विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५५
| एवमत्यन्तवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षणः ।<br>यस्य योगस्स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ॥ ३२ | जिसका योग इस प्रकारके विशिष्ट धर्मसे युक्त होता है वह मुमुक्षु योगी कहा जाता है ॥ ३२ ॥ जब मुमुक्षु पहले-पहले योगाभ्यास आरम्भ करता है तो उसे 'योगयुक्त योगी' कहते हैं और जब उसे परब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है तो वह 'विनिष्पन्नसमाधि' कहलाता है ॥ ३३ ॥ यदि किसी विघ्नवश उस योगयुक्त योगीका चित्त दूषित हो जाता है तो जन्मान्तरमें भी उसी अभ्यासको करते रहनेसे वह मुक्त हो जाता है ॥ ३४ ॥ विनिष्पन्नसमाधि योगी तो योगाग्निसे कर्मसमूहके भस्म हो जानेके कारण उसी जन्ममें थोड़े ही समयमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥ योगीको चाहिये कि अपने चित्तको ब्रह्मचिन्तनके योग्य बनाता हुआ ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रहका निष्कामभावसे सेवन करे ॥ ३६ ॥ तथा संयत चित्तसे स्वाध्याय, शौच, सन्तोष और तपका आचरण करे तथा मनको निरन्तर परब्रह्ममें लगाता रहे ॥ ३७ ॥ ये पाँच-पाँच यम और नियम बतलाये गये हैं। इनका सकाम आचरण करनेसे पृथक्-पृथक् फल मिलते हैं और निष्कामभावसे सेवन करनेसे मोक्ष प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ |
| योगयुक् प्रथमं योगी युञ्जानो ह्यभिधीयते ।<br>विनिष्पन्नसमाधिस्तु परं ब्रह्मोपलब्धिमान् ॥ ३३ | |
| यद्यन्तरायदोषेण दूष्यते चास्य मानसम् ।<br>जन्मान्तरैरभ्यसतो मुक्तिः पूर्वस्य जायते ॥ ३४ | |
| विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिं तत्रैव जन्मनि ।<br>प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥ ३५ | |
| ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् ।<br>सेवेत योगी निष्कामो योग्यतां स्वमनो नयन् ॥ ३६ | |
| स्वाध्यायशौचसन्तोषतपांसि नियतात्मवान् ।<br>कुर्वीत ब्रह्मणि तथा परस्मिन्प्रवणं मनः ॥ ३७ | |
| एते यमास्सनियमाः पञ्च पञ्च च कीर्तिताः ।<br>विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामानां विमुक्तिदाः ॥ ३८ | |
| एकं भद्रासनादीनां समास्थाय गुणैर्युतः ।<br>यमाख्यैर्नियमाख्यैश्च युञ्जीत नियतो यतिः ॥ ३९ | यतिको चाहिये कि भद्रासनादि आसनोंमेंसे किसी एकका अवलम्बन कर यम-नियमादि गुणोंसे युक्त हो योगाभ्यास करे ॥ ३९ ॥ अभ्यासके द्वारा जो प्राणवायुको वशमें किया जाता है उसे 'प्राणायाम' समझना चाहिये। वह सबीज (ध्यान तथा मन्त्रपाठ आदि आलम्बनयुक्त) और निर्बीज (निरालम्ब) भेदसे दो प्रकारका है ॥ ४० ॥ सद्गुरुके उपदेशसे जब योगी प्राण और अपानवायुद्वारा एक-दूसरेका निरोध करता है तो [क्रमशः रेचक और पूरक नामक] दो प्राणायाम होते हैं और इन दोनोंका एक ही समय संयम करनेसे [कुम्भक नामक] तीसरा प्राणायाम होता है ॥ ४१ ॥ हे द्विजोत्तम ! जब योगी सबीज प्राणायामका अभ्यास आरम्भ करता है तो उसका आलम्बन भगवान् अनन्तका हिरण्यगर्भ आदि स्थूलरूप होता है ॥ ४२ ॥ तदनन्तर वह प्रत्याहारका अभ्यास करते हुए शब्दादि विषयोंमें अनुरक्त हुई अपनी इन्द्रियोंको रोककर अपने चित्तकी अनुगामिनी बनाता है ॥ ४३ ॥ ऐसा करनेसे अत्यन्त चंचल इन्द्रियाँ उसके वशीभूत हो जाती हैं। इन्द्रियोंको वशमें किये बिना कोई योगी योग-साधन नहीं कर सकता ॥ ४४ ॥ इस प्रकार प्राणायामसे वायु और प्रत्याहारसे इन्द्रियोंको वशीभूत करके चित्तको उसके शुभ आश्रयमें स्थित करे ॥ ४५ ॥ |
| प्राणाख्यमनिलं वश्यमभ्यासात्कुरुते तु यत् ।<br>प्राणायामस्स विज्ञेयस्सबीजोऽबीज एव च ॥ ४० | |
| परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यथानिलौ ।<br>कुरुतस्सद्विधानेन तृतीयस्संयमात्तयोः ॥ ४१ | |
| तस्य चालम्बनवतः स्थूलरूपं द्विजोत्तम ।<br>आलम्बनमनन्तस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ॥ ४२ | |
| शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् ।<br>कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥ ४३ | |
| वश्यता परमा तेन जायतेऽतिचलात्मनाम् ।<br>इन्द्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः ॥ ४४ | |
| प्राणायामेन पवने प्रत्याहारेण चेन्द्रिये ।<br>वशीकृते ततः कुर्यात्स्थितं चेतश्शुभाश्रये ॥ ४५ |
४५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
खाण्डिक्य उवाच
कथ्यतां मे महाभाग चेतसो यच्छुभाश्रयः।
यदाधारमशेषं तद्धन्ति दोषमलोद्भवम्॥ ४६
खाण्डिक्य बोले— हे महाभाग! यह बतलाइये कि जिसका आश्रय करनेसे चित्तके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं वह चित्तका शुभाश्रय क्या है?॥ ४६॥
केशिध्वज उवाच
आश्रयश्चेतसो ब्रह्म द्विधा तच्च स्वभावतः।
भूप मूर्त्तममूर्त्तं च परं चापरमेव च॥ ४७
त्रिविधा भावना भूप विश्वमेतन्निबोधताम्।
ब्रह्माख्या कर्मसंज्ञा च तथा चैवोभयात्मिका॥ ४८
कर्मभावात्मिका ह्येका ब्रह्मभावात्मिका परा।
उभयात्मिका तथैवान्या त्रिविधा भावभावना॥ ४९
सनन्दनादयो ये तु ब्रह्मभावनया युताः।
कर्मभावनया चान्ये देवाद्याः स्थावराश्चराः॥ ५०
हिरण्यगर्भादिषु च ब्रह्मकर्मात्मिका द्विधा।
बोधाधिकारयुक्तेषु विद्यते भावभावना॥ ५१
केशिध्वज बोले— हे राजन्! चित्तका आश्रय ब्रह्म है जो कि मूर्त और अमूर्त अथवा अपर और पर-रूपसे स्वभावसे ही दो प्रकारका है॥ ४७॥ हे भूप! इस जगत्में ब्रह्म, कर्म और उभयात्मक नामसे तीन प्रकारकी भावनाएँ हैं॥ ४८॥ इनमें पहली कर्मभावना, दूसरी ब्रह्मभावना और तीसरी उभयात्मिकाभावना कहलाती है। इस प्रकार ये त्रिविध भावनाएँ हैं॥ ४९॥ सनन्दनादि मुनिजन ब्रह्मभावनासे युक्त हैं और देवताओंसे लेकर स्थावर-जंगमपर्यन्त समस्त प्राणी कर्मभावनायुक्त हैं॥ ५०॥ तथा [स्वरूपविषयक] बोध और [स्वर्गादिविषयक] अधिकारसे युक्त हिरण्यगर्भादिमें ब्रह्मकर्ममयी उभयात्मिकाभावना है॥ ५१॥
अक्षीणेषु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु।
विश्वमेतत्परं चान्यद्भेद्भिन्नदृशां नृणाम्॥ ५२
हे राजन् ! जबतक विशेष ज्ञानके हेतु कर्म क्षीण नहीं होते तभीतक अहङ्कारादि भेदके कारण भिन्न दृष्टि रखनेवाले मनुष्योंको ब्रह्म और जगत्की भिन्नता प्रतीत होती है॥ ५२॥
प्रत्यस्तमितभेदं यत्सत्तामात्रमगोचरम्।
वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ५३
जिसमें सम्पूर्ण भेद शान्त हो जाते हैं, जो सत्तामात्र और वाणीका अविषय है तथा स्वयं ही अनुभव करनेयोग्य है, वही ब्रह्मज्ञान कहलाता है॥ ५३॥
तच्च विष्णोः परं रूपमरूपाख्यमनुत्तमम्।
विश्वस्वरूपवैरूप्यलक्षणं परमात्मनः॥ ५४
वही परमात्मा विष्णुका अरूप नामक परम रूप है, जो उनके विश्वरूपसे विलक्षण है॥ ५४॥
न तद्योगयुजा शक्यं नृप चिन्तयितुं यतः।
ततः स्थूलं हरे रूपं चिन्तयेद्विश्वगोचरम्॥ ५५
हे राजन्! योगाभ्यासी जन पहले-पहल उस रूपका चिन्तन नहीं कर सकते, इसलिये उन्हें श्रीहरिके विश्वमय स्थूल रूपका ही चिन्तन करना चाहिये॥ ५५॥
हिरण्यगर्भो भगवान्वासुदेवः प्रजापतिः।
मरुतो वसवो रुद्रा भास्करास्तारका ग्रहाः॥ ५६
गन्धर्वयक्षदैत्याद्यास्सकला देवयोनयः।
मनुष्याः पशवश्शैलास्समुद्रास्सरितो द्रुमाः॥ ५७
भूप भूतान्यशेषाणि भूतानां ये च हेतवः।
प्रधानादिविशेषान्तं चेतनाचेतनात्मकम्॥ ५८
एकपादं द्विपादं च बहुपादमपादकम्।
मूर्त्तमेतद्धरे रूपं भावनात्रितयात्मकम्॥ ५९
हिरण्यगर्भ, भगवान् वासुदेव, प्रजापति, मरुत्, वसु, रुद्र, सूर्य, तारे, ग्रहगण, गन्धर्व, यक्ष और दैत्य आदि समस्त देवयोनियाँ तथा मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदी, वृक्ष, सम्पूर्ण भूत एवं प्रधानसे लेकर विशेष (पंचतन्मात्रा) पर्यन्त उनके कारण तथा चेतन, अचेतन, एक, दो अथवा अनेक चरणोंवाले प्राणी और बिना चरणोंवाले जीव—ये सब भगवान् हरिके भावनात्रयात्मक मूर्तरूप हैं॥ ५६—५९॥
एतत्सर्वमिदं विश्वं जगदेतच्चराचरम्।
परब्रह्मस्वरूपस्य विष्णोश्शक्तिसमन्वितम्॥ ६०
यह सम्पूर्ण चराचर जगत्, परब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका, उनकी शक्तिसे सम्पन्न 'विश्व' नामक रूप है॥ ६०॥
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५७
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा ।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ ६१
यया क्षेत्रज्ञशक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा ।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यतिसन्ततान् ॥ ६२
तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता ।
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन लक्ष्यते ॥ ६३
अप्राणवत्सु स्वल्पा सा स्थावरेषु ततोऽधिका ।
सरीसृपेषु तेभ्योऽपि ह्यतिशक्त्या पतत्त्रिषु ॥ ६४
पतत्त्रिभ्यो मृगास्तेभ्यस्तच्छक्त्या पशवोऽधिकाः ।
पशुभ्यो मनुजाश्चातिशक्त्या पुंसः प्रभाविताः ॥ ६५
तेभ्योऽपि नागगन्धर्वयक्षाद्या देवता नृप ॥ ६६
शक्रस्समस्तदेवेभ्यस्ततश्चाति प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भोऽपि ततः पुंसः शक्त्युपलक्षितः ॥ ६७
एतान्यशेषरूपाणि तस्य रूपाणि पार्थिव ।
यतस्तच्छक्तियोगेन युक्तानि नभसा यथा ॥ ६८
द्वितीयं विष्णुसंज्ञस्य योगिध्येयं महामते ।
अमूर्त्तं ब्रह्मणो रूपं यत्सदिदित्युच्यते बुधैः ॥ ६९
समस्ताः शक्तयश्चैता नृप यत्र प्रतिष्ठिताः ।
तद्विश्वरूपवैरूप्यं रूपमन्यद्धरेर्महत् ॥ ७०
समस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वर ।
देवतैर्यङ्मनुष्यादिचेष्टावन्ति स्वलीलया ॥ ७१
जगतामुपकाराय न सा कर्मनिमित्तजा ।
चेष्टा तस्याप्रमेयस्य व्यापिन्यव्याहतात्मिका ॥ ७२
तद्रूपं विश्वरूपस्य तस्य योगयुजा नृप ।
चिन्त्यमात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकिल्बिषनाशनम् ॥ ७३
यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः ।
तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्बिषम् ॥ ७४
तस्मात्समस्तशक्तीनामाधारे तत्र चेतसः ।
कुर्वीत संस्थितिं सा तु विज्ञेया शुद्धधारणा ॥ ७५
शुभाश्रयः स चित्तस्य सर्वगस्याचलात्मनः ।
त्रिभावभावनातीतो मुक्तये योगिनो नृप ॥ ७६
विष्णुशक्ति परा है, क्षेत्रज्ञ नामक शक्ति अपरा है और कर्म नामकी तीसरी शक्ति अविद्या कहलाती है ॥ ६१ ॥ हे राजन्! इस अविद्या-शक्तिसे आवृत होकर वह सर्वगामिनी क्षेत्रज्ञ-शक्ति सब प्रकारके अति विस्तृत सांसारिक कष्ट भोगा करती है ॥ ६२ ॥ हे भूपाल! अविद्या-शक्तिसे तिरोहित रहनेके कारण ही क्षेत्रज्ञ-शक्ति सम्पूर्ण प्राणियोंमें तारतम्यसे दिखलायी देती है ॥ ६३ ॥ वह सबसे कम जड पदार्थोंमें है, उनसे अधिक वृक्ष-पर्वतादि स्थावरोंमें, स्थावरोंसे अधिक सरीसृपादिमें और उनसे अधिक पक्षियोंमें है ॥ ६४ ॥ पक्षियोंसे मृगोंमें और मृगोंसे पशुओंमें वह शक्ति अधिक है तथा पशुओंकी अपेक्षा मनुष्य भगवान्की उस (क्षेत्रज्ञ) शक्तिसे अधिक प्रभावित हैं ॥ ६५ ॥ मनुष्योंसे नाग, गन्धर्व और यक्ष आदि समस्त देवगणोंमें, देवताओंसे इन्द्रमें, इन्द्रसे प्रजापतिमें और प्रजापतिसे हिरण्यगर्भमें उस शक्तिका विशेष प्रकाश है ॥ ६६-६७ ॥ हे राजन्! ये सम्पूर्ण रूप उस परमेश्वरके ही शरीर हैं, क्योंकि ये सब आकाशके समान उनकी शक्तिसे व्याप्त हैं ॥ ६८ ॥
हे महामते! विष्णु नामक ब्रह्मका दूसरा अमूर्त (आकारहीन) रूप है, जिसका योगिजन ध्यान करते हैं और जिसे बुधजन 'सत्' कहकर पुकारते हैं ॥ ६९ ॥ हे नृप! जिसमें कि ये सम्पूर्ण शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं वही भगवान्का विश्वरूपसे विलक्षण द्वितीय रूप है ॥ ७० ॥ हे नरेश! भगवान्का वही रूप अपनी लीलासे देव, तिर्यक् और मनुष्यादिकी चेष्टाओंसे युक्त सर्वशक्तिमय रूप धारण करता है ॥ ७१ ॥ इन रूपोंमें अप्रमेय भगवान्की जो व्यापक एवं अव्याहत चेष्टा होती है वह संसारके उपकारके लिये ही होती है, कर्मजन्य नहीं होती ॥ ७२ ॥ हे राजन्! योगाभ्यासीको आत्म-शुद्धिके लिये भगवान् विश्वरूपके उस सर्वपापनाशक रूपका ही चिन्तन करना चाहिये ॥ ७३ ॥ जिस प्रकार वायुसहित अग्नि ऊँची ज्वालाओंसे युक्त होकर शुष्क तृणसमूहको जला डालता है उसी प्रकार चित्तमें स्थित हुए भगवान् विष्णु योगियोंके समस्त पाप नष्ट कर देते हैं ॥ ७४ ॥ इसलिये सम्पूर्ण शक्तियोंके आधार भगवान् विष्णुमें चित्तको स्थिर करे, यही शुद्ध धारणा है ॥ ७५ ॥
हे राजन्! तीनों भावनाओंसे अतीत भगवान् विष्णु ही योगिजनोंकी मुक्तिके लिये उनके [स्वतः] चंचल तथा [किसी अनूठे विषयमें] स्थिर रहनेवाले चित्तके शुभ आश्रय हैं ॥ ७६ ॥
४५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| Sanskrit Verse | Hindi Translation |
|---|---|
| अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः।<br>अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः॥ ७७ | हे पुरुषसिंह! इसके अतिरिक्त मनके आश्रयभूत जो अन्य देवता आदि कर्मयोनियाँ हैं, वे सब अशुद्ध हैं॥ ७७॥ |
| मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिःस्पृहम्।<br>एषा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्तं तत्र धार्यते॥ ७८ | भगवान्का यह मूर्त्तरूप चित्तको अन्य आलम्बनोंसे निःस्पृह कर देता है। इस प्रकार चित्तका भगवान्में स्थिर करना ही धारणा कहलाती है॥ ७८॥ |
| यच्च मूर्त्तं हरे रूपं यादृक्चिन्त्यं नराधिप।<br>तच्छ्रूयतामनाधारा धारणा नोपपद्यते॥ ७९ | हे नरेन्द्र! धारणा बिना किसी आधारके नहीं हो सकती; इसलिये भगवान्के जिस मूर्त्तरूपका जिस प्रकार ध्यान करना चाहिये, वह सुनो॥ ७९॥ |
| प्रसन्नवदनं चारुपद्मपत्रोपमेक्षणम्।<br>सुकपोलं सुविस्तीर्णललाटफलकोज्ज्वलम्॥ ८० | जो प्रसन्नवदन और कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाले हैं, सुन्दर कपोल और विशाल भालसे अत्यन्त सुशोभित हैं तथा अपने सुन्दर कानोंमें मनोहर कुण्डल पहने हुए हैं, जिनकी ग्रीवा शंखके समान और विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो तरंगाकार त्रिवली तथा नीची नाभिवाले उदरसे सुशोभित हैं, जिनके लम्बी-लम्बी आठ अथवा चार भुजाएँ हैं तथा जिनके जंघा एवं ऊरु समानभावसे स्थित हैं और मनोहर चरणारविन्द सुघरतासे विराजमान हैं उन निर्मल पीताम्बरधारी ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका चिन्तन करे॥ ८०-८३॥ |
| समकर्णान्तविन्यस्तचारुकुण्डलभूषणम्।<br>कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ८१ | |
| वलित्रिभङ्गिना मग्ननाभिना ह्युदरेण च।<br>प्रलम्बाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम्॥ ८२ | |
| समस्थितोरुजङ्घं च सुस्थिताङ्घ्रिवराम्बुजम्।<br>चिन्तयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम्॥ ८३ | |
| किरीटहारकेयूरकटकादिविभूषितम् ॥ ८४ | हे राजन्! किरीट, हार, केयूर और कटक आदि आभूषणोंसे विभूषित, शार्ङ्गधनुष, शंख, गदा, खड्ग, चक्र तथा अक्षमालासे युक्त वरद और अभययुक्त हाथोंवाले* [तथा अँगुलियोंमें धारण की हुई] रत्नमयी मुद्रिकासे शोभायमान भगवान्के दिव्य रूपका योगीको अपना चित्त एकाग्र करके तन्मयभावसे तबतक चिन्तन करना चाहिये जबतक यह धारणा दृढ़ न हो जाय॥ ८४-८६॥ |
| शार्ङ्गशङ्खगदाखड्गचक्राक्षवलयान्वितम्।<br>वरदाभयहस्तं च मुद्रिकारत्नभूषितम्॥ ८५ | |
| चिन्तयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम्।<br>तावद्यावद्दृढीभूता तत्रैव नृप धारणा॥ ८६ | |
| व्रजतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।<br>नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा॥ ८७ | जब चलते-फिरते, उठते-बैठते अथवा स्वेच्छानुकूल कोई और कर्म करते हुए भी ध्येय मूर्ति अपने चित्तसे दूर न हो तो इसे सिद्ध हुई माननी चाहिये॥ ८७॥ |
| ततः शङ्खगदाचक्रशार्ङ्गादिरहितं बुधः।<br>चिन्तयेद्भगवद्रूपं प्रशान्तं साक्षसूत्रकम्॥ ८८ | इसके दृढ़ होनेपर बुद्धिमान् व्यक्ति शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग आदिसे रहित भगवान्के स्फटिकाक्षमाला और यज्ञोपवीतधारी शान्त स्वरूपका चिन्तन करे॥ ८८॥ |
| सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः।<br>किरीटकेयूरमुख्यैर्भूषणै रहितं स्मरेत्॥ ८९ | जब यह धारणा भी पूर्ववत् स्थिर हो जाय तो भगवान्के किरीट, केयूरादि आभूषणोंसे रहित रूपका स्मरण करे॥ ८९॥ |
| तदेकावयवं देवं चेतसा हि पुनर्बुधः।<br>कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत्॥ ९० | तदनन्तर विज्ञ पुरुष अपने चित्तमें एक (प्रधान) अवयव-विशिष्ट भगवान्का हृदयसे चिन्तन करे और फिर सम्पूर्ण अवयवोंको छोड़कर केवल अवयवीका ध्यान करे॥ ९०॥ |
* चतुर्भुज-मूर्तिके ध्यानमें चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्मकी भावना करे तथा अष्टभुजरूपका ध्यान करते समय छः हाथोंमें तो शार्ङ्ग आदि छः आयुधोंकी भावना करे तथा शेष दोमें पद्म और बाण अथवा वरद और अभय-मुद्राका चिन्तन करे।
अ० ७ ] * षष्ठ अंश * ४५९
तद्रूपप्रत्यया चैका सन्ततिश्चान्यनिःस्पृहा। तद्ध्यानं प्रथमैरङ्गैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप॥ ९१
तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत्। मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते॥ ९२
विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव। प्रापणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेषभावनः॥ ९३
क्षेत्रज्ञः करणी ज्ञानं करणं तस्य तेन तत्। निष्पाद्य मुक्तिकार्यं वै कृतकृत्यो निवर्तते॥ ९४
तद्भावभावमापन्नस्ततोऽसौ परमात्मना। भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत्॥ ९५
विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति॥ ९६
इत्युक्तस्ते मया योगः खाण्डिक्य परिपृच्छतः। संक्षेपविस्तराभ्यां तु किमन्यत्क्रियतां तव॥ ९७
खाण्डिक्य उवाच
कथिते योगसद्भावे सर्वमेव कृतं मम। तवोपदेशेनाशेषो नष्टश्चित्तमलो यतः॥ ९८
ममेति यन्मया चोक्तमसदेतन्न चान्यथा। नरेन्द्र गदितुं शक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः॥ ९९
अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्तथानयोः। परमार्थस्त्वसंलापो गोचरे वचसां न यः॥ १००
तद्गच्छ श्रेयसे सर्वं ममैतद्भवता कृतम्। यद्विमुक्तिप्रदो योगः प्रोक्तः केशिध्वजाव्ययः॥ १०१
श्रीपराशर उवाच
यथार्हं पूजया तेन खाण्डिक्येन स पूजितः। आजगाम पुरं ब्रह्मंस्ततः केशिध्वजो नृपः॥ १०२
खाण्डिक्योऽपि सुतं कृत्वा राजानं योगसिद्धये। वनं जगाम गोविन्दे विनिवेशितमानसः॥ १०३
तत्रैकान्तमतिर्भूत्वा यमादिगुणसंयुतः। विष्ण्वाख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिर्लयम्॥ १०४
हे राजन्! जिसमें परमेश्वरके रूपकी ही प्रतीति होती है, ऐसी जो विषयान्तरकी स्पृहासे रहित एक अनवरत धारा है उसे ही ध्यान कहते हैं; यह अपनेसे पूर्व यम-नियमादि छः अंगोंसे निष्पन्न होता है॥ ९१॥ उस ध्येय पदार्थका ही जो मनके द्वारा ध्यानसे सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन (ध्याता, ध्येय और ध्यानके भेदसे रहित) स्वरूप ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं॥ ९२॥ हे राजन्! [समाधिसे होनेवाला भगवत्साक्षात्काररूप] विज्ञान ही प्राप्तव्य परब्रह्मतक पहुँचानेवाला है तथा सम्पूर्ण भावनाओंसे रहित एकमात्र आत्मा ही प्रापणीय (वहाँतक पहुँचनेवाला) है॥ ९३॥ मुक्ति-लाभमें क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान करण है; [ज्ञानरूपी करणके द्वारा क्षेत्रज्ञके] मुक्तिरूपी कार्यको सिद्ध करके वह विज्ञान कृतकृत्य होकर निवृत्त हो जाता है॥ ९४॥ उस समय यह भगवद्भावसे भरकर परमात्मासे अभिन्न हो जाता है। इसका भेद-ज्ञान तो अज्ञानजन्य ही है॥ ९५॥ भेद उत्पन्न करनेवाले अज्ञानके सर्वथा नष्ट हो जानेपर ब्रह्म और आत्मामें असत् (अविद्यमान) भेद कौन कर सकता है?॥ ९६॥ हे खाण्डिक्य! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने संक्षेप और विस्तारसे योगका वर्णन किया; अब मैं तुम्हारा और क्या कार्य करूँ?॥ ९७॥
