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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

४५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७

Sanskrit VerseHindi Translation
अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः।<br>अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः॥ ७७हे पुरुषसिंह! इसके अतिरिक्त मनके आश्रयभूत जो अन्य देवता आदि कर्मयोनियाँ हैं, वे सब अशुद्ध हैं॥ ७७॥
मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिःस्पृहम्।<br>एषा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्तं तत्र धार्यते॥ ७८भगवान्‌का यह मूर्त्तरूप चित्तको अन्य आलम्बनोंसे निःस्पृह कर देता है। इस प्रकार चित्तका भगवान्‌में स्थिर करना ही धारणा कहलाती है॥ ७८॥
यच्च मूर्त्तं हरे रूपं यादृक्चिन्त्यं नराधिप।<br>तच्छ्रूयतामनाधारा धारणा नोपपद्यते॥ ७९हे नरेन्द्र! धारणा बिना किसी आधारके नहीं हो सकती; इसलिये भगवान्‌के जिस मूर्त्तरूपका जिस प्रकार ध्यान करना चाहिये, वह सुनो॥ ७९॥
प्रसन्नवदनं चारुपद्मपत्रोपमेक्षणम्।<br>सुकपोलं सुविस्तीर्णललाटफलकोज्ज्वलम्॥ ८०जो प्रसन्नवदन और कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाले हैं, सुन्दर कपोल और विशाल भालसे अत्यन्त सुशोभित हैं तथा अपने सुन्दर कानोंमें मनोहर कुण्डल पहने हुए हैं, जिनकी ग्रीवा शंखके समान और विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो तरंगाकार त्रिवली तथा नीची नाभिवाले उदरसे सुशोभित हैं, जिनके लम्बी-लम्बी आठ अथवा चार भुजाएँ हैं तथा जिनके जंघा एवं ऊरु समानभावसे स्थित हैं और मनोहर चरणारविन्द सुघरतासे विराजमान हैं उन निर्मल पीताम्बरधारी ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका चिन्तन करे॥ ८०-८३॥
समकर्णान्तविन्यस्तचारुकुण्डलभूषणम्।<br>कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ८१
वलित्रिभङ्गिना मग्ननाभिना ह्युदरेण च।<br>प्रलम्बाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम्॥ ८२
समस्थितोरुजङ्घं च सुस्थिताङ्घ्रिवराम्बुजम्।<br>चिन्तयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम्॥ ८३
किरीटहारकेयूरकटकादिविभूषितम् ॥ ८४हे राजन्! किरीट, हार, केयूर और कटक आदि आभूषणोंसे विभूषित, शार्ङ्गधनुष, शंख, गदा, खड्ग, चक्र तथा अक्षमालासे युक्त वरद और अभययुक्त हाथोंवाले* [तथा अँगुलियोंमें धारण की हुई] रत्नमयी मुद्रिकासे शोभायमान भगवान्‌के दिव्य रूपका योगीको अपना चित्त एकाग्र करके तन्मयभावसे तबतक चिन्तन करना चाहिये जबतक यह धारणा दृढ़ न हो जाय॥ ८४-८६॥
शार्ङ्गशङ्खगदाखड्गचक्राक्षवलयान्वितम्।<br>वरदाभयहस्तं च मुद्रिकारत्नभूषितम्॥ ८५
चिन्तयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम्।<br>तावद्यावद्दृढीभूता तत्रैव नृप धारणा॥ ८६
व्रजतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।<br>नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा॥ ८७जब चलते-फिरते, उठते-बैठते अथवा स्वेच्छानुकूल कोई और कर्म करते हुए भी ध्येय मूर्ति अपने चित्तसे दूर न हो तो इसे सिद्ध हुई माननी चाहिये॥ ८७॥
ततः शङ्खगदाचक्रशार्ङ्गादिरहितं बुधः।<br>चिन्तयेद्भगवद्रूपं प्रशान्तं साक्षसूत्रकम्॥ ८८इसके दृढ़ होनेपर बुद्धिमान् व्यक्ति शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग आदिसे रहित भगवान्‌के स्फटिकाक्षमाला और यज्ञोपवीतधारी शान्त स्वरूपका चिन्तन करे॥ ८८॥
सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः।<br>किरीटकेयूरमुख्यैर्भूषणै रहितं स्मरेत्॥ ८९जब यह धारणा भी पूर्ववत् स्थिर हो जाय तो भगवान्‌के किरीट, केयूरादि आभूषणोंसे रहित रूपका स्मरण करे॥ ८९॥
तदेकावयवं देवं चेतसा हि पुनर्बुधः।<br>कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत्॥ ९०तदनन्तर विज्ञ पुरुष अपने चित्तमें एक (प्रधान) अवयव-विशिष्ट भगवान्‌का हृदयसे चिन्तन करे और फिर सम्पूर्ण अवयवोंको छोड़कर केवल अवयवीका ध्यान करे॥ ९०॥

* चतुर्भुज-मूर्तिके ध्यानमें चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्मकी भावना करे तथा अष्टभुजरूपका ध्यान करते समय छः हाथोंमें तो शार्ङ्ग आदि छः आयुधोंकी भावना करे तथा शेष दोमें पद्म और बाण अथवा वरद और अभय-मुद्राका चिन्तन करे।

अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५९

तद्रूपप्रत्यया चैका सन्ततिश्चान्यनिःस्पृहा। तद्ध्यानं प्रथमैरङ्गैः षड्‌भिर्निष्पाद्यते नृप॥ ९१

तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत्। मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते॥ ९२

विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव। प्रापणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेषभावनः॥ ९३

क्षेत्रज्ञः करणी ज्ञानं करणं तस्य तेन तत्। निष्पाद्य मुक्तिकार्यं वै कृतकृत्यो निवर्तते॥ ९४

तद्भावभावमापन्नस्ततोऽसौ परमात्मना। भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत्॥ ९५

विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति॥ ९६

इत्युक्तस्ते मया योगः खाण्डिक्य परिपृच्छतः। संक्षेपविस्तराभ्यां तु किमन्यत्क्रियतां तव॥ ९७

खाण्डिक्य उवाच

कथिते योगसद्भावे सर्वमेव कृतं मम। तवोपदेशेनाशेषो नष्टश्चित्तमलो यतः॥ ९८

ममेति यन्मया चोक्तमसदेतन्न चान्यथा। नरेन्द्र गदितुं शक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः॥ ९९

अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्तथानयोः। परमार्थस्त्वसंलापो गोचरे वचसां न यः॥ १००

तद्गच्छ श्रेयसे सर्वं ममैतद्भवता कृतम्। यद्विमुक्तिप्रदो योगः प्रोक्तः केशिध्वजाव्ययः॥ १०१

श्रीपराशर उवाच

यथार्हं पूजया तेन खाण्डिक्येन स पूजितः। आजगाम पुरं ब्रह्मंस्ततः केशिध्वजो नृपः॥ १०२

खाण्डिक्योऽपि सुतं कृत्वा राजानं योगसिद्धये। वनं जगाम गोविन्दे विनिवेशितमानसः॥ १०३

तत्रैकान्तमतिर्भूत्वा यमादिगुणसंयुतः। विष्ण्वाख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिर्लयम्॥ १०४


हे राजन्! जिसमें परमेश्वरके रूपकी ही प्रतीति होती है, ऐसी जो विषयान्तरकी स्पृहासे रहित एक अनवरत धारा है उसे ही ध्यान कहते हैं; यह अपनेसे पूर्व यम-नियमादि छः अंगोंसे निष्पन्न होता है॥ ९१॥ उस ध्येय पदार्थका ही जो मनके द्वारा ध्यानसे सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन (ध्याता, ध्येय और ध्यानके भेदसे रहित) स्वरूप ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं॥ ९२॥ हे राजन्! [समाधिसे होनेवाला भगवत्साक्षात्काररूप] विज्ञान ही प्राप्तव्य परब्रह्मतक पहुँचानेवाला है तथा सम्पूर्ण भावनाओंसे रहित एकमात्र आत्मा ही प्रापणीय (वहाँतक पहुँचनेवाला) है॥ ९३॥ मुक्ति-लाभमें क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान करण है; [ज्ञानरूपी करणके द्वारा क्षेत्रज्ञके] मुक्तिरूपी कार्यको सिद्ध करके वह विज्ञान कृतकृत्य होकर निवृत्त हो जाता है॥ ९४॥ उस समय यह भगवद्भावसे भरकर परमात्मासे अभिन्न हो जाता है। इसका भेद-ज्ञान तो अज्ञानजन्य ही है॥ ९५॥ भेद उत्पन्न करनेवाले अज्ञानके सर्वथा नष्ट हो जानेपर ब्रह्म और आत्मामें असत् (अविद्यमान) भेद कौन कर सकता है?॥ ९६॥ हे खाण्डिक्य! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने संक्षेप और विस्तारसे योगका वर्णन किया; अब मैं तुम्हारा और क्या कार्य करूँ?॥ ९७॥

खाण्डिक्य बोले— आपने इस महायोगका वर्णन करके मेरा सभी कार्य कर दिया, क्योंकि आपके उपदेशसे मेरे चित्तका सम्पूर्ण मल नष्ट हो गया है॥ ९८॥ हे राजन्! मैंने जो 'मेरा' कहा यह भी असत्य ही है, अन्यथा ज्ञेय वस्तुको जाननेवाले तो यह भी नहीं कह सकते॥ ९९॥ 'मैं' और 'मेरा' ऐसी बुद्धि और इनका व्यवहार भी अविद्या ही है, परमार्थ तो कहने-सुननेकी बात नहीं है क्योंकि वह वाणीका अविषय है॥ १००॥ हे केशिध्वज! आपने इस मुक्तिप्रद योगका वर्णन करके मेरे कल्याणके लिये सब कुछ कर दिया, अब आप सुखपूर्वक पधारिये॥ १०१॥

श्रीपराशरजी बोले— हे ब्रह्मन्! तदनन्तर खाण्डिक्यसे यथोचित पूजित हो राजा केशिध्वज अपने नगरमें चले आये॥ १०२॥ तथा खाण्डिक्य भी अपने पुत्रको राज्य दे* श्रीगोविन्दमें चित्त लगाकर योग सिद्ध करनेके लिये [निर्जन] वनको चले गये॥ १०३॥ वहाँ यमादि गुणोंसे युक्त होकर एकाग्रचित्तसे ध्यान करते हुए राजा खाण्डिक्य विष्णु नामक निर्मल ब्रह्ममें लीन हो गये॥ १०४॥


* यद्यपि खाण्डिक्य उस समय राजा नहीं था; तथापि वनमें जो उसके दुर्ग, मन्त्री और भृत्य आदि थे उन्हींका स्वामी अपने पुत्रको बनाया।

४६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८

केशिध्वजो विमुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः। बुभुजे विषयान्कर्म चक्रे चानभिसंहितम्॥ १०५

