हूँ; उसका वर्णन कीजिये॥ ४॥
श्रीपराशर उवाच
यथा केशिध्वजः प्राह खाण्डिक्याय महात्मने ।
जनकाय पुरा योगं तमहं कथयामि ते ॥ ५
**श्रीपराशरजी बोले—**पूर्वकालमें जिस प्रकार इस योगका केशिध्वजने महात्मा खाण्डिक्य जनकसे वर्णन किया था मैं तुम्हें वही बतलाता हूँ॥ ५॥
श्रीमैत्रेय उवाच
खाण्डिक्यः कोऽभवद्ब्रह्मन्को वा केशिध्वजः कृती ।
कथं तयोश्च संवादो योगसम्बन्धवानभूत् ॥ ६
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**ब्रह्मन्! यह खाण्डिक्य और विद्वान् केशिध्वज कौन थे? और उनका योगसम्बन्धी संवाद किस कारणसे हुआ था? ॥ ६॥
श्रीपराशर उवाच
धर्मध्वजो वै जनकस्तस्य पुत्रोऽमितध्वजः ।
कृतध्वजश्च नाम्नासीत्सदाध्यात्मरतिर्नृपः ॥ ७
**श्रीपराशरजी बोले—**पूर्वकालमें धर्मध्वज जनक नामक एक राजा थे। उनके अमितध्वज और कृतध्वज नामक दो पुत्र हुए। इनमें कृतध्वज सर्वदा अध्यात्मशास्त्रमें रत रहता था॥ ७॥
कृतध्वजस्य पुत्रोऽभूत् ख्यातः केशिध्वजो नृपः ।
पुत्रोऽमितध्वजस्यापि खाण्डिक्यजनकोऽभवत् ॥ ८
कृतध्वजका पुत्र केशिध्वज नामसे विख्यात हुआ और अमितध्वजका पुत्र खाण्डिक्य जनक हुआ॥ ८॥
कर्ममार्गेण खाण्डिक्यः पृथिव्यामभवत्कृती ।
केशिध्वजोऽप्यतीवासीदात्मविद्याविशारदः ॥ ९
पृथिवीमण्डलमें खाण्डिक्य कर्म-मार्गमें अत्यन्त निपुण था और केशिध्वज अध्यात्मविद्याका विशेषज्ञ था॥ ९॥
तावुभावपि चैवास्तां विजिगीषू परस्परम् ।
केशिध्वजेन खाण्डिक्यस्स्वराज्यादवरोपितः ॥ १०
वे दोनों परस्पर एक-दूसरेको पराजित करनेकी चेष्टामें लगे रहते थे। अन्तमें, कालक्रमसे केशिध्वजने खाण्डिक्यको राज्यच्युत कर दिया॥ १०॥
पुरोधसा मन्त्रिभिश्च समवेतोऽल्पसाधनः ।
राज्यान्निराकृतस्सोऽथ दुर्गारण्यचरोऽभवत् ॥ ११
राज्यभ्रष्ट होनेपर खाण्डिक्य पुरोहित और मन्त्रियोंके सहित थोड़ी-सी सामग्री लेकर दुर्गम वनोंमें चला गया॥ ११॥
इयाज सोऽपि सुबहून्यज्ञाञ्ज्ञानव्यपाश्रयः ।
ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय तर्तुं मृत्युमविद्यया ॥ १२
केशिध्वज ज्ञाननिष्ठ था तो भी अविद्या (कर्म)-द्वारा मृत्युको पार करनेके लिये ज्ञानदृष्टि रखते हुए उसने अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया॥ १२॥
४५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
एकदा वर्तमानस्य यागे योगविदां वर।
धर्मधेनुं जघानोग्रश्शार्दूलो विजने वने॥ १३
ततो राजा हतां श्रुत्वा धेनुं व्याघ्रेण चर्त्विजः।
प्रायश्चित्तं स पप्रच्छ किमत्रेति विधीयताम्॥ १४
तेऽप्यूचुर्न वयं विद्मः कशेरुः पृच्छ्यतामिति।
कशेरुरपि तेनोक्तस्तथैव प्राह भार्गवम्॥ १५
शुनकं पृच्छ राजेन्द्र नाहं वेद्मि स वेत्स्यति।
स गत्वा तमपृच्छच्च सोऽप्याह शृणु यन्मुने॥ १६
न कशेरुर्न चैवाहं न चान्यः साम्प्रतं भुवि।
वेत्त्येक एव त्वच्छत्रुः खाण्डिक्यो यो जितस्त्वया॥ १७
स चाहं तं व्रजाम्येष प्रष्टुमात्मरिपुं मुने।
प्राप्त एव महायज्ञो यदि मां स हनिष्यति॥ १८
प्रायश्चित्तमशेषेण स चेत्पृष्टो वदिष्यति।
ततश्चाविकलो यागो मुनिश्रेष्ठ भविष्यति॥ १९
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा रथमारुह्य कृष्णाजिनधरो नृपः।
वनं जगाम यत्रास्ते स खाण्डिक्यो महामतिः॥ २०
तमापतन्तमालोक्य खाण्डिक्यो रिपुमात्मनः।
प्रोवाच क्रोधताम्राक्षस्स्मारोपितकार्मुकः॥ २१
खाण्डिक्य उवाच
कृष्णाजिनं त्वं कवचमाबध्यास्मान्हनिष्यसि।
कृष्णाजिनधरे वेत्सि न मयि प्रहरिष्यति॥ २२
मृगाणां वद पृष्ठेषु मूढ कृष्णाजिनं न किम्।
येषां मया त्वया चोग्राः प्रहिताशितसायकाः॥ २३
स त्वामहं हनिष्यामि न मे जीवन्विमोक्ष्यसे।
आतताय्यसि दुर्बुद्धे मम राज्यहरो रिपुः॥ २४
केशिध्वज उवाच
खाण्डिक्य संशयं प्रष्टुं भवन्तमहमागतः।
न त्वां हन्तुं विचार्यैतत्कोपं बाणं विमुञ्च वा॥ २५
श्रीपराशर उवाच
ततस्स मन्त्रिभिस्सार्द्धमेकान्ते सपुरोहितः।
मन्त्रयामास खाण्डिक्यस्सर्वैरेव महामतिः॥ २६
हे योगिश्रेष्ठ ! एक दिन जब राजा केशिध्वज यज्ञानुष्ठानमें स्थित थे उनकी धर्मधेनु (हविके लिये दूध देनेवाली गौ)-को निर्जन वनमें एक भयंकर सिंहने मार डाला॥ १३॥ व्याघ्रद्वारा गौको मारी गयी सुन राजाने ऋत्विजोंने पूछा कि 'इसमें क्या प्रायश्चित्त करना चाहिये?'॥ १४॥ ऋत्विजोंने कहा—'हम [इस विषयमें] नहीं जानते; आप कशेरुसे पूछिये।' जब राजाने कशेरुसे यह बात पूछी तो उन्होंने भी उसी प्रकार कहा कि 'हे राजेन्द्र! मैं इस विषयमें नहीं जानता। आप भृगुपुत्र शौनकसे पूछिये, वे अवश्य जानते होंगे।' हे मुने! जब राजाने शुनकसे जाकर पूछा तो उन्होंने भी जो कुछ कहा, वह सुनिये—॥ १५-१६॥
''इस समय भूमण्डलमें इस बातको न कशेरु जानता है, न मैं जानता हूँ और न कोई और ही जानता है, केवल जिसे तुमने परास्त किया है वह तुम्हारा शत्रु खाण्डिक्य ही इस बातको जानता है''॥ १७॥ यह सुनकर केशिध्वजने कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ! मैं अपने शत्रु खाण्डिक्यसे ही यह बात पूछने जाता हूँ। यदि उसने मुझे मार दिया तो भी मुझे महायज्ञका फल तो मिल ही जायगा और यदि मेरे पूछनेपर उसने मुझे सारा प्रायश्चित्त यथावत् बतला दिया तो मेरा यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जायगा'॥ १८-१९॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर राजा केशिध्वज कृष्ण मृगचर्म धारणकर रथपर आरूढ़ हो वनमें, जहाँ महामति खाण्डिक्य रहते थे, आये॥ २०॥ खाण्डिक्यने अपने शत्रुको आते देखकर धनुष चढ़ा लिया और क्रोधसे नेत्र लाल करके कहा—॥ २१॥
**खाण्डिक्य बोले—**अरे! क्या तू कृष्णाजिनरूप कवच बाँधकर हमलोगोंको मारेगा? क्या तू यह समझता है कि कृष्ण मृगचर्म धारण किये हुए मुझपर यह प्रहार नहीं करेगा?॥ २२॥ हे मूढ़! मृगोंकी पीठपर क्या कृष्ण मृगचर्म नहीं होता, जिनपर कि मैंने और तूने दोनोंहीने तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा की है॥ २३॥ अतः अब मैं तुझे अवश्य मारूँगा, तू मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकता। हे दुर्बुद्धे! तू मेरा राज्य छीननेवाला शत्रु है, इसलिये आततायी है॥ २४॥
**केशिध्वज बोले—**हे खाण्डिक्य! मैं आपसे एक सन्देह पूछनेके लिये आया हूँ, आपको मारनेके लिये नहीं आया, इस बातको सोचकर आप मुझपर क्रोध अथवा बाण छोड़ दीजिये॥ २५॥
**श्रीपराशरजी बोले—**यह सुनकर महामति
अ० ६ ] * षष्ठ अंश * ४५१
तमूचुर्मन्त्रिणो वध्यो रिपुरेष वशं गतः ।
हतेऽस्मिन्पृथिवी सर्वा तव वश्या भविष्यति ॥ २७
खाण्डिक्यश्चाह तान्सर्वानेवमेतन्न संशयः ।
हतेऽस्मिन्पृथिवी सर्वा मम वश्या भविष्यति ॥ २८
परलोकजयस्तस्य पृथिवी सकला मम ।
न हन्मि चेल्लोकजयो मम तस्य वसुन्धरा ॥ २९
नाहं मन्ये लोकजयादधिका स्याद्वसुन्धरा ।
परलोकजयोऽनन्तस्स्वल्पकालो महीजयः ॥ ३०
तस्मान्नैतं हनिष्यामि यत्पृच्छति वदामि तत् ॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
ततस्तमभ्युपेत्याह खाण्डिक्यजनको रिपुम् ।
प्रष्टव्यं यत्त्वया सर्वं तत्पृच्छस्व वदाम्यहम् ॥ ३२
ततस्सर्वं यथावृत्तं धर्मधेनुवधं द्विज ।
कथयित्वा स पप्रच्छ प्रायश्चित्तं हि तद्गतम् ॥ ३३
स चाचष्ट यथान्यायं द्विज केशिध्वजाय तत् ।
प्रायश्चित्तमशेषेण यद्वै तत्र विधीयते ॥ ३४
विदितार्थस्स तेनैव ह्यनुज्ञातो महात्मना ।
यागभूमिमुपागम्य चक्रे सर्वाः क्रियाः क्रमात् ॥ ३५
क्रमेण विधिवद्यागं नीत्वा सोऽवभृथाप्लुतः ।
कृतकृत्यस्ततो भूत्वा चिन्तयामास पार्थिवः ॥ ३६
पूजिताश्च द्विजास्सर्वे सदस्या मानिता मया ।
तथैवार्थिजनोऽप्यर्थैर्योजितोऽभिमतैर्मया ॥ ३७
यथार्हमस्य लोकस्य मया सर्वं विचेष्टितम् ।
अनिष्पन्नक्रियं चेतस्तथापि मम किं यथा ॥ ३८
इत्थं सञ्चिन्तयन्नेव सस्मार स महीपतिः ।
खाण्डिक्याय न दत्तेति मया वै गुरुदक्षिणा ॥ ३९
स जगाम तदा भूयो रथमारुह्य पार्थिवः ।
मैत्रेय दुर्गगहनं खाण्डिक्यो यत्र संस्थितः ॥ ४०
खाण्डिक्योऽपि पुनर्द्दृष्ट्वा तमायान्तं धृतायुधम् ।
तस्थौ हन्तुं कृतमतिस्तमाह स पुनर्नृपः ॥ ४१
भो नाहं तेऽपराधाय प्राप्तः खाण्डक्य मा क्रुधः ।
गुरोर्निष्क्रयदानाय मामवेहि त्वमागतम् ॥ ४२
खाण्डिक्यने अपने सम्पूर्ण पुरोहित और मन्त्रियोंसे एकान्तमें सलाह की॥ २६॥ मन्त्रियोंने कहा कि 'इस समय शत्रु आपके वशमें है, इसे मार डालना चाहिये। इसको मार देनेपर यह सम्पूर्ण पृथिवी आपके अधीन हो जायगी'॥ २७॥ खाण्डिक्यने कहा—"यह निस्सन्देह ठीक है, इसके मारे जानेपर अवश्य सम्पूर्ण पृथिवी मेरे अधीन हो जायगी; किन्तु इसे पारलौकिक जय प्राप्त होगी और मुझे सम्पूर्ण पृथिवी। परन्तु यदि इसे नहीं मारूँगा तो मुझे पारलौकिक जय प्राप्त होगी और इसे सारी पृथिवी॥ २८-२९॥ मैं पारलौकिक जयसे पृथिवीको अधिक नहीं मानता; क्योंकि परलोक-जय अनन्तकालके लिये होती है और पृथिवी तो थोड़े ही दिन रहती है। इसलिये मैं इसे मारूँगा नहीं, यह जो कुछ पूछेगा, बतला दूँगा"॥ ३०-३१॥
