विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३९८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०
| ततो दिशो नभश्चैव दृष्ट्वा शरशतैश्चितम्।<br>मुमुचुस्त्रिदशास्सर्वे ह्यस्त्रशस्त्राण्यनेकशः ॥ ५७ | इस प्रकार सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशको सैकड़ों बाणोंसे पूर्ण देख देवताओने अनेकों अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ५७ ॥ |
| एकैकमस्त्रं शस्त्रं च देवैर्मुक्तं सहस्रशः ।<br>चिच्छेद लीलयैवेशो जगतां मधुसूदनः ॥ ५८ | त्रिलोकीके स्वामी श्रीमधुसूदनने देवताओंके छोड़े हुए प्रत्येक अस्त्र-शस्त्रके लीलासे ही हजारों टुकड़े कर दिये ॥ ५८ ॥ |
| पाशं सलिलराजस्य समाकृष्योरगाशनः ।<br>चकार खण्डशश्चञ्च्वा बालपन्नगदेहवत् ॥ ५९ | सर्पाहारी गरुडने जलाधिपति वरुणके पाशको खींचकर अपनी चोंचसे सर्पके बच्चेके समान उसके कितने ही टुकड़े कर डाले ॥ ५९ ॥ |
| यमेन प्रहितं दण्डं गदाविक्षेपखण्डितम्।<br>पृथिव्यां पातयामास भगवान् देवकीसूतः ॥ ६० | श्रीदेवकीनन्दनने यमके फेंके हुए दण्डको अपनी गदासे खण्ड-खण्ड कर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६० ॥ |
| शिबिकां च धनेशस्य चक्रेण तिलशो विभुः ।<br>चकार शौरिरर्कं च दृष्टिदृष्टहतौजसम्॥ ६१ | कुबेरके विमानको भगवान्ने सुदर्शनचक्रद्वारा तिल-तिल कर डाला और सूर्यको अपनी तेजोमय दृष्टिसे देखकर ही निस्तेज कर दिया ॥ ६१ ॥ |
| नीतोऽग्निशीततां बाणैर्द्राविता वसवो दिशः ।<br>चक्रविच्छिन्नशूलाग्रा रुद्रा भुवि निपातिताः ॥ ६२ | भगवान्ने तदनन्तर बाण बरसाकर अग्निको शीतल कर दिया और वसुओंको दिशा-विदिशाओंमें भगा दिया तथा अपने चक्रसे त्रिशूलोंकी नोंक काटकर रुद्रगणको पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६२ ॥ |
| साध्या विश्वेऽथ मरुतो गन्धर्वाश्चैव सायकैः ।<br>शार्ङ्गिणा प्रेरितैरस्ता व्योम्नि शाल्मलितूलवत् ॥ ६३ | भगवान्के चलाये हुए बाणोंसे साध्यगण, विश्वेदेवगण, मरुद्गण और गन्धर्वगण सेमलकी रूईके समान आकाशमें ही लीन हो गये ॥ ६३ ॥ |
| गरुत्मानपि तुण्डेन पक्षाभ्यां च नखाङ्कुरैः ।<br>भक्षयंस्ताडयन् देवान् दारयंश्च चचार वै ॥ ६४ | श्रीभगवान्के साथ गरुडजी भी अपनी चोंच, पंख और पंजोंसे देवताओंको खाते, मारते और फाड़ते फिर रहे थे ॥ ६४ ॥ |
| ततश्शरसहस्रेण देवेन्द्रमधुसूदनौ ।<br>परस्परं ववर्षतु धाराभिरिव तोयदौ ॥ ६५ | फिर जिस प्रकार दो मेघ जलकी धाराएँ बरसाते हों उसी प्रकार देवराज इन्द्र और श्रीमधुसूदन एक-दूसरेपर बाण बरसाने लगे ॥ ६५ ॥ |
| ऐरावतेन गरुडो युयुधे तत्र संकुले ।<br>देवैस्समस्तैर्युयुधे शक्रेण च जनार्दनः ॥ ६६ | उस युद्धमें गरुडजी ऐरावतके साथ और श्रीकृष्णचन्द्र इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ लड़ रहे थे ॥ ६६ ॥ |
| भिन्नेष्वशेषबाणेषु शस्त्रेष्वस्त्रेषु च त्वरन्।<br>जग्राह वासवो वज्रं कृष्णश्चक्रं सुदर्शनम् ॥ ६७ | सम्पूर्ण बाणोंके चूक जाने और अस्त्र-शस्त्रोंके कट जानेपर इन्द्रने शीघ्रतासे वज्र और कृष्णने सुदर्शनचक्र हाथमें लिया ॥ ६७ ॥ |
| ततो हाहाकृतं सर्वं त्रैलोक्यं द्विजसत्तम ।<br>वज्रचक्रकरौ दृष्ट्वा देवराजजनार्दनौ ॥ ६८ | हे द्विजश्रेष्ठ! उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीमें इन्द्र और कृष्णचन्द्रको क्रमशः वज्र और चक्र लिये हुए देखकर हाहाकार मच गया ॥ ६८ ॥ |
| क्षिप्तं वज्रमथेन्द्रेण जग्राह भगवान्हरिः ।<br>न मुमोच तदा चक्रं शक्रं तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ६९ | श्रीहरिने इन्द्रके छोड़े हुए वज्रको अपने हाथोंसे पकड़ लिया और स्वयं चक्र न छोड़कर इन्द्रसे कहा—"अरे, ठहर!" ॥ ६९ ॥ |
| प्रणष्टवज्रं देवेन्द्रं गरुडक्षतवाहनम्।<br>सत्यभामाब्रवीद्वीरं पलायनपरायणम्॥ ७० | इस प्रकार वज्र छिन जाने और अपने वाहन ऐरावतके गरुडद्वारा क्षत-विक्षत हो जानेके कारण भागते हुए वीर इन्द्रसे सत्यभामाने कहा— ॥ ७० ॥ |
| त्रैलोक्येश न ते युक्तं शचीभर्तुः पलायनम्।<br>पारिजातस्रगाभोगा त्वामुपस्थास्यते शची ॥ ७१ | "हे त्रैलोक्येश्वर! तुम शचीके पति हो, तुम्हें इस प्रकार युद्धमें पीठ दिखलाना उचित नहीं है। तुम भागो मत, पारिजात-पुष्पोंकी मालासे विभूषिता होकर शची शीघ्र ही तुम्हारे पास आवेगी ॥ ७१ ॥ |