भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

४१२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३५

गृहीत्वा विधिवत्सर्वं ततस्तानाह कौरवान्। आज्ञापयत्युग्रसेनस्साम्बमाशु विमुच्यता ॥१० ततस्तद्वचनं श्रुत्वा भीष्मद्रोणादयो नृपाः। कर्णदुर्योधनाद्याश्च चुक्षुभुर्द्विजसत्तम ॥ ११ ऊचुश्च कुपितास्सर्वे बाह्लिकाद्याश्च कौरवाः। अराज्यार्हं यदोर्वंशमवेक्ष्य मुसलायुधम् ॥ १२ भो भो किमेतद्भवता बलभद्रेरितं वचः। आज्ञां कुरुकुलोत्थानां यादवः कः प्रदास्यति ॥ १३ उग्रसेनोऽपि यद्याज्ञां कौरवाणां प्रदास्यति। तदलं पाण्डुरैश्छत्रैर्नृपयोग्यैर्विडम्बनैः॥ १४ तद्गच्छ बल मा वा त्वं साम्बमन्यायचेष्टितम्। विमोक्ष्यामो न भवतश्चोग्रसेनस्य शासनात् ॥ १५ प्रणतिर्या कृतास्माकं मान्यानां कुकुरा Clerkन्धकैः। ननाम सा कृता केयमाज्ञा स्वामिनि भृत्यतः ॥ १६ गर्वमारोपिता यूयं समानासनभोजनैः। को दोषो भवतां नीतिर्यत्प्रीत्या नावलोकिता ॥ १७ अस्माभिर्घो भवतो योऽयं बल निवेदितः। प्रेम्णैतन्नैतदस्माकं कुलाद्युष्मत्कुलोचितम् ॥ १८ श्रीपराशर उवाच इत्युक्त्वा कुरवः साम्बं मुञ्चामो न हरेस्सुतम्। कृतैकनिश्चयास्तूर्णं विविशुर्गजसाह्वयम् ॥ १९ मत्तः कोपेन चाघूर्णंस्ततोऽधिक्षेपजन्मना। उत्थाय पाष्ण्र्या वसुधां जघान स हलायुधः ॥ २० ततो विदारिता पृथ्वी पाणि्रघातान्महात्मनः। आस्फोटयामास तदा दिशश्शब्देन पूरयन् ॥ २१ उवाच चातिताम्राक्षो भृकुटीकुटिलाननः ॥ २२ अहो मदावलेपोऽयमसारणां दुरात्मनाम्। कौरवाणां महीपत्वमस्माकं किल कालजम्। उग्रसेनस्य ये नाज्ञां मन्यन्तेऽद्यापि लङ्घनम् ॥ २३ उग्रसेनः समध्यास्ते सुधर्मां न शचीपतिः। धिङ्मानुषशतोच्छिष्टे तुष्टिरेषां नृपासने ॥ २४

उन सबको विधिवत् ग्रहण कर बलभद्रजीने कौरवोंसे कहा—"राजा उग्रसेनकी आज्ञा है आपलोग साम्बको तुरन्त छोड़ दें" ॥१०॥ हे द्विजसत्तम ! बलरामजीके इन वचनोंको सुनकर भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि राजाओंको बड़ा क्षोभ हुआ॥ ११॥ और यदुवंशको राज्यपदके अयोग्य समझ बाह्लिक आदि सभी कौरवगण कुपित होकर मूसलधारी बलभद्रजीसे कहने लगे - ॥ १२॥ "हे बलभद्र ! तुम यह क्या कह रहे हो; ऐसा कौन यदुवंशी है जो कुरुकुलोत्पन्न किसी वीरको आज्ञा दे ? ॥ १३ ॥ यदि उग्रसेन भी कौरवोंको आज्ञा दे सकता है तो राजाओंके योग्य कौरवोंके इस श्वेत छत्रका क्या प्रयोजन है? ॥ १४ ॥ अतः हे बलराम ! तुम जाओ अथवा रहो, हमलोग तुम्हारी या उग्रसेनकी आज्ञासे अन्यायकर्मा साम्बको नहीं छोड़ सकते ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें कुकुर और अन्धकवंशीय यादवगण हम माननीयोंको प्रणाम किया करते थे सो अब वे ऐसा नहीं करते तो न सही, किन्तु स्वामीको यह सेवककी ओरसे आज्ञा देना कैसा ? ॥ १६ ॥ तुमलोगोंके साथ समान आसन और भोजनका व्यवहार करके तुम्हें हमहीने गर्वीला बना दिया है; इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है; क्योंकि हमने ही प्रीतिवश नीतिका विचार नहीं किया ॥ १७ ॥ हे बलराम ! हमने जो तुम्हें यह अर्घ्य आदि निवेदन किया है यह प्रेमवश ही किया है, वास्तवमें हमारे कुलकी तरफसे तुम्हारे कुलको अर्घ्यादि देना उचित नहीं है" ॥ १८॥ श्रीपराशरजी बोले- ऐसा कहकर कौरवगण यह निश्चय करके कि "हम कृष्णके पुत्र साम्बको नहीं छोड़ेंगे" तुरन्त हस्तिनापुरमें चले गये ॥ १९॥ तदनन्तर हलायुध श्रीबलरामजीने उनके तिरस्कारसे उत्पन्न हुए क्रोधसे मत्त होकर घूरते हुए पृथिवीमें लात मारी ॥ २० ॥ महात्मा बलरामजीके पाद-प्रहारसे पृथिवी फट गयी और वे अपने शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाकर कम्पायमान करने लगे तथा लाल- लाल नेत्र और टेढ़ी भृकुटि करके बोले- ॥ २१-२२॥ "अहो ! इन सारहीन दुरात्मा कौरवोंको यह कैसा राजमदका अभिमान है। कौरवोंका महीपालत्व तो स्वतःसिद्ध है और हमारा सामयिक - ऐसा समझकर ही आज ये महाराज उग्रसेनकी आज्ञा नहीं मानते; बल्कि उसका उल्लंघ्न कर रहे हैं ॥ २३॥ आज राजा उग्रसेन सुधर्मा-सभामें स्वयं विराजमान होते हैं, उसमें शचीपति इन्द्र भी नहीं बैठने पाते। परन्तु इन