खाण्डिक्य बोले— आपने इस महायोगका वर्णन करके मेरा सभी कार्य कर दिया, क्योंकि आपके उपदेशसे मेरे चित्तका सम्पूर्ण मल नष्ट हो गया है॥ ९८॥ हे राजन्! मैंने जो 'मेरा' कहा यह भी असत्य ही है, अन्यथा ज्ञेय वस्तुको जाननेवाले तो यह भी नहीं कह सकते॥ ९९॥ 'मैं' और 'मेरा' ऐसी बुद्धि और इनका व्यवहार भी अविद्या ही है, परमार्थ तो कहने-सुननेकी बात नहीं है क्योंकि वह वाणीका अविषय है॥ १००॥ हे केशिध्वज! आपने इस मुक्तिप्रद योगका वर्णन करके मेरे कल्याणके लिये सब कुछ कर दिया, अब आप सुखपूर्वक पधारिये॥ १०१॥
श्रीपराशरजी बोले— हे ब्रह्मन्! तदनन्तर खाण्डिक्यसे यथोचित पूजित हो राजा केशिध्वज अपने नगरमें चले आये॥ १०२॥ तथा खाण्डिक्य भी अपने पुत्रको राज्य दे* श्रीगोविन्दमें चित्त लगाकर योग सिद्ध करनेके लिये [निर्जन] वनको चले गये॥ १०३॥ वहाँ यमादि गुणोंसे युक्त होकर एकाग्रचित्तसे ध्यान करते हुए राजा खाण्डिक्य विष्णु नामक निर्मल ब्रह्ममें लीन हो गये॥ १०४॥
* यद्यपि खाण्डिक्य उस समय राजा नहीं था; तथापि वनमें जो उसके दुर्ग, मन्त्री और भृत्य आदि थे उन्हींका स्वामी अपने पुत्रको बनाया।
४६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८
केशिध्वजो विमुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः। बुभुजे विषयान्कर्म चक्रे चानभिसंहितम्॥ १०५
किन्तु केशिध्वज विदेहमुक्तिके लिये अपने कर्मोंको क्षय करते हुए समस्त विषय भोगते रहे। उन्होंने फलकी इच्छा न करके अनेकों शुभ-कर्म किये॥ १०५॥
सकल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्तथा। अवाप सिद्धिमत्यन्तां तापक्षयफलां द्विज॥ १०६
हे द्विज! इस प्रकार अनेकों कल्याणप्रद भोगोंको भोगते हुए उन्होंने पाप और मल (प्रारब्ध-कर्म) का क्षय हो जानेपर तापत्रयको दूर करनेवाली आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त कर ली॥ १०६॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार
श्रीपराशर उवाच
इत्येष कथितः सम्यक्तृतीयः प्रतिसञ्चरः।
आत्यन्तिको विमुक्तिर्या लयो ब्रह्मणि शाश्वते॥ १
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव भवतो गदितं मया॥ २
पुराणं वैष्णवं चैतत्सर्वकिल्बिषनाशनम्।
विशिष्टं सर्वशास्त्रेभ्यः पुरुषार्थोपपादकम्॥ ३
तुभ्यं यथावन्मैत्रेय प्रोक्तं शुश्रूषवेऽव्ययम्।
यदन्यदपि वक्तव्यं तत्पृच्छाद्य वदामि ते॥ ४
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे तीसरे आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन किया, जो सनातन ब्रह्ममें लयरूप मोक्ष ही है॥ १॥ मैंने तुमसे संसारकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशोंके चरित्रोंका वर्णन किया॥ २॥ हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें सुननेके लिये उत्सुक देखकर यह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ सर्वपापनाशक और पुरुषार्थका प्रतिपादक वैष्णवपुराण सुना दिया। अब तुम्हें जो और कुछ पूछना हो पूछो। मैं उसका तुमसे वर्णन करूँगा॥ ३-४॥
श्रीमैत्रेय उवाच
भगवन्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया मुने।
श्रुतं चैतन्मया भक्त्या नान्यत्प्रष्टव्यमस्ति मे॥ ५
विच्छिन्नाःसर्वसन्देहा वैमल्यं मनसः कृतम्।
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञाता उत्पत्तिस्थितिसंक्षयाः॥ ६
ज्ञातश्चतुर्विधो राशिः शक्तिश्च त्रिविधा गुरो।
विज्ञाता सा च कार्त्स्न्येन त्रिविधा भावभावना॥ ७
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं ज्ञेयमन्यैरलं द्विज।
यदेतदखिलं विष्णोर्जगन्न व्यतिरिच्यते॥ ८
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! मैंने आपसे जो कुछ पूछा था वह सभी आप कह चुके और मैंने भी उसे श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुना, अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है॥ ५॥ हे मुने! आपकी कृपासे मेरे समस्त सन्देह निवृत्त हो गये और मेरा चित्त निर्मल हो गया तथा मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका ज्ञान हो गया॥ ६॥ हे गुरो! मैं चार प्रकारकी राशि¹ और तीन प्रकारकी शक्तियाँ² जान गया तथा मुझे त्रिविध भाव-भावनाओंका³ भी सम्यक् बोध हो गया॥ ७॥ हे द्विज! आपकी कृपासे मैं, जो जानना चाहिये वह भली प्रकार जान गया कि यह सम्पूर्ण जगत् श्रीविष्णुभगवान्से भिन्न नहीं है, इसलिये अब मुझे अन्य बातोंके जाननेसे कोई लाभ नहीं॥ ८॥
¹ देखिये—प्रथम अंश अध्याय २२ श्लोक २३-३३।
² ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ६१-६३।
³ ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ४८-५१।
अ० ८ ]
- षष्ठ अंश *
४६१
कृतार्थोऽहमसन्देहस्तवप्रसादान्महामुने । वर्णधर्मादयो धर्मा विदिता यदशेषतः ॥ ९ प्रवृत्तं च निवृत्तं च ज्ञातं कर्म मयाखिलम् । प्रसीद विप्रप्रवर नान्यत्रष्टव्यमस्ति मे ॥ १० यदस्य कथनायासैर्योजितोऽसि मया गुरो । तत्क्षम्यतां विशेषोऽस्ति न सतां पुत्रशिष्ययोः ॥ ११
श्रीपराशर उवाच
एतत्ते यन्मयाख्यातं पुराणं वेदसम्मतम् । श्रुतेऽस्मिन्सर्वदोषोत्थः पापराशिः प्रणश्यति ॥ १२ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं कृतस्नं मयात्र तव कीर्तिताम् ॥ १३ अत्र देवास्तथा दैत्या गन्धर्वौरगराक्षसाः । यक्षविद्याधारास्सिद्धाः कथ्यन्तेऽप्सरसस्तथा ॥ १४ मुनयो भावितात्मानः कथ्यन्ते तपसान्विताः । चातुर्वर्ण्यं तथा पुंसां विशिष्टचरितानि च ॥ १५ पुण्याः प्रदेशा मेदिन्याः पुण्या नद्योऽथ सागराः । पर्वताश्च महापुण्याश्चरितानि च धीमताम् ॥ १६ वर्णधर्मादयो धर्मा वेदशास्त्राणि कृतस्नशः । येषां संस्मरणात्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १७ उत्पत्तिस्थितिनाशानां हेतुयों जगतोऽव्ययः । स सर्वभूतस्सर्वात्मा कथ्यते भगवान्हरिः ॥ १८ अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकैः । पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहन्नस्तैर्वृकैरिव ॥ १९ यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलायनमनुत्तमम् । मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः ॥ २० कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । प्रयाति विलयं सद्यः सकृद्यत्र च संस्मृते ॥ २१ हिरण्यगर्भदेवेन्द्ररुद्रादित्याशिववायुभिः । पावकैर्वसुभिः साध्वैर्विश्वेदेवादिभिः सुरैः ॥ २२ यक्षरक्षोरगैः सिद्धैर्दैत्यगन्धर्वदानवैः । अप्सरोभिस्तथा तारानक्षत्रैः सकलैर्गृहैः ॥ २३
हे महामुने! आपके प्रसादसे मैं निस्सन्देह कृतार्थ हो गया क्योंकि मैंने वर्ण-धर्म आदि सम्पूर्ण धर्म और प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप समस्त कर्म जान लिये। हे विप्रवर! आप प्रसन्न रहें; अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है ॥ ९-१० ॥ हे गुरो! मैंने आपको जो इस सम्पूर्ण पुराणके कथन करनेका कष्ट दिया है, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें; साधुजनोंकी दृष्टिमें पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता ॥ ११ ॥
श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मैंने तुमको जो यह वेदसम्मत पुराण सुनाया है इसके श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण दोषोंसे उत्पन्न हुआ पापपुंज नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥ इसमें मैंने तुमसे सृष्टिकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर और वंशोंके चरित—इन सभीका वर्णन किया है ॥ १३ ॥ इस ग्रन्थमें देवता, दैत्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध और अप्सरागणका भी वर्णन किया गया है ॥ १४ ॥ आत्माराम और तपोनिष्ठ मुनिजन चातुर्वर्ण्य-विभाग, महापुरुषोंके विशिष्ट चरित, पृथिवीके पवित्र क्षेत्र, पवित्र नदी और समुद्र, अत्यन्त पावन पर्वत, बुद्धिमान् पुरुषोंके चरित, वर्ण-धर्म आदि धर्म तथा वेद और शास्त्रोंका भी इसमें सम्यक् रूपसे निरूपण हुआ है, जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १५-१७ ॥
जो अव्ययात्मा भगवान् हरि संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके एकमात्र कारण हैं उनका भी इसमें कीर्तन किया गया है ॥ १८ ॥ जिनके नामका विवश होकर कीर्तन करनेसे ही मनुष्य सिंहसे डरे हुए गीदड़ोंके समान पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥ हे मैत्रेय! जिनका भक्तिपूर्वक किया हुआ नाम-संकीर्तन सम्पूर्ण धातुओंको पिघलानेवाले अग्निके समान समस्त पापोंका सर्वोत्तम विलयन (लीन कर देनेवाला) है ॥ २० ॥ जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनुष्योंको नरक-यातनाएँ देनेवाला अति उग्र कलि-कल्मष तुरन्त नष्ट हो जाता है ॥ २१ ॥ हे द्विजोत्तम! हिरण्यगर्भ, देवेन्द्र, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वायु, अग्नि, वसु, साध्य और विश्वेदेव आदि देवगण, यक्ष, राक्षस, उरग, सिद्ध, दैत्य, गन्धर्व, दानव, अप्सरा, तारा, नक्षत्र, समस्त ग्रह,
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४६२
- श्रीविष्णुपुराण *
[ ३० ८ ]
