भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

अ० ३२ ] * पञ्चम अंश * ४०३

विदितार्था तु तामाह पुनश्चोषा यथोदितम्। देव्या तथैव तत्प्राप्तौ यो ह्युपायः कुरुष्व तम्॥ १९

चित्रलेखोवाच दुर्विज्ञेयमिदं वक्तुं प्राप्तुं वापि न शक्यते। तथापि किञ्चित्कर्तव्यमुपकारं प्रिये तव ॥ २० सप्ताष्टदिनपर्यन्तं तावत्कालः प्रतीक्ष्यताम्। इत्युक्त्वाभ्यन्तरं गत्वा उपायं तमथाकरोत्॥ २१

श्रीपराशर उवाच ततः पटे सुरान्दैत्यानान्धर्वांश्च प्रधानतः। मनुष्यांश्च विलिख्यास्यै चित्रलेखा व्यदर्शयत्॥ २२ अपास्य सा तु गन्धर्वांस्तथोरगसुरासुरान्। मनुष्येषु ददौ दृष्टिं तेष्वप्यन्धकवृष्णिषु॥ २३ कृष्णरामौ विलोक्यासीत्सुभ्रूल्लज्जाजडेव सा। प्रद्युम्नदर्शने व्रीडादृष्टिं निन्येऽन्यतो द्विज ॥ २४ दृष्टमात्रे ततः कान्ते प्रद्युम्नतनये द्विज। दृष्ट्वात्यर्थविलासिन्या लज्जा क्वापि निराकृता ॥ २५ सोऽयं सोऽयमितीत्युक्ते तया सा योगगामिनी। चित्रलेखाब्रवीदेनामुषां बाणसुतां तदा॥ २६

चित्रलेखोवाच अयं कृष्णस्य पौत्रस्ते भर्ता देव्या प्रसादितः। अनिरुद्ध इति ख्यातः प्रख्यातः प्रियदर्शनः॥ २७ प्राप्नोषि यदि भर्तारमिमं प्राप्तं त्वयाखिलम्। दुष्प्रवेशा पुरी पूर्वं द्वारका कृष्णपालिता ॥ २८ तथापि यत्नाद्भर्तारमानयिष्यामि ते सखि। रहस्यमेतद्वक्तव्यं न कस्यचिदपि त्वया॥ २९ अचिरादागमिष्यामि सहस्व विरहं मम। ययौ द्वारवतीं चोषां समाश्वास्य ततः सखीम्॥ ३०

चित्रलेखाके सब बात जान लेनेपर उषाने जो कुछ श्रीपार्वतीजीने कहा था, वह भी उसे सुना दिया और कहा कि अब जिस प्रकार उसका पुनः समागम हो वही उपाय करो ॥ १९ ॥

चित्रलेखाने कहा—हे प्रिये! तुमने जिस पुरुषको देखा है उसे तो जानना भी बहुत कठिन है फिर उसे बतलाना या पाना कैसे हो सकता है? तथापि मैं तुम्हारा कुछ-न-कुछ उपकार तो करूँगी ही ॥ २० ॥ तुम सात या आठ दिनतक मेरी प्रतीक्षा करना—ऐसा कहकर वह अपने घरके भीतर गयी और उस पुरुषको ढूँढनेका उपाय करने लगी ॥ २१ ॥

श्रीपराशरजी बोले—तदनन्तर [सात-आठ दिन पश्चात् लौटकर] चित्रलेखाने चित्रपटपर मुख्य-मुख्य देवता, दैत्य, गन्धर्व और मनुष्योंके चित्र लिखकर उषाको दिखलाये ॥ २२ ॥ तब उषाने गन्धर्व, नाग, देवता और दैत्य आदिको छोड़कर केवल मनुष्योंपर और उनमें भी विशेषतः अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंपर ही दृष्टि दी ॥ २३ ॥ हे द्विज! राम और कृष्णके चित्र देखकर वह सुन्दर भृकुटिवाली लज्जासे जडवत् हो गयी तथा प्रद्युम्नको देखकर उसने लज्जावश अपनी दृष्टि हटा ली ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् प्रद्युम्नतनय प्रियतम अनिरुद्धजीको देखते ही उस अत्यन्त विलासिनीकी लज्जा मानो कहीं चली गयी ॥ २५ ॥ [वह बोल उठी]—'वह यही है, वह यही है।' उसके इस प्रकार कहनेपर योगगामिनी चित्रलेखाने उस बाणासुरकी कन्यासे कहा—॥ २६ ॥

चित्रलेखा बोली—देवीने प्रसन्न होकर यह कृष्णका पौत्र ही तेरा पति निश्चित किया है; इसका नाम अनिरुद्ध है और यह अपनी सुन्दरताके लिये प्रसिद्ध है ॥ २७ ॥ यदि तुझको यह पति मिल गया तब तो तूने मानो सभी कुछ पा लिया; किन्तु कृष्णचन्द्रद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें पहले प्रवेश ही करना कठिन है ॥ २८ ॥ तथापि हे सखि! किसी उपायसे मैं तेरे पतिको लाऊँगी ही, तू इस गुप्त रहस्यको किसीसे भी न कहना ॥ २९ ॥ मैं शीघ्र ही आऊँगी, इतनी देर तू मेरे वियोगको सहन कर। अपनी सखी उषाको इस प्रकार ढाढस बँधाकर चित्रलेखा द्वारकापुरीको गयी ॥ ३० ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