विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३२] * पञ्चम अंश * ४०१
ततस्ते यादवास्सर्वे देहबन्धानमानुषान्।
ददृशुः पादपे तस्मिन् कुर्वन्तो मुखदर्शनम्॥ १३
किंकरैस्समुपानीतं हस्त्यश्वादि ततो धनम्।
विभज्य प्रददौ कृष्णो बान्धवानां महामतिः॥ १४
कन्याश्च कृष्णो जग्राह नरकस्य परिग्रहान्॥ १५
ततः काले शुभे प्राप्ते उपयेमे जनार्दनः।
ताः कन्या नरकेणासन्सर्वतो यास्समाहृताः॥ १६
एकस्मिन्नेव गोविन्दः काले तासां महामुने।
जग्राह विधिवत्पाणीन्पृथग्गेहेषु धर्मतः॥ १७
षोडशस्त्रीसहस्राणि शतमेकं ततोऽधिकम्।
तावन्ति चक्रे रूपाणि भगवान् मधुसूदनः॥ १८
एकैकमेव ताः कन्या मेनिरे मधुसूदनः।
ममैव पाणिग्रहणं मैत्रेय कृतवानिति॥ १९
निशासु च जगत्स्रष्टा तासां गेहेषु केशवः।
उवास विप्र सर्वासां विश्वरूपधरो हरिः॥ २०
यादवोंने उस वृक्षके पास जाकर अपना मुख देखा तो उन्हें अपना शरीर अमानुष दिखलायी दिया॥ १३॥
तदनन्तर महामति श्रीकृष्णचन्द्रने नरकासुरके सेवकोंद्वारा लाये हुए हाथी-घोड़े आदि धनको अपने बन्धु-बान्धवोंमें बाँट दिया और नरकासुरकी वरण की हुई कन्याओंको स्वयं ले लिया॥ १४-१५॥
शुभ समय प्राप्त होनेपर श्रीजनार्दनने उन समस्त कन्याओंके साथ, जिन्हें नरकासुर बलात् हर लाया था, विवाह किया॥ १६॥
हे महामुने! श्रीगोविन्दने एक ही समय पृथक्-पृथक् भवनोंमें उन सबके साथ विधिवत् धर्मपूर्वक पाणिग्रहण किया॥ १७॥
वे सोलह हजार एक सौ स्त्रियाँ थीं; उन सबके साथ पाणिग्रहण करते समय श्रीमघुसूदने इतने ही रूप बना लिये॥ १८॥
हे मैत्रेय! परंतु उस समय प्रत्येक कन्या 'भगवान्ने मेरा ही पाणिग्रहण किया है' इस प्रकार उन्हें एक ही समझ रही थी॥ १९॥
हे विप्र! जगत्स्रष्टा विश्वरूपधारी श्रीहरि रात्रिके समय उन सभीके घरोंमें रहते थे॥ २०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
बत्तीसवाँ अध्याय
उषा-चरित्र
श्रीपराशर उवाच
प्रद्युम्नाद्या हरेः पुत्रा रुक्मिण्यां कथितास्तव।
भानुर्भौमेरिकाद्यांश्च सत्यभामा व्यजायत॥ १
दीप्तिमत्ताम्रपक्षाद्या रोहिण्यां तनया हरेः।
बभूवुर्जाम्बवत्यां च साम्बाद्या बलशालिनः॥ २
तनया भद्रविन्दाद्या नाग्नजित्यां महाबलाः।
सङ्ग्रामजित्प्रधानास्तु शैव्यायां च हरेस्सुताः॥ ३
वृकाद्याश्च सुता माद्र्यां गात्रवत्प्रमुखांस्तुतान्।
अवाप लक्ष्मणा पुत्रान्कालिन्द्याश्च श्रुतादयः॥ ४
अन्यासां चैव भार्याणां समुत्पन्नानि चक्रिणः।
अष्टायुतानि पुत्राणां सहस्राणि शतं तथा॥ ५
श्रीपराशरजी बोले— रुक्मिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए भगवान्के प्रद्युम्न आदि पुत्रोंका वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं; सत्यभामाने भानु और भौमेरिक आदिको जन्म दिया॥ १॥
श्रीहरिके रोहिणीके गर्भसे दीप्तिमान् और ताम्रपक्ष आदि तथा जाम्बवतीसे बलशाली साम्ब आदि पुत्र हुए॥ २॥
नाग्नजिती (सत्या)-से महाबली भद्रविन्द आदि और शैव्या (मित्रविन्दा)-से संग्रामजित् आदि उत्पन्न हुए॥ ३॥
माद्रीसे वृक आदि, लक्ष्मणासे गात्रवान् आदि तथा कालिन्दीसे श्रुत आदि पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ४॥
इसी प्रकार भगवान्की अन्य स्त्रियोंके भी आठ अयुत आठ हजार आठ सौ (अट्ठासी हजार आठ सौ) पुत्र हुए॥ ५॥