सप्तर्षिभिस्तथा धिष्ण्यैर्धिष्ण्याधिपतिभिस्तथा। ब्राह्मणाद्यैर्मनुष्यैश्च तथैव पशुभिर्भूगैः ॥ २४ सरीसृपैर्विहङ्गैश्च पलाशाद्यैर्महीरुहैः। वनाग्निसागरसरित्यातालैः सधरादिभिः ॥ २५ शब्दादिभिश्च सहितं ब्रह्माण्डमखिलं द्विज। मेरोरिवाणुर्यस्येतद्यन्मयं च द्विजोत्तम ॥ २६ स सर्वः सर्ववित्सर्वस्वरूपो रूपवर्जितः। भगवान्कीर्तितो विष्णुरत्र पापप्रणाशनः ॥ २७ यदश्वमेधावभूथे स्नातः प्राज्योति वै फलम्। मानवस्तदवाज्योति श्रुतैतन्मुनिसत्तम ॥ २८ प्रयागे पुष्करे चैव कुरुक्षेत्रे तथार्णवे। कृतोपवासः प्राज्योति तदस्य श्रवणान्तरः ॥ २९ यदग्निहोत्रे सुहुते वर्षणाज्योति मानवः। महापुण्यफलं विप्र तदस्य श्रवणात्सकृत ॥ ३० यज्येष्ठशुक्ल द्वादश्यां स्नात्वा वै यमुनाजले। मथुरायां हरिं दृष्ट्वा प्राज्योति पुरुषः फलम् ॥ ३१ तदाज्योत्यखिलं सम्यगध्यायं यः शृणोति वै। पुराणस्यास्य विप्रषं केशवार्पितमानसः ॥ ३२ यमुनासलिलस्नातः पुरुषो मुनिसत्तम। ज्येष्ठामूले सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥ ३३ समभ्यर्चाच्युतं सम्यङ् मथुरायां समाहितः। अश्वमेधस्य यज्ञस्य प्राज्योत्यविकलं फलम् ॥ ३४ आलोक्यद्विद्विमाश्रयेषामुन्नीतानां स्ववंशजैः। एतत्किलोचुरन्येषां पितरः सपितामहाः ॥ ३५ कच्चिदस्मक्कुले जातः कालिन्दीसलिलाप्लुतः। अर्चयिष्यति गोविन्दं मथुरायामुपोषितः ॥ ३६ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे येनैवं वयमप्युत। परामृद्विद्विमापस्यामस्तारिताः स्वकुलोद्भवैः ॥ ३७ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे समभ्यर्च्य जनार्दनम्। धन्यानां कुलजः पिण्डान्यमुनायां प्रदास्यति ॥ ३८ तस्मिन्काले समभ्यर्च्य तत्र कृष्णं समाहितः। दत्त्वा पिण्डं पितृभ्यश्च यमुनासलिलाप्लुतः ॥ ३९
सप्तर्षि, लोक, लोकपालगण, ब्राह्मणादि मनुष्य, पशु, मृग, सरीसृप, विहंग, पलाश आदि वृक्ष, वन, अग्नि, समुद्र, नदी, पाताल तथा पृथिवी आदि और शब्दादि विषयोंके सहित यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनके आगे सुमेरुके सामने एक रेणुके समान है तथा जो इसके उपादान-कारण हैं उन सर्व सर्वज्ञ सर्वस्वरूप रूपरहित और पापनाशक भगवान् विष्णुका इसमें कीर्तन किया गया है ॥ २२-२७ ॥
हे मुनिसत्तम! अश्वमेध-यज्ञमें अवभूथ (यज्ञान्त) स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही फल मनुष्य इसको सुनकर प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥ प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र तथा समुद्रतटपर रहकर उपवास करनेसे जो फल मिलता है वही इस पुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥ एक वर्षतक नियमानुसार अग्निहोत्र करनेसे मनुष्यको जो महान् पुण्यफल मिलता है वही इसे एक बार सुननेसे हो जाता है ॥ ३० ॥ ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीके दिन मथुरापुरीमें यमुना-स्नान करके कृष्णचन्द्रका दर्शन करनेसे जो फल मिलता है हे विप्रषं! वही भगवान् कृष्णमें चित्त लगाकर इस पुराणके एक अध्यायको सावधानतापूर्वक सुननेसे मिल जाता है ॥ ३१-३२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको मथुरापुरीमें उपवास करते हुए यमुना-स्नान करके समाहितचित्तसे श्रीअच्युतका भलीप्रकार पूजन करनेसे मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल मिलता है ॥ ३३-३४ ॥ कहते हैं अपने वंशजोंद्वारा [यमुनातटपर पिण्डदान करनेसे] उन्नति लाभ किये हुए अन्य पितरोंकी समृद्धि देखकर दूसरे लोगोंके पितृ-पितामहोंने [अपने वंशजोंको लक्ष्य करके] इस प्रकार कहा था— ॥ ३५ ॥ क्या हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष ज्येष्ठ-मासके शुक्ल पक्षमें [द्वादशी तिथिको] मथुरामें उपवास करते हुए यमुनाजलमें स्नान करके श्रीगोविन्दका पूजन करेगा, जिससे हम भी अपने वंशजोंद्वारा उद्धार पाकर ऐसा परम ऐश्वर्य प्राप्त कर सकेंगे? जो बड़े भाग्यवान् होते हैं उन्हींके वंशधर ज्येष्ठमासीय शुक्लपक्षमें भगवान्का अर्चन करके यमुनामें पितृगणको पिण्डदान करते हैं ॥ ३६-३८ ॥ उस समय यमुनाजलमें स्नान करके सावधानतापूर्वक भलीप्रकार भगवान्का पूजन
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अ० ८ ] * षष्ठ अंश * ४६३
यदाप्नोति नरः पुण्यं तारयन्स्वपितामहान् ।
श्रुत्वाध्यायं तदाप्नोति पुराणस्यास्य भक्तितः ॥ ४०
एतत्संसारभीरूणां परित्राणमनुत्तमम् ।
श्राव्याणां परमं श्राव्यं पवित्राणामनुत्तमम् ॥ ४१
दुःस्वप्ननाशनं नृणां सर्वदुष्टनिबर्हणम् ।
मङ्गलं मङ्गलानां च पुत्रसम्पत्प्रदायकम् ॥ ४२
इदमार्षं पुरा प्राह ऋभवे कमलोद्भवः ।
ऋभुः प्रियव्रतायाह स च भागुरयेऽब्रवीत् ॥ ४३
भागुरिः स्तम्भमित्राय दधीचाय स चोक्तवान् ।
सारस्वताय तेनोक्तं भृगुस्सारस्वतेन च ॥ ४४
भृगुणा पुरुकुत्साय नर्मदायाै स चोक्तवान् ।
नर्मदा धृतराष्ट्राय नागायापूरणाय* च ॥ ४५
ताभ्यां च नागराजाय प्रोक्तं वासुकये द्विज ।
वासुकिः प्राह वत्सस्य वत्सश्चाश्वतराय वै ॥ ४६
कम्बलाय च तेनोक्तमेलापुत्राय तेन वै ॥ ४७
पातालं समनुप्राप्तस्ततो वेदशिरा मुनिः ।
प्राप्तवानेतदखिलं स च प्रमतये ददौ ॥ ४८
दत्तं प्रमतिना चैतज्जातुकर्णाय धीमते ।
जातुकर्णेन चैवोक्तमन्येषां पुण्यकर्मणाम् ॥ ४९
पुलस्त्यवरदानेन ममाप्येतत्स्मृतिं गतम् ।
मयापि तुभ्यं मैत्रेय यथावत्कथितं त्विदम् ॥ ५०
त्वमप्येतच्छिनीकाय कलेरन्ते वदिष्यसि ॥ ५१
इत्येतत्परमं गुह्यं कलिकल्मषनाशनम् ।
यः शृणोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२
समस्ततीर्थस्नानानि समस्तामरसंस्तुतिः ।
कृता तेन भवेदेतद्यः शृणोति दिने दिने ॥ ५३
कपिलादानजनितं पुण्यमत्यन्तदुर्लभम् ।
श्रुत्वैतस्य दशाध्यायानवाप्नोति न संशयः ॥ ५४
यस्त्वेतत्सकलं शृणोति पुरुषः
कृत्वा मनस्यच्युतं
करनेसे और पितृगणको पिण्ड देनेसे अपने पितामहोंको तारता हुआ पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है वही पुण्य भक्तिपूर्वक इस पुराणका एक अध्याय सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ यह पुराण संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंका अति उत्तम रक्षक, अत्यन्त श्रवणयोग्य तथा पवित्रोंमें परम उत्तम है ॥ ४१ ॥ यह मनुष्योंके दुःस्वप्नोंको नष्ट करनेवाला, सम्पूर्ण दोषोंको दूर करनेवाला, मांगलिक वस्तुओंमें परम मांगलिक और सन्तान तथा सम्पत्तिका देनेवाला है ॥ ४२ ॥
इस आर्षपुराणको सबसे पहले भगवान् ब्रह्माजीने ऋभुको सुनाया था । ऋभुने प्रियव्रतको सुनाया और प्रियव्रतने भागुरिसे कहा ॥ ४३ ॥ फिर इसे भागुरिने स्तम्भमित्रको, स्तम्भमित्रने दधीचिको, दधीचने सारस्वतको और सारस्वतने भृगुको सुनाया ॥ ४४ ॥ तथा भृगुने पुरुकुत्ससे, पुरुकुत्सने नर्मदासे और नर्मदाने धृतराष्ट्र एवं पूरणनागसे कहा ॥ ४५ ॥ हे द्विज ! इन दोनोंने यह पुराण नागराज वासुकीको सुनाया । वासुकिने वत्सको, वत्सने अश्वतरको, अश्वतरने कम्बलको और कम्बलने एलापुत्रको सुनाया ॥ ४६-४७ ॥ इसी समय मुनिवर वेदशिरा पाताललोकमें पहुँचे, उन्होंने यह समस्त पुराण प्राप्त किया और फिर प्रमतिको सुनाया ॥ ४८ ॥ प्रमतिने उसे परम बुद्धिमान् जातुकर्णको दिया तथा जातुकर्णने अन्यान्य पुण्यशील महात्माओंको सुनाया ॥ ४९ ॥
[पूर्व-जन्ममें सारस्वतके मुखसे सुना हुआ यह पुराण] पुलस्त्यजीके वरदानसे मुझे भी स्मरण रह गया । सो मैंने ज्यों-का-त्यों तुम्हें सुना दिया । अब तुम भी कलियुगके अन्तमें इसे शिनीकको सुनाओगे ॥ ५०-५१ ॥
जो पुरुष इस अति गुह्य और कलि-कल्मष-नाशक पुराणको भक्तिपूर्वक सुनता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५२ ॥ जो मनुष्य इसका प्रतिदिन श्रवण करता है उसने तो मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया और सभी देवताओंकी स्तुति कर ली ॥ ५३ ॥ इसके दस अध्यायोंका श्रवण करनेसे निःसन्देह कपिला गौके दानका अति दुर्लभ पुण्य-फल प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥
* नागाया (आर्ष दीर्घ) ।
४६४
- श्रीविष्णुपुराण *
[ ३० ८ ]
सर्वं सर्वमयं समस्तजगता- माधारमात्माश्रयम् । ज्ञानज्ञेयमनादिमन्तरहितं सर्वांमराणां हितं स प्राप्नोति न संशयोऽस्त्यविकलं यद्वाजिमेधे फलम् ॥ ५५
यत्रादौ भगवांश्चराचरगुरु- मध्ये तथास्ते च सः ब्रह्मज्ञानमयोऽच्युतोऽखिलजग- म्मध्यान्तसर्गप्रभुः । तत्सर्वं पुरुषः पवित्रममलं शृण्वन्यठन्वाचय- न्न्राजोत्यस्ति न तत्फलं त्रिभुवने- ष्वेकान्तसिद्धिर्हिः ॥ ५६
यस्मिन्मन्त्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र निवेशितात्ममनसो ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । मुक्तिं चेत्सि यः स्थितोऽमलधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदधं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते ॥ ५७
यज्ञैर्यज्ञविदो यजन्ति सततं यज्ञेश्वरं कर्मिणो यं वै ब्रह्ममयं परावरमयं ध्यायन्ति च ज्ञानिनः । यं सच्चिन्त्य न जायते न म्रियते नो वद्वन्ते हीयते नैवासन्न च सद्भवत्यति ततः किं वा हरेः श्रूयताम् ॥ ५८
कव्यं यः पितुरूपधृग्विधहुतं हव्यं च भुङ्क्ते विभु- दैवत्वे भगवाननादिनिधनः स्वाहास्वधासंज्ञिते ।
जो पुरुष सम्पूर्ण जगत्के आधार, आत्माके अवलम्ब, सर्वस्वरूप, सर्वमय ज्ञान और ज्ञेयरूप आदि-अन्तरहित तथा समस्त देवताओंके हितकारक श्रीविष्णुभगवान्का चित्तमें ध्यान कर इस सम्पूर्ण पुराणको सुनता है उसे निःसन्देह अश्वमेध-यज्ञका समग्र फल प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥
जिसके आदि, मध्य और अन्तमें अखिल जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहारमें समर्थ ब्रह्मज्ञानमय चराचरगुरु भगवान् अच्युतका ही कीर्तन हुआ है उस परम श्रेष्ठ और अमल पुराणको सुनने, पढ़ने और धारण करनेसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण त्रिलोकियोंमें और कहीं प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि एकान्त मुक्तिरूप सिद्धिको देनेवाले भगवान् विष्णु ही इसके प्राप्तव्य फल हैं ॥ ५६ ॥