**श्रीपराशरजी बोले—**तब खाण्डिक्य जनकने अपने शत्रु केशिध्वजके पास आकर कहा—'तुम्हें जो कुछ पूछना हो पूछ लो, मैं उसका उत्तर दूँगा'॥ ३२॥
हे द्विज! तब केशिध्वजने जिस प्रकार धर्मधेनु मारी गयी थी वह सब वृत्तान्त खाण्डिक्यसे कहा और उसके लिये प्रायश्चित्त पूछा॥ ३३॥ खाण्डिक्यने भी वह सम्पूर्ण प्रायश्चित्त, जिसका कि उसके लिये विधान था, केशिध्वजको विधिपूर्वक बतला दिया॥ ३४॥ तदनन्तर पूछे हुए अर्थको जान लेनेपर महात्मा खाण्डिक्यकी आज्ञा लेकर वे यज्ञभूमिमें आये और क्रमशः सम्पूर्ण कर्म समाप्त किया॥ ३५॥
फिर कालक्रमसे यज्ञ समाप्त होनेपर अवभृथ (यज्ञान्त) स्नानके अनन्तर कृतकृत्य होकर राजा केशिध्वजने सोचा॥ ३६॥ "मैंने सम्पूर्ण ऋत्विज् ब्राह्मणोंका पूजन किया, समस्त सदस्योंका मान किया, याचकोंको उनकी इच्छित वस्तुएँ दीं, लोकाचारके अनुसार जो कुछ कर्तव्य था वह सभी मैंने किया, तथापि न जाने, क्यों मेरे चित्तमें किसी क्रियाका अभाव खटक रहा है?"॥ ३७-३८॥ इस प्रकार सोचते-सोचते राजाको स्मरण हुआ कि मैंने अभीतक खाण्डिक्यको गुरु-दक्षिणा नहीं दी॥ ३९॥ हे मैत्रेय! तब वे रथपर चढ़कर फिर उसी दुर्गम वनमें गये, जहाँ खाण्डिक्य रहते थे॥ ४०॥ खाण्डिक्य भी उन्हें फिर शस्त्र धारण किये आते देख मारनेके लिये उद्यत हुए। तब राजा केशिध्वजने कहा—॥ ४१॥ "खाण्डिक्य! तुम क्रोध न करो, मैं तुम्हारा कोई अनिष्ट करनेके लिये नहीं आया, बल्कि तुम्हें गुरु-दक्षिणा देनेके लिये आया हूँ—ऐसा समझो॥ ४२॥
४५२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| निष्पादितो मया यागः सम्यक्त्वदुपदेशतः।<br>सोऽहं ते दातुमिच्छामि वृणीष्व गुरुदक्षिणाम्॥ ४३ | मैंने तुम्हारे उपदेशानुसार अपना यज्ञ भली प्रकार समाप्त कर दिया है, अब मैं तुम्हें गुरु-दक्षिणा देना चाहता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो माँग लो'॥ ४३॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तब खाण्डिक्यने फिर अपने मन्त्रियोंसे परामर्श किया कि "यह मुझे गुरु-दक्षिणा देना चाहता है, मैं इससे क्या माँगूँ?"॥ ४४॥ मन्त्रियोंने कहा—"आप इससे सम्पूर्ण राज्य माँग लीजिये, बुद्धिमान् लोग शत्रुओंसे अपने सैनिकोंको कष्ट दिये बिना राज्य ही माँगा करते हैं"॥ ४५॥ तब महामति राजा खाण्डिक्यने उनसे हँसते हुए कहा—"मेरे-जैसे लोग कुछ ही दिन रहनेवाला राज्यपद कैसे माँग सकते हैं?॥ ४६॥ यह ठीक है आपलोग स्वार्थ-साधनके लिये ही परामर्श देनेवाले हैं; किन्तु 'परमार्थ क्या और कैसा है?' इस विषयमें आपको विशेष ज्ञान नहीं है"॥ ४७॥ |
| भूयस्स मन्त्रिभिस्सार्द्धं मन्त्रयामास पार्थिवः।<br>गुरुनिष्क्रयकामोऽयं किं मया प्रार्थ्यतामिति॥ ४४ | |
| तमूचुर्मन्त्रिणो राज्यमशेषं प्रार्थ्यतामयम्।<br>शत्रुभिः प्रार्थ्यते राज्यमनायासितसैनिकैः॥ ४५ | |
| प्रहस्य तानाह नृपस्स खाण्डिक्यो महामतिः।<br>स्वल्पकालं महीपाल्यं मादृशैः प्रार्थ्यते कथम्॥ ४६ | |
| एवमेतद्भवन्तोऽत्र ह्यर्थसाधनमन्त्रिणः।<br>परमार्थः कथं कोऽत्र यूयं नात्र विचक्षणाः॥ ४७ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**यह कहकर राजा खाण्डिक्य केशिध्वजके पास आये और उनसे कहा, 'क्या तुम मुझे अवश्य गुरु-दक्षिणा दोगे?'॥ ४८॥ जब केशिध्वजने कहा कि 'मैं अवश्य दूँगा' तो खाण्डिक्य बोले—"आप अध्यात्मज्ञानरूप परमार्थ-विद्यामें बड़े कुशल हैं॥ ४९॥ सो यदि आप मुझे गुरु-दक्षिणा देना ही चाहते हैं तो जो कर्म समस्त क्लेशोंकी शान्ति करनेमें समर्थ हो वह बतलाइये"॥ ५०॥ |
| इत्युक्त्वा समुपैत्यैनं स तु केशिध्वजं नृपः।<br>उवाच किमवश्यं त्वं ददासि गुरुदक्षिणाम्॥ ४८ | |
| बाढमित्येव तेनोक्तः खाण्डिक्यस्तमथाब्रवीत्।<br>भवानध्यात्मविज्ञानपरमार्थविचक्षणः॥ ४९ | |
| यदि चेद्द्यीयते मह्यं भवता गुरुनिष्क्रयः।<br>तत्क्लेशप्रशमायालं यत्कर्म तदुदीरय॥ ५० |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
ब्रह्मयोगका निर्णय
| केशिध्वज उवाच | **केशिध्वज बोले—**क्षत्रियॉँको तो राज्य-प्राप्तिसे अधिक प्रिय और कुछ भी नहीं होता, फिर तुमने मेरा निष्कण्टक राज्य क्यों नहीं माँगा?॥ १॥ |
| न प्रार्थितं त्वया कस्मादस्मद्राज्यमकण्टकम्।<br>राज्यलाभाद्दिना नान्यत्क्षत्रियाणामतिप्रियम्॥ १ | |
| खाण्डिक्य उवाच | **खाण्डिक्य बोले—**हे केशिध्वज ! मैंने जिस कारणसे तुम्हारा राज्य नहीं माँगा वह सुनो। इन राज्यादिकी आकांक्षा तो मूर्खोंको हुआ करती है॥ २॥ |
| केशिध्वज निबोध त्वं मया न प्रार्थितं यतः।<br>राज्यमेतदशेषं ते यत्र गृध्नन्त्यपण्डिताः॥ २ | |
| क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम्।<br>वधश्च धर्मयुद्धेन स्वराज्यपरिपन्थिनाम्॥ ३ | क्षत्रियोंका धर्म तो यही है कि प्रजाका पालन करें और अपने राज्यके विरोधियोंका धर्म-युद्धसे वध करें॥ ३॥ |
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५३
तत्राशक्तस्य मे दोषो नैवास्त्यपहृते त्वया।
बन्ध्यायैव भवत्येषा ह्यविद्याप्यक्रमोज्झिता ॥ ४
जन्मोपभोगलिप्सार्थमियं राज्यस्पृहा मम।
अन्येषां दोषजा सैव धर्मं वै नानुरुध्यते॥ ५
न याच्ञा क्षत्रबन्धूनां धर्मायैतत्सतं मतम्।
अतो न याचितं राज्यमविद्यान्तर्गतं तव॥ ६
राज्ये गृध्नन्त्यविद्वांसो ममत्वाहृतचेतसः।
अहंमानमहापानमदमत्ता न मादृशाः ॥ ७
श्रीपराशर उवाच
प्रहृष्टस्साध्विति प्राह ततः केशिध्वजो नृपः।
खाण्डिक्यजनकं प्रीत्या श्रूयतां वचनं मम॥ ८
अहं ह्यविद्यया मृत्युं तर्तुकामः करोमि वै।
राज्यं यागांश्च विविधान्भोगैः पुण्यक्षयं तथा॥ ९
तदिदं ते मनो दिष्ट्या विवेकैश्वर्यतां गतम्।
तच्छ्रूयतामविद्यायास्स्वरूपं कुलनन्दन॥ १०
अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या चास्वे स्वमिति या मतिः।
संसारतरुसम्भूतिबीजमेतद्द्विधा स्थितम् ॥ ११
पञ्चभूतात्मके देहे देही मोहतमोवृतः।
अहं ममैतदित्युच्चैः कुरुते कुमतिर्मतिम् ॥ १२
आकाशवावग्निजलपृथिवीभ्यः पृथक् स्थिते।
आत्मन्यात्ममयं भावं कः करोति कलेवरे॥ १३
कलेवरोपभोग्यं हि गृहक्षेत्रादिकं च कः।
अदेहे ह्यात्मनि प्राज्ञो ममेदमिति मन्यते॥ १४
इत्थं च पुत्रपौत्रेषु तद्देहोत्पादितेषु कः।
करोति पण्डितस्स्वाम्यमनात्मनि कलेवरे॥ १५
सर्वं देहोपभोगाय कुरुते कर्म मानवः।
देहश्चान्यो यदा पुंसस्तदा बन्धाय तत्परम्॥ १६
मृण्मयं हि यथा गेहं लिप्यते वै मृदम्भसा।
पार्थिवोऽयं तथा देहो मृदम्ब्वालेपनस्थितः॥ १७
हिन्दी अनुवाद
शक्तिहीन होनेके कारण यदि तुमने मेरा राज्य हरण कर लिया है, तो [असमर्थतावश प्रजापालन न करनेपर भी] मुझे कोई दोष न होगा। [किन्तु राज्याधिकार होनेपर यथावत् प्रजापालन न करनेसे दोषका भागी होना पड़ता है] क्योंकि यद्यपि यह (स्वकर्म) अविद्या ही है तथापि नियमविरुद्ध त्याग करनेपर यह बन्धनका कारण होती है॥ ४॥
यह राज्यकी चाह मुझे तो जन्मान्तरके [कर्मोंद्वारा प्राप्त] सुखभोगके लिये होती है; और वही मन्त्री आदि अन्य जनोंको राग एवं लोभ आदि दोषोंसे उत्पन्न होती है केवल धर्मानुरोधसे नहीं॥ ५॥
'उत्तम क्षत्रियोंका [राज्यादिकी] याचना करना धर्म नहीं है' यह महात्माओंका मत है। इसीलिये मैंने अविद्या (पालनादि कर्म)-के अन्तर्गत तुम्हारा राज्य नहीं माँगा॥ ६॥
जो लोग अहंकाररूपी मदिराका पान करके उन्मत्त हो रहे हैं तथा जिनका चित्त ममताग्रस्त हो रहा है वे मूढ़जन ही राज्यकी अभिलाषा करते हैं; मेरे-जैसे लोग राज्यकी इच्छा नहीं करते॥ ७॥
श्रीपराशरजी बोले— तब राजा केशिध्वजने प्रसन्न होकर खाण्डिक्य जनकको साधुवाद दिया और प्रीतिपूर्वक कहा, मेरा वचन सुनो—॥ ८॥
मैं अविद्याद्वारा मृत्युको पार करनेकी इच्छासे ही राज्य तथा विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करता हूँ और नाना भोगोंद्वारा अपने पुण्योंका क्षय कर रहा हूँ॥ ९॥
हे कुलनन्दन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा मन विवेक सम्पन्न हुआ है अतः तुम अविद्याका स्वरूप सुनो॥ १०॥
संसार-वृक्षकी बीजभूता यह अविद्या दो प्रकारकी है—अनात्मामें आत्मबुद्धि और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना॥ ११॥
यह कुमति जीव मोहरूपी अन्धकारसे आवृत होकर इस पंचभूतात्मक देहमें 'मैं' और 'मेरापन' का भाव करता है॥ १२॥
जब कि आत्मा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी आदिसे सर्वथा पृथक् है तो कौन बुद्धिमान् व्यक्ति शरीरमें आत्मबुद्धि करेगा?॥ १३॥
और आत्माके देहसे परे होनेपर भी देहके उपभोग्य गृह-क्षेत्रादिको कौन प्राज्ञ पुरुष 'अपना' मान सकता है॥ १४॥
इस प्रकार इस शरीरके अनात्मा होनेसे इससे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रादिमें भी कौन विद्वान् अपनापन करेगा॥ १५॥
मनुष्य सारे कर्म देहके ही उपभोगके लिये करता है; किन्तु जब कि यह देह अपनेसे पृथक् है, तो वे कर्म केवल बन्धन (देहोत्पत्ति)-के ही कारण होते हैं॥ १६॥
जिस प्रकार मिट्टीके घरको जल और मिट्टीसे लीपते-पोतते हैं उसी प्रकार यह पार्थिव
४५४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
पञ्चभूतात्मकैर्भोगैः पञ्चभूतात्मकं वपुः। आप्यायते यदि ततः पुंसो भोगोऽत्र किं कृतः ॥ १८
अनेकजन्मसाहस्रीं संसारपदवीं व्रजन्। मोहश्रमं प्रयातोऽसौ वासनारेणुकुण्ठितः ॥ १९
प्रक्षाल्यते यदा सोऽस्य रेणुर्ज्ञानोष्णवारिणा। तदा संसारपान्थस्य याति मोहश्रमश्शमम् ॥ २०
