विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 466, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 466
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५५
| एवमत्यन्तवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षणः ।<br>यस्य योगस्स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ॥ ३२ | जिसका योग इस प्रकारके विशिष्ट धर्मसे युक्त होता है वह मुमुक्षु योगी कहा जाता है ॥ ३२ ॥ जब मुमुक्षु पहले-पहले योगाभ्यास आरम्भ करता है तो उसे 'योगयुक्त योगी' कहते हैं और जब उसे परब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है तो वह 'विनिष्पन्नसमाधि' कहलाता है ॥ ३३ ॥ यदि किसी विघ्नवश उस योगयुक्त योगीका चित्त दूषित हो जाता है तो जन्मान्तरमें भी उसी अभ्यासको करते रहनेसे वह मुक्त हो जाता है ॥ ३४ ॥ विनिष्पन्नसमाधि योगी तो योगाग्निसे कर्मसमूहके भस्म हो जानेके कारण उसी जन्ममें थोड़े ही समयमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥ योगीको चाहिये कि अपने चित्तको ब्रह्मचिन्तनके योग्य बनाता हुआ ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रहका निष्कामभावसे सेवन करे ॥ ३६ ॥ तथा संयत चित्तसे स्वाध्याय, शौच, सन्तोष और तपका आचरण करे तथा मनको निरन्तर परब्रह्ममें लगाता रहे ॥ ३७ ॥ ये पाँच-पाँच यम और नियम बतलाये गये हैं। इनका सकाम आचरण करनेसे पृथक्-पृथक् फल मिलते हैं और निष्कामभावसे सेवन करनेसे मोक्ष प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ |
| योगयुक् प्रथमं योगी युञ्जानो ह्यभिधीयते ।<br>विनिष्पन्नसमाधिस्तु परं ब्रह्मोपलब्धिमान् ॥ ३३ | |
| यद्यन्तरायदोषेण दूष्यते चास्य मानसम् ।<br>जन्मान्तरैरभ्यसतो मुक्तिः पूर्वस्य जायते ॥ ३४ | |
| विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिं तत्रैव जन्मनि ।<br>प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥ ३५ | |
| ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् ।<br>सेवेत योगी निष्कामो योग्यतां स्वमनो नयन् ॥ ३६ | |
| स्वाध्यायशौचसन्तोषतपांसि नियतात्मवान् ।<br>कुर्वीत ब्रह्मणि तथा परस्मिन्प्रवणं मनः ॥ ३७ | |
| एते यमास्सनियमाः पञ्च पञ्च च कीर्तिताः ।<br>विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामानां विमुक्तिदाः ॥ ३८ | |
| एकं भद्रासनादीनां समास्थाय गुणैर्युतः ।<br>यमाख्यैर्नियमाख्यैश्च युञ्जीत नियतो यतिः ॥ ३९ | यतिको चाहिये कि भद्रासनादि आसनोंमेंसे किसी एकका अवलम्बन कर यम-नियमादि गुणोंसे युक्त हो योगाभ्यास करे ॥ ३९ ॥ अभ्यासके द्वारा जो प्राणवायुको वशमें किया जाता है उसे 'प्राणायाम' समझना चाहिये। वह सबीज (ध्यान तथा मन्त्रपाठ आदि आलम्बनयुक्त) और निर्बीज (निरालम्ब) भेदसे दो प्रकारका है ॥ ४० ॥ सद्गुरुके उपदेशसे जब योगी प्राण और अपानवायुद्वारा एक-दूसरेका निरोध करता है तो [क्रमशः रेचक और पूरक नामक] दो प्राणायाम होते हैं और इन दोनोंका एक ही समय संयम करनेसे [कुम्भक नामक] तीसरा प्राणायाम होता है ॥ ४१ ॥ हे द्विजोत्तम ! जब योगी सबीज प्राणायामका अभ्यास आरम्भ करता है तो उसका आलम्बन भगवान् अनन्तका हिरण्यगर्भ आदि स्थूलरूप होता है ॥ ४२ ॥ तदनन्तर वह प्रत्याहारका अभ्यास करते हुए शब्दादि विषयोंमें अनुरक्त हुई अपनी इन्द्रियोंको रोककर अपने चित्तकी अनुगामिनी बनाता है ॥ ४३ ॥ ऐसा करनेसे अत्यन्त चंचल इन्द्रियाँ उसके वशीभूत हो जाती हैं। इन्द्रियोंको वशमें किये बिना कोई योगी योग-साधन नहीं कर सकता ॥ ४४ ॥ इस प्रकार प्राणायामसे वायु और प्रत्याहारसे इन्द्रियोंको वशीभूत करके चित्तको उसके शुभ आश्रयमें स्थित करे ॥ ४५ ॥ |
| प्राणाख्यमनिलं वश्यमभ्यासात्कुरुते तु यत् ।<br>प्राणायामस्स विज्ञेयस्सबीजोऽबीज एव च ॥ ४० | |
| परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यथानिलौ ।<br>कुरुतस्सद्विधानेन तृतीयस्संयमात्तयोः ॥ ४१ | |
| तस्य चालम्बनवतः स्थूलरूपं द्विजोत्तम ।<br>आलम्बनमनन्तस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ॥ ४२ | |
| शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् ।<br>कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥ ४३ | |
| वश्यता परमा तेन जायतेऽतिचलात्मनाम् ।<br>इन्द्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः ॥ ४४ | |
| प्राणायामेन पवने प्रत्याहारेण चेन्द्रिये ।<br>वशीकृते ततः कुर्यात्स्थितं चेतश्शुभाश्रये ॥ ४५ |