विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ३३ ] * पञ्चम अंश * [ ४०७
श्रीशंकर उवाच
कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ जाने त्वां पुरुषोत्तमम्।
परेशं परमात्मानमनादिनिधनं हरिम् ॥ ४१
देवतियर्ङ्मनुष्येषु शरीरग्रहणात्मिका।
लीलेयं सर्वभूतस्य तव चेष्टोपलक्षणा ॥ ४२
तत्प्रसीदाभयं दत्तं बाणस्यास्य मया प्रभो।
तत्त्वया नानृतं कार्यं यन्मया व्याहृतं वचः ॥ ४३
अस्मत्संश्रयदृप्तोऽयं नापराधी तवाव्यय।
मया दत्तवरो दैत्यस्तत्त्वां क्षमयाम्यहम् ॥ ४४
श्रीशंकरजी बोले— हे कृष्ण! हे कृष्ण!! हे जगन्नाथ!! मैं यह जानता हूँ कि आप पुरुषोत्तम परमेश्वर, परमात्मा और आदि-अन्तसे रहित श्रीहरि हैं ॥ ४१ ॥ आप सर्वभूतमय हैं। आप जो देव, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं यह आपकी स्वाधीन चेष्टाकी उपलक्षिका लीला ही है ॥ ४२ ॥ हे प्रभो! आप प्रसन्न होइये। मैंने इस बाणासुरको अभयदान दिया है। हे नाथ! मैंने जो वचन दिया है उसे आप मिथ्या न करें ॥ ४३ ॥ हे अव्यय! यह आपका अपराधी नहीं है; यह तो मेरा आश्रय पानेसे ही इतना गर्वीला हो गया है। इस दैत्यको मैंने ही वर दिया था, इसलिये मैं ही आपसे इसके लिये क्षमा कराता हूँ ॥ ४४ ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तः प्राह गोविन्दः शूलपाणिमुमापतिम्।
प्रसन्नवदनो भूत्वा गतामर्षोऽसुरं प्रति ॥ ४५
श्रीपराशरजी बोले— त्रिशूलपाणि भगवान् उमापतिके इस प्रकार कहनेपर श्रीगोविन्दने बाणासुरके प्रति क्रोधभाव त्याग दिया और प्रसन्नवदन होकर उनसे कहा— ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच
युष्मद्दत्तवरो वाणो जीवतामेष शङ्कर।
त्वद्वाक्यगौरवादेतन्मया चक्रं निवर्तितम् ॥ ४६
त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रष्टुमर्हसि शङ्कर ॥ ४७
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि ॥ ४८
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वदन्ति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर ॥ ४९
प्रसन्नोऽहं गमिष्यामि त्वं गच्छ वृषभध्वज ॥ ५०
श्रीभगवान् बोले— हे शंकर! यदि आपने इसे वर दिया है तो यह बाणासुर जीवित रहे। आपके वचनका मान रखनेके लिये मैं इस चक्रको रोके लेता हूँ ॥ ४६ ॥ आपने जो अभय दिया है वह सब मैंने भी दे दिया। हे शंकर! आप अपनेको मुझसे सर्वथा अभिन्न देखें ॥ ४७ ॥ आप यह भली प्रकार समझ लें कि जो मैं हूँ सो आप हैं तथा यह सम्पूर्ण जगत्, देव, असुर और मनुष्य आदि कोई भी मुझसे भिन्न नहीं हैं ॥ ४८ ॥ हे हर! जिन लोगोंका चित्त अविद्यासे मोहित है, वे भिन्नदर्शी पुरुष ही हम दोनोंमें भेद देखते और बतलाते हैं। हे वृषभध्वज! मैं प्रसन्न हूँ, आप पधारिये, मैं भी अब जाऊँगा ॥ ४९-५० ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्णः प्राद्युम्निर्यत्र तिष्ठति।
तद्बन्धफणिनो नेशुर्गरुडानिलपोथिताः ॥ ५१
ततोऽनिरुद्धमारोप्य सपत्नीकं गरुत्मति।
आजग्मुर्द्वारिकां रामकार्ष्णिदामोदराः पुरीम् ॥ ५२
पुत्रपौत्रैः परिवृतस्तत्र रेमे जनार्दनः।
देवीभिस्सततं विप्र भूभारतरणेच्छया ॥ ५३
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार कहकर भगवान् कृष्ण जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध थे वहाँ गये। उनके पहुँचते ही अनिरुद्धके बन्धनरूप समस्त नागगण गरुडके वेगसे उत्पन्न हुए वायुके प्रहारसे नष्ट हो गये ॥ ५१ ॥ तदनन्तर सपत्नीक अनिरुद्धको गरुडपर चढ़ाकर बलराम, प्रद्युम्न और कृष्णचन्द्र द्वाराकापुरीमें लौट आये ॥ ५२ ॥ हे विप्र! वहाँ भू-भार-हरणकी इच्छासे रहते हुए श्रीजनार्दन अपने पुत्र-पौत्रादिसे घिरे रहकर अपनी रानियोंके साथ रमण करने लगे ॥ ५३ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
| ४०८ | ॐ श्रीविष्णुपुराण ॐ | [ अ० ३४ |
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चौंतीसवाँ अध्याय
पौण्ड्रक-वध तथा काशीदहन
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>चक्रे कर्म महच्छौरिर्बिभ्राणो मानुषीं तनुम्।<br>जिगाय शक्रं शर्वं च सर्वान्देवांश्च लीलया॥ १<br>यच्चान्यदकरोत्कर्म दिव्यचेष्टाविघातकृत्।<br>तत्कथ्यतां महाभाग परं कौतूहलं हि मे॥ २<br>श्रीपराशर उवाच<br>गदतो मम विप्रर्षे श्रूयतामिदमादरात्।<br>नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा॥ ३<br>पौण्ड्रको वासुदेवस्तु वासुदेवोऽभवद्भुवि।<br>अवतीर्णस्त्वमित्युक्तो जनैरज्ञानमोहितैः॥ ४<br>स मेने वासुदेवोऽहमवतीर्णो महीतले।<br>नष्टस्मृतिस्ततस्सर्वं विष्णुचिह्नमचीकरत्॥ ५<br>दूतं च प्रेषयामास कृष्णाय सुमहात्मने।<br>त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम चात्मनः॥ ६<br>वासुदेवात्मकं मूढ त्यक्त्वा सर्वमशेषतः।<br>आत्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रणतिं व्रज॥ ७<br>इत्युक्तस्सम्प्रहस्यैनं दूतं प्राह जनार्दनः।<br>निजचिह्नममं चक्रं समुत्स्रक्ष्ये त्वयीति वै॥ ८<br>वाच्यश्च पौण्ड्रको गत्वा त्वया दूत वचो मम।<br>ज्ञातस्तद्वाक्यसद्भावो यत्कार्यं तद्विधीयताम्॥ ९<br>गृहीतचिह्नवेषोऽहमागमिष्यामि ते पुरम्।<br>उत्स्रक्ष्यामि च तच्चक्रं निजचिह्नमसंशयम्॥ १०<br>आज्ञापूर्वं च यदिदमागच्छेति त्वयोदितम्।<br>सम्पादयिष्ये श्वस्तुभ्यं समागम्याविलम्बितम्॥ ११<br>शरणं ते समभ्येत्य कर्तास्मि नृपते तथा।<br>यथा त्वत्तो भयं भूयो न मे किञ्चिद्भविष्यति॥ १२<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तेऽपगते दूते संस्मृत्याभ्यागतं हरिः।<br>गरुत्मन्तमथारुह्य त्वरितस्तत्पुरं ययौ॥ १३ | श्रीमैत्रेयजी बोले—हे गुरो! श्रीविष्णुभगवान्ने मनुष्य-शरीर धारणकर जो लीलासे ही इन्द्र, शंकर और सम्पूर्ण देवगणको जीतकर महान् कर्म किये थे [वह मैं सुन चुका ]॥ १॥ इनके सिवा देवताओंकी चेष्टाओंका विघात करनेवाले उन्होंने और भी जो कर्म किये थे, हे महाभाग! वे सब मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है॥ २॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे ब्रह्मर्षे! भगवान्ने मनुष्यावतार लेकर जिस प्रकार काशीपुरी जलायी थी वह मैं सुनाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो॥ ३॥ पौण्ड्रकवंशीय वासुदेव नामक एक राजाको अज्ञानमोहित पुरुष 'आप वासुदेवरूपसे पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं' ऐसा कहकर स्तुति किया करते थे॥ ४॥ अन्तमें वह भी यही मानने लगा कि 'मैं वासुदेवरूपसे पृथिवीमें अवतीर्ण हुआ हूँ!' इस प्रकार आत्मविस्मृत हो जानेसे उसने विष्णुभगवान्के समस्त चिह्न धारण कर लिये॥ ५॥ और महात्मा कृष्णचन्द्रके पास यह सन्देश लेकर दूत भेजा कि “हे मूढ़! अपने वासुदेव नामको छोड़कर मेरे चक्र आदि सम्पूर्ण चिह्नोंको छोड़ दे और यदि तुझे जीवनकी इच्छा है तो मेरी शरणमें आ”॥ ६-७॥<br>दूतने जब इसी प्रकार कहा तो श्रीजनार्दन उससे हँसकर बोले—“ठीक है, मैं अपने चिह्न चक्रको तेरे प्रति छोड़ूँगा। हे दूत! मेरी ओरसे तू पौण्ड्रकसे जाकर यह कहना कि मैंने तेरे वाक्यका वास्तविक भाव समझ लिया है, तुझे जो करना हो सो कर॥ ८-९॥ मैं अपने चिह्न और वेष धारणकर तेरे नगरमें आऊँगा और निस्सन्देह अपने चिह्न चक्रको तेरे ऊपर छोड़ूँगा॥ १०॥ ‘और तूने जो आज्ञा करते हुए ‘आ’ ऐसा कहा है, सो मैं उसे भी अवश्य पालन करूँगा और कल शीघ्र ही तेरे पास पहुँचूँगा॥ ११॥ हे राजन्! तेरी शरणमें आकर मैं वही उपाय करूँगा जिससे फिर तुझसे मुझे कोई भय न रहे॥ १२॥<br>श्रीपराशरजी बोले—श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जब दूत चला गया तो भगवान् स्मरण करते ही उपस्थित हुए गरुडपर चढ़कर तुरंत उसकी राजधानीको चले॥ १३॥ |
अ० ३४ ] * पञ्चम अंश * ४०९
ततस्तु केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपत्तिस्तदा।
सर्वसैन्यपरीवारः पार्ष्णिग्राह उपाययौ॥ १४
ततो बलेन महता काशिराजबलेन च।
पौण्ड्रको वासुदेवोऽसौ केशवाभिमुखो ययौ॥ १५
तं ददर्श हरिर्दूरादुदारस्यन्दने स्थितम्।
चक्रहस्तं गदाशार्ङ्गबाहुं पाणिगताम्बुजम्॥ १६
स्रग्धरं पीतवसनं सुपर्णरचितध्वजम्।
वक्षःस्थले कृतं चास्य श्रीवत्सं ददृशे हरिः॥ १७
किरीटकुण्डलधरं नानारत्नोपशोभितम्।
तं दृष्ट्वा भावगम्भीरं जहास गरुडध्वजः॥ १८
युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वबलिना द्विज।
निस्त्रिंशासिगदाशूलशक्तिकार्मुकशालिना॥ १९
क्षणेन शार्ङ्गनिर्मुक्तैश्शरैररिविदारणैः।
गदाचक्रनिपातैश्च सूदयामास तद्बलम्॥ २०
काशिराजबलं चैवं क्षयं नीत्वा जनार्दनः।
उवाच पौण्ड्रकं मूढमात्मचिह्नोपलक्षितम्॥ २१
श्रीभगवानुवाच
पौण्ड्रकोक्तं त्वया यत्तु दूतवक्त्रेण मां प्रति।
समुत्सृजेति चिह्नानि तत्ते सम्पादयाम्यहम्॥ २२
चक्रमेतत्त्समुत्सृष्टं गदेयं ते विसर्जिता।
गरुत्मानेष चोत्सृष्टस्समारोहतु ते ध्वजम्॥ २३
श्रीपराशर उवाच
इत्युच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ विदारितः।
पातितो गदया भग्नोध्वजश्चास्य गरुत्मता॥ २४
ततो हाहाकृते लोके काशिपुर्य्यधिपो बली।
युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः॥ २५
ततश्शार्ङ्गधनुर्मुक्तैश्छित्त्वा तस्य शिरश्शरैः।
काशिपुर्य्यां स चिक्षेप कुर्वँल्लोकस्य विस्मयम्॥ २६
हत्वा तं पौण्ड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम्।
पुनर्द्वारवतीं प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा॥ २७
तच्छिरः पतितं तत्र दृष्ट्वा काशिपतेः पुरे।
जनः किमेतदित्याहच्छिन्नं केनेति विस्मितः॥ २८
