भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

३९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २८


तस्या विवाहे रामाद्या यादवा हरिणा सह।
रुक्मिणो नगरं जग्मुर्नाम्ना भोजकटं द्विज॥ ९
विवाहे तत्र निर्वृत्ते प्रद्युम्नेस्तु महात्मनः।
कलिङ्गराजप्रमुखा रुक्मिणं वाक्यमब्रुवन्॥ १०
अनक्षज्ञो हली द्यूते तथास्य व्यसनं महत्।
न जयामो बलं कस्माद्द्यूतेनैनं महाबलम्॥ ११
श्रीपराशर उवाच
तथेति तानाह नृपान्रुक्मी बलमदान्वितः।
सभायां सह रामेण चक्रे द्यूतं च वै तदा॥ १२
सहस्रमेकं निष्काणां रुक्मिणा विजितो बलः।
द्वितीयेऽपि पणे चान्यत्सहस्रं रुक्मिणा जितः॥ १३
ततो दशसहस्राणि निष्काणां पणमाददे।
बलभद्रोऽजयत्तानि रुक्मी द्यूतविदां वरः॥ १४
ततो जहास स्वनवत्कलिङ्गाधिपतिर्द्विज।
दन्तान्विदर्शयन्मूढो रुक्मी चाह मदोद्धतः॥ १५
अविद्योऽयं मया द्यूते बलभद्रः पराजितः।
मुधैवाक्षावलेपान्धो योऽवमेनेऽक्षकोविदान्॥ १६
दृष्ट्वा कलिङ्गराजन्तं प्रकाशदशनाननम्।
रुक्मिणं चापि दुर्वाक्यं कोपं चक्रे हलायुधः॥ १७
ततः कोपपरीतात्मा निष्ककोटिं समाददे।
ग्लहं जग्राह रुक्मी च तदर्थेऽक्षानपातयत्॥ १८
अजयद्बलदेवस्तं प्राहोच्चैर्विजितं मया।
मयेति रुक्मी प्राहोच्चैरलीकोक्तेरलं बल॥ १९
त्वयोक्तोऽयं ग्लहस्सत्यं न मयैषोऽनुमोदितः।
एवं त्वया चेद्विजितं विजितं न मया कथम्॥ २०
श्रीपराशर उवाच
अथान्तरिक्षे वागुच्चैः प्राह गम्भीरनादिनी।
बलदेवस्य तं कोपं वर्द्धयन्ती महात्मनः॥ २१
जितं बलेन धर्मेण रुक्मिणा भाषितं मृषा।
अनुक्त्वापि वचः किञ्चित्कृतं भवति कर्मणा॥ २२
ततो बलः समुत्थाय कोपसंरक्तलोचनः।
जघानाष्टापदेनैव रुक्मिणं स महाबलः॥ २३


हिन्दी अनुवाद:

हे द्विज! उसके विवाहमें सम्मिलित होनेके लिये कृष्णचन्द्रके साथ बलभद्र आदि अन्य यादवगण भी रुक्मीकी राजधानी भोजकट नामक नगरको गये॥ ९॥ जब प्रद्युम्न-पुत्र महात्मा अनिरुद्धका विवाह-संस्कार हो चुका तो कलिंगराज आदि राजाओंने रुक्मीसे कहा—॥ १०॥ "ये बलभद्र द्यूतक्रीड़ा [अच्छी तरह] जानते तो हैं नहीं तथापि इन्हें उसका व्यसन बहुत है; तो फिर हम इन महाबली रामको जुएसे ही क्यों न जीत लें?"॥ ११॥

श्रीपराशरजी बोले— तब बलके मदसे उन्मत्त रुक्मीने उन राजाओंसे कहा—'बहुत अच्छा' और सभामें बलरामजीके साथ द्यूतक्रीड़ा आरम्भ कर दी॥ १२॥ रुक्मीने पहले ही दाँवमें बलरामजीसे एक सहस्र निष्क जीते तथा दूसरे दाँवमें एक सहस्र निष्क और जीत लिये॥ १३॥ तब बलभद्रजीने दस हजार निष्कका एक दाँव और लगाया। उसे भी पक्के जुआरी रुक्मीने ही जीत लिया॥ १४॥ हे द्विज! इसपर मूढ़ कलिंगराज दाँत दिखाता हुआ जोरसे हँसने लगा और मदोन्मत्त रुक्मीने कहा—॥ १५॥ "द्यूतक्रीड़ासे अनभिज्ञ इन बलभद्रजीको मैंने हरा दिया है; ये वृथा ही अक्षके घमण्डसे अन्धे होकर अक्षकुशल पुरुषोंका अपमान करते थे"॥ १६॥

इस प्रकार कलिंगराजको दाँत दिखाते और रुक्मीको दुर्वाक्य कहते देख हलायुध बलभद्रजी अत्यन्त क्रोधित हुए॥ १७॥ तब उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर करोड़ निष्कका दाँव लगाया और रुक्मीने भी उसे ग्रहणकर उसके निमित्त पाँसे फेंके॥ १८॥ उसे बलदेवजीने ही जीता और वे जोरसे बोल उठे, 'मैंने जीता।' इसपर रुक्मी भी चिल्लाकर बोला—'बलराम! असत्य बोलनेसे कुछ लाभ नहीं हो सकता, यह दाँव भी मैंने ही जीता है॥ १९॥ आपने इस दाँवके विषयमें जिक्र अवश्य किया था, किंतु मैंने उसका अनुमोदन तो नहीं किया। इस प्रकार यदि आपने इसे जीता है तो मैंने भी क्यों नहीं जीता?"॥ २०॥

श्रीपराशरजी बोले— उसी समय महात्मा बलदेवजीके क्रोधको बढ़ाती हुई आकाशवाणीने गम्भीर स्वरमें कहा—॥ २१॥ "इस दाँवको धर्मानुसार तो बलरामजी ही जीते हैं; रुक्मी झूठ बोलता है क्योंकि [अनुमोदनसूचक] वचन न कहनेपर भी [पाँसे फेंकने आदि] कार्यसे वह अनुमोदित ही माना जायगा"॥ २२॥

तब क्रोधसे अरुणनयन हुए महाबली बलभद्रजीने उठकर रुक्मीको जुआ खेलनेके पाँसोंसे ही मार डाला॥ २३॥

अ० २९ ] * पञ्चम अंश * ३९१


कलिङ्गराजं चादाय विस्फुरन्तं बलाद्बलः।<br>बभञ्ज दन्तान्कुपितो यैः प्रकाशं जहास सः॥ २४<br>आकृष्य च महास्तम्भं जातरूपमयं बलः।<br>जघान तान्ये तत्पक्षे भूभृतः कुपितो भृशम्॥ २५<br>ततो हाहाकृतं सर्वं पलायनपरं द्विज।<br>तद्राजमण्डलं भीतं बभूव कुपिते बले॥ २६<br>बलेन निहतं दृष्ट्वा रुक्मिणं मधुसूदनः।<br>नोवाच किञ्चिन्मैत्रेय रुक्मिणीबलयोर्भयात्॥ २७<br>ततोऽनिरुद्धमादाय कृतदारं द्विजोत्तम।<br>द्वारकामाजगामाथ यदुचक्रं च केशवः॥ २८फिर फड़कते हुए कलिंगराजको बलपूर्वक पकड़कर बलरामजीने उसके दाँत, जिन्हें दिखलाता हुआ वह हँसा था, तोड़ दिये॥ २४॥ इनके सिवा उसके पक्षके और भी जो कोई राजालोग थे, उन्हें बलरामजीने अत्यन्त कुपित होकर एक सुवर्णमय स्तम्भ उखाड़कर उससे मार डाला॥ २५॥ हे द्विज! उस समय बलरामजीके कुपित होनेसे हाहाकार मच गया और सम्पूर्ण राजालोग भयभीत होकर भागने लगे॥ २६॥<br>हे मैत्रेय! उस समय रुक्मीको मारा गया देख श्रीमधुसूदनने एक ओर रुक्मिणीके और दूसरी ओर बलरामजीके भयसे कुछ भी नहीं कहा॥ २७॥ तदनन्तर, हे द्विजश्रेष्ठ! यादवोंके सहित श्रीकृष्णचन्द्र सपत्नीक अनिरुद्धको लेकर द्वारकापुरीमें चले आये॥ २८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशेऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥


ऊनतीसवाँ अध्याय

नरकासुरका वध

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
द्वारवत्यां स्थिते कृष्णे शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः।<br>आजगामाथ मैत्रेय मत्तैरावतपृष्ठगः॥ १<br>प्रविश्य द्वारकां सोऽथ समेत्य हरिणा ततः।<br>कथयामास दैत्यस्य नरकस्य विचेष्टितम्॥ २<br>त्वया नाथेन देवानां मनुष्यत्वेऽपि तिष्ठता।<br>प्रशमं सर्वदुःखानि नीतानि मधुसूदन॥ ३<br>तपस्विव्यसनार्थाय सोऽरिष्टो धेनुकस्तथा।<br>प्रवृत्तो यस्तथा केशी ते सर्वे निहतास्त्वया॥ ४<br>कंसः कुवलयापीडः पूतना बालघातिनी।<br>नाशं नीतास्त्वया सर्वे येऽन्ये जगदुपद्रवाः॥ ५<br>युष्मद्दोर्दण्डसम्भूतिपरित्राते जगत्त्रये।<br>यज्ञ्वयज्ञांशसम्प्राप्त्या तृप्तिं यान्ति दिवौकसः॥ ६<br>सोऽहं साम्प्रतमायातो यन्निमित्तं जनार्दन।<br>तच्छ्रुत्वा तत्प्रतीकारप्रयत्नं कर्तुमर्हसि॥ ७हे मैत्रेय! एक बार जब श्रीभगवान् द्वारकामें ही थे त्रिभुवनपति इन्द्र अपने मत्त गजराज ऐरावतपर चढ़कर उनके पास आये॥ १॥ द्वारकामें आकर वे भगवान्से मिले और उनसे नरकासुरके अत्याचारोंका वर्णन किया॥ २॥ [वे बोले—] “हे मधुसूदन! इस समय मनुष्यरूपमें स्थित होकर भी आप सम्पूर्ण देवताओंके स्वामीने हमारे समस्त दुःखोंको शान्त कर दिया है॥ ३॥ जो अरिष्ट, धेनुक और केशी आदि असुर सर्वदा तपस्वियोंको क्लेशित करते रहते थे उन सबको आपने मार डाला॥ ४॥ कंस, कुवलयापीड और बालघातिनी पूतना तथा और भी जो-जो संसारके उपद्रवरूप थे उन सबको आपने नष्ट कर दिया॥ ५॥ आपके बाहुदण्डकी सत्तासे त्रिलोकीके सुरक्षित हो जानेके कारण याजकोंके दिये हुए यज्ञभागोंको प्राप्तकर देवगण तृप्त हो रहे हैं॥ ६॥ हे जनार्दन! इस समय जिस निमित्तसे मैं आपके पास उपस्थित हुआ हूँ, उसे सुनकर आप उसके प्रतीकारका प्रयत्न करें॥ ७॥

३९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २९ ]