जिनमें चित्त लगानेवाला कभी नरकमें नहीं जा सकता, जिनके स्मरणमें स्वर्ग भी विघ्नरूप है, जिनमें चित्त लग जानेपर ब्रह्मलोक भी अति तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अव्यय प्रभु निर्मलचित्त पुरुषोंके हृदयमें स्थित होकर उन्हें मोक्ष देते हैं उन्हीं अच्युतका कीर्तन करनेसे यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? ॥ ५७ ॥ यज्ञवेत्ता कर्मनिष्ठ लोग यज्ञोद्धार जिनका यज्ञेश्वररूपसे यजन करते हैं, ज्ञानीजन जिनका परावरमय ब्रह्मस्वरूपसे ध्यान करते हैं, जिनका स्मरण करनेसे पुरुष न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है और न क्षीण हो जाता है तथा जो न सत् (कारण) हैं और न असत् (कार्य) ही हैं उन श्रीहरिके अतिरिक्त और क्या सुना जाय? ॥ ५८ ॥ जो अनादिनिधन भगवान् विभु पितुरूप धारणकर स्वधासंज्ञक कव्यको और देवता होकर अग्निमें विधिपूर्वक हवन किये हुए स्वाहा नामक हव्यको ग्रहण करते हैं तथा जिन समस्त शक्तियोंके आश्रयभूत भगवान्के विषयमें बड़े-बड़े
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अ० ८ ] * षष्ठ अंश * ४६५
| यस्मिन्ब्रह्मणि सर्वशक्तिनिलये<br>मानानि नो मानिनां<br>निष्ठायै प्रभवन्ति हन्ति कलुषं<br>श्रोत्रं स यातो हरिः ॥ ५९ | प्रमाणकुशल पुरुषोंके प्रमाण भी इयत्ता करनेमें समर्थ नहीं होते वे श्रीहरि श्रवण-पथमें जाते ही समस्त पापोंको नष्ट कर देते हैं॥ ५९॥ |
| नान्तोऽस्ति यस्य न च यस्य समुद्भवोऽस्ति<br>वृद्धिर्न यस्य परिणामविवर्जितस्य ।<br>नापक्षयं च समुपैत्यविकारि वस्तु<br>यस्तं नतोऽस्मि पुरुषोत्तममीशमीड्यम् ॥ ६० | जिन परिणामहीन प्रभुका आदि, अन्त, वृद्धि और क्षय कुछ भी नहीं होता, जो नित्य निर्विकार पदार्थ हैं उन स्तवनीय प्रभु पुरुषोत्तमको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ६०॥ |
| तस्यैव योऽनु गुणभुग्बहुधैक एव<br>शुद्धोऽप्यशुद्ध इव भाति हि मूर्तिभेदैः ।<br>ज्ञानान्वितः सकलसत्त्वविभूतिकर्ता<br>तस्मै नमोऽस्तु पुरुषाय सदाव्ययाय ॥ ६१ | जो उन्हींके समान गुणोंको भोगनेवाला है, एक होकर भी अनेक रूप है तथा शुद्ध होकर भी विभिन्न रूपोंके कारण अशुद्ध-(विकारवान्)-सा प्रतीत होता है और जो ज्ञानस्वरूप एवं समस्त भूत तथा विभूतियोंका कर्ता है उस नित्य अव्यय पुरुषको नमस्कार है॥ ६१॥ |
| ज्ञानप्रवृत्तिनियमैक्यमयाय पुंसो<br>भोगप्रदानपटवे त्रिगुणात्मकाय ।<br>अव्याकृताय भवभावनकारणाय<br>वन्दे स्वरूपभवनाय सदाजराय ॥ ६२ | जो ज्ञान (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और नियमन (तम)-की एकतारूप है, पुरुषको भोग प्रदान करनेमें कुशल है, त्रिगुणात्मक तथा अव्याकृत है, संसारकी उत्पत्तिका कारण है, उस स्वतःसिद्ध तथा जराशून्य प्रभुको सर्वदा नमस्कार करता हूँ॥ ६२॥ |
| व्योमानिलाग्निजलभूरचनामयाय<br>शब्दादिभोगविषयोपनयक्षमाय ।<br>पुंसः समस्तकरणैरुपकारकाय<br>व्यक्ताय सूक्ष्मबृहदात्मवते नतोऽस्मि ॥ ६३ | जो आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवीरूप है, शब्दादि भोग्य विषयोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ है और पुरुषका उसकी समस्त इन्द्रियोंद्वारा उपकार करता है उस सूक्ष्म और विराट्रूप व्यक्त परमात्माको नमस्कार करता हूँ॥ ६३॥ |
| इति विविधमजस्य यस्य रूपं<br>प्रकृतिपरात्ममयं सनातनस्य ।<br>प्रदिशतु भगवानशेषपुंसां<br>हरिरपजन्मजरादिकां स सिद्धिम् ॥ ६४ | इस प्रकार जिन नित्य सनातन परमात्माके प्रकृति-पुरुषमय ऐसे अनेक रूप हैं वे भगवान् हरि समस्त पुरुषोंको जन्म और जरा आदिसे रहित (मुक्तिरूप) सिद्धि प्रदान करें॥ ६४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपारत्वनिर्णायके श्रीमति
विष्णुमहापुराणे षष्ठोंऽशः समाप्तः ।
इति श्रीविष्णुमहापुराणं सम्पूर्णम्
॥ श्रीविष्ण्वर्पणमस्तु ॥
समाप्त
॥ श्रीहरिः ॥
श्रीविष्णुपुराणान्तर्गतश्लोकानामकारादिक्रमेणानुक्रमः
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ० | अंगुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षः | १ | १५ | ८१ | |||
| अकरोत्स्वतनुमन्याम् | १ | ४ | ८ | अंगुलस्याष्टभागोऽपि | ३ | ७ | ४ |
| अकालगर्जितादौ च | ३ | १२ | ३६ | अंगात्सुनीथापत्यम् | १ | १३ | ७ |
| अकिञ्चनमत्सम्बन्धम् | ३ | ११ | ६२ | अचिरादागमिष्यामि | ५ | ३२ | ३० |
| अकृष्टपच्या पृथिवी | १ | १३ | ५० | अचिन्तयच्च कौन्तेयः | ५ | ३८ | २५ |
| अकृत्वा पादयोः शौचम् | १ | २१ | ३७ | अच्छेनागन्धिलेपेन | ३ | ११ | १९ |
| अकृताग्रयणं यच्च | ३ | १६ | ७ | अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नम् | ४ | १३ | २७ |
| अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च | ४ | १३ | ६७ | अच्युतोऽप्यतिप्रणतातस्तस्मात् | ४ | १३ | ५७ |
| अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूत० | ४ | १३ | १०८ | अजयद्बलदेवस्तम् | ५ | २८ | १९ |
| अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य | ५ | १७ | १ | अजमीढद्विजमीढपुरुमीढाः | ४ | १९ | २९ |
| अक्रूरः क्रूरहृदयः | ५ | १८ | ३० | अजमीढात्कण्वः | ४ | १९ | ३० |
| अक्रूरागमनवृत्तान्तम् | ५ | २० | १८ | अजमीढस्यान्यः पुत्रः | ४ | १९ | ३३ |
| अक्षरं तत्परं ब्रह्म | १ | २२ | ५६ | अजमीढस्य नलिनी नाम | ४ | १९ | ५६ |
| अक्षय्यं नान्यदाधारम् | १ | २ | २० | अजमीढस्यान्या ऋक्षनामा | ४ | १९ | ७४ |
| अक्षप्रमाणमुभयोः | २ | ८ | ७ | अजन्मन्मरे विष्णौ | ५ | ३७ | ७५ |
| अक्षीणेषु समस्तेषु | ६ | ७ | ५२ | अजायत च विप्रोऽसौ | २ | १ | ३५ |
| अक्षीणामर्षमृत्युग्र० | ५ | ३४ | ४४ | अजादशरथः | ४ | ४ | ८६ |
| अक्षौहिण्योऽत्र बहुलाः | ५ | १ | २६ | अजानता कृतमिदम् | ५ | ३७ | ७१ |
| अखिलजगत्स्रष्टुर्भगवतः | ४ | ६ | ५ | अजीजनत्पुष्करिण्याम् | १ | १३ | ३ |
| अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शन० | ४ | १३ | ३८ | अज्ञानं तामसो भावः | ६ | ५ | २५ |
| अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च | ३ | ११ | ९५ | अज्ञानतमसाच्छन्नः | ६ | ५ | २१ |
| अगाधापारमक्षय्यम् | ३ | ३ | २५ | अज्ञातकुलनामानम् | ३ | ११ | ६१ |
| अग्नये कव्यवाहाय | ३ | १५ | २७ | अण्डानां तु सहस्राणाम् | २ | ७ | २७ |
| अग्निराप्याययेद्धातून् | ३ | ११ | ९२ | अणुप्राण्युपपन्नां च | ३ | ११ | १७ |
| अग्निपुत्रः कुमारस्तु | १ | १५ | ११५ | अनुह्लादह्रददत्तः | ४ | १९ | ४५ |
| अग्निबाहुः शुचिः शुक्रः | ३ | २ | ४४ | अनुप्रयाणि धान्यानि | ६ | १ | ५४ |
| अग्निहोत्रे हूयते या | २ | ८ | ५३ | अणोरणीयांसमसत्स्वरूपम् | ५ | १ | ४२ |
| अग्निसुवर्णस्य गुरुः | ५ | १ | १४ | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि | ३ | १ | ९ |
| अग्नेः शीतेन तोयस्य | १ | १७ | ६४ | अतश्च मान्धातुः | ४ | ३ | १ |
| अग्न्यन्तकादिरूपेण | १ | २२ | २९ | अतश्च पुरुवंशम् | ४ | १८ | ३० |
| अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया | ४ | २० | १७ | अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः | ४ | २२ | १ |
| अग्रन्यस्तविषाणाग्रः | ५ | १४ | ९ | अतिविभूतेः | ४ | १ | २९ |
| अंगमेषा त्रयी विष्णोः | २ | ११ | ११ | अतिचपलचित्ता | ४ | १२ | २६ |
| अंगादनपानस्ततः | ४ | १८ | १५ | अतिदुष्टसंहारिणः | ४ | ४ | १०४ |
| अंगारकोऽपि शुक्रस्य | २ | ७ | ८ | अतितिक्षायनं क्रूरम् | ३ | १७ | २३ |
| अंगानि वेदाश्चत्वारः | ३ | ६ | २८ | अतिथिर्यस्य भग्नाशः | ३ | ११ | ६८ |
| अंगिरसश्च सकाशात् | ४ | ६ | १३ | अतिथिर्यस्य भग्नाशः | ३ | ९ | १५ |
४६७
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अतिथिं चांगतं तवं | ३ | ११ | १० | अथ दैत्यैरुपैत्य | ४ | ९ | ६ |
| अतिथिं तत्र सम्प्राप्तम् | ३ | ११ | ५९ | अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रम् | १ | १३ | ६० |
| अतिवेगितया कालम् | २ | ८ | ३३ | अथवा तव को दोषः | १ | १५ | ४२ |
| अतिभीमा समागम्य | १ | १८ | ३४ | अथ पुत्रसहस्राणि | १ | १५ | ९० |
| अतीता वर्तमानाश्च | ४ | २४ | १०३ | अथ दैत्येश्वरं प्रोचुः | १ | १७ | ४८ |
| अतीव व्रीडिता बाला | ३ | १८ | ६८ | अथ भद्राणि भूतानि | १ | १७ | ८१ |
| अतीतकल्पावसाने | १ | ४ | ३ | अथ जितारिपक्षश्च | ४ | ९ | १० |
| अतीतानागतानीह | ३ | १ | ५ | अथ शर्मिष्ठातनयम् | ४ | १० | १५ |
| अतीव जागरस्वप्ने | ३ | १२ | १७ | अथवैनां स्यन्दनम् | ४ | १२ | २१ |
| अतो गतस्स भगवान् | ५ | ३८ | ६२ | अथ यादवबलभद्रोग्रसेन० | ४ | १३ | ११३ |
| अतो मन्दतरं नाभ्याम् | २ | ८ | ३९ | अथ दुर्वासोर्वशमवधारय | ४ | १६ | २ |
| अतोऽहमस्य षोडशस्त्री० | ४ | १३ | १५६ | अथवा किं तदालापैः | ५ | २४ | १५ |
| अतोऽर्हसि ममात्मीयम् | ४ | ७ | २२ | अथवा यादृशः स्नेहः | ५ | २७ | २४ |
| अतः क्रोधकलुषीकृतचेताः | ४ | ४ | ५२ | अथवा कौरवावासम् | ५ | ३५ | ३० |
| अतः परं ययातेः | ४ | ११ | १ | अथ तन्मुसलं चासौ | ५ | ३६ | १८ |
| अतः सम्प्राप्यते स्वर्गः | २ | ३ | ४ | अथ हर्यात्मनोऽन्ते च | ३ | ३ | १७ |
| अतः परं भविष्यानहम् | ४ | २१ | १ | अथर्ववेदं स मुनिः | ३ | ६ | ९ |
| अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु | ५ | ९ | ३० | अथ भुङ्क्ते गृहे तस्य | ३ | १८ | ४६ |
| अत्यन्तमधुरालाप० | ५ | ७ | ३१ | अथ तत्रापि च | ४ | ४ | १० |
| अत्यम्लकदुतीक्ष्णोष्ण० | ६ | ५ | ११ | अथ पृष्टा पुनरप्यब्रवीत् | ४ | ६ | ४३ |
| अत्यरिच्यत सोऽधश्च | १ | १२ | ५८ | अथ वनादागत्य | ४ | ७ | २४ |
| अत्यन्तस्तिमितॉङ्गानाम् | १ | १७ | ६१ | अथ भगवान् पितामहः | ४ | ६ | ३१ |
| अत्यार्तजगतपरित्राणाय | ४ | ४ | १५ | अथाजगाम तत्तीरम् | २ | १३ | १३ |
| अत्र हि राज्ञो युवनाश्वस्य | ४ | २ | ५५ | अथान्यमप्युरणकमादाय | ४ | ६ | ५५ |
| अत्र श्लोकः | ४ | ११ | ३ | अथाह याज्ञवल्क्यस्तु | ३ | ५ | ८ |
| अत्र जन्मसहस्राणाम् | २ | ३ | २३ | अथाह भगवान् | ४ | ९ | ४ |
| अत्र हि वंशे | ४ | २३ | २ | अथाह कृष्णमक्रूरः | ५ | १८ | ३४ |
| अत्र च श्लोकः | ४ | ३ | १२ | अथागत्य देवराजोऽब्रवीत् | ४ | २ | ६० |
| अत्र देवास्तथा दैत्याः | ६ | ८ | १४ | अथान्तर्जलावस्थितः | ४ | २ | ७३ |