भगवान्के आक्रमणका समाचार सुनकर काशीनरेश भी उसका पृष्ठपोषक (सहायक) होकर अपनी सम्पूर्ण सेना ले उपस्थित हुआ॥ १४॥ तदनन्तर अपनी महान् सेनाके सहित काशीनरेशकी सेना लेकर पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णचन्द्रके सम्मुख आया॥ १५॥ भगवान्ने दूरसे ही उसे हाथमें चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और पद्म लिये एक उत्तम रथपर बैठे देखा॥ १६॥ श्रीहरिने देखा कि उसके कण्ठमें वैजयन्तीमाला है, शरीरमें पीताम्बर है, गरुडरचित ध्वजा है और वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न हैं॥ १७॥ उसे नाना प्रकारके रत्नोंसे सुसज्जित किरीट और कुण्डल धारण किये देखकर श्रीगरुडध्वज भगवान् गम्भीरभावसे हँसने लगे॥ १८॥ और हे द्विज! उसकी हाथी-घोड़ोंसे बलिष्ठ तथा निस्त्रिंश खड्ग, गदा, शूल, शक्ति और धनुष आदिसे सुसज्जित सेनासे युद्ध करने लगे॥ १९॥ श्रीभगवान्ने एक क्षणमें ही अपने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले तीक्ष्ण बाणों तथा गदा और चक्रसे उसकी सम्पूर्ण सेनाको नष्ट कर डाला॥ २०॥ इसी प्रकार काशिराजकी सेनाको भी नष्ट करके श्रीजनार्दनने अपने चिह्नोंसे युक्त मूढ़मति पौण्ड्रकसे कहा॥ २१॥
**श्रीभगवान् बोले—**हे पौण्ड्रक! मेरे प्रति तूने जो दूतके मुखसे यह कहलाया था कि मेरे चिह्नोंको छोड़ दे सो मैं तेरे सम्मुख उस आज्ञाको सम्पन्न करता हूँ॥ २२॥ देख, यह मैंने चक्र छोड़ दिया, यह तेरे ऊपर गदा भी छोड़ दी और यह गरुड भी छोड़े देता हूँ, यह तेरी ध्वजापर आरूढ़ हों॥ २३॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर छोड़े हुए चक्रने पौण्ड्रकको विदीर्ण कर डाला, गदाने नीचे गिरा दिया और गरुडने उसकी ध्वजा तोड़ डाली॥ २४॥ तदनन्तर सम्पूर्ण सेनामें हाहाकार मच जानेपर अपने मित्रका बदला चुकानेके लिये खड़ा हुआ काशीनरेश श्रीवासुदेवसे लड़ने लगा॥ २५॥ तब भगवान्ने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए एक बाणसे उसका सिर काटकर सम्पूर्ण लोगोंको विस्मित करते हुए काशीपुरीमें फेंक दिया॥ २६॥ इस प्रकार पौण्ड्रक और काशीनरेशको अनुचरों-सहित मारकर भगवान् फिर द्वारकाको लौट आये और वहाँ स्वर्ग सदृश सुखका अनुभव करते हुए रमण करने लगे॥ २७॥
इधर काशीपुरीमें काशिराजका सिर गिरा देख सम्पूर्ण नगरनिवासी विस्मयपूर्वक कहने लगे—'यह क्या हुआ? इसे किसने काट डाला?'॥ २८॥
| ४१० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३४ |
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ज्ञात्वा तं वासुदेवेन हतं तस्य सुतस्ततः।
पुरोहितेन सहितस्तोषयामास शङ्करम्॥ २९
अविमुक्ते महाक्षेत्रे तोषितस्तेन शङ्करः।
वरं वृणीष्वेति तदा तं प्रोवाच नृपात्मजम्॥ ३०
स वव्रे भगवन्कृत्या पितृहन्तुर्वधाय मे।
समुत्तिष्ठतु कृष्णस्य त्वत्प्रसादान्महेश्वर॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
एवं भविष्यतीत्युक्ते दक्षिणाग्नेरनन्तरम्।
महाकृत्या समुत्तस्थौ तस्यैवाग्नेर्विनाशिनी॥ ३२
ततो ज्वालाकरालास्या ज्वलत्केशकपालिका।
कृष्ण कृष्णेति कुपिता कृत्या द्वारवतीं ययौ॥ ३३
तामवेक्ष्य जनस्त्रासाच्चिञ्चल्ललोचनो मुने।
ययौ शरण्यं जगतां शरणं मधुसूदनम्॥ ३४
काशिराजसुतेनेयमाराध्य वृषभध्वजम्।
उत्पादिता महाकृत्येत्यवगम्याथ चक्रिणा॥ ३५
जहि कृत्यामिमामुग्रां वह्निज्वालाजटालकाम्।
चक्रमुत्सृष्टमक्षेषु क्रीडासक्तेन लीलया॥ ३६
तदग्निमालाजटिलज्वालोद्गारातिभीषणाम्।
कृत्यामनुजगामाशु विष्णुचक्रं सुदर्शनम्॥ ३७
चक्रप्रतापनिर्दग्धा कृत्या माहेश्वरी तदा।
ननाश वेगिनी वेगात्तदप्यनुजगाम ताम्॥ ३८
कृत्या वाराणसीमेव प्रविवेश त्वरान्विता।
विष्णुचक्रप्रतिहतप्रभावा मुनिसत्तम॥ ३९
ततः काशीबलं भूरि प्रमथानां तथा बलम्।
समस्तशस्त्रास्त्रयुतं चक्रस्याभिमुखं ययौ॥ ४०
शस्त्रास्त्रमोक्षचतुरं दग्ध्वा तद्वलमोजसा।
कृत्यागर्भामशेषां तां तदा वाराणसीं पुरीम्॥ ४१
सभूभृद्भृत्यपौराँ तु साश्वमातङ्गमानवाम्।
अशेषगोष्ठकोशां तां दुर्निरीक्ष्यां सुरैरपि॥ ४२
जब उसके पुत्रको मालूम हुआ कि उसे श्रीवासुदेवने मारा है तो उसने अपने पुरोहितके साथ मिलकर भगवान् शंकरको सन्तुष्ट किया॥ २९॥ अविमुक्त महाक्षेत्रमें उस राजकुमारसे सन्तुष्ट होकर श्रीशंकरने कहा—‘वर माँग’॥ ३०॥ वह बोला—‘‘हे भगवन्! हे महेश्वर!! आपकी कृपासे मेरे पिताका वध करनेवाले कृष्णका नाश करनेके लिये (अग्निसे) कृत्या उत्पन्न हो’’*॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले— भगवान् शंकरने कहा, ‘ऐसा ही होगा।’ उनके ऐसा कहनेपर दक्षिणाग्निका चयन करनेके अनन्तर उससे उस अग्निका ही विनाश करनेवाली कृत्या उत्पन्न हुई॥ ३२॥ उसका कराल मुख ज्वालामालाओंसे पूर्ण था तथा उसके केश अग्निशिखाके समान दीप्तिमान् और ताम्रवर्ण थे। वह क्रोधपूर्वक ‘कृष्ण! कृष्ण!!’ कहती द्वारकापुरीमें आयी॥ ३३॥
हे मुने! उसे देखकर लोगोंने भय-विचलित नेत्रोंसे जगद्गति भगवान् मधुसूदनकी शरण ली॥ ३४॥ जब भगवान् चक्रपाणिने जाना कि श्रीशंकरकी उपासना कर काशिराजके पुत्रने ही यह महाकृत्या उत्पन्न की है तो अक्षक्रीडामें लगे हुए उन्होंने लीलासे ही यह कहकर कि ‘इस अग्निज्वालामयी जटाओंवाली भयंकर कृत्याको मार डाल’ अपना चक्र छोड़ा॥ ३५-३६॥
तब भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रने उस अग्नि-मालामण्डित जटाओंवाली और अग्निज्वालाओंके कारण भयानक मुखवाली कृत्याका पीछा किया॥ ३७॥ उस चक्रके तेजसे दग्ध होकर छिन्न-भिन्न होती हुई वह माहेश्वरी कृत्या अति वेगसे दौड़ने लगी तथा वह चक्र भी उतने ही वेगसे उसका पीछा करने लगा॥ ३८॥ हे मुनिश्रेष्ठ! अन्तमें विष्णुचक्रसे हतप्रभाव हुई कृत्याने शीघ्रतासे काशीमें ही प्रवेश किया॥ ३९॥ उस समय काशी-नरेशकी सम्पूर्ण सेना और प्रथमगण अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होकर उस चक्रके सम्मुख आये॥ ४०॥
तब वह चक्र अपने तेजसे शस्त्रास्त्र-प्रयोगमें कुशल उस सम्पूर्ण सेनाको दग्धकर कृत्याके सहित सम्पूर्ण वाराणसीको जलाने लगा॥ ४१॥ जो राजा, प्रजा और सेवकोंसे पूर्ण थी; घोड़े, हाथी और मनुष्योंसे भरी थी; सम्पूर्ण गोष्ठ और कोशोंसे युक्त थी और देवताओंके
* इस वाक्यका अर्थ यह भी होता है कि 'मेरे वधके लिये मेरे पिताके मारनेवाले कृष्णके पास कृत्या उत्पन्न हो।' इसलिये यदि इस वरका विपरीत परिणाम हुआ तो उसमें शंका नहीं करनी चाहिये।
अ० ३५ ] * पञ्चम अंश * ४११
| ज्वालापरिष्कृताशेषगृहप्राकारचत्वराम्।<br>ददाह तद्धरेश्चक्रं सकलामेव तां पुरीम्॥ ४३<br><br>अक्षीणामर्षमत्युग्रसाध्यसाधनसस्पृहम्।<br>तच्चक्रं प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोरभ्याययौ करम्॥ ४४ | लिये भी दुर्दर्शनीय थी, उसी काशीपुरीको भगवान् विष्णुके उस चक्रने उसके गृह, कोट और चबूतरोंमें अग्निकी ज्वालाएँ प्रकटकर जला डाला॥ ४२-४३॥ अन्तमें, जिसका क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ था तथा जो अत्यन्त उग्र कर्म करनेको उत्सुक था और जिसकी दीप्ति चारों ओर फैल रही थी, वह चक्र फिर लौटकर भगवान् विष्णुके हाथमें आ गया॥ ४४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
साम्बका विवाह
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>भूय एवाहमिच्छामि बलभद्रस्य धीमतः।<br>श्रोतुं पराक्रमं ब्रह्मन् तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ १<br>यमुनाकर्षणादीनि श्रुतानि भगवन्मया।<br>तत्कथ्यतां महाभाग यदन्यत्कृतवान्बलः॥ २<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>मैत्रेय श्रूयतां कर्म यद्रामेणाभवत्कृतम्।<br>अनन्तेनाप्रमेयेन शेषेण धरणीधृता॥ ३<br>सुयोधनस्य तनयां स्वयंवरकृतक्षणाम्।<br>बलादादत्तवान्वीरस्साम्बो जाम्बवतीसुतः॥ ४<br>ततः क्रुद्धा महावीर्याः कर्णदुर्योधनादयः।<br>भीष्मद्रोणादयश्चैनं बबन्धुर्युधि निर्जितम्॥ ५<br>तच्छ्रुत्वा यादवास्सर्वे क्रोधं दुर्योधनादिषु।<br>मैत्रेय चक्रुः कृष्णश्च तान्निहन्तुं महोद्यमम्॥ ६<br>तान्निवार्य बलः प्राह मदलोलक़लाक्षरम्।<br>मोक्ष्यन्ति ते मद्वचनाद्यास्याम्येको हि कौरवान्॥ ७<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>बलदेवस्ततो गत्वा नगरं नागसाह्वयम्।<br>बाह्योपवनमध्येऽभून्न विवेश च तत्पुरम्॥ ८<br>बलमागतमाज्ञाय भूपा दुर्योधनादयः।<br>गामर्घ्यमुदकं चैव रामाय प्रत्यवेदयन्॥ ९ | श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! अब मैं फिर मतिमान् बलभद्रजीके पराक्रमकी वार्ता सुनना चाहता हूँ, आप वर्णन कीजिये॥ १॥ हे भगवन्! मैंने उनके यमुनाकर्षणादि पराक्रम तो सुन लिये; अब हे महाभाग! उन्होंने जो और-और विक्रम दिखलाये हैं, उनका वर्णन कीजिये॥ २॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! अनन्त, अप्रमेय, धरणीधर शेषावतार श्रीबलरामजीने जो कर्म किये थे, वह सुनो—॥ ३॥<br><br>एक बार जाम्बवतीनन्दन वीरवर साम्बने स्वयंवरके अवसरपर दुर्योधनकी पुत्रीको बलात् हरण किया॥ ४॥ तब महावीर कर्ण, दुर्योधन, भीष्म और द्रोण आदिने क्रुद्ध होकर उसे युद्धमें हराकर बाँध लिया॥ ५॥ यह समाचार पाकर कृष्णचन्द्र आदि समस्त यादवोंने दुर्योधनादिपर क्रुद्ध होकर उन्हें मारनेके लिये बड़ी तैयारी की॥ ६॥ उनको रोककर श्रीबलरामजीने मदिराके उन्मादसे लड़खड़ाते हुए शब्दोंमें कहा—"कौरवगण मेरे कहनेसे साम्बको छोड़ देंगे, अतः मैं अकेला ही उनके पास जाता हूँ"॥ ७॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—तदनन्तर, श्रीबलदेवजी हस्तिनापुरके समीप पहुँचकर उसके बाहर एक उद्यानमें ठहर गये; उन्होंने नगरमें प्रवेश नहीं किया॥ ८॥ बलरामजीको आये जान दुर्योधन आदि राजाओंने उन्हें गौ, अर्घ्य और पाद्यादि निवेदन किये॥ ९॥ |
४१२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३५