भौमोऽयं नरको नाम प्राग्ज्योतिषपुरेश्वरः ।
करोति सर्वभूतानामुपघातमरिन्दम ॥ ८
देवसिद्धासुरादीनां नृपाणां च जनार्दन ।
हृत्वा तु सोऽसुरः कन्या रुरोधे निजमन्दिरे ॥ ९
छत्रं यत्सलिलस्रावि तज्जहार प्रचेतसः ।
मन्दरस्य तथा शृङ्गं हृतवान्मणिपर्वतम् ॥ १०
अमृतस्राविणी दिव्ये मन्मातुः कृष्ण कुण्डले ।
जहार सोऽसुरोऽदित्या वाञ्छत्यैरावतं गजम् ॥ ११
दुर्नीतमेतद्गोविन्द मया तस्य निवेदितम् ।
यदत्र प्रति कर्तव्यं तत्स्वयं परिमृश्यताम् ॥ १२

श्रीपराशर उवाच

इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा भगवान्देवकीसुतः ।
गृहीत्वा वासवं हस्ते समुत्तस्थौ वरासनात् ॥ १३
सञ्चिन्त्यागतमारुह्य गरुडं गगनेचरम् ।
सत्यभामां समारोप्य ययौ प्राग्ज्योतिषं पुरम् ॥ १४
आरुह्यैरावतं नागं शक्रोऽपि त्रिदिवं ययौ ।
ततो जगाम कृष्णश्च पश्यतां द्वारकौकसाम् ॥ १५
प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि समन्ताच्छतयोजनम् ।
आचिता मौरवैः पाशैः क्षुरान्तैर्भूर्द्विजोत्तम ॥ १६
तांश्चिच्छेद हरिः पाशान्क्षिप्त्वा चक्रं सुदर्शनम् ।
ततो मुरस्समुत्तस्थौ तं जघान च केशवः ॥ १७
मुरस्य तनयान्सप्त सहस्रांस्तांस्ततो हरिः ।
चक्रधाराग्निन्निर्दग्धांश्चकार शलभानिव ॥ १८
हत्वा मुरं हयग्रीवं तथा पञ्चजनं द्विज ।
प्राग्ज्योतिषपुरं धीमांस्त्वरावान्समुपाद्रवत् ॥ १९
नरकेणास्य तत्राभून्महासैन्येन संयुगम् ।
कृष्णस्य यत्र गोविन्दो जघ्ने दैत्यान्सहस्रशः ॥ २०
शस्त्रास्त्रवर्षं मुञ्चन्तं तं भौमं नरकं बली ।
क्षिप्त्वा चक्रं द्विधा चक्रे चक्री दैतेयचक्रहा ॥ २१
हते तु नरके भूमिर्गृहीत्वादितिकुण्डले ।
उपतस्थे जगन्नाथं वाक्यं चेदमथाब्रवीत् ॥ २२


हिन्दी अनुवाद

हे शत्रुदमन! यह पृथिवीका पुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी है; इस समय यह सम्पूर्ण जीवोंका घात कर रहा है॥ ८ ॥ हे जनार्दन! उसने देवता, सिद्ध, असुर और राजा आदिकोंकी कन्याओंको बलात् लाकर अपने अन्तःपुरमें बन्द कर रखा है॥ ९ ॥ इस दैत्यने वरुणका जल बरसानेवाला छत्र और मन्दराचलका मणिपर्वत नामक शिखर भी हर लिया है॥ १० ॥

हे कृष्ण! उसने मेरी माता अदितिके अमृतस्रावी दोनों दिव्य कुण्डल ले लिये हैं और अब इस ऐरावत हाथीको भी लेना चाहता है॥ ११ ॥ हे गोविन्द! मैंने आपको उसकी ये सब अनीतियाँ सुना दी हैं; इनका जो प्रतीकार होना चाहिये, वह आप स्वयं विचार लें' '॥ १२ ॥

श्रीपराशरजी बोले— इन्द्रके ये वचन सुनकर श्रीदेवकीनन्दन मुसकाये और इन्द्रका हाथ पकड़कर अपने श्रेष्ठ आसनसे उठे ॥ १३ ॥ फिर स्मरण करते ही उपस्थित हुए आकाशगामी गरुडपर सत्यभामाको चढ़ाकर स्वयं चढ़े और प्राग्ज्योतिषपुरको चले ॥ १४ ॥ तदनन्तर इन्द्र भी ऐरावतपर चढ़कर देवलोकको गये तथा भगवान् कृष्णचन्द्र सब द्वारकावासियोंके देखते-देखते [नरकासुरको मारने] चले गये ॥ १५ ॥

हे द्विजोत्तम! प्राग्ज्योतिषपुरके चारों ओर पृथिवी सौ योजनतक मुर दैत्यके बनाये हुए छुरेकी धाराके समान अति तीक्ष्ण पाशोंसे घिरी हुई थी ॥ १६ ॥ भगवान्ने उन पाशोंको सुदर्शनचक्र फेंककर काट डाला; फिर मुर दैत्य भी सामना करनेके लिये उठा तब श्रीकेशवने उसे भी मार डाला ॥ १७ ॥ तदनन्तर श्रीहरिने मुरके सात हजार पुत्रोंको भी अपने चक्रकी धाररूप अग्निमें पतंगके समान भस्म कर दिया ॥ १८ ॥ हे द्विज! इस प्रकार मतिमान् भगवान्ने मुर, हयग्रीव एवं पंचजन आदि दैत्योंको मारकर बड़ी शीघ्रतासे प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रवेश किया ॥ १९ ॥ वहाँ पहुँचकर भगवान्का अधिक सेनावाले नरकासुरसे युद्ध हुआ, जिसमें श्रीगोविन्दने उसके सहस्रों दैत्योंको मार डाला ॥ २० ॥ दैत्यदलका दलन करनेवाले महाबलवान् भगवान् चक्रपाणिने शस्त्रास्त्रकी वर्षा करते हुए भूमिपुत्र नरकासुरके सुदर्शनचक्र फेंककर दो टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥ नरकासुरके मरते ही पृथिवी अदितिके कुण्डल लेकर उपस्थित हुई और श्रीजगन्नाथसे कहने लगी ॥ २२ ॥

अ० २९ ] * पञ्चम अंश * ३९३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पृथ्व्युवाच<br>यदाहमुद्धृता नाथ त्वया सूकरमूर्तिना।<br>त्वत्स्पर्शसम्भवः पुत्रस्तदायं मय्यजायत॥ २३<br><br>सोऽयं त्वयैव दत्तो मे त्वयैव विनिपातितः।<br>गृहाण कुण्डले चेमे पालयास्य च सन्ततिम्॥ २४<br><br>भारावतरणार्थाय ममैव भगवानिमम्।<br>अंशेन लोकमायात: प्रसादसुमुखः प्रभो॥ २५<br><br>त्वं कर्ता च विकर्ता च संहर्ता प्रभवोऽव्ययः।<br>जगतां त्वं जगद्रूपः स्तूयतेऽच्युत किं तव॥ २६<br><br>व्याप्तिर्व्याप्यं क्रिया कर्ता कार्यं च भगवान्यथा।<br>सर्वभूतात्मभूतस्य स्तूयते तव किं तथा॥ २७<br><br>परमात्मा च भूतात्मा त्वमात्मा चाव्ययो भवान्।<br>यथा तथा स्तुतिर्नाथ किमर्थं ते प्रवर्तते॥ २८<br><br>प्रसीद सर्वभूतात्मन्नरकेण तु यत्कृतम्।<br>तत्क्षम्यतामदोषाय त्वत्सुतस्त्वन्निपातितः॥ २९<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>तथेति चोक्त्वा धरणीं भगवान्भूतभावनः।<br>रत्नानि नरकावासाज्जग्राह मुनिसत्तम॥ ३०<br><br>कन्यापुरे स कन्यानां षोडशातुलविक्रमः।<br>शताधिकानि ददृशे सहस्राणि महामुने॥ ३१<br><br>चतुर्दंष्ट्रान्गजांश्चाग्र्यान् षट्सहस्रांश्च दृष्टवान्।<br>काम्बोजानां तथाश्वानां नियुतान्येकविंशतिम्॥ ३२<br><br>ताः कन्यास्तांस्तथा नागांस्तानश्वान् द्वारकां पुरीम्।<br>प्रापयामास गोविन्दस्सद्यो नरककिङ्करैः॥ ३३<br><br>ददृशे वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम्।<br>आरोपयामास हरिर्गरुडे पतगेश्वरे॥ ३४<br><br>आरुह्य च स्वयं कृष्णस्सत्यभामासहायवान्।<br>अदित्याः कुण्डले दातुं जगाम त्रिदशालयम्॥ ३५पृथिवी बोली—हे नाथ! जिस समय वराहरूप धारणकर आपने मेरा उद्धार किया था, उसी समय आपके स्पर्शसे मेरे यह पुत्र उत्पन्न हुआ था॥ २३॥ इस प्रकार आपनेही मुझे यह पुत्र दिया था और अब आपनेही इसको नष्ट किया है; आप ये कुण्डल लीजिये और अब इसकी सन्तानकी रक्षा कीजिये॥ २४॥ हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होकर ही आप मेरा भार उतारनेके लिये अपने अंशसे इस लोकमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २५॥ हे अच्युत! इस जगत्के आप ही कर्ता, आप ही विकर्ता (पोषक) और आप ही हर्ता (संहारक) हैं; आप ही इसकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं तथा आप ही जगतरूप हैं। फिर हम आपकी स्तुति किस प्रकार करें?॥ २६॥ हे भगवन्! जब कि व्याप्ति, व्याप्य, क्रिया, कर्ता और कार्यरूप आप ही हैं, तब सबके आत्मस्वरूप आपकी किस प्रकार स्तुति की जा सकती है?॥ २७॥ हे नाथ! जब आप ही परमात्मा, आप ही भूतात्मा और आप ही अव्यय जीवात्मा हैं, तब किस वस्तुको लेकर आपकी स्तुति हो सकती है?॥ २८॥ हे सर्वभूतात्मन्! आप प्रसन्न होइये और इस नरकासुरके सम्पूर्ण अपराध क्षमा कीजिये। निश्चय ही आपने अपने पुत्रको निर्दोष करनेके लिये ही स्वयं मारा है॥ २९॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर भगवान् भूतभावनने पृथिवीसे कहा—"तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो" और फिर नरकासुरके महलसे नाना प्रकारके रत्न लिये॥ ३०॥ हे महामुने! अतुलविक्रम श्रीभगवान्ने नरकासुरके कन्यान्तःपुरमें जाकर सोलह हजार एक सौ कन्याएँ देखीं॥ ३१॥ तथा चार दाँतवाले छः हजार गजश्रेष्ठ और इक्कीस लाख काम्बोजदेशीय अश्व देखे॥ ३२॥ उन कन्याओं, हाथियों और घोड़ोंको श्रीकृष्णचन्द्रने नरकासुरके सेवकोंद्वारा तुरन्त ही द्वारकापुरी पहुँचावा दिया॥ ३३॥<br><br>तदनन्तर भगवान्ने वरुणका छत्र और मणिपर्वत देखा, उन्हें उठाकर उन्होंने पक्षिराज गरुडपर रख लिया॥ ३४॥ और सत्यभामाके सहित स्वयं भी उसीपर चढ़कर अदितिके कुण्डल देनेके लिये स्वर्गलोकको गये॥ ३५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥

३९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०


तीसवाँ अध्याय

पारिजात-हरण

श्रीपराशर उवाच

गरुडो वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम्।
सभार्यं च हृषीकेशं लीलयैव वहन्ययौ ॥ १

ततश्शङ्खमुपाध्मासीत्स्वर्गद्वारगतो हरिः।
उपत्तस्थुस्तथा देवास्सार्घ्यहस्ता जनार्दनम् ॥ २

स देवैरर्चितः कृष्णो देवमातुर्निवेशनम्।
सिताभ्रशिखराकारं प्रविश्य ददृशेऽदितिम् ॥ ३

