विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 558 में से
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पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनि Node -> पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनि Node? Let's check text: पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनि Node -> पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनिताजनः। पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनिताजनः । बिभर्ति यस्य भृत्यानां सोऽप्येषां न महीपतिः ॥ २५
समस्तभूभृतां नाथ उग्रसेनस्स तिष्ठतु । अद्य निष्कौरवामुर्वीं कृत्वा यास्यामि तत्पुरीम् ॥ २६
कर्णं दुर्योधनं द्रोणमद्य भीष्मं सबाह्लिकम् । दुश्शासनादीन्भूरिं च भूरिश्रवसमेव च ॥ २७
सोमदत्तं शलं चैव भीमार्जुनयुधिष्ठिरान् । यमौ च कौरवांश्चान्यान्हत्वा साश्वरथद्विपान् ॥ २८
वीरमादाय तं साम्बं सपत्नीकं ततः पुरीम् । द्वारकामुग्रसेनादीन्गत्वा द्रक्ष्यामि बान्धवान् ॥ २९
अथ वा कौरवावासं समस्तैः कुरुभिस्सह । भागीरथ्यां क्षिपाम्याशु नगरं नागसाह्वयम् ॥ ३०
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा मदरक्ताक्षः कर्षणाधोमुखं हलम् । प्राकारवप्रदुर्गस्य चकर्ष मुसलायुधः ॥ ३१
आघूर्णितं तत्सहसा ततो वै हास्तिनं पुरम् । दृष्ट्वा संक्षुब्धहृदयाश्चचुक्षुभुः सर्वकौरवाः ॥ ३२
राम राम महाबाहो क्षम्यतां क्षम्यतां त्वया । उपसंह्रियतां कोपः प्रसीद मुसलायुध ॥ ३३
एष साम्बस्सपत्नीकस्तव निर्यांतितो बल । अविज्ञातप्रभावाणां क्षम्यतामपराधिनाम् ॥ ३४
श्रीपराशर उवाच
ततो निर्यातयामासुस्साम्बं पत्नीसमन्वितम् । निष्क्रम्य स्वपुरात्तूर्णं कौरवा मुनिपुङ्गव ॥ ३५
भीष्मद्रोणकृपादीनां प्रणम्य वदतां प्रियम् । क्षान्तमेव मयेत्याह बलो बलवतां वरः ॥ ३६
अद्याप्याघूर्णिताकारं लक्ष्यते तत्पुरं द्विज । एष प्रभावो रामस्य बलशौर्योपलक्षणः ॥ ३७
ततस्तु कौरवास्साम्बं सम्पूज्य हलिना सह । प्रेषयामासुरुद्वाहधनभार्यासमन्वितम् ॥ ३८
कौरवोंको धिक्कार है जिन्हें सैकड़ों मनुष्योंके उच्छिष्ट राजसिंहासनमें इतनी तुष्टि है॥ २४॥ जिनके सेवकोंकी स्त्रियाँ भी पारिजात-वृक्षकी पुष्प-मंजरी धारण करती हैं वह भी इन कौरवोंके महाराज नहीं हैं? [यह कैसा आश्चर्य है?] ॥ २५॥ वे उग्रसेन ही सम्पूर्ण राजाओंके महाराज बनकर रहें। आज मैं अकेला ही पृथिवीको कौरवहीन करके उनकी द्वारकापुरीको जाऊँगा॥ २६॥ आज कर्ण, दुर्योधन, द्रोण, भीष्म, बाह्लिक, दुश्शासनादि, भूरि, भूरिश्रवा, सोमदत्त, शल, भीम, अर्जुन, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव तथा अन्यान्य समस्त कौरवोंको उनके हाथी-घोड़े और रथके सहित मारकर तथा नववधूके साथ वीरवर साम्बको लेकर ही मैं द्वारकापुरीमें जाकर उग्रसेन आदि अपने बन्धु-बान्धवोंको देखूँगा॥ २७-२९॥ अथवा समस्त कौरवोंके सहित उनके निवासस्थान इस हस्तिनापुर नगरको ही अभी गंगाजीमें फेंके देता हूँ' ॥ ३० ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर मदसे अरुणनयन मुसलायुध श्रीबलभद्रजीने हलकी नोंकको हस्तिनापुरके खाईं और दुर्गसे युक्त प्राकारके मूलमें लगाकर खींचा ॥ ३१ ॥ उस समय सम्पूर्ण हस्तिनापुर सहसा डगमगाता देख समस्त कौरवगण क्षुब्धचित्त होकर भयभीत हो गये ॥ ३२ ॥ [और कहने लगे—] “हे राम! हे राम! हे महाबाहो! क्षमा करो, क्षमा करो। हे मुसलायुध! अपना कोप शान्त करके प्रसन्न होइये ॥ ३३ ॥ हे बलराम! हम आपको पत्नीके सहित इस साम्बको सौंपते हैं। हम आपका प्रभाव नहीं जानते थे, इसीसे आपका अपराध किया; कृपया क्षमा कीजिये'' ॥ ३४ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर कौरवोंने तुरन्त ही अपने नगरसे बाहर आकर पत्नीसहित साम्बको श्रीबलरामजीके अर्पण कर दिया ॥ ३५ ॥ तब प्रणामपूर्वक प्रिय वाक्य बोलते हुए भीष्म, द्रोण, कृप आदिसे वीरवर बलरामजीने कहा—"अच्छा मैंने क्षमा किया' ॥ ३६ ॥ हे द्विज! इस समय भी हस्तिनापुर [गंगाकी ओर] कुछ झुका हुआ-सा दिखायी देता है, यह श्रीबलरामजीके बल और शूरवीरताका परिचय देनेवाला उनका प्रभाव ही है ॥ ३७ ॥ तदनन्तर कौरवोंने बलरामजीके सहित साम्बका पूजन किया तथा बहुत-से दहेज और वधूके सहित उन्हें द्वारकापुरी भेज दिया ॥ ३८ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