किन्तु केशिध्वज विदेहमुक्तिके लिये अपने कर्मोंको क्षय करते हुए समस्त विषय भोगते रहे। उन्होंने फलकी इच्छा न करके अनेकों शुभ-कर्म किये॥ १०५॥

सकल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्तथा। अवाप सिद्धिमत्यन्तां तापक्षयफलां द्विज॥ १०६

हे द्विज! इस प्रकार अनेकों कल्याणप्रद भोगोंको भोगते हुए उन्होंने पाप और मल (प्रारब्ध-कर्म) का क्षय हो जानेपर तापत्रयको दूर करनेवाली आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त कर ली॥ १०६॥

इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार

श्रीपराशर उवाच

इत्येष कथितः सम्यक्तृतीयः प्रतिसञ्चरः।
आत्यन्तिको विमुक्तिर्या लयो ब्रह्मणि शाश्वते॥ १

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव भवतो गदितं मया॥ २

पुराणं वैष्णवं चैतत्सर्वकिल्बिषनाशनम्।
विशिष्टं सर्वशास्त्रेभ्यः पुरुषार्थोपपादकम्॥ ३

तुभ्यं यथावन्मैत्रेय प्रोक्तं शुश्रूषवेऽव्ययम्।
यदन्यदपि वक्तव्यं तत्पृच्छाद्य वदामि ते॥ ४

**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे तीसरे आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन किया, जो सनातन ब्रह्ममें लयरूप मोक्ष ही है॥ १॥ मैंने तुमसे संसारकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशोंके चरित्रोंका वर्णन किया॥ २॥ हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें सुननेके लिये उत्सुक देखकर यह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ सर्वपापनाशक और पुरुषार्थका प्रतिपादक वैष्णवपुराण सुना दिया। अब तुम्हें जो और कुछ पूछना हो पूछो। मैं उसका तुमसे वर्णन करूँगा॥ ३-४॥

श्रीमैत्रेय उवाच

भगवन्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया मुने।
श्रुतं चैतन्मया भक्त्या नान्यत्प्रष्टव्यमस्ति मे॥ ५

विच्छिन्नाःसर्वसन्देहा वैमल्यं मनसः कृतम्।
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञाता उत्पत्तिस्थितिसंक्षयाः॥ ६

ज्ञातश्चतुर्विधो राशिः शक्तिश्च त्रिविधा गुरो।
विज्ञाता सा च कार्त्स्न्येन त्रिविधा भावभावना॥ ७

त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं ज्ञेयमन्यैरलं द्विज।
यदेतदखिलं विष्णोर्जगन्न व्यतिरिच्यते॥ ८

**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! मैंने आपसे जो कुछ पूछा था वह सभी आप कह चुके और मैंने भी उसे श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुना, अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है॥ ५॥ हे मुने! आपकी कृपासे मेरे समस्त सन्देह निवृत्त हो गये और मेरा चित्त निर्मल हो गया तथा मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका ज्ञान हो गया॥ ६॥ हे गुरो! मैं चार प्रकारकी राशि¹ और तीन प्रकारकी शक्तियाँ² जान गया तथा मुझे त्रिविध भाव-भावनाओंका³ भी सम्यक् बोध हो गया॥ ७॥ हे द्विज! आपकी कृपासे मैं, जो जानना चाहिये वह भली प्रकार जान गया कि यह सम्पूर्ण जगत् श्रीविष्णुभगवान्‌से भिन्न नहीं है, इसलिये अब मुझे अन्य बातोंके जाननेसे कोई लाभ नहीं॥ ८॥


¹ देखिये—प्रथम अंश अध्याय २२ श्लोक २३-३३।
² ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ६१-६३।
³ ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ४८-५१।

अ० ८ ]

  • षष्ठ अंश *

४६१

कृतार्थोऽहमसन्देहस्तवप्रसादान्महामुने । वर्णधर्मादयो धर्मा विदिता यदशेषतः ॥ ९ प्रवृत्तं च निवृत्तं च ज्ञातं कर्म मयाखिलम् । प्रसीद विप्रप्रवर नान्यत्रष्टव्यमस्ति मे ॥ १० यदस्य कथनायासैर्योजितोऽसि मया गुरो । तत्क्षम्यतां विशेषोऽस्ति न सतां पुत्रशिष्ययोः ॥ ११

श्रीपराशर उवाच

एतत्ते यन्मयाख्यातं पुराणं वेदसम्मतम् । श्रुतेऽस्मिन्सर्वदोषोत्थः पापराशिः प्रणश्यति ॥ १२ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं कृतस्नं मयात्र तव कीर्तिताम् ॥ १३ अत्र देवास्तथा दैत्या गन्धर्वौरगराक्षसाः । यक्षविद्याधारास्सिद्धाः कथ्यन्तेऽप्सरसस्तथा ॥ १४ मुनयो भावितात्मानः कथ्यन्ते तपसान्विताः । चातुर्वर्ण्यं तथा पुंसां विशिष्टचरितानि च ॥ १५ पुण्याः प्रदेशा मेदिन्याः पुण्या नद्योऽथ सागराः । पर्वताश्च महापुण्याश्चरितानि च धीमताम् ॥ १६ वर्णधर्मादयो धर्मा वेदशास्त्राणि कृतस्नशः । येषां संस्मरणात्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १७ उत्पत्तिस्थितिनाशानां हेतुयों जगतोऽव्ययः । स सर्वभूतस्सर्वात्मा कथ्यते भगवान्हरिः ॥ १८ अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकैः । पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहन्नस्तैर्वृकैरिव ॥ १९ यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलायनमनुत्तमम् । मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः ॥ २० कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । प्रयाति विलयं सद्यः सकृद्यत्र च संस्मृते ॥ २१ हिरण्यगर्भदेवेन्द्ररुद्रादित्याशिववायुभिः । पावकैर्वसुभिः साध्वैर्विश्वेदेवादिभिः सुरैः ॥ २२ यक्षरक्षोरगैः सिद्धैर्दैत्यगन्धर्वदानवैः । अप्सरोभिस्तथा तारानक्षत्रैः सकलैर्गृहैः ॥ २३

हे महामुने! आपके प्रसादसे मैं निस्सन्देह कृतार्थ हो गया क्योंकि मैंने वर्ण-धर्म आदि सम्पूर्ण धर्म और प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप समस्त कर्म जान लिये। हे विप्रवर! आप प्रसन्न रहें; अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है ॥ ९-१० ॥ हे गुरो! मैंने आपको जो इस सम्पूर्ण पुराणके कथन करनेका कष्ट दिया है, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें; साधुजनोंकी दृष्टिमें पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता ॥ ११ ॥

श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मैंने तुमको जो यह वेदसम्मत पुराण सुनाया है इसके श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण दोषोंसे उत्पन्न हुआ पापपुंज नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥ इसमें मैंने तुमसे सृष्टिकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर और वंशोंके चरित—इन सभीका वर्णन किया है ॥ १३ ॥ इस ग्रन्थमें देवता, दैत्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध और अप्सरागणका भी वर्णन किया गया है ॥ १४ ॥ आत्माराम और तपोनिष्ठ मुनिजन चातुर्वर्ण्य-विभाग, महापुरुषोंके विशिष्ट चरित, पृथिवीके पवित्र क्षेत्र, पवित्र नदी और समुद्र, अत्यन्त पावन पर्वत, बुद्धिमान् पुरुषोंके चरित, वर्ण-धर्म आदि धर्म तथा वेद और शास्त्रोंका भी इसमें सम्यक् रूपसे निरूपण हुआ है, जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १५-१७ ॥

जो अव्ययात्मा भगवान् हरि संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके एकमात्र कारण हैं उनका भी इसमें कीर्तन किया गया है ॥ १८ ॥ जिनके नामका विवश होकर कीर्तन करनेसे ही मनुष्य सिंहसे डरे हुए गीदड़ोंके समान पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥ हे मैत्रेय! जिनका भक्तिपूर्वक किया हुआ नाम-संकीर्तन सम्पूर्ण धातुओंको पिघलानेवाले अग्निके समान समस्त पापोंका सर्वोत्तम विलयन (लीन कर देनेवाला) है ॥ २० ॥ जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनुष्योंको नरक-यातनाएँ देनेवाला अति उग्र कलि-कल्मष तुरन्त नष्ट हो जाता है ॥ २१ ॥ हे द्विजोत्तम! हिरण्यगर्भ, देवेन्द्र, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वायु, अग्नि, वसु, साध्य और विश्वेदेव आदि देवगण, यक्ष, राक्षस, उरग, सिद्ध, दैत्य, गन्धर्व, दानव, अप्सरा, तारा, नक्षत्र, समस्त ग्रह,

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४६२

  • श्रीविष्णुपुराण *

[ ३० ८ ]

सप्तर्षिभिस्तथा धिष्ण्यैर्धिष्ण्याधिपतिभिस्तथा। ब्राह्मणाद्यैर्मनुष्यैश्च तथैव पशुभिर्भूगैः ॥ २४ सरीसृपैर्विहङ्गैश्च पलाशाद्यैर्महीरुहैः। वनाग्निसागरसरित्यातालैः सधरादिभिः ॥ २५ शब्दादिभिश्च सहितं ब्रह्माण्डमखिलं द्विज। मेरोरिवाणुर्यस्येतद्यन्मयं च द्विजोत्तम ॥ २६ स सर्वः सर्ववित्सर्वस्वरूपो रूपवर्जितः। भगवान्कीर्तितो विष्णुरत्र पापप्रणाशनः ॥ २७ यदश्वमेधावभूथे स्नातः प्राज्योति वै फलम्। मानवस्तदवाज्योति श्रुतैतन्मुनिसत्तम ॥ २८ प्रयागे पुष्करे चैव कुरुक्षेत्रे तथार्णवे। कृतोपवासः प्राज्योति तदस्य श्रवणान्तरः ॥ २९ यदग्निहोत्रे सुहुते वर्षणाज्योति मानवः। महापुण्यफलं विप्र तदस्य श्रवणात्सकृत ॥ ३० यज्येष्ठशुक्ल द्वादश्यां स्नात्वा वै यमुनाजले। मथुरायां हरिं दृष्ट्वा प्राज्योति पुरुषः फलम् ॥ ३१ तदाज्योत्यखिलं सम्यगध्यायं यः शृणोति वै। पुराणस्यास्य विप्रषं केशवार्पितमानसः ॥ ३२ यमुनासलिलस्नातः पुरुषो मुनिसत्तम। ज्येष्ठामूले सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥ ३३ समभ्यर्चाच्युतं सम्यङ् मथुरायां समाहितः। अश्वमेधस्य यज्ञस्य प्राज्योत्यविकलं फलम् ॥ ३४ आलोक्यद्विद्विमाश्रयेषामुन्नीतानां स्ववंशजैः। एतत्किलोचुरन्येषां पितरः सपितामहाः ॥ ३५ कच्चिदस्मक्कुले जातः कालिन्दीसलिलाप्लुतः। अर्चयिष्यति गोविन्दं मथुरायामुपोषितः ॥ ३६ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे येनैवं वयमप्युत। परामृद्विद्विमापस्यामस्तारिताः स्वकुलोद्भवैः ॥ ३७ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे समभ्यर्च्य जनार्दनम्। धन्यानां कुलजः पिण्डान्यमुनायां प्रदास्यति ॥ ३८ तस्मिन्काले समभ्यर्च्य तत्र कृष्णं समाहितः। दत्त्वा पिण्डं पितृभ्यश्च यमुनासलिलाप्लुतः ॥ ३९