गृहीत्वा विधिवत्सर्वं ततस्तानाह कौरवान्। आज्ञापयत्युग्रसेनस्साम्बमाशु विमुच्यता ॥१० ततस्तद्वचनं श्रुत्वा भीष्मद्रोणादयो नृपाः। कर्णदुर्योधनाद्याश्च चुक्षुभुर्द्विजसत्तम ॥ ११ ऊचुश्च कुपितास्सर्वे बाह्लिकाद्याश्च कौरवाः। अराज्यार्हं यदोर्वंशमवेक्ष्य मुसलायुधम् ॥ १२ भो भो किमेतद्भवता बलभद्रेरितं वचः। आज्ञां कुरुकुलोत्थानां यादवः कः प्रदास्यति ॥ १३ उग्रसेनोऽपि यद्याज्ञां कौरवाणां प्रदास्यति। तदलं पाण्डुरैश्छत्रैर्नृपयोग्यैर्विडम्बनैः॥ १४ तद्गच्छ बल मा वा त्वं साम्बमन्यायचेष्टितम्। विमोक्ष्यामो न भवतश्चोग्रसेनस्य शासनात् ॥ १५ प्रणतिर्या कृतास्माकं मान्यानां कुकुरा Clerkन्धकैः। ननाम सा कृता केयमाज्ञा स्वामिनि भृत्यतः ॥ १६ गर्वमारोपिता यूयं समानासनभोजनैः। को दोषो भवतां नीतिर्यत्प्रीत्या नावलोकिता ॥ १७ अस्माभिर्घो भवतो योऽयं बल निवेदितः। प्रेम्णैतन्नैतदस्माकं कुलाद्युष्मत्कुलोचितम् ॥ १८ श्रीपराशर उवाच इत्युक्त्वा कुरवः साम्बं मुञ्चामो न हरेस्सुतम्। कृतैकनिश्चयास्तूर्णं विविशुर्गजसाह्वयम् ॥ १९ मत्तः कोपेन चाघूर्णंस्ततोऽधिक्षेपजन्मना। उत्थाय पाष्ण्र्या वसुधां जघान स हलायुधः ॥ २० ततो विदारिता पृथ्वी पाणि्रघातान्महात्मनः। आस्फोटयामास तदा दिशश्शब्देन पूरयन् ॥ २१ उवाच चातिताम्राक्षो भृकुटीकुटिलाननः ॥ २२ अहो मदावलेपोऽयमसारणां दुरात्मनाम्। कौरवाणां महीपत्वमस्माकं किल कालजम्। उग्रसेनस्य ये नाज्ञां मन्यन्तेऽद्यापि लङ्घनम् ॥ २३ उग्रसेनः समध्यास्ते सुधर्मां न शचीपतिः। धिङ्मानुषशतोच्छिष्टे तुष्टिरेषां नृपासने ॥ २४
उन सबको विधिवत् ग्रहण कर बलभद्रजीने कौरवोंसे कहा—"राजा उग्रसेनकी आज्ञा है आपलोग साम्बको तुरन्त छोड़ दें" ॥१०॥ हे द्विजसत्तम ! बलरामजीके इन वचनोंको सुनकर भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि राजाओंको बड़ा क्षोभ हुआ॥ ११॥ और यदुवंशको राज्यपदके अयोग्य समझ बाह्लिक आदि सभी कौरवगण कुपित होकर मूसलधारी बलभद्रजीसे कहने लगे - ॥ १२॥ "हे बलभद्र ! तुम यह क्या कह रहे हो; ऐसा कौन यदुवंशी है जो कुरुकुलोत्पन्न किसी वीरको आज्ञा दे ? ॥ १३ ॥ यदि उग्रसेन भी कौरवोंको आज्ञा दे सकता है तो राजाओंके योग्य कौरवोंके इस श्वेत छत्रका क्या प्रयोजन है? ॥ १४ ॥ अतः हे बलराम ! तुम जाओ अथवा रहो, हमलोग तुम्हारी या उग्रसेनकी आज्ञासे अन्यायकर्मा साम्बको नहीं छोड़ सकते ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें कुकुर और अन्धकवंशीय यादवगण हम माननीयोंको प्रणाम किया करते थे सो अब वे ऐसा नहीं करते तो न सही, किन्तु स्वामीको यह सेवककी ओरसे आज्ञा देना कैसा ? ॥ १६ ॥ तुमलोगोंके साथ समान आसन और भोजनका व्यवहार करके तुम्हें हमहीने गर्वीला बना दिया है; इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है; क्योंकि हमने ही प्रीतिवश नीतिका विचार नहीं किया ॥ १७ ॥ हे बलराम ! हमने जो तुम्हें यह अर्घ्य आदि निवेदन किया है यह प्रेमवश ही किया है, वास्तवमें हमारे कुलकी तरफसे तुम्हारे कुलको अर्घ्यादि देना उचित नहीं है" ॥ १८॥ श्रीपराशरजी बोले- ऐसा कहकर कौरवगण यह निश्चय करके कि "हम कृष्णके पुत्र साम्बको नहीं छोड़ेंगे" तुरन्त हस्तिनापुरमें चले गये ॥ १९॥ तदनन्तर हलायुध श्रीबलरामजीने उनके तिरस्कारसे उत्पन्न हुए क्रोधसे मत्त होकर घूरते हुए पृथिवीमें लात मारी ॥ २० ॥ महात्मा बलरामजीके पाद-प्रहारसे पृथिवी फट गयी और वे अपने शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाकर कम्पायमान करने लगे तथा लाल- लाल नेत्र और टेढ़ी भृकुटि करके बोले- ॥ २१-२२॥ "अहो ! इन सारहीन दुरात्मा कौरवोंको यह कैसा राजमदका अभिमान है। कौरवोंका महीपालत्व तो स्वतःसिद्ध है और हमारा सामयिक - ऐसा समझकर ही आज ये महाराज उग्रसेनकी आज्ञा नहीं मानते; बल्कि उसका उल्लंघ्न कर रहे हैं ॥ २३॥ आज राजा उग्रसेन सुधर्मा-सभामें स्वयं विराजमान होते हैं, उसमें शचीपति इन्द्र भी नहीं बैठने पाते। परन्तु इन
अ० ३५ ] * पञ्चम अंश * ४१३
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समस्तभूभृतां नाथ उग्रसेनस्स तिष्ठतु । अद्य निष्कौरवामुर्वीं कृत्वा यास्यामि तत्पुरीम् ॥ २६
कर्णं दुर्योधनं द्रोणमद्य भीष्मं सबाह्लिकम् । दुश्शासनादीन्भूरिं च भूरिश्रवसमेव च ॥ २७
सोमदत्तं शलं चैव भीमार्जुनयुधिष्ठिरान् । यमौ च कौरवांश्चान्यान्हत्वा साश्वरथद्विपान् ॥ २८
वीरमादाय तं साम्बं सपत्नीकं ततः पुरीम् । द्वारकामुग्रसेनादीन्गत्वा द्रक्ष्यामि बान्धवान् ॥ २९
अथ वा कौरवावासं समस्तैः कुरुभिस्सह । भागीरथ्यां क्षिपाम्याशु नगरं नागसाह्वयम् ॥ ३०
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा मदरक्ताक्षः कर्षणाधोमुखं हलम् । प्राकारवप्रदुर्गस्य चकर्ष मुसलायुधः ॥ ३१
आघूर्णितं तत्सहसा ततो वै हास्तिनं पुरम् । दृष्ट्वा संक्षुब्धहृदयाश्चचुक्षुभुः सर्वकौरवाः ॥ ३२
राम राम महाबाहो क्षम्यतां क्षम्यतां त्वया । उपसंह्रियतां कोपः प्रसीद मुसलायुध ॥ ३३
एष साम्बस्सपत्नीकस्तव निर्यांतितो बल । अविज्ञातप्रभावाणां क्षम्यतामपराधिनाम् ॥ ३४
श्रीपराशर उवाच
ततो निर्यातयामासुस्साम्बं पत्नीसमन्वितम् । निष्क्रम्य स्वपुरात्तूर्णं कौरवा मुनिपुङ्गव ॥ ३५
भीष्मद्रोणकृपादीनां प्रणम्य वदतां प्रियम् । क्षान्तमेव मयेत्याह बलो बलवतां वरः ॥ ३६
अद्याप्याघूर्णिताकारं लक्ष्यते तत्पुरं द्विज । एष प्रभावो रामस्य बलशौर्योपलक्षणः ॥ ३७
ततस्तु कौरवास्साम्बं सम्पूज्य हलिना सह । प्रेषयामासुरुद्वाहधनभार्यासमन्वितम् ॥ ३८
कौरवोंको धिक्कार है जिन्हें सैकड़ों मनुष्योंके उच्छिष्ट राजसिंहासनमें इतनी तुष्टि है॥ २४॥ जिनके सेवकोंकी स्त्रियाँ भी पारिजात-वृक्षकी पुष्प-मंजरी धारण करती हैं वह भी इन कौरवोंके महाराज नहीं हैं? [यह कैसा आश्चर्य है?] ॥ २५॥ वे उग्रसेन ही सम्पूर्ण राजाओंके महाराज बनकर रहें। आज मैं अकेला ही पृथिवीको कौरवहीन करके उनकी द्वारकापुरीको जाऊँगा॥ २६॥ आज कर्ण, दुर्योधन, द्रोण, भीष्म, बाह्लिक, दुश्शासनादि, भूरि, भूरिश्रवा, सोमदत्त, शल, भीम, अर्जुन, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव तथा अन्यान्य समस्त कौरवोंको उनके हाथी-घोड़े और रथके सहित मारकर तथा नववधूके साथ वीरवर साम्बको लेकर ही मैं द्वारकापुरीमें जाकर उग्रसेन आदि अपने बन्धु-बान्धवोंको देखूँगा॥ २७-२९॥ अथवा समस्त कौरवोंके सहित उनके निवासस्थान इस हस्तिनापुर नगरको ही अभी गंगाजीमें फेंके देता हूँ' ॥ ३० ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर मदसे अरुणनयन मुसलायुध श्रीबलभद्रजीने हलकी नोंकको हस्तिनापुरके खाईं और दुर्गसे युक्त प्राकारके मूलमें लगाकर खींचा ॥ ३१ ॥ उस समय सम्पूर्ण हस्तिनापुर सहसा डगमगाता देख समस्त कौरवगण क्षुब्धचित्त होकर भयभीत हो गये ॥ ३२ ॥ [और कहने लगे—] “हे राम! हे राम! हे महाबाहो! क्षमा करो, क्षमा करो। हे मुसलायुध! अपना कोप शान्त करके प्रसन्न होइये ॥ ३३ ॥ हे बलराम! हम आपको पत्नीके सहित इस साम्बको सौंपते हैं। हम आपका प्रभाव नहीं जानते थे, इसीसे आपका अपराध किया; कृपया क्षमा कीजिये'' ॥ ३४ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर कौरवोंने तुरन्त ही अपने नगरसे बाहर आकर पत्नीसहित साम्बको श्रीबलरामजीके अर्पण कर दिया ॥ ३५ ॥ तब प्रणामपूर्वक प्रिय वाक्य बोलते हुए भीष्म, द्रोण, कृप आदिसे वीरवर बलरामजीने कहा—"अच्छा मैंने क्षमा किया' ॥ ३६ ॥ हे द्विज! इस समय भी हस्तिनापुर [गंगाकी ओर] कुछ झुका हुआ-सा दिखायी देता है, यह श्रीबलरामजीके बल और शूरवीरताका परिचय देनेवाला उनका प्रभाव ही है ॥ ३७ ॥ तदनन्तर कौरवोंने बलरामजीके सहित साम्बका पूजन किया तथा बहुत-से दहेज और वधूके सहित उन्हें द्वारकापुरी भेज दिया ॥ ३८ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
४१४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३६
छत्तीसवाँ अध्याय
द्विविद-वध
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! बलशाली बलरामजीका ऐसा ही पराक्रम था। अब, उन्होंने जो और एक कर्म किया था वह भी सुनो॥ १॥ द्विविद नामक एक महावीर्यशाली वानरश्रेष्ठ देवविरोधी दैत्यराज नरकासुरका मित्र था॥ २॥ भगवान् कृष्णने देवराज इन्द्रकी प्रेरणासे नरकासुरका वध किया था, इसलिये वीर वानर द्विविदने देवताओंसे वैर ठाना॥ ३॥ [उसने निश्चय किया कि] "मैं मर्त्यलोकका क्षय कर दूँगा और इस प्रकार यज्ञ-यागादिका उच्छेद करके सम्पूर्ण देवताओंसे इसका बदला चुका लूँगा"॥ ४॥ तबसे वह अज्ञानमोहित होकर यज्ञोंको विध्वंस करने लगा और साधुमर्यादाको मिटाने तथा देहधारी जीवोंको नष्ट करने लगा॥ ५॥ वह वन, देश, पुर और भिन्न-भिन्न ग्रामोंको जला देता तथा कभी पर्वत गिराकर ग्रामादिकोंको चूर्ण कर डालता॥ ६॥ कभी पहाड़ोंकी चट्टान उखाड़कर समुद्रके जलमें छोड़ देता और फिर कभी समुद्रमें घुसकर उसे क्षुभित कर देता॥ ७॥ हे द्विज! उससे क्षुभित हुआ समुद्र ऊँची-ऊँची तरंगोंसे उठकर अति वेगसे युक्त हो अपने तीरवर्ती ग्राम और पुर आदिको डुबो देता था॥ ८॥ वह कामरूपी वानर महान् रूप धारणकर लोटने लगता था और अपने लुण्ठनके संघर्षसे सम्पूर्ण धान्यों (खेतों)-को कुचल डालता था॥ ९॥ हे द्विज! उस दुरात्माने इस सम्पूर्ण जगत्को स्वाध्याय और वषट्कारसे शून्य कर दिया था, जिससे यह अत्यन्त दुःखमय हो गया॥ १०॥ |
|---|---|
| मैत्रेयैतद्बलं तस्य बलस्य बलशालिनः।<br>कृतं यदन्यत्तेनाभूत्तदपि श्रूयतां त्वया॥ १ | |
| नरकस्यासुरेन्द्रस्य देवपक्षविरोधिनः।<br>सखाभवन्महावीर्यो द्विविदो वानरर्षभः॥ २ | |
| वैरानुबन्धं बलवान्स चकार सुरान्प्रति।<br>नरकं हतवान्कृष्णो देवराजेन चोदितः॥ ३ | |
| करिष्ये सर्वदेवानां तस्मादेतत्प्रतिक्रियाम्।<br>यज्ञविध्वंसनं कुर्वन् मर्त्यलोकक्षयं तथा॥ ४ | |
| ततो विध्वंसयामास यज्ञानज्ञानमोहितः।<br>बिभेद साधुमर्यादां क्षयं चक्रे च देहिनाम्॥ ५ | |
| ददाह सवनान्देशान्पुर्ग्रामान्तराणि च।<br>क्वचिच्च पर्वताक्षेपैर्ग्रामादीन्ससमचूर्णयत्॥ ६ | |
| शैलानुत्पाट्य तोयेषु मुमोचाम्बुनिधौ तथा।<br>पुनश्चार्णवमध्यस्थः क्षोभयामास सागरम्॥ ७ | |
| तेन विक्षोभितश्चाब्धिरुद्वेलो द्विज जायते।<br>प्लावयंस्तीरजान्ग्रामान्पुरादीनतिवेगवान्॥ ८ | |
| कामरूपी महारूपं कृत्वा सस्यान्यशेषतः।<br>लुठन्भ्रमणसम्मर्दैस्सञ्चूर्णयति वानरः॥ ९ | |
