भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 422

अ० ३५ ] * पञ्चम अंश * ४११

ज्वालापरिष्कृताशेषगृहप्राकारचत्वराम्।<br>ददाह तद्धरेश्चक्रं सकलामेव तां पुरीम्॥ ४३<br><br>अक्षीणामर्षमत्युग्रसाध्यसाधनसस्पृहम्।<br>तच्चक्रं प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोरभ्याययौ करम्॥ ४४लिये भी दुर्दर्शनीय थी, उसी काशीपुरीको भगवान् विष्णुके उस चक्रने उसके गृह, कोट और चबूतरोंमें अग्निकी ज्वालाएँ प्रकटकर जला डाला॥ ४२-४३॥ अन्तमें, जिसका क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ था तथा जो अत्यन्त उग्र कर्म करनेको उत्सुक था और जिसकी दीप्ति चारों ओर फैल रही थी, वह चक्र फिर लौटकर भगवान् विष्णुके हाथमें आ गया॥ ४४॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥


पैंतीसवाँ अध्याय

साम्बका विवाह

श्रीमैत्रेय उवाच<br>भूय एवाहमिच्छामि बलभद्रस्य धीमतः।<br>श्रोतुं पराक्रमं ब्रह्मन् तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ १<br>यमुनाकर्षणादीनि श्रुतानि भगवन्मया।<br>तत्कथ्यतां महाभाग यदन्यत्कृतवान्बलः॥ २<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>मैत्रेय श्रूयतां कर्म यद्रामेणाभवत्कृतम्।<br>अनन्तेनाप्रमेयेन शेषेण धरणीधृता॥ ३<br>सुयोधनस्य तनयां स्वयंवरकृतक्षणाम्।<br>बलादादत्तवान्वीरस्साम्बो जाम्बवतीसुतः॥ ४<br>ततः क्रुद्धा महावीर्याः कर्णदुर्योधनादयः।<br>भीष्मद्रोणादयश्चैनं बबन्धुर्युधि निर्जितम्॥ ५<br>तच्छ्रुत्वा यादवास्सर्वे क्रोधं दुर्योधनादिषु।<br>मैत्रेय चक्रुः कृष्णश्च तान्निहन्तुं महोद्यमम्॥ ६<br>तान्निवार्य बलः प्राह मदलोलक़लाक्षरम्।<br>मोक्ष्यन्ति ते मद्वचनाद्यास्याम्येको हि कौरवान्॥ ७<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>बलदेवस्ततो गत्वा नगरं नागसाह्वयम्।<br>बाह्योपवनमध्येऽभून्न विवेश च तत्पुरम्॥ ८<br>बलमागतमाज्ञाय भूपा दुर्योधनादयः।<br>गामर्घ्यमुदकं चैव रामाय प्रत्यवेदयन्॥ ९श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! अब मैं फिर मतिमान् बलभद्रजीके पराक्रमकी वार्ता सुनना चाहता हूँ, आप वर्णन कीजिये॥ १॥ हे भगवन्! मैंने उनके यमुनाकर्षणादि पराक्रम तो सुन लिये; अब हे महाभाग! उन्होंने जो और-और विक्रम दिखलाये हैं, उनका वर्णन कीजिये॥ २॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! अनन्त, अप्रमेय, धरणीधर शेषावतार श्रीबलरामजीने जो कर्म किये थे, वह सुनो—॥ ३॥<br><br>एक बार जाम्बवतीनन्दन वीरवर साम्बने स्वयंवरके अवसरपर दुर्योधनकी पुत्रीको बलात् हरण किया॥ ४॥ तब महावीर कर्ण, दुर्योधन, भीष्म और द्रोण आदिने क्रुद्ध होकर उसे युद्धमें हराकर बाँध लिया॥ ५॥ यह समाचार पाकर कृष्णचन्द्र आदि समस्त यादवोंने दुर्योधनादिपर क्रुद्ध होकर उन्हें मारनेके लिये बड़ी तैयारी की॥ ६॥ उनको रोककर श्रीबलरामजीने मदिराके उन्मादसे लड़खड़ाते हुए शब्दोंमें कहा—"कौरवगण मेरे कहनेसे साम्बको छोड़ देंगे, अतः मैं अकेला ही उनके पास जाता हूँ"॥ ७॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—तदनन्तर, श्रीबलदेवजी हस्तिनापुरके समीप पहुँचकर उसके बाहर एक उद्यानमें ठहर गये; उन्होंने नगरमें प्रवेश नहीं किया॥ ८॥ बलरामजीको आये जान दुर्योधन आदि राजाओंने उन्हें गौ, अर्घ्य और पाद्यादि निवेदन किये॥ ९॥