स तां प्रणम्य शक्रेण सह ते कुण्डलोत्तमे।
ददौ नरकनाशं च शशंसास्यै जनार्दनः ॥ ४

ततः प्रीता जगन्माता धातारं जगतां हरिम्।
तुष्टावादितिरव्यग्रा कृत्वा तत्प्रवणं मनः ॥ ५

अदितिरुवाच

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयंकर।
सनातनात्मन् सर्वात्मन् भूतात्मन् भूतभावन ॥ ६

प्रणेतर्मनसो बुद्धेरिन्द्रियाणां गुणात्मक।
त्रिगुणातीत निर्द्वन्द्व शुद्धसत्त्व हृदि स्थित ॥ ७

सितदीर्घादिनिशेषकल्पनापरिवर्जित।
जन्मादिभिरसंस्पृष्ट स्वप्नादिपरिवर्जित ॥ ८

सन्ध्या रात्रिरहो भूमिर्र्गगनं वायुरम्बु च।
हुताशनो मनो बुद्धिर्भूतादिस्त्वं तथाच्युत ॥ ९

सर्गस्थितिविनाशानां कर्ता कर्तृपतिर्भवान्।
ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिरात्ममूर्तिभिरीश्वर ॥ १०

देवा दैत्यास्तथा यक्षा राक्षसास्सिद्धपन्नगाः।
कूष्माण्डाश्च पिशाचाश्च गन्धर्वा मनुजास्तथा ॥ ११

पशवश्च मृगाश्चैव पतंगाश्च सरीसृपाः।
वृक्षगुल्मलता बह्व्यः समस्तास्तृणजातयः ॥ १२

स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्मात्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतराश्च ये।
देहभेदा भवान् सर्वे ये केचित्पुर्गलाश्रयाः ॥ १३

माया तवेयमज्ञातपरमार्थर्तिमोहिनी।
अनात्मन्यात्मविज्ञानं यया मूढो निरुद्ध्यते ॥ १४


श्रीपराशरजी बोले— पक्षिराज गरुड उस वारुणछत्र, मणिपर्वत और सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रको लीलासे-ही लेकर चलने लगे॥ १॥ स्वर्गके द्वारपर पहुँचते ही श्रीहरिने अपना शंख बजाया। उसका शब्द सुनते ही देवगण अर्घ्य लेकर भगवान्‌के सामने उपस्थित हुए॥ २॥ देवताओंसे पूजित होकर श्रीकृष्णचन्द्रजीने देवमाता अदितिके श्वेत मेघशिखरके समान गृहमें जाकर उनका दर्शन किया॥ ३॥ तब श्रीजनार्दनने इन्द्रके साथ देवमाताको प्रणामकर उसके अत्युत्तम कुण्डल दिये और उसे नरक-वधका वृत्तान्त सुनाया॥ ४॥ तदनन्तर जगन्माता अदितिने प्रसन्नतापूर्वक तन्मय होकर जगद्धाता श्रीहरिकी अव्यग्रभावसे स्तुति की॥ ५॥

अदिति बोली— हे कमलनयन! हे भक्तोंको अभय करनेवाले! हे सनातनस्वरूप! हे सर्वात्मन्! हे भूतस्वरूप! हे भूतभावन! आपको नमस्कार है॥ ६॥ हे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके रचयिता! हे गुणस्वरूप! हे त्रिगुणातीत! हे निर्द्वन्द्व! हे शुद्धसत्त्व! हे अन्तर्यामिन्! आपको नमस्कार है॥ ७॥ हे नाथ! आप श्वेत, दीर्घ आदि सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित हैं, जन्मादि विकारोंसे पृथक् हैं तथा स्वप्नादि अवस्थात्रयसे परे हैं; आपको नमस्कार है॥ ८॥ हे अच्युत! सन्ध्या, रात्रि, दिन, भूमि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, मन, बुद्धि और अहंकार—ये सब आप ही हैं॥ ९॥

हे ईश्वर! आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक अपनी मूर्तियोंसे जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कर्ता हैं तथा आप कर्ताओंके भी स्वामी हैं॥ १०॥ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, पन्नग (नाग), कूष्माण्ड, पिशाच, गन्धर्व, मनुष्य, पशु, मृग, पतंग, सरीसृप (साँप), अनेकों वृक्ष, गुल्म और लताएँ, समस्त तृणजातियाँ तथा स्थूल मध्यम सूक्ष्म और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जितने देह-भेद पुद्गल (परमाणु)-के आश्रित हैं वे सब आप ही हैं॥ ११—१३॥

हे प्रभो! आपकी माया ही परमार्थतत्त्वके न जाननेवाले पुरुषोंको मोहित करनेवाली है, जिससे मूढ पुरुष अनात्मामें आत्मबुद्धि करके बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ १४॥

अ० ३०] * पञ्चम अंश * ३९५

अस्वे स्वमिति भावोऽत्र यत्पुंसामुपजायते । अहं ममेति भावो यत्प्रायेणैवाभिजायते । संसारमातुर्मायायास्तवैतन्नाथ चेष्टितम् ॥ १५ यैः स्वधर्मपरैर्नाथ नरैराराधितो भवान् । ते तरन्त्यखिलामेतां मायामात्मविमुक्तये ॥ १६ ब्रह्माद्यास्सकला देवा मनुष्याः पशवस्तथा । विष्णुमायामहावर्त्तमोहान्धतमसावृताः ॥ १७ आराध्य त्वामभीप्सन्ते कामानात्मभवक्षयम् । यदेते पुरुषा माया सैवेयं भगवंस्तव ॥ १८ मया त्वं पुत्रकामिन्या वैरिपक्षजयाय च । आराधितो न मोक्षाय मायाविलसितं हि तत् ॥ १९ कौपीनाच्छादनप्राया वाञ्छा कल्पद्रुमादपि । जायते यदपुण्यानां सोऽपराधः स्वदोषजः ॥ २० तत्प्रसीदाखिलजगन्मायामोहकराव्वय । अज्ञानं ज्ञानसद्भावभूतं भूतेश नाशय ॥ २१ नमस्ते चक्रहस्ताय शार्ङ्गहस्ताय ते नमः । गदाहस्ताय ते विष्णो शङ्खहस्ताय ते नमः ॥ २२ एतत्पश्यामि ते रूपं स्थूलचिह्नोपलक्षितम् । न जानामि परं यत्ते प्रसीद परमेश्वर ॥ २३ श्रीपराशर उवाच अदित्यैवं स्तुतो विष्णुः प्रहस्याह सुरारणिम्* । माता देवि त्वमस्माकं प्रसीद वरदा भव ॥ २४ अदितिरुवाच एवमस्तु तथेच्छा ते त्वमशेषैस्सुरासुरैः । अजेयः पुरुषव्याघ्र मर्त्यलोके भविष्यसि ॥ २५ श्रीपराशर उवाच ततः कृष्णस्य पत्नी च शक्रपत्न्या सहादितिम् । सत्यभामा प्रणम्याह प्रसीदेति पुनः पुनः ॥ २६ अदितिरुवाच मत्प्रसादान्न ते सुभ्रु जरा वैरूप्यमेव वा । भविष्यत्यनवद्याङ्गि सुस्थिरं नवयौवनम् ॥ २७

* दीपयिवीम्

हे नाथ! पुरुषको जो अनात्मामें आत्मबुद्धि और 'मैं-मेरा' आदि भाव प्रायः उत्पन्न होते हैं वह सब आपकी जगज्जननी मायाका ही विलास है॥ १५॥ हे नाथ! जो स्वधर्मपरायण पुरुष आपकी आराधना करते हैं, वे अपने मोक्षके लिये इस सम्पूर्ण मायाको पार कर जाते हैं॥ १६॥ ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवगण तथा मनुष्य और पशु आदि सभी विष्णुमायारूप महान् आवर्तमें पड़कर मोहरूप अन्धकारसे आवृत हैं॥ १७॥ हे भगवन्! [जन्म और मरणके चक्रमें पड़े हुए] ये पुरुष जीवके भव-बन्धनको नष्ट करनेवाले आपकी आराधना करके भी जो नाना प्रकारकी कामनाएँ ही माँगते हैं, यह आपकी माया ही है॥ १८॥ मैंने भी पुत्रोंकी जयकामनासे शत्रुपक्षको पराजित करनेके लिये ही आपकी आराधना की है, मोक्षके लिये नहीं। यह भी आपकी मायाका ही विलास है॥ १९॥ पुण्यहीन पुरुषोंको जो कल्पवृक्षसे भी कौपीन और आच्छादन-वस्त्रमात्रकी ही कामना होती है यह उनका कर्म-दोष-जन्य अपराध ही है॥ २०॥

हे अखिलजगन्माया-मोहकारी अव्यय प्रभो! आप प्रसन्न होइये और हे भूतेश्वर! 'मैं ज्ञानवान् हूँ' मेरे इस अज्ञानको नष्ट कीजिये॥ २१॥ हे चक्रपाणे! आपको नमस्कार है, हे शार्ङ्गधर! आपको नमस्कार है; हे गदाधर! आपको नमस्कार है; हे शंखपाणे! हे विष्णो! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ २२॥ मैं स्थूल चिह्नोंसे प्रतीत होनेवाले आपके इस रूपको ही देखती हूँ; आपके वास्तविक परस्वरूपको मैं नहीं जानती; हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये॥ २३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**अदितिद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् विष्णु देवमातासे हँसकर बोले—"हे देवि! तुम तो हमारी माता हो; तुम प्रसन्न होकर हमें वरदायिनी होओ"॥ २४॥

**अदिति बोली—**हे पुरुषसिंह! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। तुम मर्त्यलोकमें सम्पूर्ण सुरासुरोंसे अजेय होगे॥ २५॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर शक्रपत्नी शचीके सहित कृष्णप्रिया सत्यभामाने अदितिको पुनः-पुनः प्रणाम करके कहा—"माता! आप प्रसन्न होइये"॥ २६॥

**अदिति बोली—**हे सुन्दर भृकुटिवाली! मेरी कृपासे तुझे कभी वृद्धावस्था या विरूपता व्याप्त न होगी। हे अनिन्दितांगि! तेरा नवयौवन सदा स्थिर रहेगा॥ २७॥

३९६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३०

श्रीपराशर उवाच अदित्या तु कृतानुज्ञो देवराजो जनार्दनम्। यथावत्पूजयामास बहुमानपुरस्सरम्॥ २८ शची च सत्यभामायै पारिजातस्य पुष्पकम्। न ददौ मानुषीं मत्वा स्वयं पुष्पैरलङ्कृता॥ २९ ततो ददर्श कृष्णोऽपि सत्यभामासहायवान्। देवोद्यानानि हृद्यानि नन्दनादीनि सत्तम॥ ३० ददर्श च सुगन्धाढ्यं मञ्जरीपुञ्जधारिणम्। नित्याह्लादकरं ताम्रबालपल्लवशोभितम्॥ ३१ मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम्। पारिजातं जगन्नाथः केशवः केशिसूदनः॥ ३२ तुतोष परमप्रीत्या तरुराजमनुत्तमम्। तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम। कस्मान्न द्वारकामेष नीयते कृष्ण पादपः॥ ३३ यदि चेत्त्वद्वचः सत्यं त्वमत्यर्थं प्रियेति मे। मद्गेहनिष्कुटार्थाय तदयं नीयतां तरुः॥ ३४ न मे जाम्बवती तादृगभीष्टा न च रुक्मिणी। सत्ये यथा त्वमित्युक्तं त्वया कृष्णासकृत्प्रियम्॥ ३५ सत्यं तद्यदि गोविन्द नोपचारकृतं मम। तदस्तु पारिजातोऽयं मम गेहविभूषणम्॥ ३६ बिभ्रती पारिजातस्य केशपक्षेण मञ्जरीम्। सपत्नीनामहं मध्ये शोभेयमिति कामये॥ ३७