| तेन विप्रकृतं सर्वं जगदेतदुरात्मना।<br>निस्स्वाध्यायवषट्कारं मैत्रेयासीत्सुदुःखितम्॥ १० | |
| एकदा रैवतोद्याने पपौ पानं हलायुधः।<br>रेवती च महाभागा तथैवान्या वरस्त्रियः॥ ११ | एक दिन श्रीबलभद्रजी रैवतोद्यानमें [क्रीड़ासक्त होकर] मद्यपान कर रहे थे। साथ ही महाभागा रेवती तथा अन्य सुन्दर रमणियाँ भी थीं॥ ११॥ उस समय यदुश्रेष्ठ श्रीबलरामजी मन्दराचलपर्वतपर कुबेरके समान [रैवतकपर स्वयं] रमण कर रहे थे॥ १२॥ इसी समय वहाँ द्विविद वानर आया और श्रीहलधरके हल और मूसल लेकर उनके सामने ही उनकी नकल करने लगा॥ १३॥ वह दुरात्मा वानर उन स्त्रियोंकी ओर देख-देखकर हँसने लगा और उसने मदिरासे भरे हुए घड़े फोड़कर फेंक दिये॥ १४॥ |
| उद्गीयमानो विलसल्ललनामौलिमध्यगः।<br>रेमे यदुकुलश्रेष्ठः कुबेर इव मन्दरे॥ १२ | |
| ततस्स वानरोऽभ्येत्य गृहीत्वा सीरिणो हलम्।<br>मुसलं च चकारास्य सम्मुखं च विडम्बनम्॥ १३ | |
| तथैव योषितां तासां जहासाभिमुखं कपिः।<br>पानपूर्णांश्च करकाञ्जिक्षेपाहत्य वै तदा॥ १४ |
अ० ३७ ] * पञ्चम अंश * ४१५
ततः कोपपरीतात्मा भर्त्सयामास तं हली।
तथापि तमवज्ञाय चक्रे किलकिलध्वनिम् ॥ १५
ततः स्मयित्वा स बलो जग्राह मुसलं रुषा।
सोऽपि शैलशिलां भीमां जग्राह प्लवगोत्तमः ॥ १६
चिक्षेप स च तां क्षिप्तां मुसलेन सहस्रधा।
बिभेद यादवश्रेष्ठस्सा पपात महीतले ॥ १७
अथ तन्मुसलं चासौ समुल्लङ्घ्य प्लवङ्गमः।
वेगेनागत्य रोषेण करेणोरस्यताडयत् ॥ १८
ततो बलेन कोपेन मुष्टिना मूर्ध्नि ताडितः।
पपात रुधिरोद्गारी द्विविदः क्षीणजीवितः ॥ १९
पतता तच्छरीरेण गिरेशृङ्गमशीर्यत।
मैत्रेय शतधा वज्रिवज्रेणेव विदारितम् ॥ २०
पुष्पवृष्टिं ततो देवा रामस्योपरि चिक्षिपुः।
प्रशंसुस्ततोऽभ्येत्य साध्वेतत्ते महत्कृतम् ॥ २१
अनेन दुष्टकपिना दैत्यपक्षोपकारिणा।
जगन्निराकृतं वीर दिष्ट्या स क्षयमागतः ॥ २२
इत्युक्त्वा दिवमाजग्मुर्देवा हृष्टास्सगुह्यकाः ॥ २३
श्रीपराशर उवाच
एवंविधान्यनेकानि बलदेवस्य धीमतः।
कर्माण्यपरिमेयानि शेषस्य धरणीभृतः ॥ २४
तब श्रीहलधरने क्रुद्ध होकर उसे धमकाया तथापि वह उनकी अवज्ञा करके किलकारी मारने लगा ॥ १५ ॥
तदनन्तर श्रीबलरामजीने मुसकाकर क्रोधसे अपना मूसल उठा लिया तथा उस वानरने भी एक भारी चट्टान ले ली ॥ १६ ॥ और उसे बलरामजीके ऊपर फेंकी, किन्तु यदुवीर बलभद्रजीने मूसलसे उसके हजारों टुकड़े कर दिये; जिससे वह पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ १७ ॥
तब उस वानरने बलरामजीके मूसलका वार बचाकर रोषपूर्वक अत्यन्त वेगसे उनकी छातीमें घूँसा मारा ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् बलभद्रजीने भी क्रुद्ध होकर द्विविदके सिरमें घूँसा मारा जिससे वह रुधिर वमन करता हुआ निर्जीव होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १९ ॥
हे मैत्रेय ! उसके गिरते समय उसके शरीरका आघात पाकर इन्द्र-वज्रसे विदीर्ण होनेके समान उस पर्वतके शिखरके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ २० ॥
उस समय देवतालोग बलरामजीके ऊपर फूल बरसाने लगे और वहाँ आकर "आपने यह बड़ा अच्छा किया" ऐसा कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २१ ॥ "हे वीर ! दैत्यपक्षके उपकारक इस दुष्ट वानरने संसारको बड़ा कष्ट दे रखा था; यह बड़े ही सौभाग्यका विषय है कि आज यह आपके हाथों मारा गया।" ऐसा कहकर गुह्यकोंके सहित देवगण अत्यन्त हर्षपूर्वक स्वर्गलोकको चले आये ॥ २२-२३ ॥
श्रीपराशरजी बोले— शेषावतार धरणीधर धीमान् बलभद्रजीके ऐसे ही अनेकों कर्म हैं, जिनका कोई परिमाण (तुलना) नहीं बताया जा सकता ॥ २४ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान्का स्वधाम सिधारना
श्रीपराशर उवाच
एवं दैत्यवधं कृष्णो बलदेवसहायवान्।
चक्रे दुष्टक्षितीशानां तथैव जगतः कृते ॥ १
क्षितेश्च भारं भगवान्फाल्गुनेन समन्वितः।
अवतारयामास विभुस्समस्ताक्षौहिणीवधात् ॥ २
कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलान्नृपान्।
शापव्याजेन विप्राणामुपसंहृतवान्कुलम् ॥ ३
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! इसी प्रकार संसारके उपकारके लिये बलभद्रजीके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने दैत्यों और दुष्ट राजाओंका वध किया ॥ १ ॥ तथा अन्तमें अर्जुनके साथ मिलकर भगवान् कृष्णने अठारह अक्षौहिणी सेनाको मारकर पृथिवीका भार उतारा ॥ २ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण राजाओंको मारकर पृथिवीका भारावतरण किया और फिर ब्राह्मणोंके शापके मिषसे अपने कुलका भी उपसंहार कर दिया ॥ ३ ॥
४१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३७
| उत्सृज्य द्वारकां कृष्णस्त्यक्त्वा मानुष्यमात्मनः।<br>सांशो विष्णुमयं स्थानं प्रविवेश मुने निजम्॥ ४ | हे मुने! अन्तमें द्वारकापुरीको छोड़कर तथा अपने मानव-शरीरको त्यागकर श्रीकृष्णचन्द्रने अपने अंश (बलराम-प्रद्युम्नादि)-के सहित अपने विष्णुमय धाममें प्रवेश किया॥ ४॥ |
|---|---|
| श्रीमैत्रेय उवाच | |
| स विप्रशापव्याजेन संजह्रे स्वकुलं कथम्।<br>कथं च मानुषं देहमुत्ससर्ज जनार्दनः॥ ५ | श्रीमैत्रेयजी बोले— हे मुने! श्रीजनार्दनने विप्रशापके मिषसे किस प्रकार अपने कुलका नाश किया और अपने मानव-देहको किस प्रकार छोड़ा?॥५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | |
| विश्वामित्रस्तथा कण्वो नारदश्च महामुनिः।<br>पिण्डारके महातीर्थे दृष्टा यदुकुमारकैः॥ ६ | श्रीपराशरजी बोले— एक बार कुछ यदुकुमारोंने महातीर्थ पिण्डारक क्षेत्रमें विश्वामित्र, कण्व और नारद आदि महामुनियोंको देखा॥ ६॥ |
| ततस्ते यौवनोन्मत्ता भाविकार्यप्रचोदिताः।<br>साम्बं जाम्बवतीपुत्रं भूषयित्वा स्त्रियं यथा॥ ७ | तब यौवनसे उन्मत्त हुए उन बालकोंने होनहारकी प्रेरणासे जाम्बवतीके पुत्र साम्बका स्त्री वेष बनाकर उन मुनीश्वरोंको प्रणाम करनेके अनन्तर अति नम्रतासे पूछा—‘‘इस स्त्रीको पुत्रकी इच्छा है, हे मुनिजन ! कहिये यह क्या जनेगी ?’’ ॥ ७-८॥ |
| प्रश्रितास्तान्मुनीनूचुः प्रणिपातपुरस्सरम्।<br>इयं स्त्री पुत्रकामा वै ब्रूत किं जनयिष्यति॥ ८ | |
| श्रीपराशर उवाच | |
| दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते विप्रलब्धाः कुमारकैः।<br>मुनयः कुपिताः प्रोचुर्मुसलं जनयिष्यति॥ ९ | श्रीपराशरजी बोले— यदुकुमारोंके इस प्रकार धोखा देनेपर उन दिव्य ज्ञानसम्पन्न मुनिजनोंने कुपित होकर कहा—‘‘यह एक लोकोत्तर मूसल जनेगी, जो समस्त यादवोंके नाशका कारण होगा और जिससे यादवोंका सम्पूर्ण कुल संसारमें निर्मूल हो जायगा॥९-१०॥ |
| सर्वयादवसंहारकारणं भुवनोत्तरम्।<br>येनाखिलकुलोत्सादो यादवानां भविष्यति॥ १० | |
| इत्युक्तास्ते कुमारास्तु आचचक्षुर्यथातथम्।<br>उग्रसेनाय मुसलं जज्ञे साम्बस्य चोदरात्॥ ११ | मुनिगणके इस प्रकार कहनेपर उन कुमारोंने सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों राजा उग्रसेनसे कह दिया तथा साम्बके पेटसे एक मूसल उत्पन्न हुआ॥ ११॥ |
| तदुग्रसेनो मुसलमयश्चूर्णमकारयत्।<br>जज्ञे तदेरकाचूर्णं प्रक्षिप्तं तैर्महोदधौ॥ १२ | उग्रसेनने उस लोहमय मूसलका चूर्ण करा डाला और उसे उन बालकोंने [ले जाकर] समुद्रमें फेंक दिया, उससे वहाँ बहुत-से सरकण्डे उत्पन्न हो गये॥ १२॥ |
| मुसलस्याथ लोहस्य चूर्णितस्य तु यादवैः।<br>खण्डं चूर्णितशेषं तु ततो यत्तोमराकृति॥ १३ | यादवोंद्वारा चूर्ण किये गये इस मूसलके लोहेका जो भालेकी नोंकके समान एक खण्ड चूर्ण करनेसे बचा उसे भी समुद्रहीमें फिकवा दिया। |
| तदप्यम्बुनिधौ क्षिप्तं मत्स्यो जग्राह जालिभिः।<br>घातितस्योदरात्तस्य लुब्धो जग्राह तज्जराः॥ १४ | उसे एक मछली निगल गयी। उस मछलीको मछेरोंने पकड़ लिया तथा चीरनेपर उसके पेटसे निकले हुए उस मूसलखण्डको जरा नामक व्याधने ले लिया॥ १३-१४॥ |
| विज्ञातपरमार्थोऽपि भगवान्मधुसूदनः।<br>नैच्छत्तदन्यथा कर्तुं विधिना यत्समीहितम्॥ १५ | भगवान् मधुसूदन इन समस्त बातोंको यथावत् जानते थे तथापि उन्होंने विधाताकी इच्छाको अन्यथा करना न चाहा॥ १५॥ |
| देवैश्च प्रहितो वायुः प्रणिपत्याह केशवम्।<br>रहस्येवमहं दूतः प्रहितो भगवन्सुरैः॥ १६ | इसी समय देवताओंने वायुको भेजा। उसने एकान्तमें श्रीकृष्णचन्द्रको प्रणाम करके कहा—‘‘भगवन्! मुझे देवताओंने दूत बनाकर भेजा है॥ १६॥ |
| वस्वश्विमरुदादित्यरुद्रसाध्यादिभिस्सह।<br>विज्ञापयति शक्रस्त्वां तदिदं श्रूयतां विभो॥ १७ | ‘हे विभो! वसुगण, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण और साध्यादिके सहित इन्द्रने आपको जो सन्देश भेजा है वह सुनिये॥ १७॥ |
अ० ३७ ]
- पञ्चम अंश * ४१७
भारावतरणार्थाय वर्षाणामधिकं शतम्। भगवानवतीर्णोऽत्र त्रिदशैस्सह चोदितः ॥ १८
दुर्वृत्ता निहता दैत्या भुवो भारोऽवतारितः। त्वया सनाथास्त्रिदशा भवन्तु त्रिदिवे सदा ॥ १९
तदतीतं जगन्नाथ वर्षाणामधिकं शतम्। इदानीं गम्यतां स्वर्गो भवता यदि रोचते ॥ २०
देवैर्विज्ञाप्यते देव तथात्रैव रतिस्तव। तत्स्थीयतां यथाकालमाख्येयमनुजीविभिः ॥ २१
श्रीभगवानुवाच
यत्त्वमात्थाखिलं दूत वेद्म्येतदहमप्युत। प्रारब्ध एव हि मया यादवानां परिक्षयः ॥ २२
भुवो नाद्यापि भारोऽयं यादवर्रैनिबर्हितैः। अवतार्य करोम्येतत्सप्तरात्रेण सत्वरः ॥ २३
यथा गृहीतामम्भोधेर्दत्त्वाहं द्वारकाभुवम्। यादवानुपसंहृत्य यास्यामि त्रिदशालयम् ॥ २४
मनुष्यदेहमुत्सृज्य संकर्षणसहायवान्। प्राप्त एवास्मि मन्तव्यो देवेन्द्रेण तथामरैः ॥ २५
जरासन्धादयो येऽन्ये निहता भारहेतवः। क्षितेस्तेभ्यः कुमारोऽपि यदूनां नापचीयते ॥ २६
तदेतं सुमहाभारमवतार्य क्षितेरहम्। यास्याम्यमरलोकस्य पालनाय ब्रवीहि तान् ॥ २७
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तो वासुदेवेन देवदूतः प्रणम्य तम्। मैत्रेय दिव्यया गत्या देवराजान्तिकं ययौ ॥ २८
भगवानप्यथोत्पातान्दिव्यभौमान्तरिक्षजान्। ददर्श द्वारकापुर्यां विनाशाय दिवानिशम् ॥ २९
