भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 558 में से

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पृष्ठ 420

अ० ३४ ] * पञ्चम अंश * ४०९


ततस्तु केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपत्तिस्तदा।
सर्वसैन्यपरीवारः पार्ष्णिग्राह उपाययौ॥ १४

ततो बलेन महता काशिराजबलेन च।
पौण्ड्रको वासुदेवोऽसौ केशवाभिमुखो ययौ॥ १५

तं ददर्श हरिर्दूरादुदारस्यन्दने स्थितम्।
चक्रहस्तं गदाशार्ङ्गबाहुं पाणिगताम्बुजम्॥ १६

स्रग्धरं पीतवसनं सुपर्णरचितध्वजम्।
वक्षःस्थले कृतं चास्य श्रीवत्सं ददृशे हरिः॥ १७

किरीटकुण्डलधरं नानारत्नोपशोभितम्।
तं दृष्ट्वा भावगम्भीरं जहास गरुडध्वजः॥ १८

युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वबलिना द्विज।
निस्त्रिंशासिगदाशूलशक्तिकार्मुकशालिना॥ १९

क्षणेन शार्ङ्गनिर्मुक्तैश्शरैररिविदारणैः।
गदाचक्रनिपातैश्च सूदयामास तद्बलम्॥ २०

काशिराजबलं चैवं क्षयं नीत्वा जनार्दनः।
उवाच पौण्ड्रकं मूढमात्मचिह्नोपलक्षितम्॥ २१

श्रीभगवानुवाच
पौण्ड्रकोक्तं त्वया यत्तु दूतवक्त्रेण मां प्रति।
समुत्सृजेति चिह्नानि तत्ते सम्पादयाम्यहम्॥ २२

चक्रमेतत्त्समुत्सृष्टं गदेयं ते विसर्जिता।
गरुत्मानेष चोत्सृष्टस्समारोहतु ते ध्वजम्॥ २३

श्रीपराशर उवाच
इत्युच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ विदारितः।
पातितो गदया भग्नोध्वजश्चास्य गरुत्मता॥ २४

ततो हाहाकृते लोके काशिपुर्य्यधिपो बली।
युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः॥ २५

ततश्शार्ङ्गधनुर्मुक्तैश्छित्त्वा तस्य शिरश्शरैः।
काशिपुर्य्यां स चिक्षेप कुर्वँल्लोकस्य विस्मयम्॥ २६

हत्वा तं पौण्ड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम्।
पुनर्द्वारवतीं प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा॥ २७

तच्छिरः पतितं तत्र दृष्ट्वा काशिपतेः पुरे।
जनः किमेतदित्याहच्छिन्नं केनेति विस्मितः॥ २८


भगवान्‌के आक्रमणका समाचार सुनकर काशीनरेश भी उसका पृष्ठपोषक (सहायक) होकर अपनी सम्पूर्ण सेना ले उपस्थित हुआ॥ १४॥ तदनन्तर अपनी महान् सेनाके सहित काशीनरेशकी सेना लेकर पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णचन्द्रके सम्मुख आया॥ १५॥ भगवान्‌ने दूरसे ही उसे हाथमें चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और पद्म लिये एक उत्तम रथपर बैठे देखा॥ १६॥ श्रीहरिने देखा कि उसके कण्ठमें वैजयन्तीमाला है, शरीरमें पीताम्बर है, गरुडरचित ध्वजा है और वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न हैं॥ १७॥ उसे नाना प्रकारके रत्नोंसे सुसज्जित किरीट और कुण्डल धारण किये देखकर श्रीगरुडध्वज भगवान् गम्भीरभावसे हँसने लगे॥ १८॥ और हे द्विज! उसकी हाथी-घोड़ोंसे बलिष्ठ तथा निस्त्रिंश खड्ग, गदा, शूल, शक्ति और धनुष आदिसे सुसज्जित सेनासे युद्ध करने लगे॥ १९॥ श्रीभगवान्‌ने एक क्षणमें ही अपने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले तीक्ष्ण बाणों तथा गदा और चक्रसे उसकी सम्पूर्ण सेनाको नष्ट कर डाला॥ २०॥ इसी प्रकार काशिराजकी सेनाको भी नष्ट करके श्रीजनार्दनने अपने चिह्नोंसे युक्त मूढ़मति पौण्ड्रकसे कहा॥ २१॥

**श्रीभगवान् बोले—**हे पौण्ड्रक! मेरे प्रति तूने जो दूतके मुखसे यह कहलाया था कि मेरे चिह्नोंको छोड़ दे सो मैं तेरे सम्मुख उस आज्ञाको सम्पन्न करता हूँ॥ २२॥ देख, यह मैंने चक्र छोड़ दिया, यह तेरे ऊपर गदा भी छोड़ दी और यह गरुड भी छोड़े देता हूँ, यह तेरी ध्वजापर आरूढ़ हों॥ २३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर छोड़े हुए चक्रने पौण्ड्रकको विदीर्ण कर डाला, गदाने नीचे गिरा दिया और गरुडने उसकी ध्वजा तोड़ डाली॥ २४॥ तदनन्तर सम्पूर्ण सेनामें हाहाकार मच जानेपर अपने मित्रका बदला चुकानेके लिये खड़ा हुआ काशीनरेश श्रीवासुदेवसे लड़ने लगा॥ २५॥ तब भगवान्‌ने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए एक बाणसे उसका सिर काटकर सम्पूर्ण लोगोंको विस्मित करते हुए काशीपुरीमें फेंक दिया॥ २६॥ इस प्रकार पौण्ड्रक और काशीनरेशको अनुचरों-सहित मारकर भगवान् फिर द्वारकाको लौट आये और वहाँ स्वर्ग सदृश सुखका अनुभव करते हुए रमण करने लगे॥ २७॥

इधर काशीपुरीमें काशिराजका सिर गिरा देख सम्पूर्ण नगरनिवासी विस्मयपूर्वक कहने लगे—'यह क्या हुआ? इसे किसने काट डाला?'॥ २८॥

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