श्रीपराशर उवाच इत्युक्तस्स प्रहस्यैनां पारिजातं गरुत्मति। आरोपयामास हरिस्तमूचुर्वनरक्षिणः॥ ३८ भो शची देवराजस्य महिषी तत्परिग्रहम्। पारिजातं न गोविन्द हर्तुमर्हसि पादपम्॥ ३९ उत्पन्नो देवराजाय दत्तस्सोऽपि ददौ पुनः। महिष्यै सुमहाभाग देव्यै शच्यै कुतूहलात्॥ ४० शचीविभूषणार्थाय देवैरमृतमन्थने। उत्पादितोऽयं न क्षेमी गृहीत्वैनं गमिष्यसि॥ ४१

श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर अदितिकी आज्ञासे देवराजने अत्यन्त आदर-सत्कारके साथ श्रीकृष्णचन्द्रका पूजन किया॥ २८॥ किन्तु कल्पवृक्षके पुष्पोंसे अलंकृता इन्द्राणीने सत्यभामाको मानुषी समझकर वे पुष्प न दिये॥ २९॥ हे साधुश्रेष्ठ! तदनन्तर सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने भी देवताओंके नन्दन आदि मनोहर उद्यानोंको देखा॥ ३०॥ वहाँपर केशिनिषूदन जगन्नाथ श्रीकृष्णने सुगन्धपूर्ण मंजरी-पुंजधारी, नित्याह्लादकारी और ताम्रवर्ण बाल पत्तोंसे सुशोभित, अमृत-मन्थनके समय प्रकट हुआ तथा सुनहरी छालवाला पारिजात-वृक्ष देखा॥ ३१-३२॥

हे द्विजोत्तम! उस अत्युत्तम वृक्षराजको देखकर परम प्रीतिवश सत्यभामा अति प्रसन्न हुई और श्रीगोविन्दसे बोली— “हे कृष्ण! इस वृक्षको द्वारकापुरी क्यों नहीं ले चलते?॥ ३३॥ यदि आपका यह वचन कि 'तुम ही मेरी अत्यन्त प्रिया हो' सत्य है तो मेरे गृहोद्यानमें लगानेके लिये इस वृक्षको ले चलिये॥ ३४॥ हे कृष्ण! आपने कई बार मुझसे यह प्रिय वाक्य कहा है कि 'हे सत्ये! मुझे तू जितनी प्यारी है उतनी न जाम्बवती है और न रुक्मिणी ही'॥ ३५॥ हे गोविन्द! यदि आपका यह कथन सत्य है—केवल मुझे बहलाना ही नहीं है—तो यह पारिजातवृक्ष मेरे गृहका भूषण हो॥ ३६॥ मेरी ऐसी इच्छा है कि मैं अपने केश-कलापोंमें पारिजातपुष्प गूँथकर अपनी अन्य सपत्नियोंमें सुशोभित होऊँ"॥ ३७॥

श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर श्रीहरिने हँसते हुए उस पारिजातवृक्षको गरुडपर रख लिया; तब नन्दनवनके रक्षकोंनो कहा—॥ ३८॥ "हे गोविन्द! देवराज इन्द्रकी पत्नी जो महारानी शची हैं यह पारिजातवृक्ष उनकी सम्पत्ति है, आप इसका हरण न कीजिये॥ ३९॥ क्षीर-समुद्रसे उत्पन्न होनेके अनन्तर यह देवराजको दिया गया था; फिर हे महाभाग! देवराजने कुतूहलवश इसे अपनी महिषी शचीदेवीको दे दिया है॥ ४०॥ समुद्र-मन्थनके समय शचीको विभूषित करनेके लिये ही देवताओंने इसे उत्पन्न किया था; इसे लेकर आप कुशलपूर्वक नहीं जा सकेंगे॥ ४१॥

अ० ३० ] * पञ्चम अंश * ३९७


देवराजो मुखप्रेक्षी यस्यास्तस्याः परिग्रहम्।
मौढ्यात्प्रार्थयसे क्षेमी गृहीत्वैनं हि को व्रजेत् ॥ ४२
अवश्यमस्य देवेन्द्रो निष्कृतिं कृष्ण यास्यति ।
वज्रोद्यतकरं शक्रमनुयास्यन्ति चामराः ॥ ४३
तदलं सकलैर्देवैर्विरोधेन तवाच्युत।
विपाककटु यत्कर्म तन्न शंसन्ति पण्डिताः ॥ ४४

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ते तैरूवाचैतान् सत्यभामातिकोपिनी ।
का शची पारिजातस्य को वा शक्रस्सुराधिपः ॥ ४५
सामान्यस्सर्वलोकस्य यद्येषोऽमृतमन्थने ।
समुत्पन्नस्तरुः कस्मादेको गृह्णाति वासवः ॥ ४६
यथा सुरा यथैवेन्दुर्यथा श्रीर्वनरक्षिणः।
सामान्यस्सर्वलोकस्य पारिजातस्तथा द्रुमः ॥ ४७
भर्तृबाहुमहागर्वाद्वृणद्ध्येनमथो शची।
तत्कथ्यतामलं क्षान्त्या सत्या हारयति द्रुमम् ॥ ४८
कथ्यतां च द्रुतं गत्वा पौलोम्या वचनं मम।
सत्यभामा वदत्येतदिति गर्वोद्धताक्षरम् ॥ ४९
यदि त्वं दयिता भर्तुर्यदि वश्यः पतिस्तव।
मद्भर्तुर्हरतो वृक्षं तत्कारय निवारणम् ॥ ५०
जानामि ते पतिं शक्रं जानामि त्रिदशेश्वरम्।
पारिजातं तथाप्येनं मानुषी हारयामि ते ॥ ५१

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ता रक्षिणो गत्वा शच्याः प्रोचुर्यथोदितम्।
श्रुत्वा चोत्साहयामास शची शक्रं सुराधिपम् ॥ ५२
ततस्समस्तदेवानां सैन्यैः परिवृतो हरिम्।
प्रययौ पारिजातार्थमिन्द्रो योद्धुं द्विजोत्तम ॥ ५३
ततः परिघनिस्त्रिंशगदाशूलवरायुधाः।
बभूवुस्त्रिदशास्सज्जाः शक्रे वज्रकरे स्थिते ॥ ५४
ततो निरीक्ष्य गोविन्दो नागराजोपरिस्थितम्।
शक्रं देवपरीवारं युद्धाय समुपस्थितम् ॥ ५५
चकार शङ्खनिर्घोषं दिशश्शब्देन पूरयन्।
मुमोच शरसङ्घातान्सहस्रायुतशश्शितान् ॥ ५६


देवराज भी जिसका मुँह देखते रहते हैं, उस शचीकी सम्पत्ति इस पारिजातकी इच्छा आप मूढताहीसे करते हैं; इसे लेकर भला कौन सकुशल जा सकता है? ॥ ४२ ॥ हे कृष्ण ! देवराज इन्द्र इस वृक्षका बदला चुकानेके लिये अवश्य ही वज्र लेकर उद्यत होंगे और फिर देवगण भी अवश्य ही उनका अनुगमन करेंगे ॥ ४३ ॥ अतः हे अच्युत ! समस्त देवताओंके साथ रार बढ़ानेसे आपका कोई लाभ नहीं; क्योंकि जिस कर्मका परिणाम कटु होता है, पण्डितजन उसे अच्छा नहीं कहते” ॥ ४४ ॥

श्रीपराशरजी बोले— उद्यान-रक्षकोंके इस प्रकार कहनेपर सत्यभामाने अत्यन्त क्रुद्ध होकर कहा—“शची अथवा देवराज इन्द्र ही इस पारिजातके कौन होते हैं? ॥ ४५ ॥ यदि यह अमृत-मन्थनके समय उत्पन्न हुआ है, तो सबकी समान सम्पत्ति है। अकेला इन्द्र ही इसे कैसे ले सकता है? ॥ ४६ ॥ अरे वनरक्षको ! जिस प्रकार [समुद्रसे उत्पन्न हुए] मदिरा, चन्द्रमा और लक्ष्मीका सब लोग समानतासे भोग करते हैं, उसी प्रकार पारिजातवृक्ष भी सभीकी सम्पत्ति है ॥ ४७ ॥ यदि पतिके बाहुबलसे गर्विता होकर शचीने ही इसपर अपना अधिकार जमा रखा है तो उससे कहना कि सत्यभामा उस वृक्षको हरण कराकर लिये जाती है, तुम्हें क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४८ ॥ अरे मालियो ! तुम तुरन्त जाकर मेरे ये शब्द शचीसे कहो कि सत्यभामा अत्यन्त गर्वपूर्वक कड़े अक्षरोंमें यह कहती है कि यदि तुम अपने पतिको अत्यन्त प्यारी हो और वे तुम्हारे वशीभूत हैं तो मेरे पतिको पारिजात हरण करनेसे रोकें ॥ ४९-५० ॥ मैं तुम्हारे पति शक्रको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि वे देवताओंके स्वामी हैं तथापि मैं मानवी ही तुम्हारे इस पारिजातवृक्षको लिये जाती हूँ” ॥ ५१ ॥

श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर वनरक्षकोंने शचीके पास जाकर उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह दिया। यह सब सुनकर शचीने अपने पति देवराज इन्द्रको उत्साहित किया ॥ ५२ ॥ हे द्विजोत्तम ! तब देवराज इन्द्र पारिजातवृक्षको छुड़ानेके लिये सम्पूर्ण देवसेनाके सहित श्रीहरिसे लड़नेके लिये चले ॥ ५३ ॥ जिस समय इन्द्रने अपने हाथमें वज्र लिया उसी समय सम्पूर्ण देवगण परिघ, निस्त्रिंश, गदा और शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो गये ॥ ५४ ॥ तदनन्तर देवसेनासे घिरे हुए ऐरावतारूढ इन्द्रको युद्धके लिये उद्यत देख श्रीगोविन्दने सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए शंख-ध्वनि की और हजारों-लाखों तीखे बाण छोड़े ॥ ५५-५६ ॥