तान्दृष्ट्वा यादवानाह पश्यध्वमतिदारुणान्। महोत्पाताञ्छ्छमायैषां प्रभासं याम मा चिरम् ॥ ३०
श्रीपराशर उवाच
एवमुक्ते तु कृष्णेन यादवप्रवरस्ततः। महाभागवतः प्राह प्रणिपत्योद्धवो हरिम् ॥ ३१
हे भगवन्! देवताओंकी प्रेरणासे उनके ही साथ पृथिवीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए आपको सौ वर्षसे अधिक बीत चुके हैं ॥ १८ ॥ अब आप दुराचारी दैत्योंको मार चुके और पृथिवीका भार भी उतार चुके, अतः [हमारी प्रार्थना है कि] अब देवगण सर्वदा स्वर्गमें ही आपसे सनाथ हों [अर्थात् आप स्वर्ग पधारकर देवताओंको सनाथ करें] ॥ १९ ॥ हे जगन्नाथ! आपको भूमण्डलमें पधारे हुए सौ वर्षसे अधिक हो गये, अब यदि आपको पसन्द आवे तो स्वर्गलोक पधारिये ॥ २० ॥ हे देव! देवगणका यह भी कथन है कि यदि आपको यहीं रहना अच्छा लगे तो रहें, सेवकोंका तो यही धर्म है कि [स्वामीको] यथासमय कर्तव्यका निवेदन कर दें' ॥ २१ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे दूत! तुम जो कुछ कहते हो वह मैं सब जानता हूँ, इसलिये अब मैंने यादवोंके नाशका आरम्भ कर ही दिया है ॥ २२ ॥ इन यादवोंका संहार हुए बिना अभीतक पृथिवीका भार हल्का नहीं हुआ है, अतः अब सात रात्रिके भीतर [इनका संहार करके] पृथिवीका भार उतारकर मैं शीघ्र ही [जैसा तुम कहते हो] वही करूँगा ॥ २३ ॥ जिस प्रकार यह द्वारकाकी भूमि मैंने समुद्रसे माँगी थी इसे उसी प्रकार उसे लौटाकर तथा यादवोंका उपसंहार कर मैं स्वर्गलोकमें आऊँगा ॥ २४ ॥ अब देवराज इन्द्र और देवताओंको यह समझना चाहिये कि संकर्षणके सहित मैं मनुष्य-शरीरको छोड़कर स्वर्ग पहुँच ही चुका हूँ ॥ २५ ॥ पृथिवीके भारभूत जो जरासन्ध आदि अन्य राजागण मारे गये हैं, ये यदुकुमार भी उनसे कम नहीं हैं ॥ २६ ॥ अतः तुम देवताओंसे जाकर कहो कि मैं पृथिवीके इस महाभारको उतारकर ही देवलोकका पालन करनेके लिये स्वर्गमें आऊँगा ॥ २७ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! भगवान् वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर देवदूत वायु उन्हें प्रणाम करके अपनी दिव्य गतिसे देवराजके पास चले आये ॥ २८ ॥ भगवान्ने देखा कि द्वारकापुरीमें रात-दिन नाशके सूचक दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष-सम्बन्धी महान् उत्पात हो रहे हैं ॥ २९ ॥ उन उत्पातोंको देखकर भगवान्ने यादवोंसे कहा— "देखो, ये कैसे घोर उपद्रव हो रहे हैं, चलो, शीघ्र ही इनकी शान्तिके लिये प्रभासक्षेत्रको चलें' ॥ ३० ॥
श्रीपराशरजी बोले— कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर महाभागवत यादवश्रेष्ठ उद्धवने श्रीहरिको प्रणाम करके
| ४१८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३७ |
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भगवन्मन्मया कार्यं तदाज्ञापय साम्प्रतम्।
मन्ये कुलमिदं सर्वं भगवान्संहरिष्यति॥ ३२
नाशायास्य निमित्तानि कुलस्याच्युत लक्षये॥ ३३
श्रीभगवानुवाच
गच्छ त्वं दिव्यया गत्या मत्प्रसादसमुत्थया।
यद्बदर्याश्रमं पुण्यं गन्धमादनपर्वते।
नरनारायणस्थाने तत्पवित्रं महीतले॥ ३४
मन्मना मत्प्रसादेन तत्र सिद्धिमवाप्स्यसि।
अहं स्वर्गं गमिष्यामि ह्युपसंहृत्य वै कुलम्॥ ३५
द्वारकां च मया त्यक्तां समुद्रः प्लावयिष्यति।
मद्देशम चैकं मुक्त्वा तु भयान्मत्तो जलाशये।
तत्र सन्निहितश्चाहं भक्तानां हितकाम्यया॥ ३६
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं जगामाशु तपोवनम्।
नरनारायणस्थानं केशवेनानुमोदितः॥ ३७
ततस्ते यादवास्सर्वे रथानारुह्य शीघ्रगान्।
प्रभासं प्रययुस्सार्धं कृष्णरामादिभिर्द्विज॥ ३८
प्रभासं समनुप्राप्ताः कुकुरान्धकवृष्णयः।
चक्रुस्तत्र महापानं वासुदेवेन चोदिताः॥ ३९
पिबतां तत्र चैतेषां सङ्घर्षेण परस्परम्।
अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्निः क्षयावहः॥ ४०
श्रीमैत्रेय उवाच
स्वं स्वं वै भुञ्जतां तेषां कलहः किन्निमित्तकः।
सङ्घर्षो वा द्विजश्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ ४१
श्रीपराशर उवाच
मृष्टं मदीयमनं ते न मृष्टमिति जल्पताम्।
मृष्टामृष्टकथा जज्ञे सङ्घर्षकलहौ ततः॥ ४२
ततश्चान्योन्यमभ्येत्य क्रोधसंरक्तलोचनाः।
जघ्नुः परस्परं ते तु शस्त्रैर्देवबलात्कृताः॥ ४३
क्षीणशस्त्राश्च जगृहुः प्रत्यासन्नामथैरकाम्॥ ४४
कहा—॥ ३१॥ “भगवन्! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब आप इस कुलका नाश करेंगे; क्योंकि हे अच्युत! इस समय सब ओर इसके नाशके सूचक कारण दिखायी दे रहे हैं, अतः मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं क्या करूँ?”॥ ३२-३३॥
श्रीभगवान् बोले—हे उद्धव! अब तुम मेरी कृपासे प्राप्त हुई दिव्य गतिसे नर-नारायणके निवासस्थान गन्धमादनपर्वतपर जो पवित्र बदरिकाश्रम क्षेत्र है वहाँ जाओ। पृथवीतलपर वही सबसे पावन स्थान है॥ ३४॥ वहाँपर मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपासे सिद्धि प्राप्त करोगे। अब मैं भी इस कुलका संहार करके स्वर्गलोकको चला जाऊँगा॥ ३५॥ मेरे छोड़ देनेपर सम्पूर्ण द्वारकाको समुद्र जलमें डुबो देगा; मुझसे भय माननेके कारण केवल मेरे भवनको छोड़ देगा; अपने इस भवनमें मैं भक्तोंकी हितकामनासे सर्वदा निवास करता हूँ॥ ३६॥
श्रीपराशरजी बोले—भगवान्के ऐसा कहनेपर उद्धवजी उन्हें प्रणामकर तुरन्त ही उनके बतलाये हुए तपोवन श्रीनरनारायणके स्थानको चले गये॥ ३७॥ हे द्विज! तदनन्तर कृष्ण और बलराम आदिके सहित सम्पूर्ण यादव शीघ्रगामी रथोंपर चढ़कर प्रभासक्षेत्रमें आये॥ ३८॥ वहाँ पहुँचकर कुकुर, अन्धक और वृष्णि आदि वंशोंके समस्त यादवोंने कृष्णचन्द्रकी प्रेरणासे महापान और भोजन$^१$ किया॥ ३९॥ पान करते समय उनमें परस्पर कुछ विवाद हो जानेसे वहाँ कुवाक्यरूप ईंधनसे युक्त प्रलयकारिणी कलहाग्नि धधक उठी॥ ४०॥
श्रीमैत्रेयजी बोले—हे द्विज! अपना-अपना भोजन करते हुए उन यादवोंमें किस कारणसे कलह (वाग्युद्ध) अथवा संघर्ष (हाथापाई) हुआ, सो आप कहिये॥ ४१॥
श्रीपराशरजी बोले—'मेरा भोजन शुद्ध है, तेरा अच्छा नहीं है।' इस प्रकार भोजनके अच्छे-बुरेकी चर्चा करते-करते उनमें परस्पर विवाद और हाथापाई हो गयी॥ ४२॥ तब वे दैवी प्रेरणासे विवश होकर आपसमें क्रोधसे रक्तनेत्र हुए एक-दूसरेपर शस्त्रप्रहार करने लगे और जब शस्त्र समाप्त हो गये तो पासहीमें उगे हुए सरकण्डे ले लिये॥ ४३-४४॥
१. मैत्रेयजीके अग्रिम प्रश्न और पराशरजीके उत्तरसे वहाँ यदुवंशियोंका अन्न-भोजन करना भी सिद्ध होता है।
अ० ३७ ] * पञ्चम अंश * ४१९
| एरका तु गृहीता वै वज्रभूतेव लक्ष्यते ।<br>तया परस्परं जघ्नुस्संग्रहारे सुदारुणे ॥ ४५<br>प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाः कृतवर्माथ सात्यकिः ।<br>अनिरुद्धादयश्चान्ये पृथुर्विपृथुरेव च ॥ ४६<br>चारुवर्मा चारुकश्च तथाक्रूरादयो द्विज ।<br>एरकारूपिभिर्वज्रैस्ते निजघ्नुः परस्परम् ॥ ४७<br>निवारयामास हरिर्यादवांस्ते च केशवम् ।<br>सहायं मेनिरेऽरीणां प्राप्तं जघ्नुः परस्परम् ॥ ४८<br>कृष्णोऽपि कुपितस्तेषामेरकामुष्टिमाददे ।<br>वधाय सोऽपि मुसलं मुष्टिलोंहमभूत्तदा ॥ ४९<br>जघान तेन निश्शेषांन्यादवानात्ततायिनः ।<br>जघ्नुस्ते सहसाभ्येत्य तथान्येऽपि परस्परम् ॥ ५०<br>ततश्चार्णवमध्येन जैत्रोऽसौ चक्रिणो रथः ।<br>पश्यतो दारुकस्याथ प्रायादश्वैर्धृतो द्विज ॥ ५१<br>चक्रं गदा तथा शाङ्ग्रं तूणी शङ्खोऽसिरेव च ।<br>प्रदक्षिणं हरिं कृत्वा जग्मुरादित्यवर्त्मना ॥ ५२<br>क्षणेन नाभवत्कश्चिद्यादवानांमघातितः ।<br>ऋते कृष्णं महात्मानं दारुकं च महामुने ॥ ५३<br>चङ्क्रम्यमाणौ तौ रामं वृक्षमूले कृतासनम् ।<br>ददृशाते मुखाच्चास्य निष्क्रामन्तं महोरगम् ॥ ५४<br>निष्क्रम्य स मुखात्तस्य महाभोगो भुजङ्गमः ।<br>प्रययावर्णवं सिद्धैः पूज्यमानस्तथोरगैः ॥ ५५<br>ततोऽर्घ्यमादाय तदा जलधिस्सम्मुखं ययौ ।<br>प्रविवेश ततस्तोयं पूजितः पन्नगोत्तमैः ॥ ५६<br>दृष्ट्वा बलस्य निर्याणं दारुकं प्राह केशवः ।<br>इदं सर्वं समाचक्ष्व वसुदेवोग्रसेनयोः ॥ ५७<br>निर्याणं बलभद्रस्य यादवानां तथा क्षयम् ।<br>योगे स्थित्वाहमध्येतत्परित्यक्ष्ये कलेवरम् ॥ ५८<br>वाच्यश्च द्वारकावासी जनस्सर्वस्तथाहुकः ।<br>यथेमां नगरीं सर्वां समुद्रः प्लावयिष्यति ॥ ५९<br>तस्माद्भवद्भिस्सर्वैस्तु प्रतीक्ष्यो ह्यर्जुनागमः ।<br>न स्थेयं द्वारकामध्ये निष्क्रान्ते तत्र पाण्डवे ॥ ६० | उनके हाथमें लगे हुए वे सरकण्डे वज्रके समान प्रतीत होते थे, उन वज्रतुल्य सरकण्डोंसे ही वे उस दारुण युद्धमें एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ४५ ॥<br>हे द्विज ! प्रद्युम्न और साम्ब आदि कृष्णपुत्रगण, कृतवर्मा, सात्यकि और अनिरुद्ध आदि तथा पृथु, विपृथु, चारुवर्मा, चारुक और अक्रूर आदि यादवगण एक-दूसरेपर एरकारूपी वज्रोंसे प्रहार करने लगे ॥ ४६-४७ ॥ जब श्रीहरिने उन्हें आपसमें लड़नेसे रोका तो उन्होंने उन्हें अपने प्रतिपक्षीका सहायक होकर आये हुए समझा और [ उनकी बातकी अवहेलनाकर ] एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ४८ ॥ कृष्णचन्द्रने भी कुपित होकर उनका वध करनेके लिये एक मुट्ठी सरकण्डे उठा लिये। वे मुट्ठीभर सरकण्डे लोहेके मूसल [ समान ] हो गये ॥ ४९ ॥ उन मूसलरूप सरकण्डोंसे कृष्णचन्द्र सम्पूर्ण आततायी यादवोंको मारने लगे तथा अन्य समस्त यादव भी वहाँ आ-आकर एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ५० ॥ हे द्विज ! तदनन्तर भगवान् कृष्णचन्द्रका जैत्र नामक रथ घोड़ोंसे आकृष्ट हो दारुकके देखते-देखते समुद्रके मध्यपथसे चला गया ॥ ५१ ॥ इसके पश्चात् भगवान्के शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष, तरकश और खड्ग आदि आयुध श्रीहरिकी प्रदक्षिणा कर सूर्यमार्गसे चले गये ॥ ५२ ॥<br>हे महामुने ! एक क्षणमें ही महात्मा कृष्णचन्द्र और उनके सारथी दारुकको छोड़कर और कोई यदुवंशी जीवित न बचा ॥ ५३ ॥ उन दोनोंने वहाँ घूमते हुए देखा कि श्रीबलरामजी एक वृक्षके तले बैठे हैं और उनके मुखसे एक बहुत बड़ा सर्प निकल रहा है ॥ ५४ ॥ वह विशाल फणधारी सर्प उनके मुखसे निकलकर सिद्ध और नागोंसे पूजित हुआ समुद्रकी ओर गया ॥ ५५ ॥ उसी समय समुद्र अर्घ्य लेकर उस (महासर्प)-के सम्मुख उपस्थित हुआ और वह नागश्रेष्ठोंसे पूजित हो समुद्रमें घुस गया ॥ ५६ ॥<br>इस प्रकार श्रीबलरामजीका प्रयाण देखकर श्रीकृष्णचन्द्रने दारुकसे कहा—"तुम यह सब वृत्तान्त उग्रसेन और वसुदेवजीसे जाकर कहो" ॥ ५७ ॥ बलभद्रजीका निर्याण, यादवोंका क्षय और मैं भी योगस्थ होकर शरीर छोड़ूँगा—[ यह सब समाचार उन्हें ] जाकर सुनाओ ॥ ५८ ॥ सम्पूर्ण द्वारकावासी और आहुक (उग्रसेन)-से कहना कि अब इस सम्पूर्ण नगरीको समुद्र डुबो देगा ॥ ५९ ॥ इसलिये आप सब केवल अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा और करें तथा अर्जुनके यहाँसे लौटते |