सप्तर्षि, लोक, लोकपालगण, ब्राह्मणादि मनुष्य, पशु, मृग, सरीसृप, विहंग, पलाश आदि वृक्ष, वन, अग्नि, समुद्र, नदी, पाताल तथा पृथिवी आदि और शब्दादि विषयोंके सहित यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनके आगे सुमेरुके सामने एक रेणुके समान है तथा जो इसके उपादान-कारण हैं उन सर्व सर्वज्ञ सर्वस्वरूप रूपरहित और पापनाशक भगवान् विष्णुका इसमें कीर्तन किया गया है ॥ २२-२७ ॥

हे मुनिसत्तम! अश्वमेध-यज्ञमें अवभूथ (यज्ञान्त) स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही फल मनुष्य इसको सुनकर प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥ प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र तथा समुद्रतटपर रहकर उपवास करनेसे जो फल मिलता है वही इस पुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥ एक वर्षतक नियमानुसार अग्निहोत्र करनेसे मनुष्यको जो महान् पुण्यफल मिलता है वही इसे एक बार सुननेसे हो जाता है ॥ ३० ॥ ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीके दिन मथुरापुरीमें यमुना-स्नान करके कृष्णचन्द्रका दर्शन करनेसे जो फल मिलता है हे विप्रषं! वही भगवान् कृष्णमें चित्त लगाकर इस पुराणके एक अध्यायको सावधानतापूर्वक सुननेसे मिल जाता है ॥ ३१-३२ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको मथुरापुरीमें उपवास करते हुए यमुना-स्नान करके समाहितचित्तसे श्रीअच्युतका भलीप्रकार पूजन करनेसे मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल मिलता है ॥ ३३-३४ ॥ कहते हैं अपने वंशजोंद्वारा [यमुनातटपर पिण्डदान करनेसे] उन्नति लाभ किये हुए अन्य पितरोंकी समृद्धि देखकर दूसरे लोगोंके पितृ-पितामहोंने [अपने वंशजोंको लक्ष्य करके] इस प्रकार कहा था— ॥ ३५ ॥ क्या हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष ज्येष्ठ-मासके शुक्ल पक्षमें [द्वादशी तिथिको] मथुरामें उपवास करते हुए यमुनाजलमें स्नान करके श्रीगोविन्दका पूजन करेगा, जिससे हम भी अपने वंशजोंद्वारा उद्धार पाकर ऐसा परम ऐश्वर्य प्राप्त कर सकेंगे? जो बड़े भाग्यवान् होते हैं उन्हींके वंशधर ज्येष्ठमासीय शुक्लपक्षमें भगवान्का अर्चन करके यमुनामें पितृगणको पिण्डदान करते हैं ॥ ३६-३८ ॥ उस समय यमुनाजलमें स्नान करके सावधानतापूर्वक भलीप्रकार भगवान्का पूजन

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अ० ८ ] * षष्ठ अंश * ४६३


यदाप्नोति नरः पुण्यं तारयन्स्वपितामहान् ।
श्रुत्वाध्यायं तदाप्नोति पुराणस्यास्य भक्तितः ॥ ४०

एतत्संसारभीरूणां परित्राणमनुत्तमम् ।
श्राव्याणां परमं श्राव्यं पवित्राणामनुत्तमम् ॥ ४१

दुःस्वप्ननाशनं नृणां सर्वदुष्टनिबर्हणम् ।
मङ्गलं मङ्गलानां च पुत्रसम्पत्प्रदायकम् ॥ ४२

इदमार्षं पुरा प्राह ऋभवे कमलोद्भवः ।
ऋभुः प्रियव्रतायाह स च भागुरयेऽब्रवीत् ॥ ४३

भागुरिः स्तम्भमित्राय दधीचाय स चोक्तवान् ।
सारस्वताय तेनोक्तं भृगुस्सारस्वतेन च ॥ ४४

भृगुणा पुरुकुत्साय नर्मदायाै स चोक्तवान् ।
नर्मदा धृतराष्ट्राय नागायापूरणाय* च ॥ ४५

ताभ्यां च नागराजाय प्रोक्तं वासुकये द्विज ।
वासुकिः प्राह वत्सस्य वत्सश्चाश्वतराय वै ॥ ४६

कम्बलाय च तेनोक्तमेलापुत्राय तेन वै ॥ ४७

पातालं समनुप्राप्तस्ततो वेदशिरा मुनिः ।
प्राप्तवानेतदखिलं स च प्रमतये ददौ ॥ ४८

दत्तं प्रमतिना चैतज्जातुकर्णाय धीमते ।
जातुकर्णेन चैवोक्तमन्येषां पुण्यकर्मणाम् ॥ ४९

पुलस्त्यवरदानेन ममाप्येतत्स्मृतिं गतम् ।
मयापि तुभ्यं मैत्रेय यथावत्कथितं त्विदम् ॥ ५०

त्वमप्येतच्छिनीकाय कलेरन्ते वदिष्यसि ॥ ५१

इत्येतत्परमं गुह्यं कलिकल्मषनाशनम् ।
यः शृणोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२

समस्ततीर्थस्नानानि समस्तामरसंस्तुतिः ।
कृता तेन भवेदेतद्यः शृणोति दिने दिने ॥ ५३

कपिलादानजनितं पुण्यमत्यन्तदुर्लभम् ।
श्रुत्वैतस्य दशाध्यायानवाप्नोति न संशयः ॥ ५४

यस्त्वेतत्सकलं शृणोति पुरुषः
कृत्वा मनस्यच्युतं


करनेसे और पितृगणको पिण्ड देनेसे अपने पितामहोंको तारता हुआ पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है वही पुण्य भक्तिपूर्वक इस पुराणका एक अध्याय सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ यह पुराण संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंका अति उत्तम रक्षक, अत्यन्त श्रवणयोग्य तथा पवित्रोंमें परम उत्तम है ॥ ४१ ॥ यह मनुष्योंके दुःस्वप्नोंको नष्ट करनेवाला, सम्पूर्ण दोषोंको दूर करनेवाला, मांगलिक वस्तुओंमें परम मांगलिक और सन्तान तथा सम्पत्तिका देनेवाला है ॥ ४२ ॥

इस आर्षपुराणको सबसे पहले भगवान् ब्रह्माजीने ऋभुको सुनाया था । ऋभुने प्रियव्रतको सुनाया और प्रियव्रतने भागुरिसे कहा ॥ ४३ ॥ फिर इसे भागुरिने स्तम्भमित्रको, स्तम्भमित्रने दधीचिको, दधीचने सारस्वतको और सारस्वतने भृगुको सुनाया ॥ ४४ ॥ तथा भृगुने पुरुकुत्ससे, पुरुकुत्सने नर्मदासे और नर्मदाने धृतराष्ट्र एवं पूरणनागसे कहा ॥ ४५ ॥ हे द्विज ! इन दोनोंने यह पुराण नागराज वासुकीको सुनाया । वासुकिने वत्सको, वत्सने अश्वतरको, अश्वतरने कम्बलको और कम्बलने एलापुत्रको सुनाया ॥ ४६-४७ ॥ इसी समय मुनिवर वेदशिरा पाताललोकमें पहुँचे, उन्होंने यह समस्त पुराण प्राप्त किया और फिर प्रमतिको सुनाया ॥ ४८ ॥ प्रमतिने उसे परम बुद्धिमान् जातुकर्णको दिया तथा जातुकर्णने अन्यान्य पुण्यशील महात्माओंको सुनाया ॥ ४९ ॥

[पूर्व-जन्ममें सारस्वतके मुखसे सुना हुआ यह पुराण] पुलस्त्यजीके वरदानसे मुझे भी स्मरण रह गया । सो मैंने ज्यों-का-त्यों तुम्हें सुना दिया । अब तुम भी कलियुगके अन्तमें इसे शिनीकको सुनाओगे ॥ ५०-५१ ॥

जो पुरुष इस अति गुह्य और कलि-कल्मष-नाशक पुराणको भक्तिपूर्वक सुनता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५२ ॥ जो मनुष्य इसका प्रतिदिन श्रवण करता है उसने तो मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया और सभी देवताओंकी स्तुति कर ली ॥ ५३ ॥ इसके दस अध्यायोंका श्रवण करनेसे निःसन्देह कपिला गौके दानका अति दुर्लभ पुण्य-फल प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥


* नागाया (आर्ष दीर्घ) ।

४६४

  • श्रीविष्णुपुराण *

[ ३० ८ ]

सर्वं सर्वमयं समस्तजगता- माधारमात्माश्रयम् । ज्ञानज्ञेयमनादिमन्तरहितं सर्वांमराणां हितं स प्राप्नोति न संशयोऽस्त्यविकलं यद्वाजिमेधे फलम् ॥ ५५

यत्रादौ भगवांश्चराचरगुरु- मध्ये तथास्ते च सः ब्रह्मज्ञानमयोऽच्युतोऽखिलजग- म्मध्यान्तसर्गप्रभुः । तत्सर्वं पुरुषः पवित्रममलं शृण्वन्यठन्वाचय- न्न्राजोत्यस्ति न तत्फलं त्रिभुवने- ष्वेकान्तसिद्धिर्हिः ॥ ५६

यस्मिन्मन्त्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र निवेशितात्ममनसो ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । मुक्तिं चेत्सि यः स्थितोऽमलधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदधं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते ॥ ५७

यज्ञैर्यज्ञविदो यजन्ति सततं यज्ञेश्वरं कर्मिणो यं वै ब्रह्ममयं परावरमयं ध्यायन्ति च ज्ञानिनः । यं सच्चिन्त्य न जायते न म्रियते नो वद्वन्ते हीयते नैवासन्न च सद्भवत्यति ततः किं वा हरेः श्रूयताम् ॥ ५८

कव्यं यः पितुरूपधृग्विधहुतं हव्यं च भुङ्क्ते विभु- दैवत्वे भगवाननादिनिधनः स्वाहास्वधासंज्ञिते ।

जो पुरुष सम्पूर्ण जगत्के आधार, आत्माके अवलम्ब, सर्वस्वरूप, सर्वमय ज्ञान और ज्ञेयरूप आदि-अन्तरहित तथा समस्त देवताओंके हितकारक श्रीविष्णुभगवान्का चित्तमें ध्यान कर इस सम्पूर्ण पुराणको सुनता है उसे निःसन्देह अश्वमेध-यज्ञका समग्र फल प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥

जिसके आदि, मध्य और अन्तमें अखिल जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहारमें समर्थ ब्रह्मज्ञानमय चराचरगुरु भगवान् अच्युतका ही कीर्तन हुआ है उस परम श्रेष्ठ और अमल पुराणको सुनने, पढ़ने और धारण करनेसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण त्रिलोकियोंमें और कहीं प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि एकान्त मुक्तिरूप सिद्धिको देनेवाले भगवान् विष्णु ही इसके प्राप्तव्य फल हैं ॥ ५६ ॥

जिनमें चित्त लगानेवाला कभी नरकमें नहीं जा सकता, जिनके स्मरणमें स्वर्ग भी विघ्नरूप है, जिनमें चित्त लग जानेपर ब्रह्मलोक भी अति तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अव्यय प्रभु निर्मलचित्त पुरुषोंके हृदयमें स्थित होकर उन्हें मोक्ष देते हैं उन्हीं अच्युतका कीर्तन करनेसे यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? ॥ ५७ ॥ यज्ञवेत्ता कर्मनिष्ठ लोग यज्ञोद्धार जिनका यज्ञेश्वररूपसे यजन करते हैं, ज्ञानीजन जिनका परावरमय ब्रह्मस्वरूपसे ध्यान करते हैं, जिनका स्मरण करनेसे पुरुष न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है और न क्षीण हो जाता है तथा जो न सत् (कारण) हैं और न असत् (कार्य) ही हैं उन श्रीहरिके अतिरिक्त और क्या सुना जाय? ॥ ५८ ॥ जो अनादिनिधन भगवान् विभु पितुरूप धारणकर स्वधासंज्ञक कव्यको और देवता होकर अग्निमें विधिपूर्वक हवन किये हुए स्वाहा नामक हव्यको ग्रहण करते हैं तथा जिन समस्त शक्तियोंके आश्रयभूत भगवान्के विषयमें बड़े-बड़े

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अ० ८ ] * षष्ठ अंश * ४६५


यस्मिन्ब्रह्मणि सर्वशक्तिनिलये<br>मानानि नो मानिनां<br>निष्ठायै प्रभवन्ति हन्ति कलुषं<br>श्रोत्रं स यातो हरिः ॥ ५९प्रमाणकुशल पुरुषोंके प्रमाण भी इयत्ता करनेमें समर्थ नहीं होते वे श्रीहरि श्रवण-पथमें जाते ही समस्त पापोंको नष्ट कर देते हैं॥ ५९॥
नान्तोऽस्ति यस्य न च यस्य समुद्भवोऽस्ति<br>वृद्धिर्न यस्य परिणामविवर्जितस्य ।<br>नापक्षयं च समुपैत्यविकारि वस्तु<br>यस्तं नतोऽस्मि पुरुषोत्तममीशमीड्यम् ॥ ६०जिन परिणामहीन प्रभुका आदि, अन्त, वृद्धि और क्षय कुछ भी नहीं होता, जो नित्य निर्विकार पदार्थ हैं उन स्तवनीय प्रभु पुरुषोत्तमको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ६०॥
तस्यैव योऽनु गुणभुग्बहुधैक एव<br>शुद्धोऽप्यशुद्ध इव भाति हि मूर्तिभेदैः ।<br>ज्ञानान्वितः सकलसत्त्वविभूतिकर्ता<br>तस्मै नमोऽस्तु पुरुषाय सदाव्ययाय ॥ ६१जो उन्हींके समान गुणोंको भोगनेवाला है, एक होकर भी अनेक रूप है तथा शुद्ध होकर भी विभिन्न रूपोंके कारण अशुद्ध-(विकारवान्)-सा प्रतीत होता है और जो ज्ञानस्वरूप एवं समस्त भूत तथा विभूतियोंका कर्ता है उस नित्य अव्यय पुरुषको नमस्कार है॥ ६१॥
ज्ञानप्रवृत्तिनियमैक्यमयाय पुंसो<br>भोगप्रदानपटवे त्रिगुणात्मकाय ।<br>अव्याकृताय भवभावनकारणाय<br>वन्दे स्वरूपभवनाय सदाजराय ॥ ६२जो ज्ञान (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और नियमन (तम)-की एकतारूप है, पुरुषको भोग प्रदान करनेमें कुशल है, त्रिगुणात्मक तथा अव्याकृत है, संसारकी उत्पत्तिका कारण है, उस स्वतःसिद्ध तथा जराशून्य प्रभुको सर्वदा नमस्कार करता हूँ॥ ६२॥
व्योमानिलाग्निजलभूरचनामयाय<br>शब्दादिभोगविषयोपनयक्षमाय ।<br>पुंसः समस्तकरणैरुपकारकाय<br>व्यक्ताय सूक्ष्मबृहदात्मवते नतोऽस्मि ॥ ६३जो आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवीरूप है, शब्दादि भोग्य विषयोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ है और पुरुषका उसकी समस्त इन्द्रियोंद्वारा उपकार करता है उस सूक्ष्म और विराट्रूप व्यक्त परमात्माको नमस्कार करता हूँ॥ ६३॥
इति विविधमजस्य यस्य रूपं<br>प्रकृतिपरात्ममयं सनातनस्य ।<br>प्रदिशतु भगवानशेषपुंसां<br>हरिरपजन्मजरादिकां स सिद्धिम् ॥ ६४इस प्रकार जिन नित्य सनातन परमात्माके प्रकृति-पुरुषमय ऐसे अनेक रूप हैं वे भगवान् हरि समस्त पुरुषोंको जन्म और जरा आदिसे रहित (मुक्तिरूप) सिद्धि प्रदान करें॥ ६४॥

इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपारत्वनिर्णायके श्रीमति
विष्णुमहापुराणे षष्ठोंऽशः समाप्तः ।

इति श्रीविष्णुमहापुराणं सम्पूर्णम्
॥ श्रीविष्ण्वर्पणमस्तु ॥
समाप्त

॥ श्रीहरिः ॥

श्रीविष्णुपुराणान्तर्गतश्लोकानामकारादिक्रमेणानुक्रमः

श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०
अ०अंगुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षः१५८१
अकरोत्स्वतनुमन्याम्अंगुलस्याष्टभागोऽपि
अकालगर्जितादौ च१२३६अंगात्सुनीथापत्यम्१३
अकिञ्चनमत्सम्बन्धम्११६२अचिरादागमिष्यामि३२३०
अकृष्टपच्या पृथिवी१३५०अचिन्तयच्च कौन्तेयः३८२५
अकृत्वा पादयोः शौचम्२१३७अच्छेनागन्धिलेपेन१११९
अकृताग्रयणं यच्च१६अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नम्१३२७
अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च१३६७अच्युतोऽप्यतिप्रणतातस्तस्मात्१३५७
अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूत०१३१०८अजयद्बलदेवस्तम्२८१९
अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य१७अजमीढद्विजमीढपुरुमीढाः१९२९
अक्रूरः क्रूरहृदयः१८३०अजमीढात्कण्वः१९३०
अक्रूरागमनवृत्तान्तम्२०१८अजमीढस्यान्यः पुत्रः१९३३
अक्षरं तत्परं ब्रह्म२२५६अजमीढस्य नलिनी नाम१९५६
अक्षय्यं नान्यदाधारम्२०अजमीढस्यान्या ऋक्षनामा१९७४
अक्षप्रमाणमुभयोःअजन्मन्मरे विष्णौ३७७५
अक्षीणेषु समस्तेषु५२अजायत च विप्रोऽसौ३५
अक्षीणामर्षमृत्युग्र०३४४४अजादशरथः८६
अक्षौहिण्योऽत्र बहुलाः२६अजानता कृतमिदम्३७७१
अखिलजगत्स्रष्टुर्भगवतःअजीजनत्पुष्करिण्याम्१३
अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शन०१३३८अज्ञानं तामसो भावः२५
अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च११९५अज्ञानतमसाच्छन्नः२१
अगाधापारमक्षय्यम्२५अज्ञातकुलनामानम्११६१
अग्नये कव्यवाहाय१५२७अण्डानां तु सहस्राणाम्२७
अग्निराप्याययेद्धातून्११९२अणुप्राण्युपपन्नां च१११७
अग्निपुत्रः कुमारस्तु१५११५अनुह्लादह्रददत्तः१९४५
अग्निबाहुः शुचिः शुक्रः४४अनुप्रयाणि धान्यानि५४
अग्निहोत्रे हूयते या५३अणोरणीयांसमसत्स्वरूपम्४२
अग्निसुवर्णस्य गुरुः१४अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि
अग्नेः शीतेन तोयस्य१७६४अतश्च मान्धातुः
अग्न्यन्तकादिरूपेण२२२९अतश्च पुरुवंशम्१८३०
अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया२०१७अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः२२
अग्रन्यस्तविषाणाग्रः१४अतिविभूतेः२९
अंगमेषा त्रयी विष्णोः११११अतिचपलचित्ता१२२६
अंगादनपानस्ततः१८१५अतिदुष्टसंहारिणः१०४
अंगारकोऽपि शुक्रस्यअतितिक्षायनं क्रूरम्१७२३
अंगानि वेदाश्चत्वारः२८अतिथिर्यस्य भग्नाशः११६८
अंगिरसश्च सकाशात्१३अतिथिर्यस्य भग्नाशः१५

