भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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४०६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३३


जृम्भिते शङ्करे नष्टे दैत्यसैन्ये गुहे जिते।
नीते प्रमथसैन्ये च सङ्ख्यं शार्ङ्गधन्वना॥ २७

नन्दिना संगृहीताश्वमधिरूढो महारथम्।
बाणस्तत्राययौ योद्धुं कृष्णकार्ष्णिबलैस्सह॥ २८

बलभद्रो महावीर्यो बाणसैन्यमनेकधा।
विव्याध बाणैः प्रभ्रश्य धर्मतश्च पलायत॥ २९

आकृष्य लाङ्गलाग्रेण मुसलेनाशु ताडितम्।
बलं बलेन ददृशे बाणो बाणैश्च चक्रिणा॥ ३०

ततः कृष्णेन बाणस्य युद्धमासीत्सुदारुणम्।
समस्यतोरिषून्दीप्तानकायत्राणविभेदिनः॥ ३१

कृष्णश्चिच्छेद बाणैस्तान्बाणेन प्रहिताञ्छितान्।
विव्याध केशवं बाणो बाणं विव्याध चक्रधृक्॥ ३२

मुमुचाते तथास्त्राणि बाणकृष्णौ जिगीषया।
परस्परं क्षतिकरौ लाघवादन्निशं द्विज॥ ३३

भिद्यमानेष्वशेषेषु शरेष्वस्त्रे च सीदति।
प्राचुर्येण ततो बाणं हन्तुं चक्रे हरिर्मनः॥ ३४

ततोऽर्कशतसङ्घाततेजसा सदृशद्युति।
जग्राह दैत्यचक्रारिर्हरिश्चक्रं सुदर्शनम्॥ ३५

मुञ्चतो बाणनाशाय ततश्चक्रं मधुद्विषः।
नग्ना दैतेयविद्याभूत्कोटारी पुरतो हरेः॥ ३६

तामग्रतो हरिर्दृष्ट्वा मीलिताक्षस्सुदर्शनम्।
मुमोच बाणमुद्दिश्यच्छेत्तुं बाहुवनं रिपोः॥ ३७

क्रमेण तत्तु बाहूनां बाणस्याच्युतचोदितम्।
छेदं चक्रेऽसुरापास्तशस्त्रौघक्षपणादृतम्॥ ३८

छिन्ने बाहुवने तत्तु करस्थं मधुसूदनः।
मुमुक्षुर्बाणनाशाय विज्ञातस्त्रिपुरद्विषा॥ ३९

समुपेत्याह गोविन्दं सामपूर्वमुमापतिः।
विलोक्य बाणं दोर्दण्डच्छेदासृक्स्राववर्षिणम्॥ ४०


इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा महादेवजीके निद्राभिभूत, दैत्य-सेनाके नष्ट, स्वामिकार्त्तिकेयके पराजित और शिवगणोंके क्षीण हो जानेपर कृष्ण, प्रद्युम्न और बलभद्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये वहाँ बाणासुर साक्षात् नन्दीश्वरद्वारा हाँके जाते हुए महान् रथपर चढ़कर आया॥ २७-२८॥ उसके आते ही महावीर्यशाली बलभद्रजीने अनेकों बाण बरसाकर बाणासुरकी सेनाको छिन्न-भिन्न कर डाला; तब वह वीरधर्मसे भ्रष्ट होकर भागने लगी॥ २९॥ बाणासुरने देखा कि उसकी सेनाको बलभद्रजी बड़ी फुर्तीसे हलसे खींच-खींचकर मूसलसे मार रहे हैं और श्रीकृष्णचन्द्र उसे बाणोंसे बींधे डालते हैं॥ ३०॥ तब बाणासुरका श्रीकृष्णचन्द्रके साथ घोर युद्ध छिड़ गया। वे दोनों परस्पर कवचभेदी बाण छोड़ने लगे। परंतु भगवान् कृष्णने बाणासुरके छोड़े हुए तीखे बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला, और फिर बाणासुर कृष्णको तथा कृष्ण बाणासुरको बींधने लगे॥ ३१-३२॥ हे द्विज! उस समय परस्पर चोट करनेवाले बाणासुर और कृष्ण दोनों ही विजयकी इच्छासे निरन्तर शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्र छोड़ने लगे॥ ३३॥

अन्तमें, समस्त बाणोंके छिन्न और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके निष्फल हो जानेपर श्रीहरिने बाणासुरको मार डालनेका विचार किया॥ ३४॥ तब दैत्यमण्डलके शत्रु भगवान् कृष्णने सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान अपने सुदर्शनचक्रको हाथमें ले लिया॥ ३५॥

जिस समय भगवान् मधुसूदन बाणासुरको मारनेके लिये चक्र छोड़ना ही चाहते थे उसी समय दैत्योंकी विद्या (मन्त्रमयी कुलदेवी) कोटारी भगवान्‌के सामने नग्नावस्थामें उपस्थित हुई॥ ३६॥ उसे देखते ही भगवान्‌ने नेत्र मूँद लिये और बाणासुरको लक्ष्य करके उस शत्रु की भुजाओंके वनको काटनेके लिये सुदर्शनचक्र छोड़ा॥ ३७॥ भगवान् अच्युतके द्वारा प्रेरित उस चक्रने दैत्योंके छोड़े हुए अस्त्रसमूहको काटकर क्रमशः बाणासुरकी भुजाओंको काट डाला [केवल दो भुजाएँ छोड़ दीं]॥ ३८॥ तब त्रिपुरशत्रु भगवान् शंकर जान गये कि श्रीमधुसूदन बाणासुरके बाहुवनको काटकर अपने हाथमें आये हुए चक्रको उसका वध करनेके लिये फिर छोड़ना चाहते हैं॥ ३९॥ अतः बाणासुरको अपने खण्डित भुजदण्डोंसे लोहूकी धारा बहाते देख श्रीउमापतिने गोविन्दके पास आकर सामपूर्वक कहा—॥ ४०॥