विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३३ |
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तैंतीसवाँ अध्याय
श्रीकृष्ण और बाणासुरका युद्ध
श्रीपराशर उवाच
बाणोऽपि प्रणिपत्याग्रे मैत्रेयाह त्रिलोचनम्।
देव बाहुसहस्रेण निर्विण्णोऽस्म्याहवं विना॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! एक बार बाणासुरने भी भगवान् त्रिलोचनको प्रणाम करके कहा था कि हे देव! बिना युद्धके इन हजार भुजाओंसे मुझे बड़ा ही खेद हो रहा है॥ १॥
कच्चिन्ममैषां बाहूनां साफल्यजनको रणः।
भविष्यति विना युद्धं भाराय मम किं भुजैः॥ २
क्या कभी मेरी इन भुजाओंको सफल करनेवाला युद्ध होगा? भला बिना युद्धके इन भाररूप भुजाओंसे मुझे लाभ ही क्या है?॥ २॥
श्रीशंकर उवाच
मयूरध्वजभङ्गस्ते यदा बाण भविष्यति।
पिशिताशिजनानन्दं प्राप्स्यसे त्वं तदा रणम्॥ ३
श्रीशंकरजी बोले— हे बाणासुर! जिस समय तेरी मयूरचिह्नवाली ध्वजा टूट जायगी, उसी समय तेरे सामने मांसभोजी यक्ष-पिशाचादिको आनन्द देनेवाला युद्ध उपस्थित होगा॥ ३॥
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वरदं शम्भुमभ्यागतो गृहम्।
सभग्नं ध्वजमालोक्य हृष्टो हर्षं पुनर्ययौ॥ ४
श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर, वरदायक श्रीशंकरको प्रणामकर बाणासुर अपने घर आया और फिर कालान्तरमें उस ध्वजाको टूटी देखकर अति आनन्दित हुआ॥ ४॥
एतस्मिन्नेव काले तु योगविद्याबलेन तम्।
अनिरुद्धमथानिन्ये चित्रलेखा वराप्सराः॥ ५
इसी समय अप्सराश्रेष्ठ चित्रलेखा अपने योगबलसे अनिरुद्धको वहाँ ले आयी॥ ५॥
कन्यान्तःपुरमभ्येत्य रममाणं सहोषया।
विज्ञाय रक्षिणो गत्वा शशंसुर्दैत्यभूपतेः॥ ६
अनिरुद्धको कन्यान्तःपुरमें आकर उषाके साथ रमण करता जान अन्तःपुररक्षकोंने सम्पूर्ण वृत्तान्त दैत्यराज बाणासुरसे कह दिया॥ ६॥
व्यादिष्टं किंकराणां तु सैन्यं तेन महात्मना।
जघान परिघं घोरमादाय परवीरहा॥ ७
तब महावीर बाणासुरने अपने सेवकोंको उससे युद्ध करनेकी आज्ञा दी; किंतु शत्रु-दमन अनिरुद्धने अपने सम्मुख आनेपर उस सम्पूर्ण सेनाको एक लोहमय दण्डसे मार डाला॥ ७॥
हतेषु तेषु बाणोऽपि रथस्थस्तद्वधोद्यतः।
युध्यमानो यथाशक्ति यदुवीरेण निर्जितः॥ ८
अपने सेवकोंके मारे जानेपर बाणासुर अनिरुद्धको मार डालनेकी इच्छासे रथपर चढ़कर उनके साथ युद्ध करने लगा; किंतु अपनी शक्तिभर युद्ध करनेपर भी वह यदुवीर अनिरुद्धजीसे परास्त हो गया॥ ८॥
मायया युयुधे तेन स तदा मन्त्रिचोदितः।
ततस्तं पन्नगास्त्रेण बबन्ध यदुनन्दनम्॥ ९
तब वह मन्त्रियोंकी प्रेरणासे मायापूर्वक युद्ध करने लगा और यदुनन्दन अनिरुद्धको नागपाशसे बाँध लिया॥ ९॥
द्वारवत्यां क्व यातोऽसावनिरुद्धेति जल्पताम्।
यदूनामाचचक्षे तं बद्धं बाणेन नारदः॥ १०
इधर द्वारकापुरीमें जिस समय समस्त यादवोंमें यह चर्चा हो रही थी कि ‘अनिरुद्ध कहाँ गये?’ उसी समय देवर्षि नारदने उनके बाणासुरद्वारा बाँधे जानेकी सूचना दी॥ १०॥
तं शोणितपुरं नीतं श्रुत्वा विद्याविदग्धया।
योषिता प्रत्ययं जग्मुर्यादवा नामरैरिति॥ ११
नारदजीके मुखसे योगविद्यामें निपुण युवती चित्रलेखाद्वारा उन्हें शोणितपुर ले जाये गये सुनकर यादवोंको विश्वास हो गया कि देवताओंने उन्हें नहीं चुराया*॥ ११॥
ततो गरुडमारुह्य स्मृतमात्रागतं हरिः।
बलप्रद्युम्नसहितो बाणस्य प्रययौ पुरम्॥ १२
तब स्मरणमात्रसे उपस्थित हुए गरुडपर
* अबतक यादवगण यही सोच रहे थे कि पारिजात हरणसे चिढ़कर देवता ही अनिरुद्धको चुरा ले गये हैं।