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४२०
- श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३७
तेनैव सह गन्तव्यं यत्र याति स कौरवः ॥ ६१ गत्वा च ब्रूहि कौन्तेयमर्जुनं वचनान्मम । पालनीयस्त्वया भक्त्या जनोऽयं मत्परिग्रहः ॥ ६२ त्वमर्जुनेन सहितो द्वारवत्यां तथा जनम् । गृहीत्वा याहि वज्रश्च यदुराजो भविष्यति ॥ ६३
श्रीपराशर उवाच इत्युक्तो दारुकः कृष्णं प्रणिपत्य पुनः पुनः । प्रदक्षिणं च बहुशः कृत्वा प्रायाद्यथोदितम् ॥ ६४ स च गत्वा तदाचष्ट द्वारकायां तथार्जुनम् । आनिनाय महाबुद्धिर्वज्रं चक्रे तथा नृपम् ॥ ६५ भगवानपि गोविन्दो वासुदेवात्मकं परम् । ब्रह्मात्मनि समारोप्य सर्वभूतेष्वधारयत् । निष्प्रपञ्चे महाभाग संयोज्यात्मानमात्मनि । तुर्यावस्थं सलीलं च शेते स्म पुरुषोत्तमः ॥ ६६ सम्मानयन्द्विजवचो दुर्वासा यदुवाच ह । योगयुक्तोऽभवत्पादं कृत्वा जानुनि सत्तम ॥ ६७ आययौ च जरानाम तदा तत्र स लुब्धकः । मुसलावशेषलोहैकसायकन्यस्ततोमरः ॥ ६८ स तत्पादं मृगाकारमवेक्ष्यारादवस्थितः । तले विव्याध तेनैव तोमरेण द्विजोत्तम ॥ ६९ ततश्च ददृशे तत्र चतुर्बाहुधरं नरम् । प्रणिपत्याह चैवैनं प्रसीदेति पुनः पुनः ॥ ७० अजानता कृतमिदं मया हरिणशंकया । क्षम्यतां मम पापेन दग्धं मां त्रातुमर्हसि ॥ ७१
श्रीपराशर उवाच ततस्तं भगवानाह न तेऽस्तु भयमण्वपि । गच्छ त्वं मत्प्रसादेन लुब्ध स्वर्गं सुरास्पदम् ॥ ७२ विमानमागतं सद्यस्तद्वाक्यसमनन्तरम् । आरुह्य प्रययौ स्वर्गं लुब्धकस्तत्प्रसादतः ॥ ७३
ही फिर कोई भी व्यक्ति द्वारकामें न रहे; जहाँ वे कुरुनन्दन जायँ वहीं सब लोग चले जायँ ॥ ६०-६१ ॥ कुन्तीपुत्र अर्जुनसे तुम मेरी ओरसे कहना कि "अपने सामर्थ्यानुसार तुम मेरे परिवारके लोगोंकी रक्षा करना" ॥ ६२ ॥ और तुम द्वारकावासी सभी लोगोंको लेकर अर्जुनके साथ चले जाना । [ हमारे पीछे] वज्र यदुवंशका राजा होगा ॥ ६३ ॥
श्रीपराशरजी बोले— भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके इस प्रकार कहनेपर दारुकने उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और उनकी अनेक परिक्रमाएँ कर उनके कथनानुसार चला गया ॥ ६४ ॥ उस महाबुद्धिने द्वारकामें पहुँचकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया और अर्जुनको वहाँ लाकर वज्रको राज्याभिषिक्त किया ॥ ६५ ॥
इधर भगवान् कृष्णचन्द्रने समस्त भूतोंमें व्याप्त वासुदेवस्वरूप परब्रह्मको अपने आत्मामें आरोपित कर उनका ध्यान किया तथा हे महाभाग ! वे पुरुषोत्तम लीलासे ही अपने चित्तको निष्प्रपंच परमात्त्मामें लीनकर तुरीयपदमें स्थित हुए ॥ ६६ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! दुर्वासाजीने [ श्रीकृष्णचन्द्रके लिये] जैसा कहा था उस द्विज-वाक्यका* मान रखनेके लिये वे अपनी जानुओंपर चरण रखकर योगयुक्त होकर बैठे ॥ ६७ ॥ इसी समय, जिसने मूसलके बचे हुए तोमर (बाणमें लगे हुए लोहेके टुकड़े)-के आकारवाले लोहखण्डको अपने बाणकी नोंकपर लगा लिया था; वह जरा नामक व्याध वहाँ आया ॥ ६८ ॥ हे द्विजोत्तम ! उस चरणको मृगाकार देख उस व्याधने उसे दूरहीसे खड़े-खड़े उसी तोमरसे बींध डाला ॥ ६९ ॥ किंतु वहाँ पहुँचनेपर उसने एक चतुर्भुजधारी मनुष्य देखा । यह देखते ही वह चरणोंमें गिरकर बारम्बार उनसे कहने लगा—"प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये ॥ ७० ॥ मैंने बिना जाने ही मृगकी आशंकासे यह अपराध किया है, कृपया क्षमा कीजिये । मैं अपने पापसे दग्ध हो रहा हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये" ॥ ७१ ॥
श्रीपराशरजी बोले— तब भगवान्ने उससे कहा—"लुब्धक ! तू तनिक भी न डर; मेरी कृपासे तू अभी देवताओंके स्थान स्वर्गलोकको चला जा ॥ ७२ ॥ इन भगवद्वाक्योंके समाप्त होते ही वहाँ एक विमान आया, उसपर चढ़कर वह व्याध भगवान्की कृपासे उसी समय स्वर्गको चला गया ॥ ७३ ॥
* महाभारतमें यह प्रसंग आया है कि—एक बार महर्षि दुर्वासा श्रीकृष्णचन्द्रजीके यहाँ आये और भगवान्से सत्कार पाकर उन्होंने कहा कि आप मेरा जूठा जल अपने सारे शरीरमें लगाइये । भगवान्ने वैसा ही किया, परंतु 'ब्राह्मणका जूठ पैरसे नहीं छूना चाहिये' ऐसा सोचकर पैरमें नहीं लगाया । इसपर दुर्वासाने शाप दिया कि आपके पैरमें कभी छेद हो जायगा ।
अ० ३८ ] * पञ्चम अंश * ४२१
| गते तस्मिन्स भगवान्संयोज्यात्मानमात्मनि।<br>ब्रह्मभूतेऽव्ययेऽचिन्त्ये वासुदेवमयेऽमले॥ ७४<br><br>अजन्मन्यमरे विष्ण्वावप्रमेयेऽखिलात्मनि।<br>तत्याज मानुषं देहमतीत्य त्रिविधां गतिम्॥ ७५ | उसके चले जानेपर भगवान् कृष्णचन्द्रने अपने आत्माको अव्यय, अचिन्त्य, वासुदेवस्वरूप, अमल, अजन्मा, अमर, अप्रमेय, अखिलात्मा और ब्रह्मस्वरूप विष्णुभगवान्में लीन कर त्रिगुणात्मक गतिको पार करके इस मनुष्य-शरीरको छोड़ दिया॥ ७४-७५ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित्का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण
| श्रीपराशर उवाच<br>अर्जुनोऽपि तदान्विष्य रामकृष्णकलेवरे।<br>संस्कारं लम्भयामास तथान्येषामनुक्रमात्॥ १<br>अष्टौ महिष्यः कथिता रुक्मिणीप्रमुखास्तु याः।<br>उपगुह्य हरेर्देहं विविशुस्ता हुताशनम्॥ २<br>रेवती चापि रामस्य देहमाश्लिष्य सत्तमा।<br>विवेश ज्वलितं वह्निं तत्सङ्गाह्लादशीतलम्॥ ३<br>उग्रसेनस्तु तच्छ्रुत्वा तथैवानकदुन्दुभिः।<br>देवकी रोहिणी चैव विविशुर्जातवेदसम्॥ ४<br>ततोऽर्जुनः प्रेतकार्यं कृत्वा तेषां यथाविधि।<br>निश्चक्राम जनं सर्वं गृहीत्वा वज्रमेव च॥ ५<br>द्वारवत्या विनिष्क्रान्ताः कृष्णपत्न्यः सहस्रशः।<br>वज्रं जनं च कौन्तेयः पालयञ्छनकैर्ययौ॥ ६<br>सभा सुधर्मा कृष्णेन मर्त्यलोके समुज्झिते।<br>स्वर्गं जगाम मैत्रेय पारिजातश्च पादपः॥ ७<br>यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिवं सन्त्यज्य मेदिनीम्।<br>तस्मिन्नेवावतीर्णोऽयं कालकायो बली कलिः॥ ८<br>प्लावयामास तां शून्यां द्वारकां च महोदधिः।<br>वासुदेवगृहं त्वेकं न प्लावयति सागरः॥ ९<br>नातिक्रान्तुमलं ब्रह्मंस्तदद्यापि महोदधिः।<br>नित्यं सन्निहितस्तत्र भगवान्केशवो यतः॥ १० | **श्रीपराशरजी बोले—**अर्जुनने राम और कृष्ण तथा अन्यान्य मुख्य-मुख्य यादवोंके मृत देहोंकी खोज कराकर क्रमशः उन सबके और्ध्वदैहिक संस्कार किये॥ १॥ भगवान् कृष्णकी जो रुक्मिणी आदि आठ पटरानी बतलायी गयी हैं, उन सबने उनके शरीरका आलिंगन कर अग्निमें प्रवेश किया॥ २॥ सती रेवतीजी भी बलरामजीके देहका आलिंगन कर, उनके अंग-संगके आह्लादसे शीतल प्रतीत होती हुई प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर गयीं॥ ३॥ इस सम्पूर्ण अनिष्टका समाचार सुनते ही उग्रसेन, वसुदेव, देवकी और रोहिणीने भी अग्निमें प्रवेश किया॥ ४॥<br>तदनन्तर अर्जुन उन सबका विधिपूर्वक प्रेत-कर्म कर वज्र तथा अन्यान्य कुटुम्बियोंको साथ लेकर द्वारकासे बाहर आये॥ ५॥ द्वारकासे निकली हुई कृष्णचन्द्रकी सहस्रों पत्नियों तथा वज्र और अन्यान्य बान्धवोंकी [सावधानीपूर्वक] रक्षा करते हुए अर्जुन धीरे-धीरे चले॥ ६॥ हे मैत्रेय! कृष्णचन्द्रके मर्त्यलोकका त्याग करते ही सुधर्मा सभा और पारिजात-वृक्ष भी स्वर्गलोकको चले गये॥ ७॥ जिस दिन भगवान् पृथिवीको छोड़कर स्वर्ग सिधारे थे, उसी दिनसे यह मलिनदेह महाबली कलियुग पृथिवीपर आ गया॥ ८॥ इस प्रकार जनशून्य द्वारकाको समुद्रने डुबो दिया, केवल एक कृष्णचन्द्रके भवनको वह नहीं डुबाता है॥ ९॥ हे ब्रह्मन्! उसे डुबानेमें समुद्र आज भी समर्थ नहीं है; क्योंकि उसमें भगवान् कृष्णचन्द्र सर्वदा निवास करते हैं॥ १०॥ |
| ४२२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३८ |
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तदतीव महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्।
विष्णुश्रियान्वितं स्थानं दृष्ट्वा पापाद्विमुच्यते॥ ११
अर्थ— वह भगवदैश्वर्यसम्पन्न स्थान अति पवित्र और समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है; उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है॥ ११॥
पार्थः पञ्चनदे देशे बहुधान्यधनान्विते।
चकार वासं सर्वस्य जनस्य मुनिसत्तमः॥ १२
अर्थ— हे मुनिश्रेष्ठ ! अर्जुनने उन समस्त द्वारकावासियोंको अत्यन्त धन-धान्य-सम्पन्न पंचनद (पंजाब) देशमें बसाया॥ १२॥
ततो लोभस्समभवत्पार्थेनैकेन धन्विना।
दृष्ट्वा स्त्रियो नीयमाना दस्यूनां निहतेश्वराः॥ १३
अर्थ— उस समय अनाथा स्त्रियोंको अकेले धनुर्धारी अर्जुनको ले जाते देख लुटेरोंको लोभ उत्पन्न हुआ॥ १३॥
ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतसः।
आभीरा मन्त्रयामासुस्समेत्यात्यन्तदुर्मदाः॥ १४
अर्थ— तब उन अत्यन्त दुर्मद, पापकर्मा और लुब्धहृदय आभीर दस्यूओंने परस्पर मिलकर सम्मति की—॥ १४॥
अयमेकोऽर्जुनो धन्वी स्त्रीजनं निहतेश्वरम्।
नयत्यस्मानतिक्रम्य धिगेतद्भवतां बलम्॥ १५