मोहश्रमे शमं याते स्वस्थान्तःकरणः पुमान्। अनन्यातिशायाबाधं परं निर्वाणमृच्छति ॥ २१
निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमलः। दुःखाज्ञानमया धर्माः प्रकृतेस्ते तु नात्मनः ॥ २२
जलस्य नाग्निसंसर्गः स्थालीसंगात्तथापि हि। शब्दोद्रेकादिकान्धर्मान्स्तत्करोति यथा नृप ॥ २३
तथात्मा प्रकृतेस्सङ्गादहम्मानादिदूषितः। भजते प्राकृतान्धर्मानन्यस्तेभ्यो हि सोऽव्ययः ॥ २४
तदेतत्कथितं बीजमविद्याया मया तव। क्लेशानां च क्षयकरं योगादन्यन्न विद्यते ॥ २५
खाण्डिक्य उवाच
तं तु ब्रूहि महाभाग योगं योगविदुत्तम। विज्ञातयोगशास्त्रार्थस्त्वमस्यां निमिसन्ततौ ॥ २६
केशिध्वज उवाच
योगस्वरूपं खाण्डिक्य श्रूयतां गदतो मम। यत्र स्थितो न च्यवते प्राप्य ब्रह्मलयं मुनिः ॥ २७
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासङ्गि मुक्त्यै निर्विषयं मनः ॥ २८
विषयेभ्यस्समाहृत्य विज्ञानात्मा मनो मुनिः। चिन्तयेन्मुक्तये तेन ब्रह्मभूतं परेश्वरम् ॥ २९
आत्मभावं नयत्येनं तद्ब्रह्म ध्यायिनं मुनिम्। विकार्यमात्मनश्शक्त्या लोहमाकर्षको यथा ॥ ३०
आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनेोगतिः। तस्या ब्रह्मणि संयोगो योग इत्यभिधीयते ॥ ३१
शरीर भी मृत्तिका (मृण्मय अन्न) और जलकी सहायतासे ही स्थिर रहता है॥१७॥ यदि यह पंचभूतात्मक शरीर पांचभौतिक पदार्थोंसे पुष्ट होता है तो इसमें पुरुषने क्या भोग किया॥ १८॥ यह जीव अनेक सहस्त्र जन्मोंतक सांसारिक भोगोंमें पड़े रहनेसे उन्हींकी वासनारूपी धूलिसे आच्छादित हो जानेके कारण केवल मोहरूपी श्रमको ही प्राप्त होता है॥ १९॥ जिस समय ज्ञानरूपी गर्म जलसे उसकी वह धूलि धो दी जाती है तब इस संसार-पथके पथिकका मोहरूपी श्रम शान्त हो जाता है॥ २०॥ मोह-श्रमके शान्त हो जानेपर पुरुष स्वस्थ-चित्त हो जाता है और निरतिशय एवं निर्बाध परम निर्वाण पद प्राप्त कर लेता है॥ २१॥ यह ज्ञानमय निर्मल आत्मा निर्वाण-स्वरूप ही है, दुःख आदि जो अज्ञानमय धर्म हैं वे प्रकृतिके हैं, आत्माके नहीं॥ २२॥ हे राजन्! जिस प्रकार स्थाली (बटलोई)-के जलका अग्निसे संयोग नहीं होता तथापि स्थालीके संसर्गसे ही उसमें खौलनेके शब्द आदि धर्म प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रकृतिके संसर्गसे ही आत्मा अहंकारादिसे दूषित होकर प्राकृत धर्मोंको स्वीकार करता है; वास्तवमें तो वह अव्ययात्मा उनसे सर्वथा पृथक् है॥ २३-२४॥ इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अविद्याका बीज बतलाया; इस अविद्यासे प्राप्त हुए क्लेशोंको नष्ट करनेवाला योगसे अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है॥ २५॥
**खाण्डिक्य बोले—**हे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग केशिध्वज! तुम निमिवंशमें योगशास्त्रके मर्मज्ञ हो, अतः उस योगका वर्णन करो॥ २६॥
**केशिध्वज बोले—**हे खाण्डिक्य! जिसमें स्थित होकर ब्रह्ममें लीन हुए मुनिजन फिर स्वरूपसे च्युत नहीं होते, मैं उस योगका वर्णन करता हूँ; श्रवण करो॥ २७॥
मनुष्यके बन्धन और मोक्षका कारण केवल मन ही है; विषयका संग करनेसे वह बन्धनकारी और विषयशून्य होनेसे मोक्षकारक होता है॥ २८॥ अतः विवेकज्ञानसम्पन्न मुनि अपने चित्तको विषयोंसे हटाकर मोक्षप्राप्तिके लिये ब्रह्मस्वरूप परमात्माका चिन्तन करे॥ २९॥ जिस प्रकार अयस्कान्तमणि अपनी शक्तिसे लोहेको खींचकर अपनेमें संयुक्त कर लेता है उसी प्रकार ब्रह्मचिन्तन करनेवाले मुनिको परमात्मा स्वभावसे ही स्वरूपमें लीन कर देता है॥ ३०॥ आत्मज्ञानके प्रयत्नभूत यम, नियम आदिकी अपेक्षा रखनेवाली जो मनकी विशिष्ट गति है, उसका ब्रह्मके साथ संयोग होना ही 'योग' कहलाता है॥ ३१॥
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५५
| एवमत्यन्तवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षणः ।<br>यस्य योगस्स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ॥ ३२ | जिसका योग इस प्रकारके विशिष्ट धर्मसे युक्त होता है वह मुमुक्षु योगी कहा जाता है ॥ ३२ ॥ जब मुमुक्षु पहले-पहले योगाभ्यास आरम्भ करता है तो उसे 'योगयुक्त योगी' कहते हैं और जब उसे परब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है तो वह 'विनिष्पन्नसमाधि' कहलाता है ॥ ३३ ॥ यदि किसी विघ्नवश उस योगयुक्त योगीका चित्त दूषित हो जाता है तो जन्मान्तरमें भी उसी अभ्यासको करते रहनेसे वह मुक्त हो जाता है ॥ ३४ ॥ विनिष्पन्नसमाधि योगी तो योगाग्निसे कर्मसमूहके भस्म हो जानेके कारण उसी जन्ममें थोड़े ही समयमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥ योगीको चाहिये कि अपने चित्तको ब्रह्मचिन्तनके योग्य बनाता हुआ ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रहका निष्कामभावसे सेवन करे ॥ ३६ ॥ तथा संयत चित्तसे स्वाध्याय, शौच, सन्तोष और तपका आचरण करे तथा मनको निरन्तर परब्रह्ममें लगाता रहे ॥ ३७ ॥ ये पाँच-पाँच यम और नियम बतलाये गये हैं। इनका सकाम आचरण करनेसे पृथक्-पृथक् फल मिलते हैं और निष्कामभावसे सेवन करनेसे मोक्ष प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ |
| योगयुक् प्रथमं योगी युञ्जानो ह्यभिधीयते ।<br>विनिष्पन्नसमाधिस्तु परं ब्रह्मोपलब्धिमान् ॥ ३३ | |
| यद्यन्तरायदोषेण दूष्यते चास्य मानसम् ।<br>जन्मान्तरैरभ्यसतो मुक्तिः पूर्वस्य जायते ॥ ३४ | |
| विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिं तत्रैव जन्मनि ।<br>प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥ ३५ | |
| ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् ।<br>सेवेत योगी निष्कामो योग्यतां स्वमनो नयन् ॥ ३६ | |
| स्वाध्यायशौचसन्तोषतपांसि नियतात्मवान् ।<br>कुर्वीत ब्रह्मणि तथा परस्मिन्प्रवणं मनः ॥ ३७ | |
| एते यमास्सनियमाः पञ्च पञ्च च कीर्तिताः ।<br>विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामानां विमुक्तिदाः ॥ ३८ | |
| एकं भद्रासनादीनां समास्थाय गुणैर्युतः ।<br>यमाख्यैर्नियमाख्यैश्च युञ्जीत नियतो यतिः ॥ ३९ | यतिको चाहिये कि भद्रासनादि आसनोंमेंसे किसी एकका अवलम्बन कर यम-नियमादि गुणोंसे युक्त हो योगाभ्यास करे ॥ ३९ ॥ अभ्यासके द्वारा जो प्राणवायुको वशमें किया जाता है उसे 'प्राणायाम' समझना चाहिये। वह सबीज (ध्यान तथा मन्त्रपाठ आदि आलम्बनयुक्त) और निर्बीज (निरालम्ब) भेदसे दो प्रकारका है ॥ ४० ॥ सद्गुरुके उपदेशसे जब योगी प्राण और अपानवायुद्वारा एक-दूसरेका निरोध करता है तो [क्रमशः रेचक और पूरक नामक] दो प्राणायाम होते हैं और इन दोनोंका एक ही समय संयम करनेसे [कुम्भक नामक] तीसरा प्राणायाम होता है ॥ ४१ ॥ हे द्विजोत्तम ! जब योगी सबीज प्राणायामका अभ्यास आरम्भ करता है तो उसका आलम्बन भगवान् अनन्तका हिरण्यगर्भ आदि स्थूलरूप होता है ॥ ४२ ॥ तदनन्तर वह प्रत्याहारका अभ्यास करते हुए शब्दादि विषयोंमें अनुरक्त हुई अपनी इन्द्रियोंको रोककर अपने चित्तकी अनुगामिनी बनाता है ॥ ४३ ॥ ऐसा करनेसे अत्यन्त चंचल इन्द्रियाँ उसके वशीभूत हो जाती हैं। इन्द्रियोंको वशमें किये बिना कोई योगी योग-साधन नहीं कर सकता ॥ ४४ ॥ इस प्रकार प्राणायामसे वायु और प्रत्याहारसे इन्द्रियोंको वशीभूत करके चित्तको उसके शुभ आश्रयमें स्थित करे ॥ ४५ ॥ |
| प्राणाख्यमनिलं वश्यमभ्यासात्कुरुते तु यत् ।<br>प्राणायामस्स विज्ञेयस्सबीजोऽबीज एव च ॥ ४० | |
| परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यथानिलौ ।<br>कुरुतस्सद्विधानेन तृतीयस्संयमात्तयोः ॥ ४१ | |
| तस्य चालम्बनवतः स्थूलरूपं द्विजोत्तम ।<br>आलम्बनमनन्तस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ॥ ४२ | |
| शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् ।<br>कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥ ४३ | |
| वश्यता परमा तेन जायतेऽतिचलात्मनाम् ।<br>इन्द्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः ॥ ४४ | |
| प्राणायामेन पवने प्रत्याहारेण चेन्द्रिये ।<br>वशीकृते ततः कुर्यात्स्थितं चेतश्शुभाश्रये ॥ ४५ |
४५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
खाण्डिक्य उवाच
कथ्यतां मे महाभाग चेतसो यच्छुभाश्रयः।
यदाधारमशेषं तद्धन्ति दोषमलोद्भवम्॥ ४६
खाण्डिक्य बोले— हे महाभाग! यह बतलाइये कि जिसका आश्रय करनेसे चित्तके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं वह चित्तका शुभाश्रय क्या है?॥ ४६॥
केशिध्वज उवाच
आश्रयश्चेतसो ब्रह्म द्विधा तच्च स्वभावतः।
भूप मूर्त्तममूर्त्तं च परं चापरमेव च॥ ४७
त्रिविधा भावना भूप विश्वमेतन्निबोधताम्।
ब्रह्माख्या कर्मसंज्ञा च तथा चैवोभयात्मिका॥ ४८
कर्मभावात्मिका ह्येका ब्रह्मभावात्मिका परा।
उभयात्मिका तथैवान्या त्रिविधा भावभावना॥ ४९
सनन्दनादयो ये तु ब्रह्मभावनया युताः।
कर्मभावनया चान्ये देवाद्याः स्थावराश्चराः॥ ५०
हिरण्यगर्भादिषु च ब्रह्मकर्मात्मिका द्विधा।
बोधाधिकारयुक्तेषु विद्यते भावभावना॥ ५१