३९८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०


ततो दिशो नभश्चैव दृष्ट्वा शरशतैश्चितम्।<br>मुमुचुस्त्रिदशास्सर्वे ह्यस्त्रशस्त्राण्यनेकशः ॥ ५७इस प्रकार सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशको सैकड़ों बाणोंसे पूर्ण देख देवताओने अनेकों अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ५७ ॥
एकैकमस्त्रं शस्त्रं च देवैर्मुक्तं सहस्रशः ।<br>चिच्छेद लीलयैवेशो जगतां मधुसूदनः ॥ ५८त्रिलोकीके स्वामी श्रीमधुसूदनने देवताओंके छोड़े हुए प्रत्येक अस्त्र-शस्त्रके लीलासे ही हजारों टुकड़े कर दिये ॥ ५८ ॥
पाशं सलिलराजस्य समाकृष्योरगाशनः ।<br>चकार खण्डशश्चञ्च्वा बालपन्नगदेहवत् ॥ ५९सर्पाहारी गरुडने जलाधिपति वरुणके पाशको खींचकर अपनी चोंचसे सर्पके बच्चेके समान उसके कितने ही टुकड़े कर डाले ॥ ५९ ॥
यमेन प्रहितं दण्डं गदाविक्षेपखण्डितम्।<br>पृथिव्यां पातयामास भगवान् देवकीसूतः ॥ ६०श्रीदेवकीनन्दनने यमके फेंके हुए दण्डको अपनी गदासे खण्ड-खण्ड कर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६० ॥
शिबिकां च धनेशस्य चक्रेण तिलशो विभुः ।<br>चकार शौरिरर्कं च दृष्टिदृष्टहतौजसम्॥ ६१कुबेरके विमानको भगवान्ने सुदर्शनचक्रद्वारा तिल-तिल कर डाला और सूर्यको अपनी तेजोमय दृष्टिसे देखकर ही निस्तेज कर दिया ॥ ६१ ॥
नीतोऽग्निशीततां बाणैर्द्राविता वसवो दिशः ।<br>चक्रविच्छिन्नशूलाग्रा रुद्रा भुवि निपातिताः ॥ ६२भगवान्ने तदनन्तर बाण बरसाकर अग्निको शीतल कर दिया और वसुओंको दिशा-विदिशाओंमें भगा दिया तथा अपने चक्रसे त्रिशूलोंकी नोंक काटकर रुद्रगणको पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६२ ॥
साध्या विश्वेऽथ मरुतो गन्धर्वाश्चैव सायकैः ।<br>शार्ङ्गिणा प्रेरितैरस्ता व्योम्नि शाल्मलितूलवत् ॥ ६३भगवान्के चलाये हुए बाणोंसे साध्यगण, विश्वेदेवगण, मरुद्गण और गन्धर्वगण सेमलकी रूईके समान आकाशमें ही लीन हो गये ॥ ६३ ॥
गरुत्मानपि तुण्डेन पक्षाभ्यां च नखाङ्कुरैः ।<br>भक्षयंस्ताडयन् देवान् दारयंश्च चचार वै ॥ ६४श्रीभगवान्के साथ गरुडजी भी अपनी चोंच, पंख और पंजोंसे देवताओंको खाते, मारते और फाड़ते फिर रहे थे ॥ ६४ ॥
ततश्शरसहस्रेण देवेन्द्रमधुसूदनौ ।<br>परस्परं ववर्षतु धाराभिरिव तोयदौ ॥ ६५फिर जिस प्रकार दो मेघ जलकी धाराएँ बरसाते हों उसी प्रकार देवराज इन्द्र और श्रीमधुसूदन एक-दूसरेपर बाण बरसाने लगे ॥ ६५ ॥
ऐरावतेन गरुडो युयुधे तत्र संकुले ।<br>देवैस्समस्तैर्युयुधे शक्रेण च जनार्दनः ॥ ६६उस युद्धमें गरुडजी ऐरावतके साथ और श्रीकृष्णचन्द्र इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ लड़ रहे थे ॥ ६६ ॥
भिन्नेष्वशेषबाणेषु शस्त्रेष्वस्त्रेषु च त्वरन्।<br>जग्राह वासवो वज्रं कृष्णश्चक्रं सुदर्शनम् ॥ ६७सम्पूर्ण बाणोंके चूक जाने और अस्त्र-शस्त्रोंके कट जानेपर इन्द्रने शीघ्रतासे वज्र और कृष्णने सुदर्शनचक्र हाथमें लिया ॥ ६७ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं त्रैलोक्यं द्विजसत्तम ।<br>वज्रचक्रकरौ दृष्ट्वा देवराजजनार्दनौ ॥ ६८हे द्विजश्रेष्ठ! उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीमें इन्द्र और कृष्णचन्द्रको क्रमशः वज्र और चक्र लिये हुए देखकर हाहाकार मच गया ॥ ६८ ॥
क्षिप्तं वज्रमथेन्द्रेण जग्राह भगवान्हरिः ।<br>न मुमोच तदा चक्रं शक्रं तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ६९श्रीहरिने इन्द्रके छोड़े हुए वज्रको अपने हाथोंसे पकड़ लिया और स्वयं चक्र न छोड़कर इन्द्रसे कहा—"अरे, ठहर!" ॥ ६९ ॥
प्रणष्टवज्रं देवेन्द्रं गरुडक्षतवाहनम्।<br>सत्यभामाब्रवीद्वीरं पलायनपरायणम्॥ ७०इस प्रकार वज्र छिन जाने और अपने वाहन ऐरावतके गरुडद्वारा क्षत-विक्षत हो जानेके कारण भागते हुए वीर इन्द्रसे सत्यभामाने कहा— ॥ ७० ॥
त्रैलोक्येश न ते युक्तं शचीभर्तुः पलायनम्।<br>पारिजातस्रगाभोगा त्वामुपस्थास्यते शची ॥ ७१"हे त्रैलोक्येश्वर! तुम शचीके पति हो, तुम्हें इस प्रकार युद्धमें पीठ दिखलाना उचित नहीं है। तुम भागो मत, पारिजात-पुष्पोंकी मालासे विभूषिता होकर शची शीघ्र ही तुम्हारे पास आवेगी ॥ ७१ ॥

अ० ३० ]

  • पञ्चम अंश *

३९९

कीदृशं देवराज्यं ते पारिजातस्वगुञ्ज्वलाम् । अपश्यतो यथापूर्वं प्रणयाभ्यागतां शचीम् ॥ ७२ अलं शक्र प्रयासेन न व्रीडां गन्तुमर्हसि । नीयतां पारिजातोऽयं देवाससन्तु गतव्यथाः ॥ ७३ पतिगर्विवलेपेन बहुमानपुरस्सरम् । न ददर्श गृहं यातामुपचारेण मां शची ॥ ७४ स्त्रीत्वादगुरुचित्ताहं स्वभर्तृश्लाघनापरा । ततः कृतवती शक्र भवता सह विग्रहम् ॥ ७५ तदलं पारिजातेन परस्वेन हूतेन मे । रूपेण गर्विता सा तु भर्त्रा का स्त्री न गर्विता ॥ ७६

श्रीपराशर उवाच

इत्युक्तो वै निववृते देवराजस्तथा द्विज । प्राह चैनामलं चण्डि सख्युः खेदोक्तिविस्तैरः ॥ ७७ न चापि सर्गसंहारस्थितिकर्ताखिलस्य यः । जितस्य तेन मे व्रीडा जायते विश्वरूपिणा ॥ ७८ यस्माज्जगत्सकलमेतदनादिमध्या- द्यस्मिन्मृतश्च न भविष्यति सर्वभूतात् । तेनोद्भवप्रलयपालनकारणेन व्रीडा कथं भवति देवि निराकृतस्य ॥ ७९ सकलभुवनसूतिर्मूर्तिरल्पाल्यसूक्ष्मा विदितसकलवेदैर्ज्ञायते यस्य नान्यैः । तमजमकृतमीशं शाश्वतं स्वेच्छयैन जगदुपकृतिमर्त्य को विजेतुं समर्थः ॥ ८०

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमोऽशो त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

अब प्रेमवश अपने पास आयी हुई शचीको पहलेकी भाँति पारिजात-पुष्पकी मालासे अलंकृत न देखकर तुम्हें देवराजत्वका क्या सुख होगा ? ॥ ७२ ॥ हे शक्र ! अब तुम्हें अधिक प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है, तुम संकोच मत करो; इस पारिजात-वृक्षको ले जाओ। इसे पाकर देवगण सन्तापरहित हों ॥ ७३ ॥ अपने पतिके बाहुबलसे अत्यन्त गर्विता शचीने अपने घर जानेपर भी मुझे कुछ अधिक सम्मानकी दृष्टिसे नहीं देखा था ॥ ७४ ॥ स्त्री होनेसे मेरा चित्त भी अधिक गम्भीर नहीं है, इसलिये मैंने भी अपने पतिका गौरव प्रकट करनेके लिये ही तुमसे यह लड़ाई ठानी थी ॥ ७५ ॥ मुझे दूसरेकी सम्पत्ति इस पारिजातको ले जानेकी क्या आवश्यकता है ? शची अपने रूप और पतिके कारण गर्विता है तो ऐसी कौन-सी स्त्री है जो इस प्रकार गर्वाली न हो ?" ॥ ७६ ॥

श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज ! सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर देवराज लौट आये और बोले—"हे क्रोधिते ! मैं तुम्हारा सुहृद् हूँ, अतः मेरे लिये ऐसी वैमनस्य बढानेवाली उक्तियोंके विस्तार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है ? ॥ ७७ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले हैं, उन विश्वरूप प्रभुसे पराजित होनेमें भी मुझे कोई संकोच नहीं है ॥ ७८ ॥ जिस आदि और मध्यरहित प्रभुसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें यह स्थित है और फिर जिसमें लीन होकर अन्तमें यह न रहेगा; हे देवि ! जगत्की उत्पत्ति, प्रलय और पालनके कारण उस परमात्मासे ही परास्त होनेमें मुझे कैसे लज्जा हो सकती है ? ॥ ७९ ॥ जिसकी अत्यन्त अल्प और सूक्ष्म मूर्तिको, जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाले अन्य पुरुष भी नहीं जान पाते तथा जिसने जगत्के उपकारके लिये अपनी इच्छासे ही मनुष्यरूप धारण किया है उस अजन्मा, अकर्ता और नित्य ईश्वरको जीतनेमें कौन समर्थ है ?" ॥ ८० ॥

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४००
* श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ३१


इकतीसवाँ अध्याय

भगवान्‌का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना

श्रीपराशर उवाच
संस्तुतो भगवानित्थं देवराजेन केशवः।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचेन्द्रं द्विजोत्तम॥ १

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजोत्तम! इन्द्रने जब इस प्रकार स्तुति की तो भगवान् कृष्णचन्द्र गम्भीर-भावसे हँसते हुए इस प्रकार बोले—॥ १॥


श्रीकृष्ण उवाच
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मर्त्या जगत्पते।
क्षन्तव्यं भवतैवेदमपराधं कृतं मम॥ २
पारिजाततरुश्चायं नीयतामुचितास्पदम्।
गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात्॥ ३
वज्रं चेदं गृहाण त्वं यदत्र प्रहितं त्वया।
तवैवैतत्प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम्॥ ४

श्रीकृष्णजी बोले— हे जगत्पते! आप देवराज इन्द्र हैं और हम मरणधर्मा मनुष्य हैं। हमने आपका जो अपराध किया है उसे आप क्षमा करें॥ २॥ मैंने जो यह पारिजातवृक्ष लिया था इसे इसके योग्य स्थान (नन्दनवन)-को ले जाइये। हे शक्र! मैंने तो इसे सत्यभामाके कहनेसे ही ले लिया था॥ ३॥ और आपने जो वज्र फेंका था उसे भी ले लीजिये; क्योंकि हे शक्र! यह शत्रुओंको नष्ट करनेवाला शस्त्र आपकाही है॥ ४॥


इन्द्र उवाच
विमोहयसि मामीश मर्त्योऽहमिति किं वदन्।
जानीमस्त्वं भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम्॥ ५
योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्तो नाथ संस्थितः।
जगतश्शल्यनिष्कर्षं करोष्यसुरसूदन॥ ६
नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवतीं पुरीम्।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्ते नायं संस्थास्यते भुवि॥ ७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वैतद्व्यतिक्रमम्॥ ८