अर्थ— 'देखो, यह धनुर्धारी अर्जुन अकेला ही हमारा अतिक्रमण करके इन अनाथा स्त्रियोंको लिये जाता है; हमारे ऐसे बल-पुरुषार्थको धिक्कार है!॥ १५॥
हत्वा गर्वसमारूढो भीष्मद्रोणजयद्रथान्।
कर्णादींश्च न जानाति बलं ग्रामनिवासिनाम्॥ १६
अर्थ— यह भीष्म, द्रोण, जयद्रथ और कर्ण आदि [नगर-निवासियों]-को मारकर ही इतना अभिमानी हो गया है, अभी हम ग्रामीणोंके बलको यह नहीं जानता॥ १६॥
यष्टिहस्तानवेक्ष्यास्मानधनुष्पाणिस्स दुर्मतिः।
सर्वानैवावजानाति किं वो बाहुभिरुन्नतैः॥ १७
अर्थ— हमारे हाथोंमें लाठी देखकर यह दुर्मति धनुष लेकर हम सबकी अवज्ञा करता है, फिर हमारी इन ऊँची-ऊँची भुजाओंसे क्या लाभ है?'॥ १७॥
ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवो लोष्टधारिणः।
सहस्रशोऽभ्यधावन्त तं जनं निहतेश्वरम्॥ १८
अर्थ— ऐसी सम्मतिकर वे सहस्रों लुटेरे लाठी और ढेले लेकर उन अनाथ द्वारकावासियोंपर टूट पड़े॥ १८॥
ततो निर्भर्त्स्य कौन्तेयः प्राहाभीरान्हसन्निव।
निवर्त्तध्वमधर्मज्ञा यदि न स्थ मुमूर्षवः॥ १९
अर्थ— तब अर्जुनने उन लुटेरोंको झिड़ककर हँसते हुए कहा—'अरे पापियो! यदि तुम्हें मरनेकी इच्छा न हो तो अभी लौट जाओ'॥ १९॥
अवज्ञाय वचस्तस्य जगृहुस्ते तदा धनम्।
स्त्रीधनं चैव मैत्रेय विष्वक्सेनपरिग्रहम्॥ २०
अर्थ— किन्तु हे मैत्रेय! लुटेरोंने उनके कथनपर कुछ भी ध्यान न दिया और भगवान् कृष्णके सम्पूर्ण धन और स्त्रीधनको अपने अधीन कर लिया॥ २०॥
ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं युधि।
आरोपयितुमारेभे न शशाक च वीर्यवान्॥ २१
अर्थ— तब वीरवर अर्जुनने युद्धमें अक्षीण अपने गाण्डीव धनुषको चढ़ाना चाहा; किन्तु वे ऐसा न कर सके॥ २१॥
चकार सज्यं कृच्छ्राच्च तच्चाभूच्छिथिलं पुनः।
न सस्मार ततोऽस्त्राणि चिन्तयन्नपि पाण्डवः॥ २२
अर्थ— उन्होंने जैसे-तैसे अति कठिनतासे उसपर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ा भी ली तो फिर वे शिथिल हो गये और बहुत कुछ सोचनेपर भी उन्हें अपने अस्त्रोंका स्मरण न हुआ॥ २२॥
शरान्मुमोच चैतेषु पार्थो वैरिष्वमर्षितः।
त्वग्भेदं ते परं चक्रुरस्ता गाण्डीवधन्विना॥ २३
अर्थ— तब वे क्रुद्ध होकर अपने शत्रुओंपर बाण बरसाने लगे; किन्तु गाण्डीवधारी अर्जुनके छोड़े हुए उन बाणोंने केवल उनकी त्वचाको ही बींधा॥ २३॥
वह्निना येऽक्षया दत्ताश्शरास्तेऽपि क्षयं ययुः।
युद्ध्यतस्सह गोपालैरर्जुनस्य भवक्षये॥ २४
अर्थ— अर्जुनका उद्भव क्षीण हो जानेके कारण अग्निसे दिये हुए उनके अक्षय बाण भी उन अहीरोंके साथ लड़नेमें नष्ट हो गये॥ २४॥
अचिन्तयच्च कौन्तेयः कृष्णस्यैव हि तद्बलम्।
यन्मया शरसङ्घातैस्सकला भूभृतो हताः॥ २५
अर्थ— तब अर्जुनने सोचा कि मैंने जो अपने शरसमूहसे अनेकों राजाओंको जीता था, वह सब कृष्णचन्द्रका ही प्रभाव था॥ २५॥
मिषतः पाण्डुपुत्रस्य ततस्ताः प्रमदोत्तमाः।
आभीरैरपकृष्यन्त कामं चान्याः प्रदुद्रुवुः॥ २६
अर्थ— अर्जुनके देखते-देखते वे अहीर उन स्त्रीरत्नोंको खींच-खींचकर ले जाने लगे तथा कोई-कोई अपनी इच्छानुसार इधर-उधर भाग गयीं॥ २६॥
अ० ३८ ] * पञ्चम अंश * ४२३
ततश्शरेषु क्षीणेषु धनुष्कोट्या धनञ्जयः ।
जघान दस्यूंस्ते चास्य प्रहाराञ्जहसुर्मुने ॥ २७
प्रेक्षतस्तस्य पार्थस्य वृष्ण्यन्धकवरस्त्रियः ।
जग्मुरादाय ते म्लेच्छाः समस्ता मुनिसत्तम ॥ २८
ततस्सुदुःखितो जिष्णुः कष्टं कष्टमिति ब्रुवन् ।
अहो भगवतानेन वञ्चितोऽस्मि रुरोद ह ॥ २९
तद्धनुस्तानि शस्त्राणि स रथस्ते च वाजिनः ।
सर्वमेकपदे नष्टं दानमश्रोत्रिये यथा ॥ ३०
अहोऽतिबलवद्दैवं विना तेन महात्मना ।
यदसामर्थ्ययुक्तेऽपि नीचवर्गे जयप्रदम् ॥ ३१
तौ बाहू स च मे मुष्टिः स्थानं तत्सोऽस्मि चार्जुनः ।
पुण्येनैव विना तेन गतं सर्वमसारताम् ॥ ३२
ममार्जुनत्वं भीमस्य भीमत्वं तत्कृते ध्रुवम् ।
विना तेन यदाभीरैर्जितोऽहं रथिनां वरः ॥ ३३
श्रीपराशर उवाच
इत्थं वदन्ययौ जिष्णुरिन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ।
चकार तत्र राजानं वज्रं यादवनन्दनम् ॥ ३४
स ददर्श ततो व्यासं फाल्गुनः काननाश्रयम् ।
तमुपेत्य महाभागं विनयेनाभ्यवादयत् ॥ ३५
तं वन्दमानं चरणाववलोक्य मुनिश्चिरम् ।
उवाच वाक्यं विच्छायः कथमद्य त्वमीदृशः ॥ ३६
अवीरजोऽनुगमनं ब्रह्महत्या कृताथ वा ।
दृढाशाभङ्गदुःखीव भ्रष्टच्छायोऽसि साम्प्रतम् ॥ ३७
सान्तानिकादयो वा ते याचमाना निराकृताः ।
अगम्यस्त्रीरतिर्वा त्वं येनासि विगतप्रभः ॥ ३८
भुङ्क्तेऽप्रदाय विप्रेभ्यो मिष्टमेकोऽथ वा भवान् ।
किं वा कृपणवित्तानि हृतानि भवताऽर्जुन ॥ ३९
कच्चिन्नु शूर्पवातस्य गोचरत्वं गतोऽर्जुन ।
दुष्टचक्षुर्हतो वाऽसि निश्श्रीकः कथमन्था ॥ ४०
स्पृष्टो नखाम्भसा वाथ घटवार्युक्षितोऽपि वा ।
केन त्वं वासि विच्छायो न्यूनैर्वा युधि निर्जितः ॥ ४१
बाणोंके समाप्त हो जानेपर धनंजय अर्जुनने धनुषकी नोंकसे ही प्रहार करना आरम्भ किया, किन्तु हे मुने! वे दस्युगण उन प्रहारोंकी और भी हँसी उड़ाने लगे ॥ २७ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनके देखते-देखते वे म्लेच्छगण वृष्टि और अन्धकवंशकी उन समस्त स्त्रियोंको लेकर चले गये ॥ २८ ॥ तब सर्वदा जयशील अर्जुन अत्यन्त दुःखी होकर 'हा! कैसा कष्ट है? कैसा कष्ट है?' ऐसा कहकर रोने लगे [और बोले—] “अहो! मुझे उन भगवान्ने ही ठग लिया ॥ २९ ॥ देखो, वही धनुष है, वे ही शस्त्र हैं, वही रथ है और वे ही अश्व हैं, किन्तु अश्रोत्रियको दिये हुए दानके समान आज सभी एक साथ नष्ट हो गये ॥ ३० ॥ अहो! दैव बड़ा प्रबल है, जिसने आज उन महात्मा कृष्णके न रहनेपर असमर्थ और नीच अहीरोंको जय दे दी ॥ ३१ ॥ देखो! मेरी वे ही भुजाएँ हैं, वही मेरी मुष्टि (मुट्ठी) है, वही (कुरुक्षेत्र) स्थान है और मैं भी वही अर्जुन हूँ तथापि पुण्यदर्शन कृष्णके बिना आज सब सारहीन हो गये ॥ ३२ ॥ अवश्य ही मेरा अर्जुनत्व और भीमका भीमत्व भगवान् कृष्णकी कृपासे ही था। देखो, उनके बिना आज महारथियोंमें श्रेष्ठ मुझको तुच्छ आभीरोंने जीत लिया'' ॥ ३३ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**अर्जुन इस प्रकार कहते हुए अपनी राजधानी इन्द्रप्रस्थमें आये और वहाँ यादवनन्दन वज्रका राज्याभिषेक किया ॥ ३४ ॥ तदनन्तर वे विपिनवासी व्यासमुनिसे मिले और उन महाभाग मुनिवरके निकट जाकर उन्हें विनयपूर्वक प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ अर्जुनको बहुत देरतक अपने चरणोंकी वन्दना करते देख मुनिवरने कहा— ‘‘आज तुम ऐसे कान्तिहीन क्यों हो रहे हो ? ॥ ३६ ॥ क्या तुमने भेड़ोंकी धूलिका अनुगमन किया है अथवा ब्रह्महत्या की है या तुम्हारी कोई सुदृढ़ आशा भंग हो गयी है ? जिसके दुःखसे तुम इस समय इतने श्रीहीन हो रहे हो ॥ ३७ ॥ तुमने किसी सन्तानके इच्छुकका विवाहके लिये याचना करनेपर निरादर तो नहीं किया अथवा किसी अगम्य स्त्रीसे रमण तो नहीं किया, जिससे तुम ऐसे तेजोहीन हो रहे हो ॥ ३८ ॥ हे अर्जुन! तुम ब्राह्मणोंको बिना दिये मिष्टान्न अकेले तो नहीं खा लेते हो अथवा तुमने किसी कृपणका धन तो नहीं हर लिया है ॥ ३९ ॥ हे अर्जुन! तुमने सूपकी वायुका तो सेवन नहीं किया ? क्या तुम्हारी आँखें दुखती हैं अथवा तुम्हें किसीने मारा है ? तुम इस प्रकार श्रीहीन कैसे हो रहे हो ? ॥ ४० ॥ तुमने नखजलका स्पर्श तो नहीं किया ? तुम्हारे ऊपर घड़ेसे छलके हुए जलकी छींटें
४२४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३८
श्रीपराशर उवाच ततः पार्थो विनिःश्वस्य श्रूयतां भगवन्निति। उक्त्वा यथावदाचष्टे व्यासायात्मपराभवम्॥ ४२
अर्जुन उवाच यद्वलं यच्च मत्तेजो यद्वीर्यं यः पराक्रमः। या श्रीश्छाया च नः सोऽस्मान्परित्यज्य हरिर्गतः॥ ४३
ईश्वरेणापि महता स्मितपूर्वाभिभाषिणा। हीना वयं मुने तेन जातास्तृणमया इव॥ ४४
अस्त्राणां सायकानां च गाण्डीवस्य तथा मम। सारता याभवन्मूर्त्तिस्स गतः पुरुषोत्तमः॥ ४५
यस्यावलोकनादस्माञ्छ्रीर्जयः सम्पदन्नतिः। न तत्याज स गोविन्दस्त्यक्त्वास्मान्भगवान्गतः॥ ४६
भीष्मद्रोणाङ्गराजाद्यास्तथा दुर्योधनादयः। यत्प्रभावेण निर्दग्धास्स कृष्णस्त्यक्तवान्भुवम्॥ ४७
निर्यौवना गतश्रीका नष्टच्छायेव मेदिनी। विभाति तात नैकोऽहं विरहे तस्य चक्रिणः॥ ४८
यस्य प्रभावाद्भीष्माद्यैर्मय्यग्नौ शलभायितम्। विना तेनाद्य कृष्णेन गोपालैरस्मि निर्जितः॥ ४९
गाण्डीवस्त्रिषु लोकेषु ख्यातिं यदनुभावतः। गतस्तेन विनाभीरलगुडैस्स तिरस्कृतः॥ ५०
स्त्रीसहस्राण्यनेकानि मन्नाथानि महामुने। यततो मम नीतानि दस्युभिर्लगुडायुधैः॥ ५१
आनीयमानमाभीरैः कृष्ण कृष्णावरोधनम्। हृतं यष्टिप्रहरणैः परिभूय बलं मम॥ ५२
निश्रीकता न मे चित्रं यज्जीवामि तदद्भुतम्। नीचावमानपङ्काङ्की निर्लज्जोऽस्मि पितामह॥ ५३
श्रीव्यास उवाच अलं ते व्रीडया पार्थ न त्वं शोचितुमर्हसि। अवेहि सर्वभूतेषु कालस्य गतिरीदृशी॥ ५४
कालो भवाय भूतानामभावाय च पाण्डव। कालमूलमिदं ज्ञात्वा भव स्थैर्यपरोऽर्जुन॥ ५५
तो नहीं पड़ गयीं अथवा तुम्हें किसी हीनबल पुरुषने युद्धमें पराजित तो नहीं किया ? फिर तुम इस तरह हतप्रभ कैसे हो रहे हो ?''॥ ४१ ॥
श्रीपराशरजी बोले— तब अर्जुनने दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा—"‘भगवन्! सुनिये’' ऐसा कहकर उन्होंने अपने पराजयका सम्पूर्ण वृत्तान्त व्यासजीको ज्यों-का-त्यों सुना दिया॥ ४२ ॥