केशिध्वज बोले— हे राजन्! चित्तका आश्रय ब्रह्म है जो कि मूर्त और अमूर्त अथवा अपर और पर-रूपसे स्वभावसे ही दो प्रकारका है॥ ४७॥ हे भूप! इस जगत्में ब्रह्म, कर्म और उभयात्मक नामसे तीन प्रकारकी भावनाएँ हैं॥ ४८॥ इनमें पहली कर्मभावना, दूसरी ब्रह्मभावना और तीसरी उभयात्मिकाभावना कहलाती है। इस प्रकार ये त्रिविध भावनाएँ हैं॥ ४९॥ सनन्दनादि मुनिजन ब्रह्मभावनासे युक्त हैं और देवताओंसे लेकर स्थावर-जंगमपर्यन्त समस्त प्राणी कर्मभावनायुक्त हैं॥ ५०॥ तथा [स्वरूपविषयक] बोध और [स्वर्गादिविषयक] अधिकारसे युक्त हिरण्यगर्भादिमें ब्रह्मकर्ममयी उभयात्मिकाभावना है॥ ५१॥
अक्षीणेषु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु।
विश्वमेतत्परं चान्यद्भेद्भिन्नदृशां नृणाम्॥ ५२
हे राजन् ! जबतक विशेष ज्ञानके हेतु कर्म क्षीण नहीं होते तभीतक अहङ्कारादि भेदके कारण भिन्न दृष्टि रखनेवाले मनुष्योंको ब्रह्म और जगत्की भिन्नता प्रतीत होती है॥ ५२॥
प्रत्यस्तमितभेदं यत्सत्तामात्रमगोचरम्।
वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ५३
जिसमें सम्पूर्ण भेद शान्त हो जाते हैं, जो सत्तामात्र और वाणीका अविषय है तथा स्वयं ही अनुभव करनेयोग्य है, वही ब्रह्मज्ञान कहलाता है॥ ५३॥
तच्च विष्णोः परं रूपमरूपाख्यमनुत्तमम्।
विश्वस्वरूपवैरूप्यलक्षणं परमात्मनः॥ ५४
वही परमात्मा विष्णुका अरूप नामक परम रूप है, जो उनके विश्वरूपसे विलक्षण है॥ ५४॥
न तद्योगयुजा शक्यं नृप चिन्तयितुं यतः।
ततः स्थूलं हरे रूपं चिन्तयेद्विश्वगोचरम्॥ ५५
हे राजन्! योगाभ्यासी जन पहले-पहल उस रूपका चिन्तन नहीं कर सकते, इसलिये उन्हें श्रीहरिके विश्वमय स्थूल रूपका ही चिन्तन करना चाहिये॥ ५५॥
हिरण्यगर्भो भगवान्वासुदेवः प्रजापतिः।
मरुतो वसवो रुद्रा भास्करास्तारका ग्रहाः॥ ५६
गन्धर्वयक्षदैत्याद्यास्सकला देवयोनयः।
मनुष्याः पशवश्शैलास्समुद्रास्सरितो द्रुमाः॥ ५७
भूप भूतान्यशेषाणि भूतानां ये च हेतवः।
प्रधानादिविशेषान्तं चेतनाचेतनात्मकम्॥ ५८
एकपादं द्विपादं च बहुपादमपादकम्।
मूर्त्तमेतद्धरे रूपं भावनात्रितयात्मकम्॥ ५९
हिरण्यगर्भ, भगवान् वासुदेव, प्रजापति, मरुत्, वसु, रुद्र, सूर्य, तारे, ग्रहगण, गन्धर्व, यक्ष और दैत्य आदि समस्त देवयोनियाँ तथा मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदी, वृक्ष, सम्पूर्ण भूत एवं प्रधानसे लेकर विशेष (पंचतन्मात्रा) पर्यन्त उनके कारण तथा चेतन, अचेतन, एक, दो अथवा अनेक चरणोंवाले प्राणी और बिना चरणोंवाले जीव—ये सब भगवान् हरिके भावनात्रयात्मक मूर्तरूप हैं॥ ५६—५९॥
एतत्सर्वमिदं विश्वं जगदेतच्चराचरम्।
परब्रह्मस्वरूपस्य विष्णोश्शक्तिसमन्वितम्॥ ६०
यह सम्पूर्ण चराचर जगत्, परब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका, उनकी शक्तिसे सम्पन्न 'विश्व' नामक रूप है॥ ६०॥
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५७
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा ।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ ६१
यया क्षेत्रज्ञशक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा ।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यतिसन्ततान् ॥ ६२
तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता ।
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन लक्ष्यते ॥ ६३
अप्राणवत्सु स्वल्पा सा स्थावरेषु ततोऽधिका ।
सरीसृपेषु तेभ्योऽपि ह्यतिशक्त्या पतत्त्रिषु ॥ ६४
पतत्त्रिभ्यो मृगास्तेभ्यस्तच्छक्त्या पशवोऽधिकाः ।
पशुभ्यो मनुजाश्चातिशक्त्या पुंसः प्रभाविताः ॥ ६५
तेभ्योऽपि नागगन्धर्वयक्षाद्या देवता नृप ॥ ६६
शक्रस्समस्तदेवेभ्यस्ततश्चाति प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भोऽपि ततः पुंसः शक्त्युपलक्षितः ॥ ६७
एतान्यशेषरूपाणि तस्य रूपाणि पार्थिव ।
यतस्तच्छक्तियोगेन युक्तानि नभसा यथा ॥ ६८
द्वितीयं विष्णुसंज्ञस्य योगिध्येयं महामते ।
अमूर्त्तं ब्रह्मणो रूपं यत्सदिदित्युच्यते बुधैः ॥ ६९
समस्ताः शक्तयश्चैता नृप यत्र प्रतिष्ठिताः ।
तद्विश्वरूपवैरूप्यं रूपमन्यद्धरेर्महत् ॥ ७०
समस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वर ।
देवतैर्यङ्मनुष्यादिचेष्टावन्ति स्वलीलया ॥ ७१
जगतामुपकाराय न सा कर्मनिमित्तजा ।
चेष्टा तस्याप्रमेयस्य व्यापिन्यव्याहतात्मिका ॥ ७२
तद्रूपं विश्वरूपस्य तस्य योगयुजा नृप ।
चिन्त्यमात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकिल्बिषनाशनम् ॥ ७३
यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः ।
तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्बिषम् ॥ ७४
तस्मात्समस्तशक्तीनामाधारे तत्र चेतसः ।
कुर्वीत संस्थितिं सा तु विज्ञेया शुद्धधारणा ॥ ७५
शुभाश्रयः स चित्तस्य सर्वगस्याचलात्मनः ।
त्रिभावभावनातीतो मुक्तये योगिनो नृप ॥ ७६
विष्णुशक्ति परा है, क्षेत्रज्ञ नामक शक्ति अपरा है और कर्म नामकी तीसरी शक्ति अविद्या कहलाती है ॥ ६१ ॥ हे राजन्! इस अविद्या-शक्तिसे आवृत होकर वह सर्वगामिनी क्षेत्रज्ञ-शक्ति सब प्रकारके अति विस्तृत सांसारिक कष्ट भोगा करती है ॥ ६२ ॥ हे भूपाल! अविद्या-शक्तिसे तिरोहित रहनेके कारण ही क्षेत्रज्ञ-शक्ति सम्पूर्ण प्राणियोंमें तारतम्यसे दिखलायी देती है ॥ ६३ ॥ वह सबसे कम जड पदार्थोंमें है, उनसे अधिक वृक्ष-पर्वतादि स्थावरोंमें, स्थावरोंसे अधिक सरीसृपादिमें और उनसे अधिक पक्षियोंमें है ॥ ६४ ॥ पक्षियोंसे मृगोंमें और मृगोंसे पशुओंमें वह शक्ति अधिक है तथा पशुओंकी अपेक्षा मनुष्य भगवान्की उस (क्षेत्रज्ञ) शक्तिसे अधिक प्रभावित हैं ॥ ६५ ॥ मनुष्योंसे नाग, गन्धर्व और यक्ष आदि समस्त देवगणोंमें, देवताओंसे इन्द्रमें, इन्द्रसे प्रजापतिमें और प्रजापतिसे हिरण्यगर्भमें उस शक्तिका विशेष प्रकाश है ॥ ६६-६७ ॥ हे राजन्! ये सम्पूर्ण रूप उस परमेश्वरके ही शरीर हैं, क्योंकि ये सब आकाशके समान उनकी शक्तिसे व्याप्त हैं ॥ ६८ ॥
हे महामते! विष्णु नामक ब्रह्मका दूसरा अमूर्त (आकारहीन) रूप है, जिसका योगिजन ध्यान करते हैं और जिसे बुधजन 'सत्' कहकर पुकारते हैं ॥ ६९ ॥ हे नृप! जिसमें कि ये सम्पूर्ण शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं वही भगवान्का विश्वरूपसे विलक्षण द्वितीय रूप है ॥ ७० ॥ हे नरेश! भगवान्का वही रूप अपनी लीलासे देव, तिर्यक् और मनुष्यादिकी चेष्टाओंसे युक्त सर्वशक्तिमय रूप धारण करता है ॥ ७१ ॥ इन रूपोंमें अप्रमेय भगवान्की जो व्यापक एवं अव्याहत चेष्टा होती है वह संसारके उपकारके लिये ही होती है, कर्मजन्य नहीं होती ॥ ७२ ॥ हे राजन्! योगाभ्यासीको आत्म-शुद्धिके लिये भगवान् विश्वरूपके उस सर्वपापनाशक रूपका ही चिन्तन करना चाहिये ॥ ७३ ॥ जिस प्रकार वायुसहित अग्नि ऊँची ज्वालाओंसे युक्त होकर शुष्क तृणसमूहको जला डालता है उसी प्रकार चित्तमें स्थित हुए भगवान् विष्णु योगियोंके समस्त पाप नष्ट कर देते हैं ॥ ७४ ॥ इसलिये सम्पूर्ण शक्तियोंके आधार भगवान् विष्णुमें चित्तको स्थिर करे, यही शुद्ध धारणा है ॥ ७५ ॥
हे राजन्! तीनों भावनाओंसे अतीत भगवान् विष्णु ही योगिजनोंकी मुक्तिके लिये उनके [स्वतः] चंचल तथा [किसी अनूठे विषयमें] स्थिर रहनेवाले चित्तके शुभ आश्रय हैं ॥ ७६ ॥
४५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| Sanskrit Verse | Hindi Translation |
|---|---|
| अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः।<br>अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः॥ ७७ | हे पुरुषसिंह! इसके अतिरिक्त मनके आश्रयभूत जो अन्य देवता आदि कर्मयोनियाँ हैं, वे सब अशुद्ध हैं॥ ७७॥ |
| मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिःस्पृहम्।<br>एषा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्तं तत्र धार्यते॥ ७८ | भगवान्का यह मूर्त्तरूप चित्तको अन्य आलम्बनोंसे निःस्पृह कर देता है। इस प्रकार चित्तका भगवान्में स्थिर करना ही धारणा कहलाती है॥ ७८॥ |
| यच्च मूर्त्तं हरे रूपं यादृक्चिन्त्यं नराधिप।<br>तच्छ्रूयतामनाधारा धारणा नोपपद्यते॥ ७९ | हे नरेन्द्र! धारणा बिना किसी आधारके नहीं हो सकती; इसलिये भगवान्के जिस मूर्त्तरूपका जिस प्रकार ध्यान करना चाहिये, वह सुनो॥ ७९॥ |
| प्रसन्नवदनं चारुपद्मपत्रोपमेक्षणम्।<br>सुकपोलं सुविस्तीर्णललाटफलकोज्ज्वलम्॥ ८० | जो प्रसन्नवदन और कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाले हैं, सुन्दर कपोल और विशाल भालसे अत्यन्त सुशोभित हैं तथा अपने सुन्दर कानोंमें मनोहर कुण्डल पहने हुए हैं, जिनकी ग्रीवा शंखके समान और विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो तरंगाकार त्रिवली तथा नीची नाभिवाले उदरसे सुशोभित हैं, जिनके लम्बी-लम्बी आठ अथवा चार भुजाएँ हैं तथा जिनके जंघा एवं ऊरु समानभावसे स्थित हैं और मनोहर चरणारविन्द सुघरतासे विराजमान हैं उन निर्मल पीताम्बरधारी ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका चिन्तन करे॥ ८०-८३॥ |
| समकर्णान्तविन्यस्तचारुकुण्डलभूषणम्।<br>कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ८१ | |