४६७

श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०
अतिथिं चांगतं तवं१११०अथ दैत्यैरुपैत्य
अतिथिं तत्र सम्प्राप्तम्११५९अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रम्१३६०
अतिवेगितया कालम्३३अथवा तव को दोषः१५४२
अतिभीमा समागम्य१८३४अथ पुत्रसहस्राणि१५९०
अतीता वर्तमानाश्च२४१०३अथ दैत्येश्वरं प्रोचुः१७४८
अतीव व्रीडिता बाला१८६८अथ भद्राणि भूतानि१७८१
अतीतकल्पावसानेअथ जितारिपक्षश्च१०
अतीतानागतानीहअथ शर्मिष्ठातनयम्१०१५
अतीव जागरस्वप्ने१२१७अथवैनां स्यन्दनम्१२२१
अतो गतस्स भगवान्३८६२अथ यादवबलभद्रोग्रसेन०१३११३
अतो मन्दतरं नाभ्याम्३९अथ दुर्वासोर्वशमवधारय१६
अतोऽहमस्य षोडशस्त्री०१३१५६अथवा किं तदालापैः२४१५
अतोऽर्हसि ममात्मीयम्२२अथवा यादृशः स्नेहः२७२४
अतः क्रोधकलुषीकृतचेताः५२अथवा कौरवावासम्३५३०
अतः परं ययातेः११अथ तन्मुसलं चासौ३६१८
अतः सम्प्राप्यते स्वर्गःअथ हर्यात्मनोऽन्ते च१७
अतः परं भविष्यानहम्२१अथर्ववेदं स मुनिः
अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु३०अथ भुङ्क्ते गृहे तस्य१८४६
अत्यन्तमधुरालाप०३१अथ तत्रापि च१०
अत्यम्लकदुतीक्ष्णोष्ण०११अथ पृष्टा पुनरप्यब्रवीत्४३
अत्यरिच्यत सोऽधश्च१२५८अथ वनादागत्य२४
अत्यन्तस्तिमितॉङ्गानाम्१७६१अथ भगवान् पितामहः३१
अत्यार्तजगतपरित्राणाय१५अथाजगाम तत्तीरम्१३१३
अत्र हि राज्ञो युवनाश्वस्य५५अथान्यमप्युरणकमादाय५५
अत्र श्लोकः११अथाह याज्ञवल्क्यस्तु
अत्र जन्मसहस्राणाम्२३अथाह भगवान्
अत्र हि वंशे२३अथाह कृष्णमक्रूरः१८३४
अत्र च श्लोकः१२अथागत्य देवराजोऽब्रवीत्६०
अत्र देवास्तथा दैत्याः१४अथान्तर्जलावस्थितः७३
अत्रानुवंशश्लोको भवति१०अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैः१३१११
अत्रायं श्लोकः२११७अथाहाक्रूरः स एषः१३१४८
अत्रानुवंशश्लोकः२२१२अथान्तरिक्षे वागुच्चैः
अत्रावतीर्णयोः कृष्ण४१अथान्तरिक्षे वागुच्चैः२८२१
अत्रान्तरे च सगरः१६अथाहान्तर्हितो विप्र१६१८
अत्रापि भारतं श्रेष्ठम्२२अथांशुमानपि स्वर्यातानाम्२७
अत्रापि श्रूयते श्लोकः८१अथैतामतीतानागत०३१
अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च२७अथैनान्वसिष्ठो जीवन्मृतकान्४३
अत्रेस्सोमःअथैनामटव्यामेवाग्निस्थालीम्८१
अत्रोपविश्य वै तेन१३३५अथैनं देवर्षयः
अथ तस्य भगवतः८२अथैनां रथमारोप्य१२२३
अथ प्रसन्नवदनः१२५०अथैनं शैव्योवाच१२२८

४६८

श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०
अथैनं भगवान्वाह...२५अनादिमध्यान्तमजम्...
अथोपवाह्यादादाय...१२१३अनाशी परमार्थश्च...
अदित्यैवं स्तुतो विष्णुः...३०२४अनागच्छति तस्मिन्नृसेनः...
अदित्या तु कृतानुज्ञः...३०२८अनाद्यतैव साधुत्वहेतुः...
अदीर्घह्रस्वमस्थूलम्...१४३९अनाख्येयस्वरूपामन्...
अदृश्याय ततस्तस्मै...६६अनिरुद्धोऽपि रुक्मिणः...
अदृष्टाः पुरुषैःस्त्रीभिः...अनिकेताः ह्यनाहाराः...
अद्य मे सफलं जन्म...१७अन्निन्दं भक्षयेदित्थम्...
अद्याप्याघूर्णिताकारम्...३५३७अनिलस्य शिवा भार्या...
अद्यैव ते व्यलीकलज्जावत्याः...२९अनिष्क्रमणे च मधुरिपुरसौ...
अद्यैव देव कंसोऽयम्...१९अनिरुद्धो रणेऽरुद्धः...
अधर्मबीजमुद्धृतम्...१५अनुज्ञां देहि भगवन्...
अधमोत्तमौ न तेष्वास्ताम्...७९अनुशिष्टोऽसि केनेदृक्...
अधश्चोर्ध्वं च ते दीप्ताः...२१अनुतप्ता शिखी चैव...
अधिसीमकृष्णात्...२१अनुदिनानुरूढस्नेह०...
अधोमुखो वै क्रियते...१५अनुदिनं चोपभोगतः...
अधःशिरोभिर्दृश्यन्ते...३३अनुयातैनमन्त्रान्या...
अनष्टद्रव्यता च...१११७अनुरागेण शैथिल्यम्...
अनन्यचेतसस्तस्य...१२अनुयुक्तौ ततस्तौ तु...
अनन्तरं च तुर्वसुम्...१०१३अनुभूतमिवान्यस्मिन्...
अनभ्यर्च्य ऋषीन्देवान्...१८५०अनृतमेव व्यवहारजयहेतुः...
अनन्तरं च सा...३२अनेन दुष्टकपिना...
अनरण्यस्य पृषदश्वः...१८अनेकजन्मसाहस्रीम...
अनक्षज्ञो हली द्यूते...२८११अनेरानकदुन्दुभिः...
अनन्तरं हरेशार्ङ्गम्...२२अन्तर्जले यदाश्चर्यम्...
अनन्तरं चाशेषः...२४९९अन्तर्द्धानं गते तस्मिन्...
अनन्तरं च सप्तमम्...१५२८अन्तर्वत्न्यहमब्दान्ते...
अनमित्रस्य पुत्रः...१४अन्तरटव्यामचिन्तयत्...
अनमित्रस्यान्वये...१४अन्तःपुराणां मञ्जाश्च...
अनन्तरं चातिशुद्ध०...१२३३अन्तःप्रविष्टश्च धात्र्याः...
अनन्तरं च तैरूक्तम्...७९अन्तःपुरे निपतितम्...
अनन्तरं च तेनापि...५४अन्धकारीकृते लोके...
अनसूया तथैवात्रेः...१०अन्धकारीकृते लोके...
अनावृष्टिभयप्रायाः...२४अन्धं तम इवाज्ञानम्...
अनावृष्ट्यादिसम्पर्कात्...१२अन्नशाकाम्बुदानेन...
अनायतैस्समस्तैश्च...३१अन्नाग्रञ्च समुद्धृत्य...
अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या...११अन्नेन वा यथाशक्त्या...
अनादिर्भगवान्कालः...२६अन्नं बलाय मे भूमे...
अनाराधितगोविन्दैः...११४३अन्यजन्मकृतैः पुण्यैः...
अनाकाशमसंस्पर्शम्...१४४०अन्यथा सकला लोकाः...
अनामगोत्रमसुखम्...१४४१अन्यस्मै कन्यारत्नमिदम्...

४६९

श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०
अन्यान्प्यन्यपाषण्ड०...१८२३अप्यत्र वत्से भवत्याः सुखम्...
अन्यासां चैव भार्याणाम्...३२अप्येष मां कंसपरिग्रहेण...
अन्याश्च भार्याः कृष्णस्य...२८अप्येष पृष्ठे मम हस्तपद्मम्...
अन्याश्च शतशस्तत्र...६६अप्येतेऽस्मत्पुत्राः कलभाषिणः...
अन्याय एव वृत्तिहेतुः...२४८३अप्रदानेन च विजित्येन्द्रम्...
अन्यान्‌थ सजातीयान्...११अप्रतिरथस्य कण्वः...
अन्याब्रवीति भो गोपाः...१३२८अप्रतिरथस्यापरः...
अन्याः सहस्रशस्तत्र...४४अप्राणवत्सु स्वल्पा सा...
न्यूनोनतिरिक्ताश्च...९०अप्रियेण तु तान्दृष्ट्वा...
न्यूननश्चाप्यवृद्धिंश्च...४८अप्सु तस्मिन्नहोरात्रे...
अन्येषां चैव जन्तूनाम्...अब्दे च पूर्णे...
अन्ये च पाण्डवानामात्मजाः...२०४३अभवन्दनुपुत्राश्च...
अन्येनोत्थाप्यतेऽन्येन...३३अभयं सर्वभूतेभ्यः...
अन्ये तु पुरुषव्याघ्र...७७अभयप्रगल्भोच्चारणमेव...
अन्येषां दुर्लभं स्थानम्...१२८७अभिषिच्य गवां वाक्यात्...
अन्येषां यो न पापानि...१९अभिष्टूय च तं वाग्भिः...
अन्येऽपि सन्त्येव नृपाः पृथिव्याम्...७८अभिरुचिरेव दाम्पत्य०...
अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे...१५९८अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षिज्जेषु...
अपत्यं कृत्तिकानां तु...१५११६अभिषिक्तो यदा राज्ये...
अपश्यच्च तन्मांसम्...५१अभिषिच्य सुतं वीरम्...
अपसर्पिणी न तेषां वै...१३अभिशस्तस्तथा स्तेनः...
अपसव्यं न गच्छेच्च...१२२६अभिष्टा सर्वदा यस्य...
अपहन्ति तमो यश्च...२१अभुक्तवत्सु चैतेषु...
अपध्वस्तवपुः सोऽपि...१३४१अभूद्विदेहोऽस्य पितेति वैदेहः...
अपक्षयविनाशाभ्याम्...११अभ्यर्थितापि सुहृदा...
अपराह्ने व्यतीते तु...६४अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापः...
अपामपि गुणो यस्तु...१७अमरेषु ममावज्ञा...
अपापे तत्र पापँश्च...१८३७अमाद्यदिन्द्रस्सोमेन...
अपास्य सा तु गन्धर्वान्...३२२३अमावास्या यदा पुष्ये...
अपि धन्यः कुले जायात्...१४२२अमावास्या यदा मैत्र०...
अपि ते परमा तृप्तिः...१५१७अमिताभा भूतरया...
अपि स्मरसि राजेन्द्र...१८७५अमृष्टं जायते मृष्टम्...
अपि नस्स कुले जायात्...१६१९अमृतस्त्राविणी दिव्ये...
अपि नस्ते भविष्यन्ति...१६१८अम्बरीषमिवाभाति...
अपीड्या तयोः कामम्...११अम्ब यत्त्वमिदं प्रात्थ...
अपुत्रा तस्य सा पत्नी...१२१४अम्बरीषस्य मान्धातृतनयस्य...
अपुत्रा प्रागियं विष्णुम्...१५अम्बरीषस्यापि...
अपुण्यपुण्योपरमे...१००अम्ब कथमत्र वयम्...
अपुत्रस्य च भूभुजः...२०अयनस्योत्तरस्यादौ...
अपूर्वमग्निहोत्रं च...११४२अयमेव मुने प्रश्नः...
अपृथग्धर्मचरणास्ते...१४अयमन्योऽस्मत्प्रत्याख्यानोपायः...

