विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३३ ] * पञ्चम अंश * ४०५
पुरप्रवेशे प्रमथैर्युद्धमासीन्महात्मनः।
ययौ बाणपुराभ्याशं नीत्वा तान्सङ्क्षयं हरिः॥ १३
ततस्त्रिपादस्त्रिशिरा ज्वरो माहेश्वरो महान्।
बाणरक्षार्थमभ्येत्य युयुधे शार्ङ्गधन्वना॥ १४
तद्भस्मस्पर्शसम्भूततापः कृष्णाङ्गसङ्गमात्।
अवाप बलदेवोऽपि श्रममामीलितेक्षणः॥ १५
ततस्स युद्ध्यमानस्तु सह देवेन शार्ङ्गिणा।
वैष्णवेन ज्वरेणाशु कृष्णदेहान्निराकृतः॥ १६
नारायणभुजाघातपरिपीडनविह्वलम् ।
तं वीक्ष्य क्षम्यतामस्येत्याह देवः पितामहः॥ १७
ततश्च क्षान्तमेवेति प्रोच्य तं वैष्णवं ज्वरम्।
आत्मन्येव लयं निन्ये भगवान्मधुसूदनः॥ १८
ज्वर उवाच
मम त्वया समं युद्धं ये स्मरिष्यन्ति मानवाः।
विज्वरास्ते भविष्यन्तीत्युक्त्वा चैनं ययौ ज्वरः॥ १९
ततोऽग्नीन्भगवान्पञ्च जित्वा नीत्वा तथा क्षयम्।
दानवानां बलं कृष्णश्चूर्णयामास लीलया॥ २०
ततस्समस्तसैन्येन दैतेयानां बलेस्सुतः।
युयुधे शङ्करश्चैव कार्त्तिकेयश्च शौरिणा॥ २१
हरिशङ्करयोर्युद्धमतीवासीत्सुदारुणम् ।
चुक्षुभुस्सकला लोकाः शस्त्रास्त्रांशुप्रतापिताः॥ २२
प्रलयोऽयमशेषस्य जगतो नूनमागतः।
मेनिरे त्रिदशास्तत्र वर्तमाने महारणे॥ २३
जृम्भकास्त्रेण गोविन्दो जृम्भयामास शंकरम्।
ततः प्रणेशुर्दैतेयाः प्रमथाश्च समन्ततः॥ २४
जृम्भाभिभूतस्तु हरो रथोपस्थ उपाविशत्।
न शशाक ततो योद्धुं कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा॥ २५
गरुडक्षतवाहश्च प्रद्युम्नास्त्रेण पीडितः।
कृष्णहुङ्कारनिर्धूतशक्तिश्चापययौ गुहः॥ २६
चढ़कर श्रीहरि बलराम और प्रद्युम्नके सहित बाणासुरकी राजधानीमें आये॥ १२॥ नगरमें घुसते ही उन तीनोंका भगवान् शंकरके पार्षद प्रमथगणोंसे युद्ध हुआ; उन्हें नष्ट करके श्रीहरि बाणासुरकी राजधानीके समीप चले गये॥ १३॥
तदनन्तर बाणासुरकी रक्षाके लिये तीन सिर और तीन पैरवाला माहेश्वर नामक महान् ज्वर आगे बढ़कर श्रीभगवान्से लड़ने लगा॥ १४॥ [उस ज्वरका ऐसा प्रभाव था कि] उसके फेंके हुए भस्मके स्पर्शसे सन्तप्त हुए श्रीकृष्णचन्द्रके शरीरका आलिंगन करनेपर बलदेवजीने भी शिथिल होकर नेत्र मूँद लिये॥ १५॥ इस प्रकार भगवान् शार्ङ्गधरके साथ [उनके शरीरमें व्याप्त होकर] युद्ध करते हुए उस माहेश्वर ज्वरको वैष्णव ज्वरने तुरंत उनके शरीरसे निकाल दिया॥ १६॥ उस समय श्रीनारायणकी भुजाओंके आघातसे उस माहेश्वर ज्वरको पीड़ित और विह्वल हुआ देखकर पितामह ब्रह्माजीने भगवान्से कहा—'इसे क्षमा कीजिये'॥ १७॥ तब भगवान् मधुसूदनने 'अच्छा, मैंने क्षमा की' ऐसा कहकर उस वैष्णव ज्वरको अपनेमें लीन कर लिया॥ १८॥
ज्वर बोला—जो मनुष्य आपके साथ मेरे इस युद्धका स्मरण करेंगे वे ज्वरहीन हो जायँगे, ऐसा कहकर वह चला गया॥ १९॥
तदनन्तर भगवान् कृष्णचन्द्रने पंचाग्नियोंको जीतकर नष्ट किया और फिर लीलासे ही दानवसेनाको नष्ट करने लगे॥ २०॥ तब सम्पूर्ण दैत्यसेनाके सहित बलि-पुत्र बाणासुर, भगवान् शंकर और स्वामिकार्त्तिकेयजी भगवान् कृष्णके साथ युद्ध करने लगे॥ २१॥ श्रीहरि और श्रीमहादेवजीका परस्पर बड़ा घोर युद्ध हुआ, इस युद्धमें प्रयुक्त शस्त्रास्त्रोंके किरणजालसे सन्तप्त होकर सम्पूर्ण लोक क्षुब्ध हो गये॥ २२॥ इस घोर युद्धके उपस्थित होनेपर देवताओंने समझा कि निश्चय ही यह सम्पूर्ण जगत्का प्रलयकाल आ गया है॥ २३॥ श्रीगोविन्दने जृम्भकास्त्र छोड़ा जिससे महादेवजी निद्रित-से होकर जमुहाई लेने लगे; उनकी ऐसी दशा देखकर दैत्य और प्रमथगण चारों ओर भागने लगे॥ २४॥ भगवान् शंकर निद्राभिभूत होकर रथके पिछले भागमें बैठ गये और फिर अनायास ही अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्रसे युद्ध न कर सके॥ २५॥ तदनन्तर गरुड़द्वारा वाहनके नष्ट हो जानेसे, प्रद्युम्नजीके शस्त्रोंसे पीड़ित होनेसे तथा कृष्णचन्द्रके हुंकारसे शक्तिहीन हो जानेसे स्वामिकार्त्तिकेय भी भागने लगे॥ २६॥
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