विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- पञ्चम अंश *
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कीदृशं देवराज्यं ते पारिजातस्वगुञ्ज्वलाम् । अपश्यतो यथापूर्वं प्रणयाभ्यागतां शचीम् ॥ ७२ अलं शक्र प्रयासेन न व्रीडां गन्तुमर्हसि । नीयतां पारिजातोऽयं देवाससन्तु गतव्यथाः ॥ ७३ पतिगर्विवलेपेन बहुमानपुरस्सरम् । न ददर्श गृहं यातामुपचारेण मां शची ॥ ७४ स्त्रीत्वादगुरुचित्ताहं स्वभर्तृश्लाघनापरा । ततः कृतवती शक्र भवता सह विग्रहम् ॥ ७५ तदलं पारिजातेन परस्वेन हूतेन मे । रूपेण गर्विता सा तु भर्त्रा का स्त्री न गर्विता ॥ ७६
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तो वै निववृते देवराजस्तथा द्विज । प्राह चैनामलं चण्डि सख्युः खेदोक्तिविस्तैरः ॥ ७७ न चापि सर्गसंहारस्थितिकर्ताखिलस्य यः । जितस्य तेन मे व्रीडा जायते विश्वरूपिणा ॥ ७८ यस्माज्जगत्सकलमेतदनादिमध्या- द्यस्मिन्मृतश्च न भविष्यति सर्वभूतात् । तेनोद्भवप्रलयपालनकारणेन व्रीडा कथं भवति देवि निराकृतस्य ॥ ७९ सकलभुवनसूतिर्मूर्तिरल्पाल्यसूक्ष्मा विदितसकलवेदैर्ज्ञायते यस्य नान्यैः । तमजमकृतमीशं शाश्वतं स्वेच्छयैन जगदुपकृतिमर्त्य को विजेतुं समर्थः ॥ ८०
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमोऽशो त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अब प्रेमवश अपने पास आयी हुई शचीको पहलेकी भाँति पारिजात-पुष्पकी मालासे अलंकृत न देखकर तुम्हें देवराजत्वका क्या सुख होगा ? ॥ ७२ ॥ हे शक्र ! अब तुम्हें अधिक प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है, तुम संकोच मत करो; इस पारिजात-वृक्षको ले जाओ। इसे पाकर देवगण सन्तापरहित हों ॥ ७३ ॥ अपने पतिके बाहुबलसे अत्यन्त गर्विता शचीने अपने घर जानेपर भी मुझे कुछ अधिक सम्मानकी दृष्टिसे नहीं देखा था ॥ ७४ ॥ स्त्री होनेसे मेरा चित्त भी अधिक गम्भीर नहीं है, इसलिये मैंने भी अपने पतिका गौरव प्रकट करनेके लिये ही तुमसे यह लड़ाई ठानी थी ॥ ७५ ॥ मुझे दूसरेकी सम्पत्ति इस पारिजातको ले जानेकी क्या आवश्यकता है ? शची अपने रूप और पतिके कारण गर्विता है तो ऐसी कौन-सी स्त्री है जो इस प्रकार गर्वाली न हो ?" ॥ ७६ ॥
श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज ! सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर देवराज लौट आये और बोले—"हे क्रोधिते ! मैं तुम्हारा सुहृद् हूँ, अतः मेरे लिये ऐसी वैमनस्य बढानेवाली उक्तियोंके विस्तार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है ? ॥ ७७ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले हैं, उन विश्वरूप प्रभुसे पराजित होनेमें भी मुझे कोई संकोच नहीं है ॥ ७८ ॥ जिस आदि और मध्यरहित प्रभुसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें यह स्थित है और फिर जिसमें लीन होकर अन्तमें यह न रहेगा; हे देवि ! जगत्की उत्पत्ति, प्रलय और पालनके कारण उस परमात्मासे ही परास्त होनेमें मुझे कैसे लज्जा हो सकती है ? ॥ ७९ ॥ जिसकी अत्यन्त अल्प और सूक्ष्म मूर्तिको, जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाले अन्य पुरुष भी नहीं जान पाते तथा जिसने जगत्के उपकारके लिये अपनी इच्छासे ही मनुष्यरूप धारण किया है उस अजन्मा, अकर्ता और नित्य ईश्वरको जीतनेमें कौन समर्थ है ?" ॥ ८० ॥
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