| वलित्रिभङ्गिना मग्ननाभिना ह्युदरेण च।<br>प्रलम्बाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम्॥ ८२ | |
| समस्थितोरुजङ्घं च सुस्थिताङ्घ्रिवराम्बुजम्।<br>चिन्तयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम्॥ ८३ | |
| किरीटहारकेयूरकटकादिविभूषितम् ॥ ८४ | हे राजन्! किरीट, हार, केयूर और कटक आदि आभूषणोंसे विभूषित, शार्ङ्गधनुष, शंख, गदा, खड्ग, चक्र तथा अक्षमालासे युक्त वरद और अभययुक्त हाथोंवाले* [तथा अँगुलियोंमें धारण की हुई] रत्नमयी मुद्रिकासे शोभायमान भगवान्के दिव्य रूपका योगीको अपना चित्त एकाग्र करके तन्मयभावसे तबतक चिन्तन करना चाहिये जबतक यह धारणा दृढ़ न हो जाय॥ ८४-८६॥ |
| शार्ङ्गशङ्खगदाखड्गचक्राक्षवलयान्वितम्।<br>वरदाभयहस्तं च मुद्रिकारत्नभूषितम्॥ ८५ | |
| चिन्तयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम्।<br>तावद्यावद्दृढीभूता तत्रैव नृप धारणा॥ ८६ | |
| व्रजतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।<br>नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा॥ ८७ | जब चलते-फिरते, उठते-बैठते अथवा स्वेच्छानुकूल कोई और कर्म करते हुए भी ध्येय मूर्ति अपने चित्तसे दूर न हो तो इसे सिद्ध हुई माननी चाहिये॥ ८७॥ |
| ततः शङ्खगदाचक्रशार्ङ्गादिरहितं बुधः।<br>चिन्तयेद्भगवद्रूपं प्रशान्तं साक्षसूत्रकम्॥ ८८ | इसके दृढ़ होनेपर बुद्धिमान् व्यक्ति शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग आदिसे रहित भगवान्के स्फटिकाक्षमाला और यज्ञोपवीतधारी शान्त स्वरूपका चिन्तन करे॥ ८८॥ |
| सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः।<br>किरीटकेयूरमुख्यैर्भूषणै रहितं स्मरेत्॥ ८९ | जब यह धारणा भी पूर्ववत् स्थिर हो जाय तो भगवान्के किरीट, केयूरादि आभूषणोंसे रहित रूपका स्मरण करे॥ ८९॥ |
| तदेकावयवं देवं चेतसा हि पुनर्बुधः।<br>कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत्॥ ९० | तदनन्तर विज्ञ पुरुष अपने चित्तमें एक (प्रधान) अवयव-विशिष्ट भगवान्का हृदयसे चिन्तन करे और फिर सम्पूर्ण अवयवोंको छोड़कर केवल अवयवीका ध्यान करे॥ ९०॥ |
* चतुर्भुज-मूर्तिके ध्यानमें चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्मकी भावना करे तथा अष्टभुजरूपका ध्यान करते समय छः हाथोंमें तो शार्ङ्ग आदि छः आयुधोंकी भावना करे तथा शेष दोमें पद्म और बाण अथवा वरद और अभय-मुद्राका चिन्तन करे।
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५९
तद्रूपप्रत्यया चैका सन्ततिश्चान्यनिःस्पृहा। तद्ध्यानं प्रथमैरङ्गैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप॥ ९१
तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत्। मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते॥ ९२
विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव। प्रापणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेषभावनः॥ ९३
क्षेत्रज्ञः करणी ज्ञानं करणं तस्य तेन तत्। निष्पाद्य मुक्तिकार्यं वै कृतकृत्यो निवर्तते॥ ९४
तद्भावभावमापन्नस्ततोऽसौ परमात्मना। भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत्॥ ९५
विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति॥ ९६
इत्युक्तस्ते मया योगः खाण्डिक्य परिपृच्छतः। संक्षेपविस्तराभ्यां तु किमन्यत्क्रियतां तव॥ ९७
खाण्डिक्य उवाच
कथिते योगसद्भावे सर्वमेव कृतं मम। तवोपदेशेनाशेषो नष्टश्चित्तमलो यतः॥ ९८
ममेति यन्मया चोक्तमसदेतन्न चान्यथा। नरेन्द्र गदितुं शक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः॥ ९९
अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्तथानयोः। परमार्थस्त्वसंलापो गोचरे वचसां न यः॥ १००
तद्गच्छ श्रेयसे सर्वं ममैतद्भवता कृतम्। यद्विमुक्तिप्रदो योगः प्रोक्तः केशिध्वजाव्ययः॥ १०१
श्रीपराशर उवाच
यथार्हं पूजया तेन खाण्डिक्येन स पूजितः। आजगाम पुरं ब्रह्मंस्ततः केशिध्वजो नृपः॥ १०२
खाण्डिक्योऽपि सुतं कृत्वा राजानं योगसिद्धये। वनं जगाम गोविन्दे विनिवेशितमानसः॥ १०३
तत्रैकान्तमतिर्भूत्वा यमादिगुणसंयुतः। विष्ण्वाख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिर्लयम्॥ १०४
हे राजन्! जिसमें परमेश्वरके रूपकी ही प्रतीति होती है, ऐसी जो विषयान्तरकी स्पृहासे रहित एक अनवरत धारा है उसे ही ध्यान कहते हैं; यह अपनेसे पूर्व यम-नियमादि छः अंगोंसे निष्पन्न होता है॥ ९१॥ उस ध्येय पदार्थका ही जो मनके द्वारा ध्यानसे सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन (ध्याता, ध्येय और ध्यानके भेदसे रहित) स्वरूप ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं॥ ९२॥ हे राजन्! [समाधिसे होनेवाला भगवत्साक्षात्काररूप] विज्ञान ही प्राप्तव्य परब्रह्मतक पहुँचानेवाला है तथा सम्पूर्ण भावनाओंसे रहित एकमात्र आत्मा ही प्रापणीय (वहाँतक पहुँचनेवाला) है॥ ९३॥ मुक्ति-लाभमें क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान करण है; [ज्ञानरूपी करणके द्वारा क्षेत्रज्ञके] मुक्तिरूपी कार्यको सिद्ध करके वह विज्ञान कृतकृत्य होकर निवृत्त हो जाता है॥ ९४॥ उस समय यह भगवद्भावसे भरकर परमात्मासे अभिन्न हो जाता है। इसका भेद-ज्ञान तो अज्ञानजन्य ही है॥ ९५॥ भेद उत्पन्न करनेवाले अज्ञानके सर्वथा नष्ट हो जानेपर ब्रह्म और आत्मामें असत् (अविद्यमान) भेद कौन कर सकता है?॥ ९६॥ हे खाण्डिक्य! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने संक्षेप और विस्तारसे योगका वर्णन किया; अब मैं तुम्हारा और क्या कार्य करूँ?॥ ९७॥
खाण्डिक्य बोले— आपने इस महायोगका वर्णन करके मेरा सभी कार्य कर दिया, क्योंकि आपके उपदेशसे मेरे चित्तका सम्पूर्ण मल नष्ट हो गया है॥ ९८॥ हे राजन्! मैंने जो 'मेरा' कहा यह भी असत्य ही है, अन्यथा ज्ञेय वस्तुको जाननेवाले तो यह भी नहीं कह सकते॥ ९९॥ 'मैं' और 'मेरा' ऐसी बुद्धि और इनका व्यवहार भी अविद्या ही है, परमार्थ तो कहने-सुननेकी बात नहीं है क्योंकि वह वाणीका अविषय है॥ १००॥ हे केशिध्वज! आपने इस मुक्तिप्रद योगका वर्णन करके मेरे कल्याणके लिये सब कुछ कर दिया, अब आप सुखपूर्वक पधारिये॥ १०१॥
श्रीपराशरजी बोले— हे ब्रह्मन्! तदनन्तर खाण्डिक्यसे यथोचित पूजित हो राजा केशिध्वज अपने नगरमें चले आये॥ १०२॥ तथा खाण्डिक्य भी अपने पुत्रको राज्य दे* श्रीगोविन्दमें चित्त लगाकर योग सिद्ध करनेके लिये [निर्जन] वनको चले गये॥ १०३॥ वहाँ यमादि गुणोंसे युक्त होकर एकाग्रचित्तसे ध्यान करते हुए राजा खाण्डिक्य विष्णु नामक निर्मल ब्रह्ममें लीन हो गये॥ १०४॥
* यद्यपि खाण्डिक्य उस समय राजा नहीं था; तथापि वनमें जो उसके दुर्ग, मन्त्री और भृत्य आदि थे उन्हींका स्वामी अपने पुत्रको बनाया।
४६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८
केशिध्वजो विमुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः। बुभुजे विषयान्कर्म चक्रे चानभिसंहितम्॥ १०५
किन्तु केशिध्वज विदेहमुक्तिके लिये अपने कर्मोंको क्षय करते हुए समस्त विषय भोगते रहे। उन्होंने फलकी इच्छा न करके अनेकों शुभ-कर्म किये॥ १०५॥
सकल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्तथा। अवाप सिद्धिमत्यन्तां तापक्षयफलां द्विज॥ १०६
हे द्विज! इस प्रकार अनेकों कल्याणप्रद भोगोंको भोगते हुए उन्होंने पाप और मल (प्रारब्ध-कर्म) का क्षय हो जानेपर तापत्रयको दूर करनेवाली आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त कर ली॥ १०६॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार
श्रीपराशर उवाच
इत्येष कथितः सम्यक्तृतीयः प्रतिसञ्चरः।
आत्यन्तिको विमुक्तिर्या लयो ब्रह्मणि शाश्वते॥ १
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव भवतो गदितं मया॥ २
पुराणं वैष्णवं चैतत्सर्वकिल्बिषनाशनम्।
विशिष्टं सर्वशास्त्रेभ्यः पुरुषार्थोपपादकम्॥ ३
तुभ्यं यथावन्मैत्रेय प्रोक्तं शुश्रूषवेऽव्ययम्।
यदन्यदपि वक्तव्यं तत्पृच्छाद्य वदामि ते॥ ४
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे तीसरे आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन किया, जो सनातन ब्रह्ममें लयरूप मोक्ष ही है॥ १॥ मैंने तुमसे संसारकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशोंके चरित्रोंका वर्णन किया॥ २॥ हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें सुननेके लिये उत्सुक देखकर यह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ सर्वपापनाशक और पुरुषार्थका प्रतिपादक वैष्णवपुराण सुना दिया। अब तुम्हें जो और कुछ पूछना हो पूछो। मैं उसका तुमसे वर्णन करूँगा॥ ३-४॥
श्रीमैत्रेय उवाच
भगवन्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया मुने।
श्रुतं चैतन्मया भक्त्या नान्यत्प्रष्टव्यमस्ति मे॥ ५
विच्छिन्नाःसर्वसन्देहा वैमल्यं मनसः कृतम्।
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञाता उत्पत्तिस्थितिसंक्षयाः॥ ६