इन्द्र बोले— हे ईश! 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहकर मुझे क्यों मोहित करते हैं? हे भगवन्! मैं तो आपके इस सगुणस्वरूपको ही जानता हूँ, हम आपके सूक्ष्म-स्वरूपको जाननेवाले नहीं हैं॥ ५॥ हे नाथ! आप जो हैं वही हैं, [हम तो इतना ही जानते हैं कि] हे दैत्यदलन! आप लोकरक्षामें तत्पर हैं और इस संसारके काँटोंको निकाल रहे हैं॥ ६॥ हे कृष्ण! इस पारिजात-वृक्षको आप द्वारकापुरी ले जाइये, जिस समय आप मर्त्यलोक छोड़ देंगे, उस समय वह भूर्लोकमें नहीं रहेगा॥ ७॥ हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे महाबाहो! हे शंखचक्रगदापाणे! मेरी इस धृष्टताको क्षमा कीजिये॥ ८॥


श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुवं हरिः।
प्रसक्तैः सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमानः सुर्षिभिः॥ ९
ततश्शङ्खमुपाध्माय द्वारकोपरि संस्थितः।
हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिनां द्विज॥ १०
अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान्।
निष्कूटे स्थापयामास पारिजातं महातरुम्॥ ११
यमभ्येत्य जनस्सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम्।
वास्यते यस्य पुष्योत्थगन्धेनोर्वी त्रियोजनम्॥ १२

श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीहरि देवराजसे 'तुम्हारी जैसी इच्छा है वैसा ही सही' ऐसा कहकर सिद्ध, गन्धर्व और देवर्षिगणसे स्तुत हो भूर्लोकमें चले आये॥ ९॥ हे द्विज! द्वारकापुरीके ऊपर पहुँचकर श्रीकृष्णचन्द्रने [अपने आनेकी सूचना देते हुए] शंख बजाकर द्वारकावासियोंको आनन्दित किया॥ १०॥ तदनन्तर सत्यभामाके सहित गरुडसे उतरकर उस पारिजात-महावृक्षको [सत्यभामाके] गृहोद्यानमें लगा दिया॥ ११॥ जिसके पास आकर सब मनुष्योंको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आता है और जिसके पुष्पोंसे निकली हुई गन्धसे तीन योजनतक पृथिवी सुगन्धित रहती है॥ १२॥


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अ० ३२] * पञ्चम अंश * ४०१


ततस्ते यादवास्सर्वे देहबन्धानमानुषान्।
ददृशुः पादपे तस्मिन् कुर्वन्तो मुखदर्शनम्॥ १३
किंकरैस्समुपानीतं हस्त्यश्वादि ततो धनम्।
विभज्य प्रददौ कृष्णो बान्धवानां महामतिः॥ १४
कन्याश्च कृष्णो जग्राह नरकस्य परिग्रहान्॥ १५
ततः काले शुभे प्राप्ते उपयेमे जनार्दनः।
ताः कन्या नरकेणासन्सर्वतो यास्समाहृताः॥ १६
एकस्मिन्नेव गोविन्दः काले तासां महामुने।
जग्राह विधिवत्पाणीन्पृथग्गेहेषु धर्मतः॥ १७
षोडशस्त्रीसहस्राणि शतमेकं ततोऽधिकम्।
तावन्ति चक्रे रूपाणि भगवान् मधुसूदनः॥ १८
एकैकमेव ताः कन्या मेनिरे मधुसूदनः।
ममैव पाणिग्रहणं मैत्रेय कृतवानिति॥ १९
निशासु च जगत्स्रष्टा तासां गेहेषु केशवः।
उवास विप्र सर्वासां विश्वरूपधरो हरिः॥ २०

यादवोंने उस वृक्षके पास जाकर अपना मुख देखा तो उन्हें अपना शरीर अमानुष दिखलायी दिया॥ १३॥

तदनन्तर महामति श्रीकृष्णचन्द्रने नरकासुरके सेवकोंद्वारा लाये हुए हाथी-घोड़े आदि धनको अपने बन्धु-बान्धवोंमें बाँट दिया और नरकासुरकी वरण की हुई कन्याओंको स्वयं ले लिया॥ १४-१५॥

शुभ समय प्राप्त होनेपर श्रीजनार्दनने उन समस्त कन्याओंके साथ, जिन्हें नरकासुर बलात् हर लाया था, विवाह किया॥ १६॥

हे महामुने! श्रीगोविन्दने एक ही समय पृथक्-पृथक् भवनोंमें उन सबके साथ विधिवत् धर्मपूर्वक पाणिग्रहण किया॥ १७॥

वे सोलह हजार एक सौ स्त्रियाँ थीं; उन सबके साथ पाणिग्रहण करते समय श्रीमघुसूदने इतने ही रूप बना लिये॥ १८॥

हे मैत्रेय! परंतु उस समय प्रत्येक कन्या 'भगवान्ने मेरा ही पाणिग्रहण किया है' इस प्रकार उन्हें एक ही समझ रही थी॥ १९॥

हे विप्र! जगत्स्रष्टा विश्वरूपधारी श्रीहरि रात्रिके समय उन सभीके घरोंमें रहते थे॥ २०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥


बत्तीसवाँ अध्याय

उषा-चरित्र

श्रीपराशर उवाच

प्रद्युम्नाद्या हरेः पुत्रा रुक्मिण्यां कथितास्तव।
भानुर्भौमेरिकाद्यांश्च सत्यभामा व्यजायत॥ १

दीप्तिमत्ताम्रपक्षाद्या रोहिण्यां तनया हरेः।
बभूवुर्जाम्बवत्यां च साम्बाद्या बलशालिनः॥ २

तनया भद्रविन्दाद्या नाग्नजित्यां महाबलाः।
सङ्ग्रामजित्प्रधानास्तु शैव्यायां च हरेस्सुताः॥ ३

वृकाद्याश्च सुता माद्र्यां गात्रवत्प्रमुखांस्तुतान्।
अवाप लक्ष्मणा पुत्रान्कालिन्द्याश्च श्रुतादयः॥ ४

अन्यासां चैव भार्याणां समुत्पन्नानि चक्रिणः।
अष्टायुतानि पुत्राणां सहस्राणि शतं तथा॥ ५

श्रीपराशरजी बोले— रुक्मिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए भगवान्‌के प्रद्युम्न आदि पुत्रोंका वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं; सत्यभामाने भानु और भौमेरिक आदिको जन्म दिया॥ १॥

श्रीहरिके रोहिणीके गर्भसे दीप्तिमान् और ताम्रपक्ष आदि तथा जाम्बवतीसे बलशाली साम्ब आदि पुत्र हुए॥ २॥

नाग्नजिती (सत्या)-से महाबली भद्रविन्द आदि और शैव्या (मित्रविन्दा)-से संग्रामजित् आदि उत्पन्न हुए॥ ३॥

माद्रीसे वृक आदि, लक्ष्मणासे गात्रवान् आदि तथा कालिन्दीसे श्रुत आदि पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ४॥

इसी प्रकार भगवान्‌की अन्य स्त्रियोंके भी आठ अयुत आठ हजार आठ सौ (अट्ठासी हजार आठ सौ) पुत्र हुए॥ ५॥

४०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३२

प्रद्युम्नः प्रथमस्तेषां सर्वेषां रुक्मिणीसुतः ।<br>प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽभूद्वज्रस्तस्मादजायत ॥ ६<br>अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो बलेः पौत्रीं महाबलः ।<br>उषां बाणस्य तनयामुपयेमे द्विजोत्तम ॥ ७<br>यत्र युद्धमभूद्घोरं हरिशङ्करयोर्महत् ।<br>छिन्नं सहस्रं बाहूनां यत्र बाणस्य चक्रिणा ॥ ८इन सब पुत्रोंमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न सबसे बड़े थे; प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका जन्म हुआ और अनिरुद्धसे वज्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ हे द्विजोत्तम ! महाबली अनिरुद्ध युद्धमें किसीसे रोके नहीं जा सकते थे। उन्होंने बलिकी पौत्री एवं बाणासुरकी पुत्री उषासे विवाह किया था ॥ ७ ॥ उस विवाहमें श्रीहरि और भगवान् शंकरका घोर युद्ध हुआ था और श्रीकृष्णचन्द्रने बाणासुरकी सहस्र भुजाएँ काट डाली थीं ॥ ८ ॥
श्रीमैत्रेय उवाच<br>कथं युद्धमभूद्ब्रह्मन्नुषार्थे हरकृष्णयोः ।<br>कथं क्षयं च बाणस्य बाहूनां कृतवान्हरिः ॥ ९<br>एतत्सर्वं महाभाग ममाख्यातुं त्वमर्हसि ।<br>महत्कौतूहलं जातं कथां श्रोतुमिमां हरेः ॥ १०**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे ब्रह्मन् ! उषाके लिये श्रीमहादेव और कृष्णका युद्ध क्यों हुआ और श्रीहरिने बाणासुरकी भुजाएँ क्यों काट डालीं ? ॥ ९ ॥ हे महाभाग ! आप मुझसे यह सम्पूर्ण वृत्तान्त कहिये; मुझे श्रीहरिकी यह कथा सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ १० ॥
श्रीपराशर उवाच<br>उषा बाणसुता विप्र पार्वतीं सह शम्भुना ।<br>क्रीडन्तीमुपलक्ष्योच्चैः स्पृहां चक्रे तदाश्रयाम् ॥ ११<br>ततस्सकलचित्तज्ञा गौरी तामाह भामिनीम् ।<br>अलमत्यर्थतापेन भर्त्रा त्वमपि रंस्यसे ॥ १२<br>इत्युक्ता सा तया चक्रे कदेति मतिमात्मनः ।<br>को वा भर्ता ममेत्याह पुनस्तामाह पार्वती ॥ १३**श्रीपराशरजी बोले—**हे विप्र ! एक बार बाणासुरकी पुत्री उषाने श्रीशंकरके साथ पार्वतीजीको क्रीडा करती देख स्वयं भी अपने पतिके साथ रमण करनेकी इच्छा की ॥ ११ ॥ तब सर्वान्तर्यामिनी श्रीपार्वतीजीने उस सुकुमारीसे कहा—'तू अधिक सन्तप्त मत हो, यथासमय तू भी अपने पतिके साथ रमण करेगी' ॥ १२ ॥ पार्वतीजीके ऐसा कहनेपर उषाने मन-ही-मन यह सोचकर कि 'न जाने ऐसा कब होगा ? और मेरा पति भी कौन होगा ?' [इस सम्बन्धमें] पार्वतीजीसे पूछा, तब पार्वतीजीने उससे फिर कहा— ॥ १३ ॥
पार्वत्युवाच<br>वैशाखशुक्लद्वादश्यां स्वप्ने योऽभिभवं तव ।<br>करिष्यति स ते भर्ता राजपुत्रि भविष्यति ॥ १४**पार्वतीजी बोलीं—**हे राजपुत्रि ! वैशाख शुक्ला द्वादशीकी रात्रिको जो पुरुष स्वप्नमें तुझसे हठात् सम्भोग करेगा वही तेरा पति होगा ॥ १४ ॥
श्रीपराशर उवाच<br>तस्यां तिथावुषास्वप्ने यथा देव्या समीरितम् ।<br>तथैवाभिभवं चक्रे कश्चिद्रागं च तत्र सा ॥ १५<br>ततः प्रबुद्धा पुरुषमपश्यन्ती समुत्सुका ।<br>क्व गतोऽसीति निर्लज्जा मैत्रेयोक्तवती सखीम् ॥ १६<br>बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सुता ।<br>तस्याः सख्यभवत्सा च प्राह कोऽयं त्वयोच्यते ॥ १७<br>यदा लज्जाकुला नास्यै कथयामास सा सखी ।<br>तदा विश्वासमानीय सर्वमेवाभ्यवादयत् ॥ १८**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर उसी तिथिको उषाकी स्वप्नावस्थामें किसी पुरुषने उससे, जैसा श्रीपार्वतीदेवीने कहा था, उसी प्रकार सम्भोग किया और उसका भी उसमें अनुराग हो गया ॥ १५ ॥ हे मैत्रेय ! तब उसके बाद स्वप्नसे जगनेपर जब उसने उस पुरुषको न देखा तो वह उसे देखनेके लिये अत्यन्त उत्सुक होकर अपनी सखीकी ओर लक्ष्य करके निर्लज्जतापूर्वक कहने लगी—"हे नाथ ! आप कहाँ चले गये ?" ॥ १६ ॥<br>बाणासुरका मन्त्री कुम्भाण्ड था; उसकी चित्रलेखा नामकी पुत्री थी, वह उषाकी सखी थी, [उषाका यह प्रलाप सुनकर] उसने पूछा—"यह तुम किसके विषयमें कह रही हो ?" ॥ १७ ॥ किन्तु जब लज्जावश उषाने उसे कुछ भी न बतलाया तब चित्रलेखाने [सब बात गुप्त रखनेका] विश्वास दिलाकर उषासे सब वृत्तान्त कहला लिया ॥ १८ ॥

