विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| ४०८ | ॐ श्रीविष्णुपुराण ॐ | [ अ० ३४ |
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चौंतीसवाँ अध्याय
पौण्ड्रक-वध तथा काशीदहन
| संस्कृत | हिन्दी |
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| श्रीमैत्रेय उवाच<br>चक्रे कर्म महच्छौरिर्बिभ्राणो मानुषीं तनुम्।<br>जिगाय शक्रं शर्वं च सर्वान्देवांश्च लीलया॥ १<br>यच्चान्यदकरोत्कर्म दिव्यचेष्टाविघातकृत्।<br>तत्कथ्यतां महाभाग परं कौतूहलं हि मे॥ २<br>श्रीपराशर उवाच<br>गदतो मम विप्रर्षे श्रूयतामिदमादरात्।<br>नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा॥ ३<br>पौण्ड्रको वासुदेवस्तु वासुदेवोऽभवद्भुवि।<br>अवतीर्णस्त्वमित्युक्तो जनैरज्ञानमोहितैः॥ ४<br>स मेने वासुदेवोऽहमवतीर्णो महीतले।<br>नष्टस्मृतिस्ततस्सर्वं विष्णुचिह्नमचीकरत्॥ ५<br>दूतं च प्रेषयामास कृष्णाय सुमहात्मने।<br>त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम चात्मनः॥ ६<br>वासुदेवात्मकं मूढ त्यक्त्वा सर्वमशेषतः।<br>आत्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रणतिं व्रज॥ ७<br>इत्युक्तस्सम्प्रहस्यैनं दूतं प्राह जनार्दनः।<br>निजचिह्नममं चक्रं समुत्स्रक्ष्ये त्वयीति वै॥ ८<br>वाच्यश्च पौण्ड्रको गत्वा त्वया दूत वचो मम।<br>ज्ञातस्तद्वाक्यसद्भावो यत्कार्यं तद्विधीयताम्॥ ९<br>गृहीतचिह्नवेषोऽहमागमिष्यामि ते पुरम्।<br>उत्स्रक्ष्यामि च तच्चक्रं निजचिह्नमसंशयम्॥ १०<br>आज्ञापूर्वं च यदिदमागच्छेति त्वयोदितम्।<br>सम्पादयिष्ये श्वस्तुभ्यं समागम्याविलम्बितम्॥ ११<br>शरणं ते समभ्येत्य कर्तास्मि नृपते तथा।<br>यथा त्वत्तो भयं भूयो न मे किञ्चिद्भविष्यति॥ १२<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तेऽपगते दूते संस्मृत्याभ्यागतं हरिः।<br>गरुत्मन्तमथारुह्य त्वरितस्तत्पुरं ययौ॥ १३ | श्रीमैत्रेयजी बोले—हे गुरो! श्रीविष्णुभगवान्ने मनुष्य-शरीर धारणकर जो लीलासे ही इन्द्र, शंकर और सम्पूर्ण देवगणको जीतकर महान् कर्म किये थे [वह मैं सुन चुका ]॥ १॥ इनके सिवा देवताओंकी चेष्टाओंका विघात करनेवाले उन्होंने और भी जो कर्म किये थे, हे महाभाग! वे सब मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है॥ २॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे ब्रह्मर्षे! भगवान्ने मनुष्यावतार लेकर जिस प्रकार काशीपुरी जलायी थी वह मैं सुनाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो॥ ३॥ पौण्ड्रकवंशीय वासुदेव नामक एक राजाको अज्ञानमोहित पुरुष 'आप वासुदेवरूपसे पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं' ऐसा कहकर स्तुति किया करते थे॥ ४॥ अन्तमें वह भी यही मानने लगा कि 'मैं वासुदेवरूपसे पृथिवीमें अवतीर्ण हुआ हूँ!' इस प्रकार आत्मविस्मृत हो जानेसे उसने विष्णुभगवान्के समस्त चिह्न धारण कर लिये॥ ५॥ और महात्मा कृष्णचन्द्रके पास यह सन्देश लेकर दूत भेजा कि “हे मूढ़! अपने वासुदेव नामको छोड़कर मेरे चक्र आदि सम्पूर्ण चिह्नोंको छोड़ दे और यदि तुझे जीवनकी इच्छा है तो मेरी शरणमें आ”॥ ६-७॥<br>दूतने जब इसी प्रकार कहा तो श्रीजनार्दन उससे हँसकर बोले—“ठीक है, मैं अपने चिह्न चक्रको तेरे प्रति छोड़ूँगा। हे दूत! मेरी ओरसे तू पौण्ड्रकसे जाकर यह कहना कि मैंने तेरे वाक्यका वास्तविक भाव समझ लिया है, तुझे जो करना हो सो कर॥ ८-९॥ मैं अपने चिह्न और वेष धारणकर तेरे नगरमें आऊँगा और निस्सन्देह अपने चिह्न चक्रको तेरे ऊपर छोड़ूँगा॥ १०॥ ‘और तूने जो आज्ञा करते हुए ‘आ’ ऐसा कहा है, सो मैं उसे भी अवश्य पालन करूँगा और कल शीघ्र ही तेरे पास पहुँचूँगा॥ ११॥ हे राजन्! तेरी शरणमें आकर मैं वही उपाय करूँगा जिससे फिर तुझसे मुझे कोई भय न रहे॥ १२॥<br>श्रीपराशरजी बोले—श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जब दूत चला गया तो भगवान् स्मरण करते ही उपस्थित हुए गरुडपर चढ़कर तुरंत उसकी राजधानीको चले॥ १३॥ |