ज्ञातश्चतुर्विधो राशिः शक्तिश्च त्रिविधा गुरो।
विज्ञाता सा च कार्त्स्न्येन त्रिविधा भावभावना॥ ७
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं ज्ञेयमन्यैरलं द्विज।
यदेतदखिलं विष्णोर्जगन्न व्यतिरिच्यते॥ ८
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! मैंने आपसे जो कुछ पूछा था वह सभी आप कह चुके और मैंने भी उसे श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुना, अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है॥ ५॥ हे मुने! आपकी कृपासे मेरे समस्त सन्देह निवृत्त हो गये और मेरा चित्त निर्मल हो गया तथा मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका ज्ञान हो गया॥ ६॥ हे गुरो! मैं चार प्रकारकी राशि¹ और तीन प्रकारकी शक्तियाँ² जान गया तथा मुझे त्रिविध भाव-भावनाओंका³ भी सम्यक् बोध हो गया॥ ७॥ हे द्विज! आपकी कृपासे मैं, जो जानना चाहिये वह भली प्रकार जान गया कि यह सम्पूर्ण जगत् श्रीविष्णुभगवान्से भिन्न नहीं है, इसलिये अब मुझे अन्य बातोंके जाननेसे कोई लाभ नहीं॥ ८॥
¹ देखिये—प्रथम अंश अध्याय २२ श्लोक २३-३३।
² ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ६१-६३।
³ ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ४८-५१।
अ० ८ ]
- षष्ठ अंश *
४६१
कृतार्थोऽहमसन्देहस्तवप्रसादान्महामुने । वर्णधर्मादयो धर्मा विदिता यदशेषतः ॥ ९ प्रवृत्तं च निवृत्तं च ज्ञातं कर्म मयाखिलम् । प्रसीद विप्रप्रवर नान्यत्रष्टव्यमस्ति मे ॥ १० यदस्य कथनायासैर्योजितोऽसि मया गुरो । तत्क्षम्यतां विशेषोऽस्ति न सतां पुत्रशिष्ययोः ॥ ११
श्रीपराशर उवाच
एतत्ते यन्मयाख्यातं पुराणं वेदसम्मतम् । श्रुतेऽस्मिन्सर्वदोषोत्थः पापराशिः प्रणश्यति ॥ १२ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं कृतस्नं मयात्र तव कीर्तिताम् ॥ १३ अत्र देवास्तथा दैत्या गन्धर्वौरगराक्षसाः । यक्षविद्याधारास्सिद्धाः कथ्यन्तेऽप्सरसस्तथा ॥ १४ मुनयो भावितात्मानः कथ्यन्ते तपसान्विताः । चातुर्वर्ण्यं तथा पुंसां विशिष्टचरितानि च ॥ १५ पुण्याः प्रदेशा मेदिन्याः पुण्या नद्योऽथ सागराः । पर्वताश्च महापुण्याश्चरितानि च धीमताम् ॥ १६ वर्णधर्मादयो धर्मा वेदशास्त्राणि कृतस्नशः । येषां संस्मरणात्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १७ उत्पत्तिस्थितिनाशानां हेतुयों जगतोऽव्ययः । स सर्वभूतस्सर्वात्मा कथ्यते भगवान्हरिः ॥ १८ अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकैः । पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहन्नस्तैर्वृकैरिव ॥ १९ यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलायनमनुत्तमम् । मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः ॥ २० कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । प्रयाति विलयं सद्यः सकृद्यत्र च संस्मृते ॥ २१ हिरण्यगर्भदेवेन्द्ररुद्रादित्याशिववायुभिः । पावकैर्वसुभिः साध्वैर्विश्वेदेवादिभिः सुरैः ॥ २२ यक्षरक्षोरगैः सिद्धैर्दैत्यगन्धर्वदानवैः । अप्सरोभिस्तथा तारानक्षत्रैः सकलैर्गृहैः ॥ २३
हे महामुने! आपके प्रसादसे मैं निस्सन्देह कृतार्थ हो गया क्योंकि मैंने वर्ण-धर्म आदि सम्पूर्ण धर्म और प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप समस्त कर्म जान लिये। हे विप्रवर! आप प्रसन्न रहें; अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है ॥ ९-१० ॥ हे गुरो! मैंने आपको जो इस सम्पूर्ण पुराणके कथन करनेका कष्ट दिया है, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें; साधुजनोंकी दृष्टिमें पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता ॥ ११ ॥
श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मैंने तुमको जो यह वेदसम्मत पुराण सुनाया है इसके श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण दोषोंसे उत्पन्न हुआ पापपुंज नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥ इसमें मैंने तुमसे सृष्टिकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर और वंशोंके चरित—इन सभीका वर्णन किया है ॥ १३ ॥ इस ग्रन्थमें देवता, दैत्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध और अप्सरागणका भी वर्णन किया गया है ॥ १४ ॥ आत्माराम और तपोनिष्ठ मुनिजन चातुर्वर्ण्य-विभाग, महापुरुषोंके विशिष्ट चरित, पृथिवीके पवित्र क्षेत्र, पवित्र नदी और समुद्र, अत्यन्त पावन पर्वत, बुद्धिमान् पुरुषोंके चरित, वर्ण-धर्म आदि धर्म तथा वेद और शास्त्रोंका भी इसमें सम्यक् रूपसे निरूपण हुआ है, जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १५-१७ ॥
जो अव्ययात्मा भगवान् हरि संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके एकमात्र कारण हैं उनका भी इसमें कीर्तन किया गया है ॥ १८ ॥ जिनके नामका विवश होकर कीर्तन करनेसे ही मनुष्य सिंहसे डरे हुए गीदड़ोंके समान पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥ हे मैत्रेय! जिनका भक्तिपूर्वक किया हुआ नाम-संकीर्तन सम्पूर्ण धातुओंको पिघलानेवाले अग्निके समान समस्त पापोंका सर्वोत्तम विलयन (लीन कर देनेवाला) है ॥ २० ॥ जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनुष्योंको नरक-यातनाएँ देनेवाला अति उग्र कलि-कल्मष तुरन्त नष्ट हो जाता है ॥ २१ ॥ हे द्विजोत्तम! हिरण्यगर्भ, देवेन्द्र, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वायु, अग्नि, वसु, साध्य और विश्वेदेव आदि देवगण, यक्ष, राक्षस, उरग, सिद्ध, दैत्य, गन्धर्व, दानव, अप्सरा, तारा, नक्षत्र, समस्त ग्रह,
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४६२
- श्रीविष्णुपुराण *
[ ३० ८ ]
सप्तर्षिभिस्तथा धिष्ण्यैर्धिष्ण्याधिपतिभिस्तथा। ब्राह्मणाद्यैर्मनुष्यैश्च तथैव पशुभिर्भूगैः ॥ २४ सरीसृपैर्विहङ्गैश्च पलाशाद्यैर्महीरुहैः। वनाग्निसागरसरित्यातालैः सधरादिभिः ॥ २५ शब्दादिभिश्च सहितं ब्रह्माण्डमखिलं द्विज। मेरोरिवाणुर्यस्येतद्यन्मयं च द्विजोत्तम ॥ २६ स सर्वः सर्ववित्सर्वस्वरूपो रूपवर्जितः। भगवान्कीर्तितो विष्णुरत्र पापप्रणाशनः ॥ २७ यदश्वमेधावभूथे स्नातः प्राज्योति वै फलम्। मानवस्तदवाज्योति श्रुतैतन्मुनिसत्तम ॥ २८ प्रयागे पुष्करे चैव कुरुक्षेत्रे तथार्णवे। कृतोपवासः प्राज्योति तदस्य श्रवणान्तरः ॥ २९ यदग्निहोत्रे सुहुते वर्षणाज्योति मानवः। महापुण्यफलं विप्र तदस्य श्रवणात्सकृत ॥ ३० यज्येष्ठशुक्ल द्वादश्यां स्नात्वा वै यमुनाजले। मथुरायां हरिं दृष्ट्वा प्राज्योति पुरुषः फलम् ॥ ३१ तदाज्योत्यखिलं सम्यगध्यायं यः शृणोति वै। पुराणस्यास्य विप्रषं केशवार्पितमानसः ॥ ३२ यमुनासलिलस्नातः पुरुषो मुनिसत्तम। ज्येष्ठामूले सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥ ३३ समभ्यर्चाच्युतं सम्यङ् मथुरायां समाहितः। अश्वमेधस्य यज्ञस्य प्राज्योत्यविकलं फलम् ॥ ३४ आलोक्यद्विद्विमाश्रयेषामुन्नीतानां स्ववंशजैः। एतत्किलोचुरन्येषां पितरः सपितामहाः ॥ ३५ कच्चिदस्मक्कुले जातः कालिन्दीसलिलाप्लुतः। अर्चयिष्यति गोविन्दं मथुरायामुपोषितः ॥ ३६ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे येनैवं वयमप्युत। परामृद्विद्विमापस्यामस्तारिताः स्वकुलोद्भवैः ॥ ३७ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे समभ्यर्च्य जनार्दनम्। धन्यानां कुलजः पिण्डान्यमुनायां प्रदास्यति ॥ ३८ तस्मिन्काले समभ्यर्च्य तत्र कृष्णं समाहितः। दत्त्वा पिण्डं पितृभ्यश्च यमुनासलिलाप्लुतः ॥ ३९
सप्तर्षि, लोक, लोकपालगण, ब्राह्मणादि मनुष्य, पशु, मृग, सरीसृप, विहंग, पलाश आदि वृक्ष, वन, अग्नि, समुद्र, नदी, पाताल तथा पृथिवी आदि और शब्दादि विषयोंके सहित यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनके आगे सुमेरुके सामने एक रेणुके समान है तथा जो इसके उपादान-कारण हैं उन सर्व सर्वज्ञ सर्वस्वरूप रूपरहित और पापनाशक भगवान् विष्णुका इसमें कीर्तन किया गया है ॥ २२-२७ ॥
हे मुनिसत्तम! अश्वमेध-यज्ञमें अवभूथ (यज्ञान्त) स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही फल मनुष्य इसको सुनकर प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥ प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र तथा समुद्रतटपर रहकर उपवास करनेसे जो फल मिलता है वही इस पुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥ एक वर्षतक नियमानुसार अग्निहोत्र करनेसे मनुष्यको जो महान् पुण्यफल मिलता है वही इसे एक बार सुननेसे हो जाता है ॥ ३० ॥ ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीके दिन मथुरापुरीमें यमुना-स्नान करके कृष्णचन्द्रका दर्शन करनेसे जो फल मिलता है हे विप्रषं! वही भगवान् कृष्णमें चित्त लगाकर इस पुराणके एक अध्यायको सावधानतापूर्वक सुननेसे मिल जाता है ॥ ३१-३२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको मथुरापुरीमें उपवास करते हुए यमुना-स्नान करके समाहितचित्तसे श्रीअच्युतका भलीप्रकार पूजन करनेसे मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल मिलता है ॥ ३३-३४ ॥ कहते हैं अपने वंशजोंद्वारा [यमुनातटपर पिण्डदान करनेसे] उन्नति लाभ किये हुए अन्य पितरोंकी समृद्धि देखकर दूसरे लोगोंके पितृ-पितामहोंने [अपने वंशजोंको लक्ष्य करके] इस प्रकार कहा था— ॥ ३५ ॥ क्या हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष ज्येष्ठ-मासके शुक्ल पक्षमें [द्वादशी तिथिको] मथुरामें उपवास करते हुए यमुनाजलमें स्नान करके श्रीगोविन्दका पूजन करेगा, जिससे हम भी अपने वंशजोंद्वारा उद्धार पाकर ऐसा परम ऐश्वर्य प्राप्त कर सकेंगे? जो बड़े भाग्यवान् होते हैं उन्हींके वंशधर ज्येष्ठमासीय शुक्लपक्षमें भगवान्का अर्चन करके यमुनामें पितृगणको पिण्डदान करते हैं ॥ ३६-३८ ॥ उस समय यमुनाजलमें स्नान करके सावधानतापूर्वक भलीप्रकार भगवान्का पूजन
