विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 421, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३४ |
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ज्ञात्वा तं वासुदेवेन हतं तस्य सुतस्ततः।
पुरोहितेन सहितस्तोषयामास शङ्करम्॥ २९
अविमुक्ते महाक्षेत्रे तोषितस्तेन शङ्करः।
वरं वृणीष्वेति तदा तं प्रोवाच नृपात्मजम्॥ ३०
स वव्रे भगवन्कृत्या पितृहन्तुर्वधाय मे।
समुत्तिष्ठतु कृष्णस्य त्वत्प्रसादान्महेश्वर॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
एवं भविष्यतीत्युक्ते दक्षिणाग्नेरनन्तरम्।
महाकृत्या समुत्तस्थौ तस्यैवाग्नेर्विनाशिनी॥ ३२
ततो ज्वालाकरालास्या ज्वलत्केशकपालिका।
कृष्ण कृष्णेति कुपिता कृत्या द्वारवतीं ययौ॥ ३३
तामवेक्ष्य जनस्त्रासाच्चिञ्चल्ललोचनो मुने।
ययौ शरण्यं जगतां शरणं मधुसूदनम्॥ ३४
काशिराजसुतेनेयमाराध्य वृषभध्वजम्।
उत्पादिता महाकृत्येत्यवगम्याथ चक्रिणा॥ ३५
जहि कृत्यामिमामुग्रां वह्निज्वालाजटालकाम्।
चक्रमुत्सृष्टमक्षेषु क्रीडासक्तेन लीलया॥ ३६
तदग्निमालाजटिलज्वालोद्गारातिभीषणाम्।
कृत्यामनुजगामाशु विष्णुचक्रं सुदर्शनम्॥ ३७
चक्रप्रतापनिर्दग्धा कृत्या माहेश्वरी तदा।
ननाश वेगिनी वेगात्तदप्यनुजगाम ताम्॥ ३८
कृत्या वाराणसीमेव प्रविवेश त्वरान्विता।
विष्णुचक्रप्रतिहतप्रभावा मुनिसत्तम॥ ३९
ततः काशीबलं भूरि प्रमथानां तथा बलम्।
समस्तशस्त्रास्त्रयुतं चक्रस्याभिमुखं ययौ॥ ४०
शस्त्रास्त्रमोक्षचतुरं दग्ध्वा तद्वलमोजसा।
कृत्यागर्भामशेषां तां तदा वाराणसीं पुरीम्॥ ४१
सभूभृद्भृत्यपौराँ तु साश्वमातङ्गमानवाम्।
अशेषगोष्ठकोशां तां दुर्निरीक्ष्यां सुरैरपि॥ ४२
जब उसके पुत्रको मालूम हुआ कि उसे श्रीवासुदेवने मारा है तो उसने अपने पुरोहितके साथ मिलकर भगवान् शंकरको सन्तुष्ट किया॥ २९॥ अविमुक्त महाक्षेत्रमें उस राजकुमारसे सन्तुष्ट होकर श्रीशंकरने कहा—‘वर माँग’॥ ३०॥ वह बोला—‘‘हे भगवन्! हे महेश्वर!! आपकी कृपासे मेरे पिताका वध करनेवाले कृष्णका नाश करनेके लिये (अग्निसे) कृत्या उत्पन्न हो’’*॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले— भगवान् शंकरने कहा, ‘ऐसा ही होगा।’ उनके ऐसा कहनेपर दक्षिणाग्निका चयन करनेके अनन्तर उससे उस अग्निका ही विनाश करनेवाली कृत्या उत्पन्न हुई॥ ३२॥ उसका कराल मुख ज्वालामालाओंसे पूर्ण था तथा उसके केश अग्निशिखाके समान दीप्तिमान् और ताम्रवर्ण थे। वह क्रोधपूर्वक ‘कृष्ण! कृष्ण!!’ कहती द्वारकापुरीमें आयी॥ ३३॥
हे मुने! उसे देखकर लोगोंने भय-विचलित नेत्रोंसे जगद्गति भगवान् मधुसूदनकी शरण ली॥ ३४॥ जब भगवान् चक्रपाणिने जाना कि श्रीशंकरकी उपासना कर काशिराजके पुत्रने ही यह महाकृत्या उत्पन्न की है तो अक्षक्रीडामें लगे हुए उन्होंने लीलासे ही यह कहकर कि ‘इस अग्निज्वालामयी जटाओंवाली भयंकर कृत्याको मार डाल’ अपना चक्र छोड़ा॥ ३५-३६॥
तब भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रने उस अग्नि-मालामण्डित जटाओंवाली और अग्निज्वालाओंके कारण भयानक मुखवाली कृत्याका पीछा किया॥ ३७॥ उस चक्रके तेजसे दग्ध होकर छिन्न-भिन्न होती हुई वह माहेश्वरी कृत्या अति वेगसे दौड़ने लगी तथा वह चक्र भी उतने ही वेगसे उसका पीछा करने लगा॥ ३८॥ हे मुनिश्रेष्ठ! अन्तमें विष्णुचक्रसे हतप्रभाव हुई कृत्याने शीघ्रतासे काशीमें ही प्रवेश किया॥ ३९॥ उस समय काशी-नरेशकी सम्पूर्ण सेना और प्रथमगण अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होकर उस चक्रके सम्मुख आये॥ ४०॥
तब वह चक्र अपने तेजसे शस्त्रास्त्र-प्रयोगमें कुशल उस सम्पूर्ण सेनाको दग्धकर कृत्याके सहित सम्पूर्ण वाराणसीको जलाने लगा॥ ४१॥ जो राजा, प्रजा और सेवकोंसे पूर्ण थी; घोड़े, हाथी और मनुष्योंसे भरी थी; सम्पूर्ण गोष्ठ और कोशोंसे युक्त थी और देवताओंके
* इस वाक्यका अर्थ यह भी होता है कि 'मेरे वधके लिये मेरे पिताके मारनेवाले कृष्णके पास कृत्या उत्पन्न हो।' इसलिये यदि इस वरका विपरीत परिणाम हुआ तो उसमें शंका नहीं करनी चाहिये।