| अत्रानुवंशश्लोको भवति | ४ | १० | ५ | अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैः | ४ | १३ | १११ |
| अत्रायं श्लोकः | ४ | २१ | १७ | अथाहाक्रूरः स एषः | ४ | १३ | १४८ |
| अत्रानुवंशश्लोकः | ४ | २२ | १२ | अथान्तरिक्षे वागुच्चैः | ५ | १ | ७ |
| अत्रावतीर्णयोः कृष्ण | ५ | ७ | ४१ | अथान्तरिक्षे वागुच्चैः | ५ | २८ | २१ |
| अत्रान्तरे च सगरः | ४ | ४ | १६ | अथाहान्तर्हितो विप्र | ५ | १६ | १८ |
| अत्रापि भारतं श्रेष्ठम् | २ | ३ | २२ | अथांशुमानपि स्वर्यातानाम् | ४ | ४ | २७ |
| अत्रापि श्रूयते श्लोकः | ४ | ४ | ८१ | अथैतामतीतानागत० | ४ | ३ | ३१ |
| अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च | १ | ७ | २७ | अथैनान्वसिष्ठो जीवन्मृतकान् | ४ | ३ | ४३ |
| अत्रेस्सोमः | ४ | ६ | ६ | अथैनामटव्यामेवाग्निस्थालीम् | ४ | ६ | ८१ |
| अत्रोपविश्य वै तेन | ५ | १३ | ३५ | अथैनं देवर्षयः | ४ | ७ | ५ |
| अथ तस्य भगवतः | ४ | २ | ८२ | अथैनां रथमारोप्य | ४ | १२ | २३ |
| अथ प्रसन्नवदनः | १ | १२ | ५० | अथैनं शैव्योवाच | ४ | १२ | २८ |
४६८
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अथैनं भगवान्वाह | ... | ४ | ४ | २५ | अनादिमध्यान्तमजम् | ... | १ |
| अथोपवाह्यादादाय | ... | ५ | १२ | १३ | अनाशी परमार्थश्च | ... | २ |
| अदित्यैवं स्तुतो विष्णुः | ... | ५ | ३० | २४ | अनागच्छति तस्मिन्नृसेनः | ... | ४ |
| अदित्या तु कृतानुज्ञः | ... | ५ | ३० | २८ | अनाद्यतैव साधुत्वहेतुः | ... | ४ |
| अदीर्घह्रस्वमस्थूलम् | ... | १ | १४ | ३९ | अनाख्येयस्वरूपामन् | ... | ५ |
| अदृश्याय ततस्तस्मै | ... | ५ | १ | ६६ | अनिरुद्धोऽपि रुक्मिणः | ... | ४ |
| अदृष्टाः पुरुषैःस्त्रीभिः | ... | ५ | २ | ६ | अनिकेताः ह्यनाहाराः | ... | ३ |
| अद्य मे सफलं जन्म | ... | ५ | १७ | ३ | अन्निन्दं भक्षयेदित्थम् | ... | ३ |
| अद्याप्याघूर्णिताकारम् | ... | ५ | ३५ | ३७ | अनिलस्य शिवा भार्या | ... | १ |
| अद्यैव ते व्यलीकलज्जावत्याः | ... | ४ | ६ | २९ | अनिष्क्रमणे च मधुरिपुरसौ | ... | ४ |
| अद्यैव देव कंसोऽयम् | ... | ५ | ३ | १९ | अनिरुद्धो रणेऽरुद्धः | ... | ५ |
| अधर्मबीजमुद्धृतम् | ... | १ | ६ | १५ | अनुज्ञां देहि भगवन् | ... | १ |
| अधमोत्तमौ न तेष्वास्ताम् | ... | २ | ४ | ७९ | अनुशिष्टोऽसि केनेदृक् | ... | १ |
| अधश्चोर्ध्वं च ते दीप्ताः | ... | ६ | ३ | २१ | अनुतप्ता शिखी चैव | ... | २ |
| अधिसीमकृष्णात् | ... | ४ | २१ | ७ | अनुदिनानुरूढस्नेह० | ... | ४ |
| अधोमुखो वै क्रियते | ... | ६ | ५ | १५ | अनुदिनं चोपभोगतः | ... | ४ |
| अधःशिरोभिर्दृश्यन्ते | ... | २ | ६ | ३३ | अनुयातैनमन्त्रान्या | ... | ५ |
| अनष्टद्रव्यता च | ... | ४ | ११ | १७ | अनुरागेण शैथिल्यम् | ... | ५ |
| अनन्यचेतसस्तस्य | ... | १ | १२ | ७ | अनुयुक्तौ ततस्तौ तु | ... | ५ |
| अनन्तरं च तुर्वसुम् | ... | ४ | १० | १३ | अनुभूतमिवान्यस्मिन् | ... | ६ |
| अनभ्यर्च्य ऋषीन्देवान् | ... | ३ | १८ | ५० | अनृतमेव व्यवहारजयहेतुः | ... | ४ |
| अनन्तरं च सा | ... | ४ | ७ | ३२ | अनेन दुष्टकपिना | ... | ५ |
| अनरण्यस्य पृषदश्वः | ... | ४ | ३ | १८ | अनेकजन्मसाहस्रीम | ... | ६ |
| अनक्षज्ञो हली द्यूते | ... | ५ | २८ | ११ | अनेरानकदुन्दुभिः | ... | ४ |
| अनन्तरं हरेशार्ङ्गम् | ... | ५ | २२ | ६ | अन्तर्जले यदाश्चर्यम् | ... | ५ |
| अनन्तरं चाशेषः | ... | ४ | २४ | ९९ | अन्तर्द्धानं गते तस्मिन् | ... | ५ |
| अनन्तरं च सप्तमम् | ... | ४ | १५ | २८ | अन्तर्वत्न्यहमब्दान्ते | ... | ४ |
| अनमित्रस्य पुत्रः | ... | ४ | १४ | १ | अन्तरटव्यामचिन्तयत् | ... | ४ |
| अनमित्रस्यान्वये | ... | ४ | १४ | ५ | अन्तःपुराणां मञ्जाश्च | ... | ५ |
| अनन्तरं चातिशुद्ध० | ... | ४ | १२ | ३३ | अन्तःप्रविष्टश्च धात्र्याः | ... | ४ |
| अनन्तरं च तैरूक्तम् | ... | ४ | ४ | ७९ | अन्तःपुरे निपतितम् | ... | ५ |
| अनन्तरं च तेनापि | ... | ४ | ४ | ५४ | अन्धकारीकृते लोके | ... | ५ |
| अनसूया तथैवात्रेः | ... | १ | १० | ८ | अन्धकारीकृते लोके | ... | ६ |
| अनावृष्टिभयप्रायाः | ... | ६ | १ | २४ | अन्धं तम इवाज्ञानम् | ... | ६ |
| अनावृष्ट्यादिसम्पर्कात् | ... | ६ | ४ | १२ | अन्नशाकाम्बुदानेन | ... | ३ |
| अनायतैस्समस्तैश्च | ... | ६ | ५ | ३१ | अन्नाग्रञ्च समुद्धृत्य | ... | ३ |
| अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या | ... | ६ | ७ | ११ | अन्नेन वा यथाशक्त्या | ... | ३ |
| अनादिर्भगवान्कालः | ... | १ | २ | २६ | अन्नं बलाय मे भूमे | ... | ३ |
| अनाराधितगोविन्दैः | ... | १ | ११ | ४३ | अन्यजन्मकृतैः पुण्यैः | ... | १ |
| अनाकाशमसंस्पर्शम् | ... | १ | १४ | ४० | अन्यथा सकला लोकाः | ... | १ |
| अनामगोत्रमसुखम् | ... | १ | १४ | ४१ | अन्यस्मै कन्यारत्नमिदम् | ... | ४ |
४६९
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अन्यान्प्यन्यपाषण्ड० | ... | ३ | १८ | २३ | अप्यत्र वत्से भवत्याः सुखम् | ... | ४ |
| अन्यासां चैव भार्याणाम् | ... | ५ | ३२ | ५ | अप्येष मां कंसपरिग्रहेण | ... | ५ |
| अन्याश्च भार्याः कृष्णस्य | ... | ५ | २८ | ३ | अप्येष पृष्ठे मम हस्तपद्मम् | ... | ५ |
| अन्याश्च शतशस्तत्र | ... | २ | ४ | ६६ | अप्येतेऽस्मत्पुत्राः कलभाषिणः | ... | ४ |
| अन्याय एव वृत्तिहेतुः | ... | ४ | २४ | ८३ | अप्रदानेन च विजित्येन्द्रम् | ... | ४ |
| अन्यान्थ सजातीयान् | ... | ५ | ८ | ११ | अप्रतिरथस्य कण्वः | ... | ४ |
| अन्याब्रवीति भो गोपाः | ... | ५ | १३ | २८ | अप्रतिरथस्यापरः | ... | ४ |
| अन्याः सहस्रशस्तत्र | ... | २ | ४ | ४४ | अप्राणवत्सु स्वल्पा सा | ... | ६ |
| न्यूनोनतिरिक्ताश्च | ... | २ | ४ | ९० | अप्रियेण तु तान्दृष्ट्वा | ... | १ |
| न्यूननश्चाप्यवृद्धिंश्च | ... | ५ | १ | ४८ | अप्सु तस्मिन्नहोरात्रे | ... | २ |
| अन्येषां चैव जन्तूनाम् | ... | १ | ३ | ७ | अब्दे च पूर्णे | ... | ४ |
| अन्ये च पाण्डवानामात्मजाः | ... | ४ | २० | ४३ | अभवन्दनुपुत्राश्च | ... | १ |
| अन्येनोत्थाप्यतेऽन्येन | ... | ६ | ५ | ३३ | अभयं सर्वभूतेभ्यः | ... | ३ |
| अन्ये तु पुरुषव्याघ्र | ... | ६ | ७ | ७७ | अभयप्रगल्भोच्चारणमेव | ... | ४ |
| अन्येषां दुर्लभं स्थानम् | ... | १ | १२ | ८७ | अभिषिच्य गवां वाक्यात् | ... | ५ |
| अन्येषां यो न पापानि | ... | १ | १९ | ५ | अभिष्टूय च तं वाग्भिः | ... | ५ |
| अन्येऽपि सन्त्येव नृपाः पृथिव्याम् | ... | ४ | २ | ७८ | अभिरुचिरेव दाम्पत्य० | ... | ४ |
| अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे | ... | १ | १५ | ९८ | अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षिज्जेषु | ... | ४ |
| अपत्यं कृत्तिकानां तु | ... | १ | १५ | ११६ | अभिषिक्तो यदा राज्ये | ... | १ |
| अपश्यच्च तन्मांसम् | ... | ४ | ४ | ५१ | अभिषिच्य सुतं वीरम् | ... | २ |
| अपसर्पिणी न तेषां वै | ... | २ | ४ | १३ | अभिशस्तस्तथा स्तेनः | ... | ३ |
| अपसव्यं न गच्छेच्च | ... | ३ | १२ | २६ | अभिष्टा सर्वदा यस्य | ... | ५ |
| अपहन्ति तमो यश्च | ... | ३ | ५ | २१ | अभुक्तवत्सु चैतेषु | ... | ३ |
| अपध्वस्तवपुः सोऽपि | ... | २ | १३ | ४१ | अभूद्विदेहोऽस्य पितेति वैदेहः | ... | ४ |
| अपक्षयविनाशाभ्याम् | ... | १ | २ | ११ | अभ्यर्थितापि सुहृदा | ... | ६ |
| अपराह्ने व्यतीते तु | ... | २ | ८ | ६४ | अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापः | ... | २ |
| अपामपि गुणो यस्तु | ... | ६ | ४ | १७ | अमरेषु ममावज्ञा | ... | ५ |
| अपापे तत्र पापँश्च | ... | १ | १८ | ३७ | अमाद्यदिन्द्रस्सोमेन | ... | ४ |
| अपास्य सा तु गन्धर्वान् | ... | ५ | ३२ | २३ | अमावास्या यदा पुष्ये | ... | ३ |
| अपि धन्यः कुले जायात् | ... | ३ | १४ | २२ | अमावास्या यदा मैत्र० | ... | ३ |
| अपि ते परमा तृप्तिः | ... | २ | १५ | १७ | अमिताभा भूतरया | ... | ३ |
| अपि स्मरसि राजेन्द्र | ... | ३ | १८ | ७५ | अमृष्टं जायते मृष्टम् | ... | २ |
| अपि नस्स कुले जायात् | ... | ३ | १६ | १९ | अमृतस्त्राविणी दिव्ये | ... | ५ |
| अपि नस्ते भविष्यन्ति | ... | ३ | १६ | १८ | अम्बरीषमिवाभाति | ... | ६ |
| अपीड्या तयोः कामम् | ... | ३ | ११ | ६ | अम्ब यत्त्वमिदं प्रात्थ | ... | १ |
| अपुत्रा तस्य सा पत्नी | ... | ४ | १२ | १४ | अम्बरीषस्य मान्धातृतनयस्य | ... | ४ |
| अपुत्रा प्रागियं विष्णुम् | ... | १ | १५ | ६ | अम्बरीषस्यापि | ... | ४ |
| अपुण्यपुण्योपरमे | ... | २ | ८ | १०० | अम्ब कथमत्र वयम् | ... | ४ |
| अपुत्रस्य च भूभुजः | ... | ४ | ५ | २० | अयनस्योत्तरस्यादौ | ... | २ |
| अपूर्वमग्निहोत्रं च | ... | ३ | ११ | ४२ | अयमेव मुने प्रश्नः | ... | ३ |
| अपृथग्धर्मचरणास्ते | ... | १ | १४ | ७ | अयमन्योऽस्मत्प्रत्याख्यानोपायः | ... | ४ |
४७०
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अयमस्मान् ब्रह्मर्षिः | ४ | २ | ९० | अलं भगिन्योऽहमिमं वृणोमि | ४ | २ | ९२ |
| अयमतीव दुरात्मा सत्राजित् | ४ | १३ | ६८ | अल्पप्रसादा बृहत्क्रोपाः | ४ | २४ | ७१ |
| अयमपि च यज्ञादनन्तरम् | ४ | १३ | १३६ | अल्पप्रज्ञा वृथालिंगाः | ६ | १ | ४३ |
| अयमेकोऽर्जुनो धन्वी | ५ | ३८ | १५ | अल्पोपादानं चास्यासंशयम् | ४ | १३ | १३७ |
| अयुजो भोजयेत् कामम् | ३ | १३ | २० | अवतीर्याय गरुडात् | ५ | ३१ | ११ |
| अयं कृष्णस्य पौत्रस्ते | ५ | ३२ | २७ | अवश्यमस्य देवेन्द्रः | ५ | ३० | ४३ |
| अयं हि वंशोऽतिबलपराक्रम० | ४ | ६ | ४ | अवरुह्य स नागेन्द्रात् | ५ | १२ | ५ |
| अयं स पुरुषोत्कृष्टः | ४ | ६ | ६९ | अवतार्य भवान्पूर्वम् | ५ | ७ | ४० |