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अ० ८ ] * षष्ठ अंश * ४६३
यदाप्नोति नरः पुण्यं तारयन्स्वपितामहान् ।
श्रुत्वाध्यायं तदाप्नोति पुराणस्यास्य भक्तितः ॥ ४०
एतत्संसारभीरूणां परित्राणमनुत्तमम् ।
श्राव्याणां परमं श्राव्यं पवित्राणामनुत्तमम् ॥ ४१
दुःस्वप्ननाशनं नृणां सर्वदुष्टनिबर्हणम् ।
मङ्गलं मङ्गलानां च पुत्रसम्पत्प्रदायकम् ॥ ४२
इदमार्षं पुरा प्राह ऋभवे कमलोद्भवः ।
ऋभुः प्रियव्रतायाह स च भागुरयेऽब्रवीत् ॥ ४३
भागुरिः स्तम्भमित्राय दधीचाय स चोक्तवान् ।
सारस्वताय तेनोक्तं भृगुस्सारस्वतेन च ॥ ४४
भृगुणा पुरुकुत्साय नर्मदायाै स चोक्तवान् ।
नर्मदा धृतराष्ट्राय नागायापूरणाय* च ॥ ४५
ताभ्यां च नागराजाय प्रोक्तं वासुकये द्विज ।
वासुकिः प्राह वत्सस्य वत्सश्चाश्वतराय वै ॥ ४६
कम्बलाय च तेनोक्तमेलापुत्राय तेन वै ॥ ४७
पातालं समनुप्राप्तस्ततो वेदशिरा मुनिः ।
प्राप्तवानेतदखिलं स च प्रमतये ददौ ॥ ४८
दत्तं प्रमतिना चैतज्जातुकर्णाय धीमते ।
जातुकर्णेन चैवोक्तमन्येषां पुण्यकर्मणाम् ॥ ४९
पुलस्त्यवरदानेन ममाप्येतत्स्मृतिं गतम् ।
मयापि तुभ्यं मैत्रेय यथावत्कथितं त्विदम् ॥ ५०
त्वमप्येतच्छिनीकाय कलेरन्ते वदिष्यसि ॥ ५१
इत्येतत्परमं गुह्यं कलिकल्मषनाशनम् ।
यः शृणोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२
समस्ततीर्थस्नानानि समस्तामरसंस्तुतिः ।
कृता तेन भवेदेतद्यः शृणोति दिने दिने ॥ ५३
कपिलादानजनितं पुण्यमत्यन्तदुर्लभम् ।
श्रुत्वैतस्य दशाध्यायानवाप्नोति न संशयः ॥ ५४
यस्त्वेतत्सकलं शृणोति पुरुषः
कृत्वा मनस्यच्युतं
करनेसे और पितृगणको पिण्ड देनेसे अपने पितामहोंको तारता हुआ पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है वही पुण्य भक्तिपूर्वक इस पुराणका एक अध्याय सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ यह पुराण संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंका अति उत्तम रक्षक, अत्यन्त श्रवणयोग्य तथा पवित्रोंमें परम उत्तम है ॥ ४१ ॥ यह मनुष्योंके दुःस्वप्नोंको नष्ट करनेवाला, सम्पूर्ण दोषोंको दूर करनेवाला, मांगलिक वस्तुओंमें परम मांगलिक और सन्तान तथा सम्पत्तिका देनेवाला है ॥ ४२ ॥
इस आर्षपुराणको सबसे पहले भगवान् ब्रह्माजीने ऋभुको सुनाया था । ऋभुने प्रियव्रतको सुनाया और प्रियव्रतने भागुरिसे कहा ॥ ४३ ॥ फिर इसे भागुरिने स्तम्भमित्रको, स्तम्भमित्रने दधीचिको, दधीचने सारस्वतको और सारस्वतने भृगुको सुनाया ॥ ४४ ॥ तथा भृगुने पुरुकुत्ससे, पुरुकुत्सने नर्मदासे और नर्मदाने धृतराष्ट्र एवं पूरणनागसे कहा ॥ ४५ ॥ हे द्विज ! इन दोनोंने यह पुराण नागराज वासुकीको सुनाया । वासुकिने वत्सको, वत्सने अश्वतरको, अश्वतरने कम्बलको और कम्बलने एलापुत्रको सुनाया ॥ ४६-४७ ॥ इसी समय मुनिवर वेदशिरा पाताललोकमें पहुँचे, उन्होंने यह समस्त पुराण प्राप्त किया और फिर प्रमतिको सुनाया ॥ ४८ ॥ प्रमतिने उसे परम बुद्धिमान् जातुकर्णको दिया तथा जातुकर्णने अन्यान्य पुण्यशील महात्माओंको सुनाया ॥ ४९ ॥
[पूर्व-जन्ममें सारस्वतके मुखसे सुना हुआ यह पुराण] पुलस्त्यजीके वरदानसे मुझे भी स्मरण रह गया । सो मैंने ज्यों-का-त्यों तुम्हें सुना दिया । अब तुम भी कलियुगके अन्तमें इसे शिनीकको सुनाओगे ॥ ५०-५१ ॥
जो पुरुष इस अति गुह्य और कलि-कल्मष-नाशक पुराणको भक्तिपूर्वक सुनता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५२ ॥ जो मनुष्य इसका प्रतिदिन श्रवण करता है उसने तो मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया और सभी देवताओंकी स्तुति कर ली ॥ ५३ ॥ इसके दस अध्यायोंका श्रवण करनेसे निःसन्देह कपिला गौके दानका अति दुर्लभ पुण्य-फल प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥
* नागाया (आर्ष दीर्घ) ।
४६४
- श्रीविष्णुपुराण *
[ ३० ८ ]
सर्वं सर्वमयं समस्तजगता- माधारमात्माश्रयम् । ज्ञानज्ञेयमनादिमन्तरहितं सर्वांमराणां हितं स प्राप्नोति न संशयोऽस्त्यविकलं यद्वाजिमेधे फलम् ॥ ५५
यत्रादौ भगवांश्चराचरगुरु- मध्ये तथास्ते च सः ब्रह्मज्ञानमयोऽच्युतोऽखिलजग- म्मध्यान्तसर्गप्रभुः । तत्सर्वं पुरुषः पवित्रममलं शृण्वन्यठन्वाचय- न्न्राजोत्यस्ति न तत्फलं त्रिभुवने- ष्वेकान्तसिद्धिर्हिः ॥ ५६
यस्मिन्मन्त्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र निवेशितात्ममनसो ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । मुक्तिं चेत्सि यः स्थितोऽमलधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदधं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते ॥ ५७
यज्ञैर्यज्ञविदो यजन्ति सततं यज्ञेश्वरं कर्मिणो यं वै ब्रह्ममयं परावरमयं ध्यायन्ति च ज्ञानिनः । यं सच्चिन्त्य न जायते न म्रियते नो वद्वन्ते हीयते नैवासन्न च सद्भवत्यति ततः किं वा हरेः श्रूयताम् ॥ ५८
कव्यं यः पितुरूपधृग्विधहुतं हव्यं च भुङ्क्ते विभु- दैवत्वे भगवाननादिनिधनः स्वाहास्वधासंज्ञिते ।
जो पुरुष सम्पूर्ण जगत्के आधार, आत्माके अवलम्ब, सर्वस्वरूप, सर्वमय ज्ञान और ज्ञेयरूप आदि-अन्तरहित तथा समस्त देवताओंके हितकारक श्रीविष्णुभगवान्का चित्तमें ध्यान कर इस सम्पूर्ण पुराणको सुनता है उसे निःसन्देह अश्वमेध-यज्ञका समग्र फल प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥
जिसके आदि, मध्य और अन्तमें अखिल जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहारमें समर्थ ब्रह्मज्ञानमय चराचरगुरु भगवान् अच्युतका ही कीर्तन हुआ है उस परम श्रेष्ठ और अमल पुराणको सुनने, पढ़ने और धारण करनेसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण त्रिलोकियोंमें और कहीं प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि एकान्त मुक्तिरूप सिद्धिको देनेवाले भगवान् विष्णु ही इसके प्राप्तव्य फल हैं ॥ ५६ ॥
जिनमें चित्त लगानेवाला कभी नरकमें नहीं जा सकता, जिनके स्मरणमें स्वर्ग भी विघ्नरूप है, जिनमें चित्त लग जानेपर ब्रह्मलोक भी अति तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अव्यय प्रभु निर्मलचित्त पुरुषोंके हृदयमें स्थित होकर उन्हें मोक्ष देते हैं उन्हीं अच्युतका कीर्तन करनेसे यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? ॥ ५७ ॥ यज्ञवेत्ता कर्मनिष्ठ लोग यज्ञोद्धार जिनका यज्ञेश्वररूपसे यजन करते हैं, ज्ञानीजन जिनका परावरमय ब्रह्मस्वरूपसे ध्यान करते हैं, जिनका स्मरण करनेसे पुरुष न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है और न क्षीण हो जाता है तथा जो न सत् (कारण) हैं और न असत् (कार्य) ही हैं उन श्रीहरिके अतिरिक्त और क्या सुना जाय? ॥ ५८ ॥ जो अनादिनिधन भगवान् विभु पितुरूप धारणकर स्वधासंज्ञक कव्यको और देवता होकर अग्निमें विधिपूर्वक हवन किये हुए स्वाहा नामक हव्यको ग्रहण करते हैं तथा जिन समस्त शक्तियोंके आश्रयभूत भगवान्के विषयमें बड़े-बड़े
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अ० ८ ] * षष्ठ अंश * ४६५
| यस्मिन्ब्रह्मणि सर्वशक्तिनिलये<br>मानानि नो मानिनां<br>निष्ठायै प्रभवन्ति हन्ति कलुषं<br>श्रोत्रं स यातो हरिः ॥ ५९ | प्रमाणकुशल पुरुषोंके प्रमाण भी इयत्ता करनेमें समर्थ नहीं होते वे श्रीहरि श्रवण-पथमें जाते ही समस्त पापोंको नष्ट कर देते हैं॥ ५९॥ |
| नान्तोऽस्ति यस्य न च यस्य समुद्भवोऽस्ति<br>वृद्धिर्न यस्य परिणामविवर्जितस्य ।<br>नापक्षयं च समुपैत्यविकारि वस्तु<br>यस्तं नतोऽस्मि पुरुषोत्तममीशमीड्यम् ॥ ६० | जिन परिणामहीन प्रभुका आदि, अन्त, वृद्धि और क्षय कुछ भी नहीं होता, जो नित्य निर्विकार पदार्थ हैं उन स्तवनीय प्रभु पुरुषोत्तमको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ६०॥ |
| तस्यैव योऽनु गुणभुग्बहुधैक एव<br>शुद्धोऽप्यशुद्ध इव भाति हि मूर्तिभेदैः ।<br>ज्ञानान्वितः सकलसत्त्वविभूतिकर्ता<br>तस्मै नमोऽस्तु पुरुषाय सदाव्ययाय ॥ ६१ | जो उन्हींके समान गुणोंको भोगनेवाला है, एक होकर भी अनेक रूप है तथा शुद्ध होकर भी विभिन्न रूपोंके कारण अशुद्ध-(विकारवान्)-सा प्रतीत होता है और जो ज्ञानस्वरूप एवं समस्त भूत तथा विभूतियोंका कर्ता है उस नित्य अव्यय पुरुषको नमस्कार है॥ ६१॥ |