४७०

श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०
अयमस्मान् ब्रह्मर्षिः९०अलं भगिन्योऽहमिमं वृणोमि९२
अयमतीव दुरात्मा सत्राजित्१३६८अल्पप्रसादा बृहत्क्रोपाः२४७१
अयमपि च यज्ञादनन्तरम्१३१३६अल्पप्रज्ञा वृथालिंगाः४३
अयमेकोऽर्जुनो धन्वी३८१५अल्पोपादानं चास्यासंशयम्१३१३७
अयुजो भोजयेत् कामम्१३२०अवतीर्याय गरुडात्३१११
अयं कृष्णस्य पौत्रस्ते३२२७अवश्यमस्य देवेन्द्रः३०४३
अयं हि वंशोऽतिबलपराक्रम०अवरुह्य स नागेन्द्रात्१२
अयं स पुरुषोत्कृष्टः६९अवतार्य भवान्पूर्वम्४०
अयं हि भगवान्१५१७अवतीर्य च तत्रायम्६५
अयं च तस्य श्लोकः२०१२अवबोधि च यच्छान्तम्१७२४
अयं चास्य महाबाहुः२०४८अवज्ञाय वचस्तस्य३८२०
अयं स कथ्यते प्राज्ञैः२०४९अवज्ञानमहंकारः१६
अयं हि सर्वलोकस्य२०५०अवगाहदपः पूर्वम्
अयं समस्तजगतः२७१०अवयो वक्षसश्चक्रे४८
अरजोऽशब्दममृतम्१४४२अवरांच वरांश्र्चैव१५७६
अरक्षितारो हर्तारः३४अवष्टम्भो गदापाणिः२९
अराजके नृपश्रेष्ठ१३६७अवशेनापि यन्नाम्नि१९
अरिष्टो धेनुकः केशी२४अवकाशमशेषस्य१५
अरिष्टो धेनुकः केशी२०४७अवकाशमशेषाणाम्१४३२
अरुन्धती वसुर्यामिः१५१०५अवादयन् जगुश्चान्ये१७
अरुणोदं महाभद्रम्२६अवाप्तज्ञानतन्त्रस्य१५
अरूपरसमस्पर्शम्२५अवापुस्तापमत्यर्थम्१०
अर्कस्येव हि तस्याश्वाः१२अविकाराय शुद्धाय
अर्चिर्भिस्संवृते तस्मिन्२०अविकारमजं शुद्धम्१४३८
अर्जुनस्याप्युलूप्याम्२०४९अविकारं स तद्भुक्त्वा१८
अर्जुनार्थे त्वहं सर्वान्१२२४अविक्षितोऽप्यतिबल०३१
अर्जुनोऽपि तदान्विष्य३८अविद्योऽयं मया द्यूते२८१६
अर्थो विष्णुरियं वाणी१८अविद्यामोहितात्मानः३३४९
अर्धनारीनरवपुः१३अविमुक्ते महाक्षेत्रे३४३०
अर्यमा पुलहश्चैव१०अवीरजोऽनुगमनम्३८३७
अर्वाक्स्त्रोतास्तु कथितःअव्यक्तं कारणं यत्तत्१९
अर्हध्वं धर्ममेतं च१८अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मन्६०
अर्हंतैतं महाधर्मम्१८१३अशब्दगोचरस्यापि७१
अलमत्यन्तकोपेन१६अशस्त्रमतिघोरं तत्२०६८
अलमलमनेनासद्ग्राहेण३२अशास्त्रविहितं घोरम्४०
अलातचक्रवद्भ्रान्ति१२२८अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्तः३१
अलांबुं गृञ्जनं चैव१६अशुचि प्रस्तरे सुप्तः१९
अलं ते क्रीडया पार्थ३८५४अशेषपर्वस्वेतेषु१११२०
अलं शक्र प्रयासेन३०७३अशेषभूभृतः पूर्वम्१८८२
अलं त्रासेन गोपालाः१६अशेषजगदाधार०२०८७
अलं निशाचरैर्दग्धैः२०अश्नीयात्तन्मयो भूत्वा११८७

४७१

श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०
अश्मकस्य मूलको नाम... ४७३अहमत्यन्तविषयी... ५२३४६
अश्विनौ वसवश्चेमे... १६४अहिंसादिष्वशेषेषु... २१३
अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः... १२४अहो क्षात्रं परं तेजः... १११३८
अष्टाशीतिसहस्राणि... १३६अहोऽस्य तपसो वीर्यम्... ११२९९
अष्टाशीतिसहस्राणि... २९२अहोरात्रकृतं पापम्... १२०३७
अष्टाश्वः काञ्चनः श्रीमान्... २१२१८अहोरात्रार्द्धमासास्तु... २८०
अष्टाभिः पाण्डुरैर्युक्तः... २१२१९अहोरात्र व्यवस्थान०... २११
अष्टाविंशतिकृत्वो वै... ३अहोमी च कृमीन्भुङ्क्ते... ३११७४
अष्टाविंशद्वधोपेतम्... ३१७२८अहो धन्योऽद्यमीदृशम्... ४७४
अष्टावक्रः पुरा विप्रः... ५३८७१अहो मे मोहस्य... ४११५
अष्टौ शतसहस्राणि... ११९अहो गोपीजनस्यास्य... ५१८२८
अष्टौ महिष्यः कथिताः... ५३८अहोऽतिबलवद्दैवम्... ५३८३१
असत्प्रतिगृहीता तु... २१८अहोरात्रं पितॄणां तु... ६
असहन्ती तु सा भर्तुः... ३अहर्भवति तच्चापि... २३७
असमर्थोऽन्नदानस्य... २१४२५अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनः... १२२८७
असहन्रौहिणेयस्य... ५१७अहं त्वं च तथान्ये च... २१३६९
असम्यक्करणे दोषः... ६२१अहं चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे... ४१२५
असारंसंसारविवर्तनेषु... ११७९०अहं रामश्च मथुराम्... ५१८
असावपि हिरण्यपात्रे... ४४८अहं ह्यविद्यया मृत्युम्... ६
असावपि प्रतिगृह्योदकाञ्जलिम्... ४५६अहं ममेत्यविद्येयम्... ६१००
असावप्यनालोचितोत्तरवचनः... ४१२२७आ०
असावप्याह... ४१३८४आकण्ठमग्नं सलिले... ५३८७४
असावपि देवापिर्वेदवाद०... ४२०२६आकाशवायुतेजांसि... १५०
असिपत्रवनं याति... २२६आकाशगंगासलिलम्... २१२
अस्त्रभूषणसंस्थान०... १२२७६आकाशसम्भवेरश्वैः... २१२२०
अस्त्राणां सायकानां च... ५३८४५आकाशवाव्वग्निजलं०... ६१३
अस्त्रानभोजिनो नागिन०... ६२७आकाशं चैव भूतादिः... ६३३
अस्नाताशी मलं भुङ्क्ते... ३११७३आकृष्य लांगलाग्रेण... ५३३३०
अस्मत्संश्रयदृप्तोऽयम्... ५३३४४आकृष्य च महास्तम्भम्... ५२८२५
अस्मच्चेष्टामपहसन्... ५२४१३आक्रान्तः पर्वतः कस्मात्... ११६
अस्माभिरर्घो भवतः... ५३५१८आख्यातं च जनैस्तेषाम्... ११३३१
अस्मिन्वसति दुष्टात्मा... ५आख्याहि मे समयमिति... ४४२
अस्मिन्वयसि पुत्रो मे... ५२७२३आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैः... ३१५
अस्याक्रूरस्य पिता श्वफल्कः... ४१३११५आगच्छ हे राजन्... ४२०२८
अस्वे स्वमिति भावोऽत्र... ५३०१५आगमनश्रवणसमनन्तरम्... ४७६
अहङ्कृता अहम्मानाः... १११आगताय वसिष्ठाय... ४४९
अहन्यहन्यनुष्ठानम्... १२८आगच्छत द्रुतं देवाः... ११५१२८
अहन्यहन्याचार्यः... ११९२६आगमोत्थं विवेकाच्च... ६६१
अहमेवाक्षयो नित्यः... ११९८६आगारदाही मित्रघ्नः... २२३
अहमम्वरार्चितेन धात्रा... ३१५आगामियुगे सूर्यवंश०... ४११०
अहमप्यद्रिशृङ्गाभम्... ५११आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च... २

४७२

श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०
आग्नेयमष्टमं चैव... ३२२आनीय चोग्रसेनाय... ५२४
आघूर्णितं तत्सहसा... ५३५३२आनीयमानमाभीरैः... ५३८५२
आजीवो याः परस्तेषाम्... ५११आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता... ११२१
आज्ञापूर्वं च यदिदम्... ५३४११आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता... ५१०२७
आताम्रनयनः कोपात्... ५१५आपस्तम्भिरे चास्य... ११३४९
आताम्रा हि भवन्त्यापः... २२५आपस्य पुत्रो वैतण्डः... ११५१११
आत्मच्छायां तरुच्छायाम्... ३११११आपदशौचनात्पूर्वम्... ३१५४८
आत्मनोऽधिगतज्ञानः... २१३३८आपो ध्रुवश्च सोमश्च... ११५११०
आत्ममायामयीं दिव्याम्... ६आपो नारा इति प्रोक्ताः... १
आत्मभावं नयत्येनम्... ६३०आपो ग्रसन्ति वै पूर्वम्... ६१४
आत्मप्रयत्नसापेक्षा... ६३१आप्याः प्रसूता भव्याश्च... ३२७
आत्मानमस्य जगतः... १२२६८आभूतसंप्लवं स्थानम्... २९५
आत्मात्मदेहगुणवत्... ५३९आमन्त्रितश्च कृष्णेति... ५२४१९
आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तः... २१३७१आमृत्युतो नैव मनोरथानाम्... ४११९
आत्मा ध्येयः सदा भूप... २१४१५आयतिर्नियतिश्चैव... ११०
आदत्ते रश्मिभिर्यं तु... २११२४आययौ च जरा नाम... ५३७६८
आदाय कृष्णं सन्त्रस्ता... ५१२आयागं तद्वनूरत्नम्... ५२०१५
आदाय वसुदेवोऽपि... ५२३आयास्ये भवतीगेहम्... ५२०१३
आदाहवार्यायुधादि०... ३१३३६आयातं दैत्यवृषभम्... ५१४१०
आदित्या मरुतस्साध्याः... ५१७आयुर्वेदो धनुर्वेदः... ३२९
आदित्यान्निस्सृतो राहुः... २१२२२आरक्ताश्चैव निर्यासाः... ३१६
आदित्यवसुरुद्राद्याः... ३३१आरभ्वस्यात्मजः... ४१७
आद्यमाजगवं नाम... ११३४०आराधिताच्च गोविन्दात्... ३
आद्ये कृतयुगे सर्गः... ६आराध्यः कथितो देवः... १११५०
आद्यो यज्ञपुमानीड्यः... १६१आराध्य वरदं विष्णुम्... ११४१४
आद्यो वेदश्चतुष्पादः... ३आराधनाय लोकानाम्... ३१७११
आद्यं सर्वपुराणानाम्... ३२०आराधितो यद्भगवान्... ५२०९५
आधारभूतं जगतः... ११२८१आराध्यन्महादेवम्... ५२३
आधारभूतं विश्वस्य... १आराध्य त्वामभीप्सन्ते... ५३०१८
आधारः शिशुमारस्य... २आराधितस्त्वया विष्णुः... ११५६२
आधारभूतः सवितुः... २२३आरुह्यैराक्तं नागम्... ५२९१५
आध्यात्मिकादि मैत्रेय... ६आरुह्य च स्वयं कृष्णः... ५२९३५
आध्यात्मिकोऽपि द्विविधः... ६आर्यबलभद्रेणापि... ४१३१५७
आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु... ३१२आर्यकाः कुरराश्चैव... २१७
आनम्य चापि हस्ताभ्याम्... ५४४आलोक्यर्द्धिमथान्‍येषाम्... ६३५
आनकदुन्दुभेर्देवक्यामपि... ४१५२६आश्रमाणां च सर्वेषाम्... ३३८
आनर्तनामा परमधार्मिकः... ४६३आश्रयश्चेतसो ब्रह्म... ६४७
आनर्तस्यापि रेवतनामा पुत्रः... ४६४आश्रित्य तमसो वृत्तिम्... १२२२८
आनिन्ये च पुनः संज्ञाम्... ३आसन्नं चैष जग्राह... ५१४११
आनीलनिषधायामौ... २३९आसन्नो हि कलिः... ४७७
आनीय सहिता दैत्यैः... १७७आसां पिबन्ति सलिलम्... २१८