| अयं हि भगवान् | ४ | १५ | १७ | अवतीर्य च तत्रायम् | ५ | १ | ६५ |
| अयं च तस्य श्लोकः | ४ | २० | १२ | अवबोधि च यच्छान्तम् | ३ | १७ | २४ |
| अयं चास्य महाबाहुः | ५ | २० | ४८ | अवज्ञाय वचस्तस्य | ५ | ३८ | २० |
| अयं स कथ्यते प्राज्ञैः | ५ | २० | ४९ | अवज्ञानमहंकारः | ३ | ९ | १६ |
| अयं हि सर्वलोकस्य | ५ | २० | ५० | अवगाहदपः पूर्वम् | ३ | ९ | ६ |
| अयं समस्तजगतः | ५ | २७ | १० | अवयो वक्षसश्चक्रे | १ | ५ | ४८ |
| अरजोऽशब्दममृतम् | १ | १४ | ४२ | अवरांच वरांश्र्चैव | १ | १५ | ७६ |
| अरक्षितारो हर्तारः | ६ | १ | ३४ | अवष्टम्भो गदापाणिः | १ | ८ | २९ |
| अराजके नृपश्रेष्ठ | १ | १३ | ६७ | अवशेनापि यन्नाम्नि | ६ | ८ | १९ |
| अरिष्टो धेनुकः केशी | ५ | १ | २४ | अवकाशमशेषस्य | ५ | २ | १५ |
| अरिष्टो धेनुकः केशी | ५ | २० | ४७ | अवकाशमशेषाणाम् | १ | १४ | ३२ |
| अरुन्धती वसुर्यामिः | १ | १५ | १०५ | अवादयन् जगुश्चान्ये | १ | १७ | ८ |
| अरुणोदं महाभद्रम् | २ | २ | २६ | अवाप्तज्ञानतन्त्रस्य | २ | १५ | ५ |
| अरूपरसमस्पर्शम् | ६ | ४ | २५ | अवापुस्तापमत्यर्थम् | ५ | १० | २ |
| अर्कस्येव हि तस्याश्वाः | २ | १२ | ३ | अविकाराय शुद्धाय | १ | २ | १ |
| अर्चिर्भिस्संवृते तस्मिन् | ६ | ४ | २० | अविकारमजं शुद्धम् | १ | १४ | ३८ |
| अर्जुनस्याप्युलूप्याम् | ४ | २० | ४९ | अविकारं स तद्भुक्त्वा | १ | १८ | ६ |
| अर्जुनार्थे त्वहं सर्वान् | ५ | १२ | २४ | अविक्षितोऽप्यतिबल० | ४ | १ | ३१ |
| अर्जुनोऽपि तदान्विष्य | ५ | ३८ | १ | अविद्योऽयं मया द्यूते | ५ | २८ | १६ |
| अर्थो विष्णुरियं वाणी | १ | ८ | १८ | अविद्यामोहितात्मानः | ५ | ३३ | ४९ |
| अर्धनारीनरवपुः | १ | ७ | १३ | अविमुक्ते महाक्षेत्रे | ५ | ३४ | ३० |
| अर्यमा पुलहश्चैव | २ | १० | ५ | अवीरजोऽनुगमनम् | ५ | ३८ | ३७ |
| अर्वाक्स्त्रोतास्तु कथितः | १ | ६ | १ | अव्यक्तं कारणं यत्तत् | १ | २ | १९ |
| अर्हध्वं धर्ममेतं च | ३ | १८ | ७ | अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मन् | १ | २ | ६० |
| अर्हंतैतं महाधर्मम् | ३ | १८ | १३ | अशब्दगोचरस्यापि | ६ | ५ | ७१ |
| अलमत्यन्तकोपेन | १ | १ | १६ | अशस्त्रमतिघोरं तत् | ५ | २० | ६८ |
| अलमलमनेनासद्ग्राहेण | ४ | ३ | ३२ | अशास्त्रविहितं घोरम् | ६ | १ | ४० |
| अलातचक्रवद्भ्रान्ति | २ | १२ | २८ | अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्तः | ३ | ७ | ३१ |
| अलांबुं गृञ्जनं चैव | ३ | १६ | ८ | अशुचि प्रस्तरे सुप्तः | ६ | ५ | १९ |
| अलं ते क्रीडया पार्थ | ५ | ३८ | ५४ | अशेषपर्वस्वेतेषु | ३ | ११ | १२० |
| अलं शक्र प्रयासेन | ५ | ३० | ७३ | अशेषभूभृतः पूर्वम् | ३ | १८ | ८२ |
| अलं त्रासेन गोपालाः | ५ | १६ | ५ | अशेषजगदाधार० | ५ | २० | ८७ |
| अलं निशाचरैर्दग्धैः | १ | १ | २० | अश्नीयात्तन्मयो भूत्वा | ३ | ११ | ८७ |
४७१
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अश्मकस्य मूलको नाम | ... ४ | ४ | ७३ | अहमत्यन्तविषयी | ... ५ | २३ | ४६ |
| अश्विनौ वसवश्चेमे | ... १ | ९ | ६४ | अहिंसादिष्वशेषेषु | ... २ | १३ | ८ |
| अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः | ... १ | ५ | २४ | अहो क्षात्रं परं तेजः | ... १ | ११ | ३८ |
| अष्टाशीतिसहस्राणि | ... १ | ६ | ३६ | अहोऽस्य तपसो वीर्यम् | ... १ | १२ | ९९ |
| अष्टाशीतिसहस्राणि | ... २ | ८ | ९२ | अहोरात्रकृतं पापम् | ... १ | २० | ३७ |
| अष्टाश्वः काञ्चनः श्रीमान् | ... २ | १२ | १८ | अहोरात्रार्द्धमासास्तु | ... २ | ८ | ८० |
| अष्टाभिः पाण्डुरैर्युक्तः | ... २ | १२ | १९ | अहोरात्र व्यवस्थान० | ... २ | ८ | ११ |
| अष्टाविंशतिकृत्वो वै | ... ३ | ३ | ९ | अहोमी च कृमीन्भुङ्क्ते | ... ३ | ११ | ७४ |
| अष्टाविंशद्वधोपेतम् | ... ३ | १७ | २८ | अहो धन्योऽद्यमीदृशम् | ... ४ | २ | ७४ |
| अष्टावक्रः पुरा विप्रः | ... ५ | ३८ | ७१ | अहो मे मोहस्य | ... ४ | २ | ११५ |
| अष्टौ शतसहस्राणि | ... १ | ३ | १९ | अहो गोपीजनस्यास्य | ... ५ | १८ | २८ |
| अष्टौ महिष्यः कथिताः | ... ५ | ३८ | २ | अहोऽतिबलवद्दैवम् | ... ५ | ३८ | ३१ |
| असत्प्रतिगृहीता तु | ... २ | ६ | १८ | अहोरात्रं पितॄणां तु | ... ६ | १ | ४ |
| असहन्ती तु सा भर्तुः | ... ३ | २ | ३ | अहर्भवति तच्चापि | ... २ | ८ | ३७ |
| असमर्थोऽन्नदानस्य | ... २ | १४ | २५ | अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनः | ... १ | २२ | ८७ |
| असहन्रौहिणेयस्य | ... ५ | ९ | १७ | अहं त्वं च तथान्ये च | ... २ | १३ | ६९ |
| असम्यक्करणे दोषः | ... ६ | २ | २१ | अहं चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे | ... ४ | २ | १२५ |
| असारंसंसारविवर्तनेषु | ... १ | १७ | ९० | अहं रामश्च मथुराम् | ... ५ | १८ | ९ |
| असावपि हिरण्यपात्रे | ... ४ | ४ | ४८ | अहं ह्यविद्यया मृत्युम् | ... ६ | ७ | ९ |
| असावपि प्रतिगृह्योदकाञ्जलिम् | ... ४ | ४ | ५६ | अहं ममेत्यविद्येयम् | ... ६ | ७ | १०० |
| असावप्यनालोचितोत्तरवचनः | ... ४ | १२ | २७ | आ० | |||
| असावप्याह | ... ४ | १३ | ८४ | आकण्ठमग्नं सलिले | ... ५ | ३८ | ७४ |
| असावपि देवापिर्वेदवाद० | ... ४ | २० | २६ | आकाशवायुतेजांसि | ... १ | २ | ५० |
| असिपत्रवनं याति | ... २ | ६ | २६ | आकाशगंगासलिलम् | ... २ | ९ | १२ |
| अस्त्रभूषणसंस्थान० | ... १ | २२ | ७६ | आकाशसम्भवेरश्वैः | ... २ | १२ | २० |
| अस्त्राणां सायकानां च | ... ५ | ३८ | ४५ | आकाशवाव्वग्निजलं० | ... ६ | ७ | १३ |
| अस्त्रानभोजिनो नागिन० | ... ६ | १ | २७ | आकाशं चैव भूतादिः | ... ६ | ४ | ३३ |
| अस्नाताशी मलं भुङ्क्ते | ... ३ | ११ | ७३ | आकृष्य लांगलाग्रेण | ... ५ | ३३ | ३० |
| अस्मत्संश्रयदृप्तोऽयम् | ... ५ | ३३ | ४४ | आकृष्य च महास्तम्भम् | ... ५ | २८ | २५ |
| अस्मच्चेष्टामपहसन् | ... ५ | २४ | १३ | आक्रान्तः पर्वतः कस्मात् | ... १ | १६ | ७ |
| अस्माभिरर्घो भवतः | ... ५ | ३५ | १८ | आख्यातं च जनैस्तेषाम् | ... १ | १३ | ३१ |
| अस्मिन्वसति दुष्टात्मा | ... ५ | ७ | ६ | आख्याहि मे समयमिति | ... ४ | ६ | ४२ |
| अस्मिन्वयसि पुत्रो मे | ... ५ | २७ | २३ | आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैः | ... ३ | ६ | १५ |
| अस्याक्रूरस्य पिता श्वफल्कः | ... ४ | १३ | ११५ | आगच्छ हे राजन् | ... ४ | २० | २८ |
| अस्वे स्वमिति भावोऽत्र | ... ५ | ३० | १५ | आगमनश्रवणसमनन्तरम् | ... ४ | २ | ७६ |
| अहङ्कृता अहम्मानाः | ... १ | ५ | ११ | आगताय वसिष्ठाय | ... ४ | ४ | ४९ |
| अहन्यहन्यनुष्ठानम् | ... १ | ६ | २८ | आगच्छत द्रुतं देवाः | ... १ | १५ | १२८ |
| अहन्यहन्याचार्यः | ... १ | १९ | २६ | आगमोत्थं विवेकाच्च | ... ६ | ५ | ६१ |
| अहमेवाक्षयो नित्यः | ... १ | १९ | ८६ | आगारदाही मित्रघ्नः | ... २ | ६ | २३ |
| अहमम्वरार्चितेन धात्रा | ... ३ | ७ | १५ | आगामियुगे सूर्यवंश० | ... ४ | ४ | ११० |
| अहमप्यद्रिशृङ्गाभम् | ... ५ | ११ | ५ | आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च | ... २ | १ | ७ |
४७२
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आग्नेयमष्टमं चैव | ... ३ | ६ | २२ | आनीय चोग्रसेनाय | ... ५ | २४ | ७ |
| आघूर्णितं तत्सहसा | ... ५ | ३५ | ३२ | आनीयमानमाभीरैः | ... ५ | ३८ | ५२ |
| आजीवो याः परस्तेषाम् | ... ५ | ११ | ४ | आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता | ... १ | ९ | १२१ |
| आज्ञापूर्वं च यदिदम् | ... ५ | ३४ | ११ | आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता | ... ५ | १० | २७ |
| आताम्रनयनः कोपात् | ... ५ | ७ | १५ | आपस्तम्भिरे चास्य | ... १ | १३ | ४९ |
| आताम्रा हि भवन्त्यापः | ... २ | ८ | २५ | आपस्य पुत्रो वैतण्डः | ... १ | १५ | १११ |
| आत्मच्छायां तरुच्छायाम् | ... ३ | ११ | ११ | आपदशौचनात्पूर्वम् | ... ३ | १५ | ४८ |
| आत्मनोऽधिगतज्ञानः | ... २ | १३ | ३८ | आपो ध्रुवश्च सोमश्च | ... १ | १५ | ११० |
| आत्ममायामयीं दिव्याम् | ... ६ | ४ | ६ | आपो नारा इति प्रोक्ताः | ... १ | ४ | ६ |
| आत्मभावं नयत्येनम् | ... ६ | ७ | ३० | आपो ग्रसन्ति वै पूर्वम् | ... ६ | ४ | १४ |
| आत्मप्रयत्नसापेक्षा | ... ६ | ७ | ३१ | आप्याः प्रसूता भव्याश्च | ... ३ | १ | २७ |
| आत्मानमस्य जगतः | ... १ | २२ | ६८ | आभूतसंप्लवं स्थानम् | ... २ | ८ | ९५ |
| आत्मात्मदेहगुणवत् | ... ५ | १ | ३९ | आमन्त्रितश्च कृष्णेति | ... ५ | २४ | १९ |
| आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तः | ... २ | १३ | ७१ | आमृत्युतो नैव मनोरथानाम् | ... ४ | २ | ११९ |
| आत्मा ध्येयः सदा भूप | ... २ | १४ | १५ | आयतिर्नियतिश्चैव | ... १ | १० | ३ |
| आदत्ते रश्मिभिर्यं तु | ... २ | ११ | २४ | आययौ च जरा नाम | ... ५ | ३७ | ६८ |
| आदाय कृष्णं सन्त्रस्ता | ... ५ | ५ | १२ | आयागं तद्वनूरत्नम् | ... ५ | २० | १५ |
| आदाय वसुदेवोऽपि | ... ५ | ३ | २३ | आयास्ये भवतीगेहम् | ... ५ | २० | १३ |
| आदाहवार्यायुधादि० | ... ३ | १३ | ३६ | आयातं दैत्यवृषभम् | ... ५ | १४ | १० |
| आदित्या मरुतस्साध्याः | ... ५ | १ | १७ | आयुर्वेदो धनुर्वेदः | ... ३ | ६ | २९ |
| आदित्यान्निस्सृतो राहुः | ... २ | १२ | २२ | आरक्ताश्चैव निर्यासाः | ... ३ | १६ | ९ |
| आदित्यवसुरुद्राद्याः | ... ३ | १ | ३१ | आरभ्वस्यात्मजः | ... ४ | १७ | ४ |
| आद्यमाजगवं नाम | ... १ | १३ | ४० | आराधिताच्च गोविन्दात् | ... ३ | ८ | २ |
| आद्ये कृतयुगे सर्गः | ... ६ | १ | ७ | आराध्यः कथितो देवः | ... १ | ११ | ५० |
| आद्यो यज्ञपुमानीड्यः | ... १ | ९ | ६१ | आराध्य वरदं विष्णुम् | ... १ | १४ | १४ |