अर्जुन बोले— जो हरि मेरे एकमात्र बल, तेज, वीर्य, पराक्रम, श्री और कान्ति थे, वे हमें छोड़कर चले गये॥ ४३ ॥ जो सब प्रकार समर्थ होकर भी हमसे मित्रवत् हँस-हँसकर बातें किया करते थे, हे मुने! उन हरिके बिना हम आज तृणमय पुतलेके समान निःसत्त्व हो गये हैं॥ ४४ ॥ जो मेरे दिव्यास्त्रों, दिव्यबाणों और गाण्डीव धनुषके मूर्त्तिमान् सार थे वे पुरुषोत्तम भगवान् हमें छोड़कर चले गये हैं॥ ४५ ॥ जिनकी कृपादृष्टिसे श्री, जय, सम्पत्ति और उन्नतिने कभी हमारा साथ नहीं छोड़ा, वे ही भगवान् गोविन्द हमें छोड़कर चले गये हैं॥ ४६ ॥ जिनकी प्रभावानिमें भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि अनेक शूरवीर दग्ध हो गये थे, उन कृष्णचन्द्रने इस भूमण्डलको छोड़ दिया है॥ ४७ ॥ हे तात! उन चक्रपाणि कृष्णचन्द्रके विरहमें एक मैं ही क्या, सम्पूर्ण पृथिवी ही यौवन, श्री और कान्तिसे हीन प्रतीत होती है॥ ४८ ॥ जिनके प्रभावसे अग्निरूप मुझमें भीष्म आदि महारथीगण पतंगवत् भस्म हो गये थे, आज उन्हीं कृष्णके बिना मुझे गोपोंने हरा दिया!॥ ४९ ॥ जिनके प्रभावसे यह गाण्डीव धनुष तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ था उन्हींके बिना आज यह अहीरोंकी लाठियोंसे तिरस्कृत हो गया!॥ ५० ॥ हे महामुने! भगवान्की जो सहस्रों स्त्रियाँ मेरी देख-रेखमें आ रही थीं उन्हें, मेरे सब प्रकार यत्न करते रहनेपर भी दस्युगण अपनी लाठियोंके बलसे ले गये॥ ५१ ॥ हे कृष्णद्वैपायन! लाठियाँ ही जिनके हथियार हैं उन आभीरों ने आज मेरे बलको कुण्ठितकर मेरे द्वारा साथ लाये हुए सम्पूर्ण कृष्ण-परिवारको हर लिया॥ ५२ ॥ ऐसी अवस्थामें मेरा श्रीहीन होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; हे पितामह! आश्चर्य तो यह है कि नीच पुरुषोंद्वारा अपमान-पंकमें सनकर भी मैं निर्लज्ज अभी जीवित ही हूँ॥ ५३ ॥
श्रीव्यासजी बोले— हे पार्थ! तुम्हारी लज्जा व्यर्थ है, तुम्हें शोक करना उचित नहीं है। तुम सम्पूर्ण भूतोंमें कालकी ऐसी ही गति जानो॥ ५४ ॥ हे पाण्डव! प्राणियोंकी उन्नति और अवनतिका कारण काल ही है,
अ० ३८] * पञ्चम अंश * ४२५
नद्यः समुद्रा गिरयस्सकला च वसुन्धरा। देवा मनुष्याः पशवस्तरवश्च सरीसृपाः ॥ ५६
सृष्टाः कालेन कालेन पुनर्यास्यन्ति संक्षयम्। कालात्मकमिदं सर्वं ज्ञात्वा शममवाप्नुहि ॥ ५७
कालस्वरूपी भगवान्कृष्णः कमलोचनः। यच्चात्थ कृष्णमाहात्म्यं तत्तथैव धनञ्जय ॥ ५८
भारावतारकार्यार्थमवतीर्णस्स मेदिनीम्। भाराक्रान्ता धरा याता देवानां समितिं पुरा ॥ ५९
तदर्थमवतीर्णोऽसौ कालरूपी जनार्दनः। तच्च निष्पादितं कार्यमशेषा भूभुजो हताः ॥ ६०
वृष्ण्यन्धककुलं सर्वं तथा पार्थोपसंहृतम्। न किञ्चिदन्यत्कर्तव्यं तस्य भूमितले प्रभोः ॥ ६१
अतो गतस्स भगवान्कृतकृत्यो यथेच्छया। सृष्टिं सर्गे करोत्येष देवदेवः स्थितौ स्थितिम्। अन्तेऽन्ताय समर्थोऽयं साम्प्रतं वै यथा गतः ॥ ६२
तस्मात्पार्थ न सन्तापस्त्वया कार्यः पराभवे। भवन्ति भावाः कालेषु पुरुषाणां यतः स्तुतिः ॥ ६३
त्वयैकेन हता भीष्मद्रोणकर्णादयो रणे। तेषामर्जुन कालोत्थः किं न्यूनाभिभवो न सः ॥ ६४
विष्णोस्तस्य प्रभावेण यथा तेषां पराभवः। कृतस्तथैव भवतो दस्युभ्यस्स पराभवः ॥ ६५
स देवेशश्शरीराणि समाविश्य जगत्स्थितिम्। करोति सर्वभूतानां नाशमन्ते जगत्पतिः ॥ ६६
भगोदये ते कौन्तेय सहायोऽभूज्जनार्दनः। तथान्ते तद्विपक्षास्ते केशवेन विलोकिताः ॥ ६७
कश्श्रद्धध्यात्सगाङ्गेयान्हन्यास्त्वं कौरवानिति। आभीरभ्यश्च भवतः कः श्रद्धध्यात्पराभवम् ॥ ६८
अतः हे अर्जुन! इन जय-पराजयोंको कालके अधीन समझकर तुम स्थिरता धारण करो ॥ ५५ ॥ नदियाँ, समुद्र, गिरिगण, सम्पूर्ण पृथिवी, देव, मनुष्य, पशु, वृक्ष और सरीसृप आदि सम्पूर्ण पदार्थ कालके ही रचे हुए हैं और फिर कालहीसे ये क्षीण हो जाते हैं, अतः इस सारे प्रपंचको कालात्मक जानकर शान्त होओ ॥ ५६-५७ ॥
हे धनंजय! तुमने कृष्णचन्द्रका जैसा माहात्म्य बतलाया है वह सब सत्य ही है; क्योंकि कमलनयन भगवान् कृष्ण साक्षात् कालस्वरूप ही हैं ॥ ५८ ॥ उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही मर्त्यलोकमें अवतार लिया था। एक समय पूर्वकालमें पृथिवी भाराक्रान्त होकर देवताओंकी सभामें गयी थी ॥ ५९ ॥ कालस्वरूपी श्रीजनार्दनने उसीके लिये अवतार लिया था। अब सम्पूर्ण दुष्ट राजा मारे जा चुके, अतः वह कार्य सम्पन्न हो गया ॥ ६० ॥ हे पार्थ! वृष्णि और अन्धक आदि सम्पूर्ण यदुकुलका भी उपसंहार हो गया; इसलिये उन प्रभुके लिये अब पृथिवीतलपर और कुछ भी कर्तव्य नहीं रहा ॥ ६१ ॥ अतः अपना कार्य समाप्त हो चुकनेपर भगवान् स्वेच्छानुसार चले गये, ये देवदेव प्रभु सर्गके आरम्भमें सृष्टि-रचना करते हैं, स्थितिके समय पालन करते हैं और अन्तमें ये ही उसका नाश करनेमें समर्थ हैं—जैसे इस समय वे [राक्षस आदिका संहार करके] चले गये हैं ॥ ६२ ॥
अतः हे पार्थ! तुझे अपनी पराजयसे दुःखी न होना चाहिये, क्योंकि अभ्युदय-काल उपस्थित होनेपर ही पुरुषोंसे ऐसे कर्म बनते हैं जिनसे उनकी स्तुति होती है ॥ ६३ ॥ हे अर्जुन! जिस समय तुझ अकेलेने ही युद्धमें भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिको मार डाला था वह क्या उन वीरोंका कालक्रमसे प्राप्त हीनबल पुरुषसे पराभव नहीं था ? ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार भगवान् विष्णुके प्रभावसे तुमने उन सबोंको नीचा दिखलाया था, उसी प्रकार तुझे दस्युओंसे दबना पड़ा है ॥ ६५ ॥ वे जगत्पति देवेश्वर ही शरीरोंमें प्रविष्ट होकर जगत्की स्थिति करते हैं और वे ही अन्तमें समस्त जीवोंका नाश करते हैं ॥ ६६ ॥
हे कौन्तेय ! जिस समय तेरा भाग्योदय हुआ था उस समय श्रीजनार्दन तेरे सहायक थे और जब उस (सौभाग्य)-का अन्त हो गया तो तेरे विपक्षियोंपर श्रीकेशवकी कृपादृष्टि हुई है ॥ ६७ ॥ तू गंगानन्दन भीष्मपितामहके सहित सम्पूर्ण कौरवोंको मार डालेगा—इस बातको कौन मान सकता था और फिर यह भी किसे विश्वास होगा कि तू आभीरोंसे हार जायगा ॥ ६८ ॥
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| ४२६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३८ |
|---|
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पार्थैतत्सर्वभूतस्य हरेर्लीलाविचेष्टितम्।<br>त्वया यत्कौरवा ध्वस्ता यदाभीरैर्भवाञ्जितः॥ ६९ | हे पार्थ! यह सब सर्वात्मा भगवान्की लीलाका ही कौतुक है कि तुझ अकेलेने कौरवोंको नष्ट कर दिया और फिर स्वयं अहीरोंसे पराजित हो गया॥ ६९॥ |
| गृहीता दस्युभिश्चाश्च भवाञ्छोचति ताःस्त्रियः।<br>एतस्याहं यथावृत्तं कथयामि तवार्जुन॥ ७० | हे अर्जुन! तू जो उन दस्युओंद्वारा हरण की गयी स्त्रियोंके लिये शोक करता है सो मैं तुझे उसका यथावत् रहस्य बतलाता हूँ॥ ७०॥ |
| अष्टावक्रः पुरा विप्रो जलवासरतोऽभवत्।<br>बहून्वर्षगणान्यार्थ गृणन्ब्रह्म सनातनम्॥ ७१ | एक बार पूर्वकालमें विप्रवर अष्टावक्रजी सनातन ब्रह्मकी स्तुति करते हुए अनेकों वर्षतक जलमें रहे॥ ७१॥ |
| जितेष्वसुरसङ्घेषु मेरुपृष्ठे महोत्सवः।<br>बभूव तत्र गच्छन्त्यो ददृशुस्तं सुरस्त्रियः॥ ७२<br>रम्भातिलोत्तमाद्यास्तु शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तुष्टुवुस्तं महात्मानं प्रशंसुश्च पाण्डव॥ ७३ | उसी समय दैत्योंपर विजय प्राप्त करनेसे देवताओंने सुमेरु पर्वतपर एक महान् उत्सव किया। उसमें सम्मिलित होनेके लिये जाती हुई रम्भा और तिलोत्तमा आदि सैकड़ों-हजारों देवांगनाओंने मार्गमें उन मुनिवरको देखकर उनकी अत्यन्त स्तुति और प्रशंसा की॥ ७२-७३॥ |
| आकण्ठमग्नं सलिले जटाभारवहं मुनिम्।<br>विनयावनताश्चैनं प्रणेमुः स्तोत्रतत्पराः॥ ७४ | वे देवांगनाएँ उन जटाधारी मुनिवरको कण्ठपर्यन्त जलमें डूबे देखकर विनयपूर्वक स्तुति करती हुई प्रणाम करने लगीं॥ ७४॥ |
| यथा यथा प्रसन्नोऽसौ तुष्टुवुस्तं तथा तथा।<br>सर्वास्ताः कौरवश्रेष्ठ तं वरिष्ठं द्विजन्मनाम्॥ ७५ | हे कौरवश्रेष्ठ! जिस प्रकार वे द्विजश्रेष्ठ अष्टावक्रजी प्रसन्न हों उसी प्रकार वे अप्सराएँ उनकी स्तुति करने लगीं॥ ७५॥ |
| अष्टावक्र उवाच | अष्टावक्रजी बोले— |
| प्रसन्नोऽहं महाभागा भवतीनां यदिष्यते।<br>मत्तस्तद्व्रियतां सर्वं प्रदास्याम्यतिदुर्लभम्॥ ७६ | हे महाभागाओ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो मुझसे वही वर माँग लो; मैं अति दुर्लभ होनेपर भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा॥ ७६॥ |
| रम्भातिलोत्तमाद्यास्तं वैदिक्योऽप्सरसोऽब्रुवन्।<br>प्रसन्ने त्वय्यपर्याप्तं किमस्माकमिति द्विज॥ ७७ | तब रम्भा और तिलोत्तमा आदि वैदिकी (वेदप्रसिद्ध) अप्सराओंने उनसे कहा—"हे द्विज! आपके प्रसन्न हो जानेपर हमें क्या नहीं मिल गया॥ ७७॥ |
| इतरास्त्वब्रुवन्विप्र प्रसन्नो भगवान्यदि।<br>तदिच्छामः पतिं प्राप्तुं विप्रेन्द्र पुरुषोत्तमम्॥ ७८ | तथा अन्य अप्सराओंने कहा—"यदि भगवान् हमपर प्रसन्न हैं तो हे विप्रेन्द्र! हम साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान्को पतिरूपसे प्राप्त करना चाहती हैं"॥ ७८॥ |
| श्रीव्यास उवाच | श्रीव्यासजी बोले— |
| एवं भविष्यतीत्युक्त्वा ह्युत्ततार जलान्मुनिः।<br>तमुत्तीर्णं च ददृशुर्विरूपं वक्रमष्टधा॥ ७९ | तब 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर मुनिवर अष्टावक्र जलसे बाहर आये। उनके बाहर आते समय अप्सराओंने आठ स्थानोंमें टेढ़े उनके कुरूप देहको देखा॥ ७९॥ |
| तं दृष्ट्वा गृहमानानां यासां हासः स्फुटोऽभवत्।<br>ताश्शशाप मुनिः कोपमवाप्य कुरुनन्दन॥ ८० | उसे देखकर जिन अप्सराओंकी हँसी छिपानेपर भी प्रकट हो गयी, हे कुरुनन्दन! उन्हें मुनिवरने क्रुद्ध होकर यह शाप दिया—॥ ८०॥ |
| यस्माद्विकृतरूपं मां मत्वा हासावमानना।<br>भवतीभिः कृता तस्मादेतं शापं ददामि वः॥ ८१<br>मत्प्रसादेन भर्तारं लब्ध्वा तु पुरुषोत्तमम्।<br>मच्छापोपहतास्सर्वा दस्युहस्तं गमिष्यथ॥ ८२ | "मुझे कुरूप देखकर तुमने हँसते हुए मेरा अपमान किया है, इसलिये मैं तुम्हें यह शाप देता हूँ कि मेरी कृपासे श्रीपुरुषोत्तमको पतिरूपसे पाकर भी तुम मेरे शापके वशीभूत होकर लुटेरोंके हाथोंमें पड़ोगी"॥ ८१-८२॥ |
| श्रीव्यास उवाच | श्रीव्यासजी बोले— |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य मुनिस्ताभिः प्रसादितः।<br>पुनस्सुरेन्द्रलोकं वै प्राह भूयो गमिष्यथ॥ ८३ | मुनिका यह वाक्य सुनकर उन अप्सराओंने उन्हें फिर प्रसन्न किया, तब मुनिवरने उनसे कहा "उसके पश्चात् तुम फिर स्वर्गलोकमें चली जाओगी"॥ ८३॥ |
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