४७३

श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०
आस्फोटयामास तदा१४इति विज्ञाप्यमानोऽपि१३२६
आह चैनं कृतवर्मा१३८२इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः१९१०
आह चैनामतिपापे२५इति राजाह भरतः१३१०
आह च भगवान्इति भरतनरेन्द्रसारवृत्तम्१६२५
आह चोर्वशी६५इतीरितस्तेन स राजवर्यः१६२४
आह च राजा७६इतीरितोऽसौ कमलोद्भवेन९३
आहारः फलमूलानि१३८६इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च
आहुकस्य देवकोग्रसेनौ१४१६इत्थमुन्मार्गयातेषु१८३३
आह्लादकारिणः शुभ्राःइत्थं च पुत्रपौत्रेषु१५
इ०इत्थं सञ्चिन्तयन्नेव३९
इक्ष्वाकुतनयो यःइत्थं वदन्ययौ जिष्णुः३८३४
इक्ष्वाकुश्च नृगश्चैव३३इत्थं विभूषितो रेमे२५१८
इक्ष्वाकुकुलाचार्यो वसिष्ठः१७इत्थं पुरस्त्रीलोकस्य२०६३
इक्ष्वाकुजह्नुमान्धातु०२४१४१इत्थं पुमान्प्रधानं च२२७५
इक्ष्वाकूणामयं वंशः२२१३इत्थं चिरगते तस्मिन्१३२८
इच्छा श्रीभगवान्कामः२०इत्थं विचिन्त्य बद्ध्वा च११
इज्यते तत्र भगवान्१९इत्थं सञ्चिन्तयन्विष्णुम्१७१८
इतरस्यानुदिनम्१३५१इत्थं स्तुतस्तदा तेन२४
इतरास्त्वब्रुवन्विप्र३८७८इत्यनेकान्तवादं च१८१२
इति विविधमजस्य यस्य रूपम्६४इत्यन्ते वचसस्तेषाम्६०
इति संसारदुःखार्क०५७इत्याज्ञाप्तास्ततस्तेन११
इति कृत्वा मतिं कृष्णः१११६इत्याज्ञाप्तास्ततस्तेन१७३२
इति गोपकुमाराणाम्इत्याकर्ण्य वचस्तस्य१५३२
इति गोपीवचः श्रुत्वा३३इत्याह भगवानौर्वः१७
इति संस्मारितः कृष्णः४३इत्याकर्ण्य समस्तदेवैः३०
इति संस्मारितो विप्र३४इत्यात्मानमात्मनैवाभिधाय१२९
इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यम्१३१३इत्यात्मेर्ष्याकोपकलुषित०१२३०
इति सञ्चिन्त्य गोविन्दः२३१३इत्याकर्ण्योपलब्धस्य१३४३
इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा२९१३इत्याकर्ण्य समुत्पाट्य
इति तस्य वचः श्रुत्वा१०४२इत्याकर्ण्य धरावाक्यम्२९
इति नानाविधैर्भावैः४९इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसः१४
इति कृत्वा मतिं सर्वे२५इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च१७
इतिहासपुराणे च३८इत्यालोच्य स दुष्टात्मा१५१२
इति प्रसूतिं वृष्णीनाम्१५५०इत्याज्ञप्तस्तदाक्रूरः१५२३
इति ऋषिवचनम्८०इत्यादिश्य स तौ मल्लौ२०२२
इति मत्वा स्वदारेषु१११२७इत्युक्तोऽसौ तदा दैत्यैः१७२८
इति निजभटशासनाय देवः३५इत्युक्तः स तया प्राह१५२५
इति यमवचनं निशम्य पाशी१९इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्तैः१३२९
इति शाखान्समाख्याताः३१इत्युक्ता देवदेवेन८२
इति पूर्वं वसिष्ठेन२९इत्युक्त्या देवदेवेन१२४०
इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः१४९इत्युक्त्वा प्रययौ साथ१२२४

४७४

श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०
इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रः२५इत्युक्तस्स प्रहस्यैनाम्३०३८
इत्युदीरितमाकर्ण्य५८इत्युक्ते तैरूवाचैतान्३०४५
इत्युक्तः सकलं मात्रे१११४इत्युक्ता रक्षिणो गत्वा३०५२
इत्युकास्ते ततः सर्पाः१७३८इत्युक्तो वै निवृते३०७७
इत्युक्त्वा सोऽभवन्मौनी१८१९इत्युका सा तया चक्रे३२१३
इत्युक्तास्तेन ते क्रुद्धाः१८३३इत्युक्तः प्राह गोविन्दः३३४५
इत्युक्तास्तेन ते सर्वे१८४४इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्णः३३५१
इत्युक्त्वा तं ततो गत्वा१८४६इत्युक्तस्सम्प्रहस्यैनम्३४
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवः१५७२इत्युक्तेऽपगते दूते३४१३
इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः२०२९इत्युच्चार्य विमुक्तेन३४२४
इत्युक्ते मौनिनं भूयः१५इत्युक्त्वा कुरवः साम्बम्३५१९
इत्युक्ता तेन सा पत्नी१५१५इत्युक्तामदरक्ताक्षः३५३१
इत्युक्तः सहसारुह्य१६१२इत्युक्त्वा दिवमाजग्मुः३६२३
इत्युक्तः सत्वरं तस्य१६१५इत्युकास्ते कुमारास्तु३७११
इत्युक्तो रुधिराक्तानि१२इत्युक्तो वासुदेवेन३७२८
इत्युच्चार्य नरो दद्यात्११५६इत्युक्तः प्रणिपत्यैनम्३७३७
इत्युच्चार्य स्वहस्तेन११९८इत्युक्तो दारुकः कृष्णम्३७६४
इत्युक्तो भगवांस्तेभ्यः१७४१इत्युदीरितमाकर्ण्य३८८३
इत्युक्ताः प्रणिपत्यैनम्१७४५इत्युक्तोऽभ्येत्य पार्थाभ्याम्३८९१
इत्युच्चार्याहर्निशम्१४इत्युक्तो मुनिभिर्व्यासः१४
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र३४इत्युक्त्वा रथमारुह्य२०
इत्युक्त्वा प्रययौ देवी२९इत्युक्त्वा समुपेत्यैनम्४८
इत्युक्ताः प्रययुर्गोपाःइत्युक्तस्ते मया योगः९७
इत्युक्ते ताभिराश्वस्य६०इत्येते कथिताः सर्गाः१९
इत्युक्त्वा सर्पराजं तम्७९इत्येष प्राकृतः सर्गः२१
इत्युक्तास्तेन ते गोपाः१११९इत्येता ओषधीनां तु२३
इत्युक्तः सम्परिष्वज्य१२२५इत्येषा दक्षकन्यानाम्१०२१
इत्युक्तवास्फोट्य गोविन्दः१६इत्येवमुक्तास्ते पित्रा१४१८
इत्युक्त्वा चोदयामास१९इत्येवमुक्त्वा तां देवीम्२१३४
इत्युक्त्वा भगवांस्तूष्णीम्१५इत्येष तैऽशः प्रथमः२२८८
इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ१९१२इत्येते मुनिवर्योक्ताः४५
इत्युक्त्वा तद्गृहात्कृष्णः१९२९इत्येवं तव मैत्रेय२१
इत्युक्तस्सोऽग्रजेनाथ२०३५इत्येष सन्निवेशोऽयम्१२३५
इत्युक्त्वाथ प्रणम्योभौ२१इत्येतास्तनवस्तस्य४४
इत्युक्त्वा सोऽस्मरद्वायुम्२११३इत्येताः प्रतिशाखाभ्यः२५
इत्युक्तः पवनो गत्वा२११६इत्येवमादिभिस्तेन२६
इत्युक्तोऽन्तर्जलं गत्वा२१२८इत्येते कथिता राजन्४१
इत्युक्तः प्रणिपत्येशम्२४इत्येतेऽतित्थयः प्रोक्ताः११६७
इत्युक्ता वारुणी तेन२५इत्येतत्पितृभिर्गीतम्१४३१
इत्युक्तयातिसन्त्रासात्२५१४इत्येतन्मान्धातृ०१३२
इत्युक्तश्शम्बरं युद्धे२७१८इत्येते मैथिलाः३३