| आद्यो वेदश्चतुष्पादः | ... ३ | ४ | १ | आराधनाय लोकानाम् | ... ३ | १७ | ११ |
| आद्यं सर्वपुराणानाम् | ... ३ | ६ | २० | आराधितो यद्भगवान् | ... ५ | २० | ९५ |
| आधारभूतं जगतः | ... १ | १२ | ८१ | आराध्यन्महादेवम् | ... ५ | २३ | ३ |
| आधारभूतं विश्वस्य | ... १ | २ | ५ | आराध्य त्वामभीप्सन्ते | ... ५ | ३० | १८ |
| आधारः शिशुमारस्य | ... २ | ९ | ६ | आराधितस्त्वया विष्णुः | ... १ | १५ | ६२ |
| आधारभूतः सवितुः | ... २ | ९ | २३ | आरुह्यैराक्तं नागम् | ... ५ | २९ | १५ |
| आध्यात्मिकादि मैत्रेय | ... ६ | ५ | १ | आरुह्य च स्वयं कृष्णः | ... ५ | २९ | ३५ |
| आध्यात्मिकोऽपि द्विविधः | ... ६ | ५ | २ | आर्यबलभद्रेणापि | ... ४ | १३ | १५७ |
| आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु | ... ३ | ४ | १२ | आर्यकाः कुरराश्चैव | ... २ | ४ | १७ |
| आनम्य चापि हस्ताभ्याम् | ... ५ | ७ | ४४ | आलोक्यर्द्धिमथान्येषाम् | ... ६ | ८ | ३५ |
| आनकदुन्दुभेर्देवक्यामपि | ... ४ | १५ | २६ | आश्रमाणां च सर्वेषाम् | ... ३ | ८ | ३८ |
| आनर्तनामा परमधार्मिकः | ... ४ | १ | ६३ | आश्रयश्चेतसो ब्रह्म | ... ६ | ७ | ४७ |
| आनर्तस्यापि रेवतनामा पुत्रः | ... ४ | १ | ६४ | आश्रित्य तमसो वृत्तिम् | ... १ | २२ | २८ |
| आनिन्ये च पुनः संज्ञाम् | ... ३ | २ | ८ | आसन्नं चैष जग्राह | ... ५ | १४ | ११ |
| आनीलनिषधायामौ | ... २ | २ | ३९ | आसन्नो हि कलिः | ... ४ | १ | ७७ |
| आनीय सहिता दैत्यैः | ... १ | ९ | ७७ | आसां पिबन्ति सलिलम् | ... २ | ३ | १८ |
४७३
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आस्फोटयामास तदा | ५ | ७ | १४ | इति विज्ञाप्यमानोऽपि | १ | १३ | २६ |
| आह चैनं कृतवर्मा | ४ | १३ | ८२ | इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः | १ | १९ | १० |
| आह चैनामतिपापे | ४ | ७ | २५ | इति राजाह भरतः | २ | १३ | १० |
| आह च भगवान् | ४ | ३ | ६ | इति भरतनरेन्द्रसारवृत्तम् | २ | १६ | २५ |
| आह चोर्वशी | ४ | ६ | ६५ | इतीरितस्तेन स राजवर्यः | २ | १६ | २४ |
| आह च राजा | ४ | ६ | ७६ | इतीरितोऽसौ कमलोद्भवेन | ४ | १ | ९३ |
| आहारः फलमूलानि | १ | १३ | ८६ | इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च | २ | ३ | ५ |
| आहुकस्य देवकोग्रसेनौ | ४ | १४ | १६ | इत्थमुन्मार्गयातेषु | ३ | १८ | ३३ |
| आह्लादकारिणः शुभ्राः | २ | ५ | ६ | इत्थं च पुत्रपौत्रेषु | ६ | ७ | १५ |
| इ० | इत्थं सञ्चिन्तयन्नेव | ६ | ६ | ३९ | |||
| इक्ष्वाकुतनयो यः | ४ | ५ | १ | इत्थं वदन्ययौ जिष्णुः | ५ | ३८ | ३४ |
| इक्ष्वाकुश्च नृगश्चैव | ३ | १ | ३३ | इत्थं विभूषितो रेमे | ५ | २५ | १८ |
| इक्ष्वाकुकुलाचार्यो वसिष्ठः | ४ | २ | १७ | इत्थं पुरस्त्रीलोकस्य | ५ | २० | ६३ |
| इक्ष्वाकुजह्नुमान्धातु० | ४ | २४ | १४१ | इत्थं पुमान्प्रधानं च | १ | २२ | ७५ |
| इक्ष्वाकूणामयं वंशः | ४ | २२ | १३ | इत्थं चिरगते तस्मिन् | २ | १३ | २८ |
| इच्छा श्रीभगवान्कामः | १ | ८ | २० | इत्थं विचिन्त्य बद्ध्वा च | ५ | ७ | ११ |
| इज्यते तत्र भगवान् | २ | ४ | १९ | इत्थं सञ्चिन्तयन्विष्णुम् | ५ | १७ | १८ |
| इतरस्यानुदिनम् | ४ | १३ | ५१ | इत्थं स्तुतस्तदा तेन | ५ | २४ | १ |
| इतरास्त्वब्रुवन्विप्र | ५ | ३८ | ७८ | इत्यनेकान्तवादं च | ३ | १८ | १२ |
| इति विविधमजस्य यस्य रूपम् | ६ | ८ | ६४ | इत्यन्ते वचसस्तेषाम् | १ | ९ | ६० |
| इति संसारदुःखार्क० | ६ | ५ | ५७ | इत्याज्ञाप्तास्ततस्तेन | ५ | ११ | ६ |
| इति कृत्वा मतिं कृष्णः | ५ | ११ | १६ | इत्याज्ञाप्तास्ततस्तेन | १ | १७ | ३२ |
| इति गोपकुमाराणाम् | ५ | ८ | ६ | इत्याकर्ण्य वचस्तस्य | २ | १५ | ३२ |
| इति गोपीवचः श्रुत्वा | ५ | ७ | ३३ | इत्याह भगवानौर्वः | ३ | १७ | १ |
| इति संस्मारितः कृष्णः | ५ | ७ | ४३ | इत्याकर्ण्य समस्तदेवैः | ४ | २ | ३० |
| इति संस्मारितो विप्र | ५ | ९ | ३४ | इत्यात्मानमात्मनैवाभिधाय | ४ | २ | १२९ |
| इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यम् | ५ | १३ | १३ | इत्यात्मेर्ष्याकोपकलुषित० | ४ | १२ | ३० |
| इति सञ्चिन्त्य गोविन्दः | ५ | २३ | १३ | इत्याकर्ण्योपलब्धस्य | ४ | १३ | ४३ |
| इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा | ५ | २९ | १३ | इत्याकर्ण्य समुत्पाट्य | ५ | १ | ९ |
| इति तस्य वचः श्रुत्वा | ५ | १० | ४२ | इत्याकर्ण्य धरावाक्यम् | ५ | १ | २९ |
| इति नानाविधैर्भावैः | ५ | ६ | ४९ | इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसः | ५ | ४ | १४ |
| इति कृत्वा मतिं सर्वे | ५ | ६ | २५ | इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च | ५ | ४ | १७ |
| इतिहासपुराणे च | ५ | १ | ३८ | इत्यालोच्य स दुष्टात्मा | ५ | १५ | १२ |
| इति प्रसूतिं वृष्णीनाम् | ४ | १५ | ५० | इत्याज्ञप्तस्तदाक्रूरः | ५ | १५ | २३ |
| इति ऋषिवचनम् | ४ | २ | ८० | इत्यादिश्य स तौ मल्लौ | ५ | २० | २२ |
| इति मत्वा स्वदारेषु | ३ | ११ | १२७ | इत्युक्तोऽसौ तदा दैत्यैः | १ | १७ | २८ |
| इति निजभटशासनाय देवः | ३ | ७ | ३५ | इत्युक्तः स तया प्राह | १ | १५ | २५ |
| इति यमवचनं निशम्य पाशी | ३ | ७ | १९ | इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्तैः | १ | १३ | २९ |
| इति शाखान्समाख्याताः | ३ | ६ | ३१ | इत्युक्ता देवदेवेन | १ | ९ | ८२ |
| इति पूर्वं वसिष्ठेन | १ | १ | २९ | इत्युक्त्या देवदेवेन | १ | १२ | ४० |
| इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः | १ | ९ | १४९ | इत्युक्त्वा प्रययौ साथ | १ | १२ | २४ |
४७४
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रः | १ | ९ | २५ | इत्युक्तस्स प्रहस्यैनाम् | ५ | ३० | ३८ |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य | १ | ९ | ५८ | इत्युक्ते तैरूवाचैतान् | ५ | ३० | ४५ |
| इत्युक्तः सकलं मात्रे | १ | ११ | १४ | इत्युक्ता रक्षिणो गत्वा | ५ | ३० | ५२ |
| इत्युकास्ते ततः सर्पाः | १ | १७ | ३८ | इत्युक्तो वै निवृते | ५ | ३० | ७७ |
| इत्युक्त्वा सोऽभवन्मौनी | १ | १८ | १९ | इत्युका सा तया चक्रे | ५ | ३२ | १३ |
| इत्युक्तास्तेन ते क्रुद्धाः | १ | १८ | ३३ | इत्युक्तः प्राह गोविन्दः | ५ | ३३ | ४५ |
| इत्युक्तास्तेन ते सर्वे | १ | १८ | ४४ | इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्णः | ५ | ३३ | ५१ |
| इत्युक्त्वा तं ततो गत्वा | १ | १८ | ४६ | इत्युक्तस्सम्प्रहस्यैनम् | ५ | ३४ | ८ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे देवः | १ | १५ | ७२ | इत्युक्तेऽपगते दूते | ५ | ३४ | १३ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः | १ | २० | २९ | इत्युच्चार्य विमुक्तेन | ५ | ३४ | २४ |
| इत्युक्ते मौनिनं भूयः | २ | १५ | १ | इत्युक्त्वा कुरवः साम्बम् | ५ | ३५ | १९ |
| इत्युक्ता तेन सा पत्नी | २ | १५ | १५ | इत्युक्तामदरक्ताक्षः | ५ | ३५ | ३१ |
| इत्युक्तः सहसारुह्य | २ | १६ | १२ | इत्युक्त्वा दिवमाजग्मुः | ५ | ३६ | २३ |
| इत्युक्तः सत्वरं तस्य | २ | १६ | १५ | इत्युकास्ते कुमारास्तु | ५ | ३७ | ११ |
| इत्युक्तो रुधिराक्तानि | ३ | ५ | १२ | इत्युक्तो वासुदेवेन | ५ | ३७ | २८ |
| इत्युच्चार्य नरो दद्यात् | ३ | ११ | ५६ | इत्युक्तः प्रणिपत्यैनम् | ५ | ३७ | ३७ |
| इत्युच्चार्य स्वहस्तेन | ३ | ११ | ९८ | इत्युक्तो दारुकः कृष्णम् | ५ | ३७ | ६४ |
| इत्युक्तो भगवांस्तेभ्यः | ३ | १७ | ४१ | इत्युदीरितमाकर्ण्य | ५ | ३८ | ८३ |
| इत्युक्ताः प्रणिपत्यैनम् | ३ | १७ | ४५ | इत्युक्तोऽभ्येत्य पार्थाभ्याम् | ५ | ३८ | ९१ |
| इत्युच्चार्याहर्निशम् | ४ | ३ | १४ | इत्युक्तो मुनिभिर्व्यासः | ६ | २ | १४ |
| इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र | ५ | १ | ३४ | इत्युक्त्वा रथमारुह्य | ६ | ६ | २० |
| इत्युक्त्वा प्रययौ देवी | ५ | ३ | २९ | इत्युक्त्वा समुपेत्यैनम् | ६ | ६ | ४८ |
| इत्युक्ताः प्रययुर्गोपाः | ५ | ५ | ६ | इत्युक्तस्ते मया योगः | ६ | ७ | ९७ |
| इत्युक्ते ताभिराश्वस्य | ५ | ७ | ६० | इत्येते कथिताः सर्गाः | १ | ५ | १९ |
| इत्युक्त्वा सर्पराजं तम् | ५ | ७ | ७९ | इत्येष प्राकृतः सर्गः | १ | ५ | २१ |
| इत्युक्तास्तेन ते गोपाः | ५ | ११ | १९ | इत्येता ओषधीनां तु | १ | ६ | २३ |
| इत्युक्तः सम्परिष्वज्य | ५ | १२ | २५ | इत्येषा दक्षकन्यानाम् | १ | १० | २१ |
| इत्युक्तवास्फोट्य गोविन्दः | ५ | १६ | ८ | इत्येवमुक्तास्ते पित्रा | १ | १४ | १८ |
| इत्युक्त्वा चोदयामास | ५ | १९ | ९ | इत्येवमुक्त्वा तां देवीम् | १ | २१ | ३४ |
| इत्युक्त्वा भगवांस्तूष्णीम् | ५ | ३ | १५ | इत्येष तैऽशः प्रथमः | १ | २२ | ८८ |
| इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ | ५ | १९ | १२ | इत्येते मुनिवर्योक्ताः | २ | २ | ४५ |
| इत्युक्त्वा तद्गृहात्कृष्णः | ५ | १९ | २९ | इत्येवं तव मैत्रेय | २ | ४ | २१ |
| इत्युक्तस्सोऽग्रजेनाथ | ५ | २० | ३५ | इत्येष सन्निवेशोऽयम् | २ | १२ | ३५ |
| इत्युक्त्वाथ प्रणम्योभौ | ५ | २१ | ६ | इत्येतास्तनवस्तस्य | ३ | १ | ४४ |
| इत्युक्त्वा सोऽस्मरद्वायुम् | ५ | २१ | १३ | इत्येताः प्रतिशाखाभ्यः | ३ | ४ | २५ |
| इत्युक्तः पवनो गत्वा | ५ | २१ | १६ | इत्येवमादिभिस्तेन | ३ | ५ | २६ |
| इत्युक्तोऽन्तर्जलं गत्वा | ५ | २१ | २८ | इत्येते कथिता राजन् | ३ | ८ | ४१ |
| इत्युक्तः प्रणिपत्येशम् | ५ | २४ | ४ | इत्येतेऽतित्थयः प्रोक्ताः | ३ | ११ | ६७ |
| इत्युक्ता वारुणी तेन | ५ | २५ | ४ | इत्येतत्पितृभिर्गीतम् | ३ | १४ | ३१ |
| इत्युक्तयातिसन्त्रासात् | ५ | २५ | १४ | इत्येतन्मान्धातृ० | ४ | २ | १३२ |
| इत्युक्तश्शम्बरं युद्धे | ५ | २७ | १८ | इत्येते मैथिलाः | ४ | ५ | ३३ |