विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३३ ] * पञ्चम अंश * [ ४०७
श्रीशंकर उवाच
कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ जाने त्वां पुरुषोत्तमम्।
परेशं परमात्मानमनादिनिधनं हरिम् ॥ ४१
देवतियर्ङ्मनुष्येषु शरीरग्रहणात्मिका।
लीलेयं सर्वभूतस्य तव चेष्टोपलक्षणा ॥ ४२
तत्प्रसीदाभयं दत्तं बाणस्यास्य मया प्रभो।
तत्त्वया नानृतं कार्यं यन्मया व्याहृतं वचः ॥ ४३
अस्मत्संश्रयदृप्तोऽयं नापराधी तवाव्यय।
मया दत्तवरो दैत्यस्तत्त्वां क्षमयाम्यहम् ॥ ४४
श्रीशंकरजी बोले— हे कृष्ण! हे कृष्ण!! हे जगन्नाथ!! मैं यह जानता हूँ कि आप पुरुषोत्तम परमेश्वर, परमात्मा और आदि-अन्तसे रहित श्रीहरि हैं ॥ ४१ ॥ आप सर्वभूतमय हैं। आप जो देव, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं यह आपकी स्वाधीन चेष्टाकी उपलक्षिका लीला ही है ॥ ४२ ॥ हे प्रभो! आप प्रसन्न होइये। मैंने इस बाणासुरको अभयदान दिया है। हे नाथ! मैंने जो वचन दिया है उसे आप मिथ्या न करें ॥ ४३ ॥ हे अव्यय! यह आपका अपराधी नहीं है; यह तो मेरा आश्रय पानेसे ही इतना गर्वीला हो गया है। इस दैत्यको मैंने ही वर दिया था, इसलिये मैं ही आपसे इसके लिये क्षमा कराता हूँ ॥ ४४ ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तः प्राह गोविन्दः शूलपाणिमुमापतिम्।
प्रसन्नवदनो भूत्वा गतामर्षोऽसुरं प्रति ॥ ४५
श्रीपराशरजी बोले— त्रिशूलपाणि भगवान् उमापतिके इस प्रकार कहनेपर श्रीगोविन्दने बाणासुरके प्रति क्रोधभाव त्याग दिया और प्रसन्नवदन होकर उनसे कहा— ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच
युष्मद्दत्तवरो वाणो जीवतामेष शङ्कर।
त्वद्वाक्यगौरवादेतन्मया चक्रं निवर्तितम् ॥ ४६
त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रष्टुमर्हसि शङ्कर ॥ ४७
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि ॥ ४८
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वदन्ति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर ॥ ४९
प्रसन्नोऽहं गमिष्यामि त्वं गच्छ वृषभध्वज ॥ ५०
श्रीभगवान् बोले— हे शंकर! यदि आपने इसे वर दिया है तो यह बाणासुर जीवित रहे। आपके वचनका मान रखनेके लिये मैं इस चक्रको रोके लेता हूँ ॥ ४६ ॥ आपने जो अभय दिया है वह सब मैंने भी दे दिया। हे शंकर! आप अपनेको मुझसे सर्वथा अभिन्न देखें ॥ ४७ ॥ आप यह भली प्रकार समझ लें कि जो मैं हूँ सो आप हैं तथा यह सम्पूर्ण जगत्, देव, असुर और मनुष्य आदि कोई भी मुझसे भिन्न नहीं हैं ॥ ४८ ॥ हे हर! जिन लोगोंका चित्त अविद्यासे मोहित है, वे भिन्नदर्शी पुरुष ही हम दोनोंमें भेद देखते और बतलाते हैं। हे वृषभध्वज! मैं प्रसन्न हूँ, आप पधारिये, मैं भी अब जाऊँगा ॥ ४९-५० ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्णः प्राद्युम्निर्यत्र तिष्ठति।
तद्बन्धफणिनो नेशुर्गरुडानिलपोथिताः ॥ ५१
ततोऽनिरुद्धमारोप्य सपत्नीकं गरुत्मति।
आजग्मुर्द्वारिकां रामकार्ष्णिदामोदराः पुरीम् ॥ ५२
पुत्रपौत्रैः परिवृतस्तत्र रेमे जनार्दनः।
देवीभिस्सततं विप्र भूभारतरणेच्छया ॥ ५३
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार कहकर भगवान् कृष्ण जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध थे वहाँ गये। उनके पहुँचते ही अनिरुद्धके बन्धनरूप समस्त नागगण गरुडके वेगसे उत्पन्न हुए वायुके प्रहारसे नष्ट हो गये ॥ ५१ ॥ तदनन्तर सपत्नीक अनिरुद्धको गरुडपर चढ़ाकर बलराम, प्रद्युम्न और कृष्णचन्द्र द्वाराकापुरीमें लौट आये ॥ ५२ ॥ हे विप्र! वहाँ भू-भार-हरणकी इच्छासे रहते हुए श्रीजनार्दन अपने पुत्र-पौत्रादिसे घिरे रहकर अपनी रानियोंके साथ रमण करने लगे ॥ ५३ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