४७५

श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०
इत्येवमाद्यतिबलपराक्रम०...१०२इयं मायावती भार्या...
इत्येतां ज्यामघस्य सन्ततिम्...१२४५इलावृताय प्रददौ...
इत्येतद्भगवतः...१३१६२इष्ट्वा यमिन्द्रो यज्ञानाम्...
इत्येते शैनेयाः...१४इष्टिं च मित्रावरुणयोः...
इत्येष समासतरुस्ते...१६इह चारोग्यविपुलम्...
इत्येते मया मागधाः...१९८५ई०
इत्येते चेक्ष्वाकवः...२२११ईषद्वसन्तौ तौ वीरौ...
इत्येते बह्वृचाः प्रोक्ताः...२६ईशोऽपि सर्वजगताम्...
इत्येते बार्हद्रथाः...२३१३ईश्वरेणापि महता...
इत्येतेऽष्टत्रिंशदुत्तरम्...२४उ०
इत्येते शैशनाभाः...२४१९उक्तस्तयैवं स मुनिः...
इत्येते शुंगा द्वादशोत्तरम्...२४३७उक्तोऽपि बहुशः किञ्चित्...
इत्येते धरणीगीताः...२४१३७उग्रसेनस्यापि कंसन्यग्रोध०...
इत्येष कथितः सम्यक्...२४१३८उग्रसेनसुते कंसे...
इत्येव संस्तवं श्रुत्वा...५२उग्रसेने यथा कंसः...
इत्येवमतिहार्देन...१८३२उग्रसेनं ततो बन्धात्...
इत्येवं वर्णिते पौरैः...२०५१उग्रसेनोऽपि यद्याज्ञाम्...
इत्येतत्तव मैत्रेय...३८९३उग्रसेनः समध्यास्ते...
इत्येतत्परमं गुह्यम्...५२उग्रसेनस्तु तच्छ्रुत्वा...
इत्येवमनेकदोषोत्तरे...२४९३उग्रायुधात्क्षेम्यः क्षेम्यात्...
इत्येष कथितः सम्यक्...उच्चप्रमाणामिति तामवेक्ष्य...
इत्येष कल्पसंहारः...११उच्चावचानि भूतानि...
इत्येष तव मैत्रेय...५०उच्चैर्मनोरथस्तेऽयम्...
इत्येषा प्रकृतिस्सर्वा...३५उत्कुरः शकुनिश्चैव...
इदमार्षं पुरा प्राह...४३उत्तरं यदगस्त्यस्य...
इदं च शृणु मैत्रेय...उत्तरं यत्समुद्रस्य...
इदं चापि जपेदम्बु...११३२उत्तमोत्तममप्राप्यम्...
इदं च श्रूयतामन्यत्...१७उत्तमः स मम भ्राता...
इन्द्रत्वमकरोद्दैत्यः...१७उत्तमज्ञानसम्पन्ने...
इन्द्रप्रमितिरेकां तु...१९उत्तानपादपुत्रस्तु...
इन्द्राय धर्मराजाय...११४६उत्तानपादस्तस्याधः...
इन्द्रियार्थेषु भूतेषु...६२उत्तानपादतनयम्...
इन्द्रो विश्वावसुः स्रोतः...१०उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहतम्...
इममद्रिमहं धैर्यात्...१११५उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेः...
इमौ सुललितैरङ्गैः...२०६१उत्थाप्य वसुदेवस्तम्...
इमं चोदाहरन्त्यत्र...उत्थाय मुचुकुन्दोऽपि...
[इमं स्तवं यः पठति...१५]उत्पत्तिस्थितिनाशानाम्...
इयाज यज्ञान् सुबहून्...१८९१उत्पत्तिं प्रलयं चैव...
इयाज सोऽपि सुबहून्...१२उत्पत्तिस्थितिनाशानाम्...
इयं च वर्तते सन्ध्या...१५२९उत्पत्तिश्च निरोधश्च...
इयं च मारिषा पूर्वम्...१५६०उत्पन्नबुद्धिश्च...

४७६

श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०श्लोकाःअंशाःअध्या०श्लो०
उत्पन्नश्चापि मे मृत्युः... ५१२उभयोस्त्वविभागेन... १२२४८
उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन्... १उभयोः काष्ठयोर्मध्ये... २४१
उत्पन्नो देवराजाय... ५३०४०उभाभ्यामपि पाणिभ्याम्... ६२९
उत्पाट्य शृङ्गमेकं तु... ५१४१३उभे सन्ध्ये रविं भूप... ३
उत्पाट्य वामदन्तं तु... ५२०३८उर्वशीदर्शनादुद्भूत०... ४१२
उत्फुल्लपंकजदल०... ५३०उर्वशी च तदुपभोगात्... ४४९
उत्ससर्ज ततस्तां तु तमः... १३२उर्वशीसालोक्यम्... ४९२
उत्ससर्ज ततस्तां तु पितॄन्... १३६उर्वी महांश्च जगतः... ६२९
उत्साद्याखिलक्षत्रजातिम्... ४२४६३उवाच च स कोपेन... ११९५१
उत्सृज्य पितरं बालः... १११११उवाह शिबिकां तस्य... २१३५५
उत्सृज्य पूर्वजा याताः... ४२४१३२उवाचैनं राजानम्... ४७५
उत्सृज्य जलसर्वस्वम्... ५१०उवाच च सुरानैतौ... ५६१
उत्सृज्य द्वारकां कृष्णः... ५३७उवाच चाम्ब हे तात... ५२१
उदकावरणं यत्तु... ६३२उवाच चातिताम्राक्षः... ५३५२२
उदग्रककुदाभोग०... ५१४उशनसश्च दुहितरम्... ४१०
उदङ्मुखो दिवा मूत्रम्... ३१११४उशीनरस्यापि शिबिनुंग०... ४१८
उदयास्तमनाभ्यां च... २१८उषा रात्रिः समाख्याता... २४८
उदयास्तमने चैव... २१३उषा बाणसुता विप्र... ५३२११
उदक्यासूतकाशौचि... ३१६१३उष्णाद्विचित्ररथः... ४२११०
उदावसोर्नन्दिवर्द्धनः... ४२५ऊ०
उदितो वर्द्धमानाभिः... २१७ऊचतुर्विप्रतां याते... ५२१२४
उदीच्यां च तथैवानुम्... ४१०३२ऊचुश्चैनमग्निमामानायानुसारी... ४७८
उद्गीयमानो विलसत्... ५३६१२ऊचुश्च कुपितास्सर्वे... ५३५१२
उद्भिदो वेणुमांश्र्चैव... २३६ऊरुगम्भीरबुद्ध्याद्याः... ३४५
उद्वेगं परमं जग्मुः... ११०७ऊरुः पूरुश्शतद्युम्न०... ३२९
उन्नताम्बुतैव पृथिवीहेतुः... ४२४७९ऊर्जायां तु वसिष्ठस्य... ११०१२
उन्मत्तव्रतधृग्विप्रः... १ऊर्जः स्तम्भस्तथा प्राणः... ३११
उन्मत्तशिखिसारंगे... ५४४ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव... ११५९४
उन्मूलानथ तान्वृक्षान्... ११५ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु... २९८
उपयेमे पुनश्चोमाम्... ११४ऊर्मिषट्कातिगं ब्रह्म... ११५३७
उपर्याक्रान्तावाञ्छैलम्... १९०ऊहुरुन्मार्गवाहिनि... ५३८
उपस्थितेऽतियशसः... ११५१२७ऋ०
उपर्यहं यथा राजा... २१६१३ऋक्षपतिनिहतं च... ४१३३९
उपतिष्ठन्ति वै सन्ध्याम्... ३१११०४ऋक्षाद्भीमसेनः... ४२०
उपयोगकाले च ताम्... ४२०ऋक्षोऽभूद्गार्गवस्तस्मात्... ३१८
उपसंहर सर्वात्मन्... ५१३ऋग्यजुस्सामसंज्ञेयम्... ३१७
उपवासस्तथायासः... ६१५ऋग्यजुस्सामभिर्मार्गैः... ६४२
उपायतः समारब्धाः... ११३७८ऋग्यजुःसामनिष्पाद्यम्... २१४२१
उपेत्य मथुरां सोऽथ... ५२२ऋग्वेदपाठकं पैलम्... ३
उभयमपि तन्मनस्कम्... ४३८ऋग्वेदस्त्वं यजुर्वेदः... ५३७
उभयं पुण्यमत्यर्थम्... २१७ऋचीकश्च तस्याश्चरुम्... ४१७

४७७

श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०श्लोकाःअंशा०अध्या०श्लो०
ऋचो यजूंषि सामानि२२८३एकश्चात्र महाभाग७४
ऋचः स्तुवन्ति पूर्वाह्ने१११०एकपादं द्विपादं च५९
ऋतावुपेगमश्शस्तः११११४एकानेकस्वरूपाय
ऋतुपर्णपुत्रस्सर्वकामः३८एकार्णवे तु त्रैलोक्ये२४
ऋतेऽमरगिरेर्मेरोः१९एकान्तिनः सदा ब्रह्म३९
ऋतेषु कक्षेषु स्थण्डिलेषु०१९एकाग्रचेताः सततम्१२३०
ऋतेपोरन्तिनारः१९एकादशश्च भविता२९
ऋत्विक्सवश्रेय०१५एकादशे तु त्रिशिखः१४
ऋभूर्नामाभवत्पुत्रः१५एका लिङ्गे गुदे तिस्रः१११८
ऋभूरस्मि तवाचार्यः१५३४एका वंशकरमेकम्
ऋभुवर्षसहस्रे तु१६एकावयवसूक्ष्मांशः६४
ऋषयस्ते ततः प्रोचुः३१एकार्णवे ततस्तस्मिन्
ऋषभाद्भरतो जज्ञे२८एकांशेन स्थितो विष्णुः२२२६
ऋषिकुल्याकुमाराद्याः१४एकेनांशेन ब्रह्मासौ२२२४
ऋषिणा यस्तदा गर्भः१५४८एकैकमेव ताः कन्याः३११९
ऋषिभ्यस्तु सहस्राणाम्१०एकैकमस्रं शस्त्रं च३०५८
ऋषियोंऽद्य महामेरोःएकैकं सप्तधा चक्रे२१४०
ऋषीणां नामधेयानि६५एकोऽग्निरादावभवत्९४
ए०एकोद्दिष्टमयो धर्मः१३२६
एकमस्य व्यतीतं तु२७एकोद्दिष्टविधानेन१३२७
एकविंशमथर्वाणम्५६एकोऽर्घ्यस्तत्र दातव्यः१३२४
एकस्मिन् यत्र निधनम्१३७४एको वेदश्चतुर्धा तु२०
एकदा तु त्वरायुक्तः१५२४एको व्यापी समः शुद्धः१४२९
एकदा तु स धर्मात्मा१७११एकं तवैतद्भूतात्मन्१७१५
एकदा तु मया पृष्टम्१२एकं वर्षसहस्रम्१०१०
एकदा तु समं स्नातौ१८५७एकं त्वमग्र्यं परमं पदं यत्४६
एकदा तु दुहितुस्नेह०१०१एकं भद्रासनादीनाम्३९
एकदा तु किञ्चित्५९एकः समस्तं यदिहास्ति१६२३
एकदा त्वम्भोनिधितीरसंश्रयः१३१२एतत्ते कथितं ब्रह्मन्१४८
एकदा तु विना रामम्एतद्राजासनम्११
एकदा रैवतोद्याने३६११एतन्मे क्रियतां सम्यक्११४२
एकदा वर्तमानस्य१३एतज्जजाप भगवान्११५६
एकचक्रो महाबाहुः२१एतद्ब्रह्मपराख्यं वै१५५९
एकप्रमाणमेवैषः४३एतत्सर्वं महाभाग१६११
एकस्वरूपभेदश्च१४३३एतन्निशम्य दैत्येन्द्रः१७१६
एक आसीद्यजुर्वेदः११एतच्चान्यच्च सकलम्१९३२
एकरात्रस्थितिर्गृहे२८एतद्विजानता सर्वम्१९४८
एकवस्त्रधरोऽथार्द्र०११७९एतच्छ्रुत्वा तु कोपेन१९५०
एकश्चतुर्द्धा भगवान्हुताशः४४एतदण्डकटाहेन२२
एकस्मिन्नेव गोविन्दः३११७एतद्विवेकविज्ञानम्१४
एकश्शुद्धोऽक्षरो नित्यः३६एतस्मिन्परमार्थज्ञः१४