| ज्ञानप्रवृत्तिनियमैक्यमयाय पुंसो<br>भोगप्रदानपटवे त्रिगुणात्मकाय ।<br>अव्याकृताय भवभावनकारणाय<br>वन्दे स्वरूपभवनाय सदाजराय ॥ ६२ | जो ज्ञान (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और नियमन (तम)-की एकतारूप है, पुरुषको भोग प्रदान करनेमें कुशल है, त्रिगुणात्मक तथा अव्याकृत है, संसारकी उत्पत्तिका कारण है, उस स्वतःसिद्ध तथा जराशून्य प्रभुको सर्वदा नमस्कार करता हूँ॥ ६२॥ |
| व्योमानिलाग्निजलभूरचनामयाय<br>शब्दादिभोगविषयोपनयक्षमाय ।<br>पुंसः समस्तकरणैरुपकारकाय<br>व्यक्ताय सूक्ष्मबृहदात्मवते नतोऽस्मि ॥ ६३ | जो आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवीरूप है, शब्दादि भोग्य विषयोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ है और पुरुषका उसकी समस्त इन्द्रियोंद्वारा उपकार करता है उस सूक्ष्म और विराट्रूप व्यक्त परमात्माको नमस्कार करता हूँ॥ ६३॥ |
| इति विविधमजस्य यस्य रूपं<br>प्रकृतिपरात्ममयं सनातनस्य ।<br>प्रदिशतु भगवानशेषपुंसां<br>हरिरपजन्मजरादिकां स सिद्धिम् ॥ ६४ | इस प्रकार जिन नित्य सनातन परमात्माके प्रकृति-पुरुषमय ऐसे अनेक रूप हैं वे भगवान् हरि समस्त पुरुषोंको जन्म और जरा आदिसे रहित (मुक्तिरूप) सिद्धि प्रदान करें॥ ६४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपारत्वनिर्णायके श्रीमति
विष्णुमहापुराणे षष्ठोंऽशः समाप्तः ।
इति श्रीविष्णुमहापुराणं सम्पूर्णम्
॥ श्रीविष्ण्वर्पणमस्तु ॥
समाप्त
॥ श्रीहरिः ॥
श्रीविष्णुपुराणान्तर्गतश्लोकानामकारादिक्रमेणानुक्रमः
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ० | अंगुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षः | १ | १५ | ८१ | |||
| अकरोत्स्वतनुमन्याम् | १ | ४ | ८ | अंगुलस्याष्टभागोऽपि | ३ | ७ | ४ |
| अकालगर्जितादौ च | ३ | १२ | ३६ | अंगात्सुनीथापत्यम् | १ | १३ | ७ |
| अकिञ्चनमत्सम्बन्धम् | ३ | ११ | ६२ | अचिरादागमिष्यामि | ५ | ३२ | ३० |
| अकृष्टपच्या पृथिवी | १ | १३ | ५० | अचिन्तयच्च कौन्तेयः | ५ | ३८ | २५ |
| अकृत्वा पादयोः शौचम् | १ | २१ | ३७ | अच्छेनागन्धिलेपेन | ३ | ११ | १९ |
| अकृताग्रयणं यच्च | ३ | १६ | ७ | अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नम् | ४ | १३ | २७ |
| अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च | ४ | १३ | ६७ | अच्युतोऽप्यतिप्रणतातस्तस्मात् | ४ | १३ | ५७ |
| अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूत० | ४ | १३ | १०८ | अजयद्बलदेवस्तम् | ५ | २८ | १९ |
| अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य | ५ | १७ | १ | अजमीढद्विजमीढपुरुमीढाः | ४ | १९ | २९ |
| अक्रूरः क्रूरहृदयः | ५ | १८ | ३० | अजमीढात्कण्वः | ४ | १९ | ३० |
| अक्रूरागमनवृत्तान्तम् | ५ | २० | १८ | अजमीढस्यान्यः पुत्रः | ४ | १९ | ३३ |
| अक्षरं तत्परं ब्रह्म | १ | २२ | ५६ | अजमीढस्य नलिनी नाम | ४ | १९ | ५६ |
| अक्षय्यं नान्यदाधारम् | १ | २ | २० | अजमीढस्यान्या ऋक्षनामा | ४ | १९ | ७४ |
| अक्षप्रमाणमुभयोः | २ | ८ | ७ | अजन्मन्मरे विष्णौ | ५ | ३७ | ७५ |
| अक्षीणेषु समस्तेषु | ६ | ७ | ५२ | अजायत च विप्रोऽसौ | २ | १ | ३५ |
| अक्षीणामर्षमृत्युग्र० | ५ | ३४ | ४४ | अजादशरथः | ४ | ४ | ८६ |
| अक्षौहिण्योऽत्र बहुलाः | ५ | १ | २६ | अजानता कृतमिदम् | ५ | ३७ | ७१ |
| अखिलजगत्स्रष्टुर्भगवतः | ४ | ६ | ५ | अजीजनत्पुष्करिण्याम् | १ | १३ | ३ |
| अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शन० | ४ | १३ | ३८ | अज्ञानं तामसो भावः | ६ | ५ | २५ |
| अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च | ३ | ११ | ९५ | अज्ञानतमसाच्छन्नः | ६ | ५ | २१ |
| अगाधापारमक्षय्यम् | ३ | ३ | २५ | अज्ञातकुलनामानम् | ३ | ११ | ६१ |
| अग्नये कव्यवाहाय | ३ | १५ | २७ | अण्डानां तु सहस्राणाम् | २ | ७ | २७ |
| अग्निराप्याययेद्धातून् | ३ | ११ | ९२ | अणुप्राण्युपपन्नां च | ३ | ११ | १७ |
| अग्निपुत्रः कुमारस्तु | १ | १५ | ११५ | अनुह्लादह्रददत्तः | ४ | १९ | ४५ |
| अग्निबाहुः शुचिः शुक्रः | ३ | २ | ४४ | अनुप्रयाणि धान्यानि | ६ | १ | ५४ |
| अग्निहोत्रे हूयते या | २ | ८ | ५३ | अणोरणीयांसमसत्स्वरूपम् | ५ | १ | ४२ |
| अग्निसुवर्णस्य गुरुः | ५ | १ | १४ | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि | ३ | १ | ९ |
| अग्नेः शीतेन तोयस्य | १ | १७ | ६४ | अतश्च मान्धातुः | ४ | ३ | १ |
| अग्न्यन्तकादिरूपेण | १ | २२ | २९ | अतश्च पुरुवंशम् | ४ | १८ | ३० |
| अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया | ४ | २० | १७ | अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः | ४ | २२ | १ |
| अग्रन्यस्तविषाणाग्रः | ५ | १४ | ९ | अतिविभूतेः | ४ | १ | २९ |
| अंगमेषा त्रयी विष्णोः | २ | ११ | ११ | अतिचपलचित्ता | ४ | १२ | २६ |
| अंगादनपानस्ततः | ४ | १८ | १५ | अतिदुष्टसंहारिणः | ४ | ४ | १०४ |
| अंगारकोऽपि शुक्रस्य | २ | ७ | ८ | अतितिक्षायनं क्रूरम् | ३ | १७ | २३ |
| अंगानि वेदाश्चत्वारः | ३ | ६ | २८ | अतिथिर्यस्य भग्नाशः | ३ | ११ | ६८ |
| अंगिरसश्च सकाशात् | ४ | ६ | १३ | अतिथिर्यस्य भग्नाशः | ३ | ९ | १५ |
४६७
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अतिथिं चांगतं तवं | ३ | ११ | १० | अथ दैत्यैरुपैत्य | ४ | ९ | ६ |
| अतिथिं तत्र सम्प्राप्तम् | ३ | ११ | ५९ | अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रम् | १ | १३ | ६० |
| अतिवेगितया कालम् | २ | ८ | ३३ | अथवा तव को दोषः | १ | १५ | ४२ |
| अतिभीमा समागम्य | १ | १८ | ३४ | अथ पुत्रसहस्राणि | १ | १५ | ९० |
| अतीता वर्तमानाश्च | ४ | २४ | १०३ | अथ दैत्येश्वरं प्रोचुः | १ | १७ | ४८ |
| अतीव व्रीडिता बाला | ३ | १८ | ६८ | अथ भद्राणि भूतानि | १ | १७ | ८१ |
| अतीतकल्पावसाने | १ | ४ | ३ | अथ जितारिपक्षश्च | ४ | ९ | १० |
| अतीतानागतानीह | ३ | १ | ५ | अथ शर्मिष्ठातनयम् | ४ | १० | १५ |
| अतीव जागरस्वप्ने | ३ | १२ | १७ | अथवैनां स्यन्दनम् | ४ | १२ | २१ |
| अतो गतस्स भगवान् | ५ | ३८ | ६२ | अथ यादवबलभद्रोग्रसेन० | ४ | १३ | ११३ |
| अतो मन्दतरं नाभ्याम् | २ | ८ | ३९ | अथ दुर्वासोर्वशमवधारय | ४ | १६ | २ |
| अतोऽहमस्य षोडशस्त्री० | ४ | १३ | १५६ | अथवा किं तदालापैः | ५ | २४ | १५ |
| अतोऽर्हसि ममात्मीयम् | ४ | ७ | २२ | अथवा यादृशः स्नेहः | ५ | २७ | २४ |
| अतः क्रोधकलुषीकृतचेताः | ४ | ४ | ५२ | अथवा कौरवावासम् | ५ | ३५ | ३० |
| अतः परं ययातेः | ४ | ११ | १ | अथ तन्मुसलं चासौ | ५ | ३६ | १८ |
| अतः सम्प्राप्यते स्वर्गः | २ | ३ | ४ | अथ हर्यात्मनोऽन्ते च | ३ | ३ | १७ |
| अतः परं भविष्यानहम् | ४ | २१ | १ | अथर्ववेदं स मुनिः | ३ | ६ | ९ |
| अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु | ५ | ९ | ३० | अथ भुङ्क्ते गृहे तस्य | ३ | १८ | ४६ |
| अत्यन्तमधुरालाप० | ५ | ७ | ३१ | अथ तत्रापि च | ४ | ४ | १० |
| अत्यम्लकदुतीक्ष्णोष्ण० | ६ | ५ | ११ | अथ पृष्टा पुनरप्यब्रवीत् | ४ | ६ | ४३ |
| अत्यरिच्यत सोऽधश्च | १ | १२ | ५८ | अथ वनादागत्य | ४ | ७ | २४ |
| अत्यन्तस्तिमितॉङ्गानाम् | १ | १७ | ६१ | अथ भगवान् पितामहः | ४ | ६ | ३१ |
| अत्यार्तजगतपरित्राणाय | ४ | ४ | १५ | अथाजगाम तत्तीरम् | २ | १३ | १३ |
| अत्र हि राज्ञो युवनाश्वस्य | ४ | २ | ५५ | अथान्यमप्युरणकमादाय | ४ | ६ | ५५ |
| अत्र श्लोकः | ४ | ११ | ३ | अथाह याज्ञवल्क्यस्तु | ३ | ५ | ८ |
| अत्र जन्मसहस्राणाम् | २ | ३ | २३ | अथाह भगवान् | ४ | ९ | ४ |
| अत्र हि वंशे | ४ | २३ | २ | अथाह कृष्णमक्रूरः | ५ | १८ | ३४ |
| अत्र च श्लोकः | ४ | ३ | १२ | अथागत्य देवराजोऽब्रवीत् | ४ | २ | ६० |
| अत्र देवास्तथा दैत्याः | ६ | ८ | १४ | अथान्तर्जलावस्थितः | ४ | २ | ७३ |
| अत्रानुवंशश्लोको भवति | ४ | १० | ५ | अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैः | ४ | १३ | १११ |
| अत्रायं श्लोकः | ४ | २१ | १७ | अथाहाक्रूरः स एषः | ४ | १३ | १४८ |
| अत्रानुवंशश्लोकः | ४ | २२ | १२ | अथान्तरिक्षे वागुच्चैः | ५ | १ | ७ |
| अत्रावतीर्णयोः कृष्ण | ५ | ७ | ४१ | अथान्तरिक्षे वागुच्चैः | ५ | २८ | २१ |
| अत्रान्तरे च सगरः | ४ | ४ | १६ | अथाहान्तर्हितो विप्र | ५ | १६ | १८ |
| अत्रापि भारतं श्रेष्ठम् | २ | ३ | २२ | अथांशुमानपि स्वर्यातानाम् | ४ | ४ | २७ |
| अत्रापि श्रूयते श्लोकः | ४ | ४ | ८१ | अथैतामतीतानागत० | ४ | ३ | ३१ |
| अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च | १ | ७ | २७ | अथैनान्वसिष्ठो जीवन्मृतकान् | ४ | ३ | ४३ |
| अत्रेस्सोमः | ४ | ६ | ६ | अथैनामटव्यामेवाग्निस्थालीम् | ४ | ६ | ८१ |
| अत्रोपविश्य वै तेन | ५ | १३ | ३५ | अथैनं देवर्षयः | ४ | ७ | ५ |
| अथ तस्य भगवतः | ४ | २ | ८२ | अथैनां रथमारोप्य | ४ | १२ | २३ |
| अथ प्रसन्नवदनः | १ | १२ | ५० | अथैनं शैव्योवाच | ४ | १२ | २८ |