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अ० ३२ ] * पञ्चम अंश * ४०३

विदितार्था तु तामाह पुनश्चोषा यथोदितम्। देव्या तथैव तत्प्राप्तौ यो ह्युपायः कुरुष्व तम्॥ १९

चित्रलेखोवाच दुर्विज्ञेयमिदं वक्तुं प्राप्तुं वापि न शक्यते। तथापि किञ्चित्कर्तव्यमुपकारं प्रिये तव ॥ २० सप्ताष्टदिनपर्यन्तं तावत्कालः प्रतीक्ष्यताम्। इत्युक्त्वाभ्यन्तरं गत्वा उपायं तमथाकरोत्॥ २१

श्रीपराशर उवाच ततः पटे सुरान्दैत्यानान्धर्वांश्च प्रधानतः। मनुष्यांश्च विलिख्यास्यै चित्रलेखा व्यदर्शयत्॥ २२ अपास्य सा तु गन्धर्वांस्तथोरगसुरासुरान्। मनुष्येषु ददौ दृष्टिं तेष्वप्यन्धकवृष्णिषु॥ २३ कृष्णरामौ विलोक्यासीत्सुभ्रूल्लज्जाजडेव सा। प्रद्युम्नदर्शने व्रीडादृष्टिं निन्येऽन्यतो द्विज ॥ २४ दृष्टमात्रे ततः कान्ते प्रद्युम्नतनये द्विज। दृष्ट्वात्यर्थविलासिन्या लज्जा क्वापि निराकृता ॥ २५ सोऽयं सोऽयमितीत्युक्ते तया सा योगगामिनी। चित्रलेखाब्रवीदेनामुषां बाणसुतां तदा॥ २६

चित्रलेखोवाच अयं कृष्णस्य पौत्रस्ते भर्ता देव्या प्रसादितः। अनिरुद्ध इति ख्यातः प्रख्यातः प्रियदर्शनः॥ २७ प्राप्नोषि यदि भर्तारमिमं प्राप्तं त्वयाखिलम्। दुष्प्रवेशा पुरी पूर्वं द्वारका कृष्णपालिता ॥ २८ तथापि यत्नाद्भर्तारमानयिष्यामि ते सखि। रहस्यमेतद्वक्तव्यं न कस्यचिदपि त्वया॥ २९ अचिरादागमिष्यामि सहस्व विरहं मम। ययौ द्वारवतीं चोषां समाश्वास्य ततः सखीम्॥ ३०

चित्रलेखाके सब बात जान लेनेपर उषाने जो कुछ श्रीपार्वतीजीने कहा था, वह भी उसे सुना दिया और कहा कि अब जिस प्रकार उसका पुनः समागम हो वही उपाय करो ॥ १९ ॥

चित्रलेखाने कहा—हे प्रिये! तुमने जिस पुरुषको देखा है उसे तो जानना भी बहुत कठिन है फिर उसे बतलाना या पाना कैसे हो सकता है? तथापि मैं तुम्हारा कुछ-न-कुछ उपकार तो करूँगी ही ॥ २० ॥ तुम सात या आठ दिनतक मेरी प्रतीक्षा करना—ऐसा कहकर वह अपने घरके भीतर गयी और उस पुरुषको ढूँढनेका उपाय करने लगी ॥ २१ ॥

श्रीपराशरजी बोले—तदनन्तर [सात-आठ दिन पश्चात् लौटकर] चित्रलेखाने चित्रपटपर मुख्य-मुख्य देवता, दैत्य, गन्धर्व और मनुष्योंके चित्र लिखकर उषाको दिखलाये ॥ २२ ॥ तब उषाने गन्धर्व, नाग, देवता और दैत्य आदिको छोड़कर केवल मनुष्योंपर और उनमें भी विशेषतः अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंपर ही दृष्टि दी ॥ २३ ॥ हे द्विज! राम और कृष्णके चित्र देखकर वह सुन्दर भृकुटिवाली लज्जासे जडवत् हो गयी तथा प्रद्युम्नको देखकर उसने लज्जावश अपनी दृष्टि हटा ली ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् प्रद्युम्नतनय प्रियतम अनिरुद्धजीको देखते ही उस अत्यन्त विलासिनीकी लज्जा मानो कहीं चली गयी ॥ २५ ॥ [वह बोल उठी]—'वह यही है, वह यही है।' उसके इस प्रकार कहनेपर योगगामिनी चित्रलेखाने उस बाणासुरकी कन्यासे कहा—॥ २६ ॥

चित्रलेखा बोली—देवीने प्रसन्न होकर यह कृष्णका पौत्र ही तेरा पति निश्चित किया है; इसका नाम अनिरुद्ध है और यह अपनी सुन्दरताके लिये प्रसिद्ध है ॥ २७ ॥ यदि तुझको यह पति मिल गया तब तो तूने मानो सभी कुछ पा लिया; किन्तु कृष्णचन्द्रद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें पहले प्रवेश ही करना कठिन है ॥ २८ ॥ तथापि हे सखि! किसी उपायसे मैं तेरे पतिको लाऊँगी ही, तू इस गुप्त रहस्यको किसीसे भी न कहना ॥ २९ ॥ मैं शीघ्र ही आऊँगी, इतनी देर तू मेरे वियोगको सहन कर। अपनी सखी उषाको इस प्रकार ढाढस बँधाकर चित्रलेखा द्वारकापुरीको गयी ॥ ३० ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

४०४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ३३

तैंतीसवाँ अध्याय

श्रीकृष्ण और बाणासुरका युद्ध

श्रीपराशर उवाच
बाणोऽपि प्रणिपत्याग्रे मैत्रेयाह त्रिलोचनम्।
देव बाहुसहस्रेण निर्विण्णोऽस्म्याहवं विना॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! एक बार बाणासुरने भी भगवान् त्रिलोचनको प्रणाम करके कहा था कि हे देव! बिना युद्धके इन हजार भुजाओंसे मुझे बड़ा ही खेद हो रहा है॥ १॥

कच्चिन्ममैषां बाहूनां साफल्यजनको रणः।
भविष्यति विना युद्धं भाराय मम किं भुजैः॥ २
क्या कभी मेरी इन भुजाओंको सफल करनेवाला युद्ध होगा? भला बिना युद्धके इन भाररूप भुजाओंसे मुझे लाभ ही क्या है?॥ २॥

श्रीशंकर उवाच
मयूरध्वजभङ्गस्ते यदा बाण भविष्यति।
पिशिताशिजनानन्दं प्राप्स्यसे त्वं तदा रणम्॥ ३
श्रीशंकरजी बोले— हे बाणासुर! जिस समय तेरी मयूरचिह्नवाली ध्वजा टूट जायगी, उसी समय तेरे सामने मांसभोजी यक्ष-पिशाचादिको आनन्द देनेवाला युद्ध उपस्थित होगा॥ ३॥

श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वरदं शम्भुमभ्यागतो गृहम्।
सभग्नं ध्वजमालोक्य हृष्टो हर्षं पुनर्ययौ॥ ४
श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर, वरदायक श्रीशंकरको प्रणामकर बाणासुर अपने घर आया और फिर कालान्तरमें उस ध्वजाको टूटी देखकर अति आनन्दित हुआ॥ ४॥

एतस्मिन्नेव काले तु योगविद्याबलेन तम्।
अनिरुद्धमथानिन्ये चित्रलेखा वराप्सराः॥ ५
इसी समय अप्सराश्रेष्ठ चित्रलेखा अपने योगबलसे अनिरुद्धको वहाँ ले आयी॥ ५॥

कन्यान्तःपुरमभ्येत्य रममाणं सहोषया।
विज्ञाय रक्षिणो गत्वा शशंसुर्दैत्यभूपतेः॥ ६
अनिरुद्धको कन्यान्तःपुरमें आकर उषाके साथ रमण करता जान अन्तःपुररक्षकोंने सम्पूर्ण वृत्तान्त दैत्यराज बाणासुरसे कह दिया॥ ६॥

व्यादिष्टं किंकराणां तु सैन्यं तेन महात्मना।
जघान परिघं घोरमादाय परवीरहा॥ ७
तब महावीर बाणासुरने अपने सेवकोंको उससे युद्ध करनेकी आज्ञा दी; किंतु शत्रु-दमन अनिरुद्धने अपने सम्मुख आनेपर उस सम्पूर्ण सेनाको एक लोहमय दण्डसे मार डाला॥ ७॥

हतेषु तेषु बाणोऽपि रथस्थस्तद्वधोद्यतः।
युध्यमानो यथाशक्ति यदुवीरेण निर्जितः॥ ८
अपने सेवकोंके मारे जानेपर बाणासुर अनिरुद्धको मार डालनेकी इच्छासे रथपर चढ़कर उनके साथ युद्ध करने लगा; किंतु अपनी शक्तिभर युद्ध करनेपर भी वह यदुवीर अनिरुद्धजीसे परास्त हो गया॥ ८॥

मायया युयुधे तेन स तदा मन्त्रिचोदितः।
ततस्तं पन्नगास्त्रेण बबन्ध यदुनन्दनम्॥ ९
तब वह मन्त्रियोंकी प्रेरणासे मायापूर्वक युद्ध करने लगा और यदुनन्दन अनिरुद्धको नागपाशसे बाँध लिया॥ ९॥

द्वारवत्यां क्व यातोऽसावनिरुद्धेति जल्पताम्।
यदूनामाचचक्षे तं बद्धं बाणेन नारदः॥ १०
इधर द्वारकापुरीमें जिस समय समस्त यादवोंमें यह चर्चा हो रही थी कि ‘अनिरुद्ध कहाँ गये?’ उसी समय देवर्षि नारदने उनके बाणासुरद्वारा बाँधे जानेकी सूचना दी॥ १०॥

तं शोणितपुरं नीतं श्रुत्वा विद्याविदग्धया।
योषिता प्रत्ययं जग्मुर्यादवा नामरैरिति॥ ११
नारदजीके मुखसे योगविद्यामें निपुण युवती चित्रलेखाद्वारा उन्हें शोणितपुर ले जाये गये सुनकर यादवोंको विश्वास हो गया कि देवताओंने उन्हें नहीं चुराया*॥ ११॥

ततो गरुडमारुह्य स्मृतमात्रागतं हरिः।
बलप्रद्युम्नसहितो बाणस्य प्रययौ पुरम्॥ १२
तब स्मरणमात्रसे उपस्थित हुए गरुडपर


