विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 469, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 469
४५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| Sanskrit Verse | Hindi Translation |
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| अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः।<br>अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः॥ ७७ | हे पुरुषसिंह! इसके अतिरिक्त मनके आश्रयभूत जो अन्य देवता आदि कर्मयोनियाँ हैं, वे सब अशुद्ध हैं॥ ७७॥ |
| मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिःस्पृहम्।<br>एषा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्तं तत्र धार्यते॥ ७८ | भगवान्का यह मूर्त्तरूप चित्तको अन्य आलम्बनोंसे निःस्पृह कर देता है। इस प्रकार चित्तका भगवान्में स्थिर करना ही धारणा कहलाती है॥ ७८॥ |
| यच्च मूर्त्तं हरे रूपं यादृक्चिन्त्यं नराधिप।<br>तच्छ्रूयतामनाधारा धारणा नोपपद्यते॥ ७९ | हे नरेन्द्र! धारणा बिना किसी आधारके नहीं हो सकती; इसलिये भगवान्के जिस मूर्त्तरूपका जिस प्रकार ध्यान करना चाहिये, वह सुनो॥ ७९॥ |
| प्रसन्नवदनं चारुपद्मपत्रोपमेक्षणम्।<br>सुकपोलं सुविस्तीर्णललाटफलकोज्ज्वलम्॥ ८० | जो प्रसन्नवदन और कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाले हैं, सुन्दर कपोल और विशाल भालसे अत्यन्त सुशोभित हैं तथा अपने सुन्दर कानोंमें मनोहर कुण्डल पहने हुए हैं, जिनकी ग्रीवा शंखके समान और विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो तरंगाकार त्रिवली तथा नीची नाभिवाले उदरसे सुशोभित हैं, जिनके लम्बी-लम्बी आठ अथवा चार भुजाएँ हैं तथा जिनके जंघा एवं ऊरु समानभावसे स्थित हैं और मनोहर चरणारविन्द सुघरतासे विराजमान हैं उन निर्मल पीताम्बरधारी ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका चिन्तन करे॥ ८०-८३॥ |
| समकर्णान्तविन्यस्तचारुकुण्डलभूषणम्।<br>कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ८१ | |
| वलित्रिभङ्गिना मग्ननाभिना ह्युदरेण च।<br>प्रलम्बाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम्॥ ८२ | |
| समस्थितोरुजङ्घं च सुस्थिताङ्घ्रिवराम्बुजम्।<br>चिन्तयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम्॥ ८३ | |
| किरीटहारकेयूरकटकादिविभूषितम् ॥ ८४ | हे राजन्! किरीट, हार, केयूर और कटक आदि आभूषणोंसे विभूषित, शार्ङ्गधनुष, शंख, गदा, खड्ग, चक्र तथा अक्षमालासे युक्त वरद और अभययुक्त हाथोंवाले* [तथा अँगुलियोंमें धारण की हुई] रत्नमयी मुद्रिकासे शोभायमान भगवान्के दिव्य रूपका योगीको अपना चित्त एकाग्र करके तन्मयभावसे तबतक चिन्तन करना चाहिये जबतक यह धारणा दृढ़ न हो जाय॥ ८४-८६॥ |
| शार्ङ्गशङ्खगदाखड्गचक्राक्षवलयान्वितम्।<br>वरदाभयहस्तं च मुद्रिकारत्नभूषितम्॥ ८५ | |
| चिन्तयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम्।<br>तावद्यावद्दृढीभूता तत्रैव नृप धारणा॥ ८६ | |
| व्रजतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।<br>नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा॥ ८७ | जब चलते-फिरते, उठते-बैठते अथवा स्वेच्छानुकूल कोई और कर्म करते हुए भी ध्येय मूर्ति अपने चित्तसे दूर न हो तो इसे सिद्ध हुई माननी चाहिये॥ ८७॥ |
| ततः शङ्खगदाचक्रशार्ङ्गादिरहितं बुधः।<br>चिन्तयेद्भगवद्रूपं प्रशान्तं साक्षसूत्रकम्॥ ८८ | इसके दृढ़ होनेपर बुद्धिमान् व्यक्ति शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग आदिसे रहित भगवान्के स्फटिकाक्षमाला और यज्ञोपवीतधारी शान्त स्वरूपका चिन्तन करे॥ ८८॥ |
| सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः।<br>किरीटकेयूरमुख्यैर्भूषणै रहितं स्मरेत्॥ ८९ | जब यह धारणा भी पूर्ववत् स्थिर हो जाय तो भगवान्के किरीट, केयूरादि आभूषणोंसे रहित रूपका स्मरण करे॥ ८९॥ |
| तदेकावयवं देवं चेतसा हि पुनर्बुधः।<br>कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत्॥ ९० | तदनन्तर विज्ञ पुरुष अपने चित्तमें एक (प्रधान) अवयव-विशिष्ट भगवान्का हृदयसे चिन्तन करे और फिर सम्पूर्ण अवयवोंको छोड़कर केवल अवयवीका ध्यान करे॥ ९०॥ |
* चतुर्भुज-मूर्तिके ध्यानमें चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्मकी भावना करे तथा अष्टभुजरूपका ध्यान करते समय छः हाथोंमें तो शार्ङ्ग आदि छः आयुधोंकी भावना करे तथा शेष दोमें पद्म और बाण अथवा वरद और अभय-मुद्राका चिन्तन करे।