विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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४०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३२
| प्रद्युम्नः प्रथमस्तेषां सर्वेषां रुक्मिणीसुतः ।<br>प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽभूद्वज्रस्तस्मादजायत ॥ ६<br>अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो बलेः पौत्रीं महाबलः ।<br>उषां बाणस्य तनयामुपयेमे द्विजोत्तम ॥ ७<br>यत्र युद्धमभूद्घोरं हरिशङ्करयोर्महत् ।<br>छिन्नं सहस्रं बाहूनां यत्र बाणस्य चक्रिणा ॥ ८ | इन सब पुत्रोंमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न सबसे बड़े थे; प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका जन्म हुआ और अनिरुद्धसे वज्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ हे द्विजोत्तम ! महाबली अनिरुद्ध युद्धमें किसीसे रोके नहीं जा सकते थे। उन्होंने बलिकी पौत्री एवं बाणासुरकी पुत्री उषासे विवाह किया था ॥ ७ ॥ उस विवाहमें श्रीहरि और भगवान् शंकरका घोर युद्ध हुआ था और श्रीकृष्णचन्द्रने बाणासुरकी सहस्र भुजाएँ काट डाली थीं ॥ ८ ॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>कथं युद्धमभूद्ब्रह्मन्नुषार्थे हरकृष्णयोः ।<br>कथं क्षयं च बाणस्य बाहूनां कृतवान्हरिः ॥ ९<br>एतत्सर्वं महाभाग ममाख्यातुं त्वमर्हसि ।<br>महत्कौतूहलं जातं कथां श्रोतुमिमां हरेः ॥ १० | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे ब्रह्मन् ! उषाके लिये श्रीमहादेव और कृष्णका युद्ध क्यों हुआ और श्रीहरिने बाणासुरकी भुजाएँ क्यों काट डालीं ? ॥ ९ ॥ हे महाभाग ! आप मुझसे यह सम्पूर्ण वृत्तान्त कहिये; मुझे श्रीहरिकी यह कथा सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ १० ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>उषा बाणसुता विप्र पार्वतीं सह शम्भुना ।<br>क्रीडन्तीमुपलक्ष्योच्चैः स्पृहां चक्रे तदाश्रयाम् ॥ ११<br>ततस्सकलचित्तज्ञा गौरी तामाह भामिनीम् ।<br>अलमत्यर्थतापेन भर्त्रा त्वमपि रंस्यसे ॥ १२<br>इत्युक्ता सा तया चक्रे कदेति मतिमात्मनः ।<br>को वा भर्ता ममेत्याह पुनस्तामाह पार्वती ॥ १३ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे विप्र ! एक बार बाणासुरकी पुत्री उषाने श्रीशंकरके साथ पार्वतीजीको क्रीडा करती देख स्वयं भी अपने पतिके साथ रमण करनेकी इच्छा की ॥ ११ ॥ तब सर्वान्तर्यामिनी श्रीपार्वतीजीने उस सुकुमारीसे कहा—'तू अधिक सन्तप्त मत हो, यथासमय तू भी अपने पतिके साथ रमण करेगी' ॥ १२ ॥ पार्वतीजीके ऐसा कहनेपर उषाने मन-ही-मन यह सोचकर कि 'न जाने ऐसा कब होगा ? और मेरा पति भी कौन होगा ?' [इस सम्बन्धमें] पार्वतीजीसे पूछा, तब पार्वतीजीने उससे फिर कहा— ॥ १३ ॥ |
| पार्वत्युवाच<br>वैशाखशुक्लद्वादश्यां स्वप्ने योऽभिभवं तव ।<br>करिष्यति स ते भर्ता राजपुत्रि भविष्यति ॥ १४ | **पार्वतीजी बोलीं—**हे राजपुत्रि ! वैशाख शुक्ला द्वादशीकी रात्रिको जो पुरुष स्वप्नमें तुझसे हठात् सम्भोग करेगा वही तेरा पति होगा ॥ १४ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>तस्यां तिथावुषास्वप्ने यथा देव्या समीरितम् ।<br>तथैवाभिभवं चक्रे कश्चिद्रागं च तत्र सा ॥ १५<br>ततः प्रबुद्धा पुरुषमपश्यन्ती समुत्सुका ।<br>क्व गतोऽसीति निर्लज्जा मैत्रेयोक्तवती सखीम् ॥ १६<br>बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सुता ।<br>तस्याः सख्यभवत्सा च प्राह कोऽयं त्वयोच्यते ॥ १७<br>यदा लज्जाकुला नास्यै कथयामास सा सखी ।<br>तदा विश्वासमानीय सर्वमेवाभ्यवादयत् ॥ १८ | **श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर उसी तिथिको उषाकी स्वप्नावस्थामें किसी पुरुषने उससे, जैसा श्रीपार्वतीदेवीने कहा था, उसी प्रकार सम्भोग किया और उसका भी उसमें अनुराग हो गया ॥ १५ ॥ हे मैत्रेय ! तब उसके बाद स्वप्नसे जगनेपर जब उसने उस पुरुषको न देखा तो वह उसे देखनेके लिये अत्यन्त उत्सुक होकर अपनी सखीकी ओर लक्ष्य करके निर्लज्जतापूर्वक कहने लगी—"हे नाथ ! आप कहाँ चले गये ?" ॥ १६ ॥<br>बाणासुरका मन्त्री कुम्भाण्ड था; उसकी चित्रलेखा नामकी पुत्री थी, वह उषाकी सखी थी, [उषाका यह प्रलाप सुनकर] उसने पूछा—"यह तुम किसके विषयमें कह रही हो ?" ॥ १७ ॥ किन्तु जब लज्जावश उषाने उसे कुछ भी न बतलाया तब चित्रलेखाने [सब बात गुप्त रखनेका] विश्वास दिलाकर उषासे सब वृत्तान्त कहला लिया ॥ १८ ॥ |
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