भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 411

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* श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ३१


इकतीसवाँ अध्याय

भगवान्‌का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना

श्रीपराशर उवाच
संस्तुतो भगवानित्थं देवराजेन केशवः।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचेन्द्रं द्विजोत्तम॥ १

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजोत्तम! इन्द्रने जब इस प्रकार स्तुति की तो भगवान् कृष्णचन्द्र गम्भीर-भावसे हँसते हुए इस प्रकार बोले—॥ १॥


श्रीकृष्ण उवाच
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मर्त्या जगत्पते।
क्षन्तव्यं भवतैवेदमपराधं कृतं मम॥ २
पारिजाततरुश्चायं नीयतामुचितास्पदम्।
गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात्॥ ३
वज्रं चेदं गृहाण त्वं यदत्र प्रहितं त्वया।
तवैवैतत्प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम्॥ ४

श्रीकृष्णजी बोले— हे जगत्पते! आप देवराज इन्द्र हैं और हम मरणधर्मा मनुष्य हैं। हमने आपका जो अपराध किया है उसे आप क्षमा करें॥ २॥ मैंने जो यह पारिजातवृक्ष लिया था इसे इसके योग्य स्थान (नन्दनवन)-को ले जाइये। हे शक्र! मैंने तो इसे सत्यभामाके कहनेसे ही ले लिया था॥ ३॥ और आपने जो वज्र फेंका था उसे भी ले लीजिये; क्योंकि हे शक्र! यह शत्रुओंको नष्ट करनेवाला शस्त्र आपकाही है॥ ४॥


इन्द्र उवाच
विमोहयसि मामीश मर्त्योऽहमिति किं वदन्।
जानीमस्त्वं भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम्॥ ५
योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्तो नाथ संस्थितः।
जगतश्शल्यनिष्कर्षं करोष्यसुरसूदन॥ ६
नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवतीं पुरीम्।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्ते नायं संस्थास्यते भुवि॥ ७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वैतद्व्यतिक्रमम्॥ ८

इन्द्र बोले— हे ईश! 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहकर मुझे क्यों मोहित करते हैं? हे भगवन्! मैं तो आपके इस सगुणस्वरूपको ही जानता हूँ, हम आपके सूक्ष्म-स्वरूपको जाननेवाले नहीं हैं॥ ५॥ हे नाथ! आप जो हैं वही हैं, [हम तो इतना ही जानते हैं कि] हे दैत्यदलन! आप लोकरक्षामें तत्पर हैं और इस संसारके काँटोंको निकाल रहे हैं॥ ६॥ हे कृष्ण! इस पारिजात-वृक्षको आप द्वारकापुरी ले जाइये, जिस समय आप मर्त्यलोक छोड़ देंगे, उस समय वह भूर्लोकमें नहीं रहेगा॥ ७॥ हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे महाबाहो! हे शंखचक्रगदापाणे! मेरी इस धृष्टताको क्षमा कीजिये॥ ८॥


श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुवं हरिः।
प्रसक्तैः सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमानः सुर्षिभिः॥ ९
ततश्शङ्खमुपाध्माय द्वारकोपरि संस्थितः।
हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिनां द्विज॥ १०
अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान्।
निष्कूटे स्थापयामास पारिजातं महातरुम्॥ ११
यमभ्येत्य जनस्सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम्।
वास्यते यस्य पुष्योत्थगन्धेनोर्वी त्रियोजनम्॥ १२

श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीहरि देवराजसे 'तुम्हारी जैसी इच्छा है वैसा ही सही' ऐसा कहकर सिद्ध, गन्धर्व और देवर्षिगणसे स्तुत हो भूर्लोकमें चले आये॥ ९॥ हे द्विज! द्वारकापुरीके ऊपर पहुँचकर श्रीकृष्णचन्द्रने [अपने आनेकी सूचना देते हुए] शंख बजाकर द्वारकावासियोंको आनन्दित किया॥ १०॥ तदनन्तर सत्यभामाके सहित गरुडसे उतरकर उस पारिजात-महावृक्षको [सत्यभामाके] गृहोद्यानमें लगा दिया॥ ११॥ जिसके पास आकर सब मनुष्योंको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आता है और जिसके पुष्पोंसे निकली हुई गन्धसे तीन योजनतक पृथिवी सुगन्धित रहती है॥ १२॥


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