* अबतक यादवगण यही सोच रहे थे कि पारिजात हरणसे चिढ़कर देवता ही अनिरुद्धको चुरा ले गये हैं।

अ० ३३ ] * पञ्चम अंश * ४०५


पुरप्रवेशे प्रमथैर्युद्धमासीन्महात्मनः।
ययौ बाणपुराभ्याशं नीत्वा तान्सङ्क्षयं हरिः॥ १३

ततस्त्रिपादस्त्रिशिरा ज्वरो माहेश्वरो महान्।
बाणरक्षार्थमभ्येत्य युयुधे शार्ङ्गधन्वना॥ १४

तद्भस्मस्पर्शसम्भूततापः कृष्णाङ्गसङ्गमात्।
अवाप बलदेवोऽपि श्रममामीलितेक्षणः॥ १५

ततस्स युद्ध्यमानस्तु सह देवेन शार्ङ्गिणा।
वैष्णवेन ज्वरेणाशु कृष्णदेहान्निराकृतः॥ १६

नारायणभुजाघातपरिपीडनविह्वलम् ।
तं वीक्ष्य क्षम्यतामस्येत्याह देवः पितामहः॥ १७

ततश्च क्षान्तमेवेति प्रोच्य तं वैष्णवं ज्वरम्।
आत्मन्येव लयं निन्ये भगवान्मधुसूदनः॥ १८

ज्वर उवाच
मम त्वया समं युद्धं ये स्मरिष्यन्ति मानवाः।
विज्वरास्ते भविष्यन्तीत्युक्त्वा चैनं ययौ ज्वरः॥ १९

ततोऽग्नीन्भगवान्पञ्च जित्वा नीत्वा तथा क्षयम्।
दानवानां बलं कृष्णश्चूर्णयामास लीलया॥ २०

ततस्समस्तसैन्येन दैतेयानां बलेस्सुतः।
युयुधे शङ्करश्चैव कार्त्तिकेयश्च शौरिणा॥ २१

हरिशङ्करयोर्युद्धमतीवासीत्सुदारुणम् ।
चुक्षुभुस्सकला लोकाः शस्त्रास्त्रांशुप्रतापिताः॥ २२

प्रलयोऽयमशेषस्य जगतो नूनमागतः।
मेनिरे त्रिदशास्तत्र वर्तमाने महारणे॥ २३

जृम्भकास्त्रेण गोविन्दो जृम्भयामास शंकरम्।
ततः प्रणेशुर्दैतेयाः प्रमथाश्च समन्ततः॥ २४

जृम्भाभिभूतस्तु हरो रथोपस्थ उपाविशत्।
न शशाक ततो योद्धुं कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा॥ २५

गरुडक्षतवाहश्च प्रद्युम्नास्त्रेण पीडितः।
कृष्णहुङ्कारनिर्धूतशक्तिश्चापययौ गुहः॥ २६


चढ़कर श्रीहरि बलराम और प्रद्युम्नके सहित बाणासुरकी राजधानीमें आये॥ १२॥ नगरमें घुसते ही उन तीनोंका भगवान् शंकरके पार्षद प्रमथगणोंसे युद्ध हुआ; उन्हें नष्ट करके श्रीहरि बाणासुरकी राजधानीके समीप चले गये॥ १३॥

तदनन्तर बाणासुरकी रक्षाके लिये तीन सिर और तीन पैरवाला माहेश्वर नामक महान् ज्वर आगे बढ़कर श्रीभगवान्‌से लड़ने लगा॥ १४॥ [उस ज्वरका ऐसा प्रभाव था कि] उसके फेंके हुए भस्मके स्पर्शसे सन्तप्त हुए श्रीकृष्णचन्द्रके शरीरका आलिंगन करनेपर बलदेवजीने भी शिथिल होकर नेत्र मूँद लिये॥ १५॥ इस प्रकार भगवान् शार्ङ्गधरके साथ [उनके शरीरमें व्याप्त होकर] युद्ध करते हुए उस माहेश्वर ज्वरको वैष्णव ज्वरने तुरंत उनके शरीरसे निकाल दिया॥ १६॥ उस समय श्रीनारायणकी भुजाओंके आघातसे उस माहेश्वर ज्वरको पीड़ित और विह्वल हुआ देखकर पितामह ब्रह्माजीने भगवान्‌से कहा—'इसे क्षमा कीजिये'॥ १७॥ तब भगवान् मधुसूदनने 'अच्छा, मैंने क्षमा की' ऐसा कहकर उस वैष्णव ज्वरको अपनेमें लीन कर लिया॥ १८॥

ज्वर बोला—जो मनुष्य आपके साथ मेरे इस युद्धका स्मरण करेंगे वे ज्वरहीन हो जायँगे, ऐसा कहकर वह चला गया॥ १९॥

तदनन्तर भगवान् कृष्णचन्द्रने पंचाग्नियोंको जीतकर नष्ट किया और फिर लीलासे ही दानवसेनाको नष्ट करने लगे॥ २०॥ तब सम्पूर्ण दैत्यसेनाके सहित बलि-पुत्र बाणासुर, भगवान् शंकर और स्वामिकार्त्तिकेयजी भगवान् कृष्णके साथ युद्ध करने लगे॥ २१॥ श्रीहरि और श्रीमहादेवजीका परस्पर बड़ा घोर युद्ध हुआ, इस युद्धमें प्रयुक्त शस्त्रास्त्रोंके किरणजालसे सन्तप्त होकर सम्पूर्ण लोक क्षुब्ध हो गये॥ २२॥ इस घोर युद्धके उपस्थित होनेपर देवताओंने समझा कि निश्चय ही यह सम्पूर्ण जगत्‌का प्रलयकाल आ गया है॥ २३॥ श्रीगोविन्दने जृम्भकास्त्र छोड़ा जिससे महादेवजी निद्रित-से होकर जमुहाई लेने लगे; उनकी ऐसी दशा देखकर दैत्य और प्रमथगण चारों ओर भागने लगे॥ २४॥ भगवान् शंकर निद्राभिभूत होकर रथके पिछले भागमें बैठ गये और फिर अनायास ही अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्रसे युद्ध न कर सके॥ २५॥ तदनन्तर गरुड़द्वारा वाहनके नष्ट हो जानेसे, प्रद्युम्नजीके शस्त्रोंसे पीड़ित होनेसे तथा कृष्णचन्द्रके हुंकारसे शक्तिहीन हो जानेसे स्वामिकार्त्तिकेय भी भागने लगे॥ २६॥


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४०६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३३


जृम्भिते शङ्करे नष्टे दैत्यसैन्ये गुहे जिते।
नीते प्रमथसैन्ये च सङ्ख्यं शार्ङ्गधन्वना॥ २७

नन्दिना संगृहीताश्वमधिरूढो महारथम्।
बाणस्तत्राययौ योद्धुं कृष्णकार्ष्णिबलैस्सह॥ २८

बलभद्रो महावीर्यो बाणसैन्यमनेकधा।
विव्याध बाणैः प्रभ्रश्य धर्मतश्च पलायत॥ २९

आकृष्य लाङ्गलाग्रेण मुसलेनाशु ताडितम्।
बलं बलेन ददृशे बाणो बाणैश्च चक्रिणा॥ ३०

ततः कृष्णेन बाणस्य युद्धमासीत्सुदारुणम्।
समस्यतोरिषून्दीप्तानकायत्राणविभेदिनः॥ ३१

कृष्णश्चिच्छेद बाणैस्तान्बाणेन प्रहिताञ्छितान्।
विव्याध केशवं बाणो बाणं विव्याध चक्रधृक्॥ ३२

मुमुचाते तथास्त्राणि बाणकृष्णौ जिगीषया।
परस्परं क्षतिकरौ लाघवादन्निशं द्विज॥ ३३

भिद्यमानेष्वशेषेषु शरेष्वस्त्रे च सीदति।
प्राचुर्येण ततो बाणं हन्तुं चक्रे हरिर्मनः॥ ३४

ततोऽर्कशतसङ्घाततेजसा सदृशद्युति।
जग्राह दैत्यचक्रारिर्हरिश्चक्रं सुदर्शनम्॥ ३५

मुञ्चतो बाणनाशाय ततश्चक्रं मधुद्विषः।
नग्ना दैतेयविद्याभूत्कोटारी पुरतो हरेः॥ ३६

तामग्रतो हरिर्दृष्ट्वा मीलिताक्षस्सुदर्शनम्।
मुमोच बाणमुद्दिश्यच्छेत्तुं बाहुवनं रिपोः॥ ३७

क्रमेण तत्तु बाहूनां बाणस्याच्युतचोदितम्।
छेदं चक्रेऽसुरापास्तशस्त्रौघक्षपणादृतम्॥ ३८

छिन्ने बाहुवने तत्तु करस्थं मधुसूदनः।
मुमुक्षुर्बाणनाशाय विज्ञातस्त्रिपुरद्विषा॥ ३९

समुपेत्याह गोविन्दं सामपूर्वमुमापतिः।
विलोक्य बाणं दोर्दण्डच्छेदासृक्स्राववर्षिणम्॥ ४०


इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा महादेवजीके निद्राभिभूत, दैत्य-सेनाके नष्ट, स्वामिकार्त्तिकेयके पराजित और शिवगणोंके क्षीण हो जानेपर कृष्ण, प्रद्युम्न और बलभद्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये वहाँ बाणासुर साक्षात् नन्दीश्वरद्वारा हाँके जाते हुए महान् रथपर चढ़कर आया॥ २७-२८॥ उसके आते ही महावीर्यशाली बलभद्रजीने अनेकों बाण बरसाकर बाणासुरकी सेनाको छिन्न-भिन्न कर डाला; तब वह वीरधर्मसे भ्रष्ट होकर भागने लगी॥ २९॥ बाणासुरने देखा कि उसकी सेनाको बलभद्रजी बड़ी फुर्तीसे हलसे खींच-खींचकर मूसलसे मार रहे हैं और श्रीकृष्णचन्द्र उसे बाणोंसे बींधे डालते हैं॥ ३०॥ तब बाणासुरका श्रीकृष्णचन्द्रके साथ घोर युद्ध छिड़ गया। वे दोनों परस्पर कवचभेदी बाण छोड़ने लगे। परंतु भगवान् कृष्णने बाणासुरके छोड़े हुए तीखे बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला, और फिर बाणासुर कृष्णको तथा कृष्ण बाणासुरको बींधने लगे॥ ३१-३२॥ हे द्विज! उस समय परस्पर चोट करनेवाले बाणासुर और कृष्ण दोनों ही विजयकी इच्छासे निरन्तर शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्र छोड़ने लगे॥ ३३॥

अन्तमें, समस्त बाणोंके छिन्न और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके निष्फल हो जानेपर श्रीहरिने बाणासुरको मार डालनेका विचार किया॥ ३४॥ तब दैत्यमण्डलके शत्रु भगवान् कृष्णने सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान अपने सुदर्शनचक्रको हाथमें ले लिया॥ ३५॥

जिस समय भगवान् मधुसूदन बाणासुरको मारनेके लिये चक्र छोड़ना ही चाहते थे उसी समय दैत्योंकी विद्या (मन्त्रमयी कुलदेवी) कोटारी भगवान्‌के सामने नग्नावस्थामें उपस्थित हुई॥ ३६॥ उसे देखते ही भगवान्‌ने नेत्र मूँद लिये और बाणासुरको लक्ष्य करके उस शत्रु की भुजाओंके वनको काटनेके लिये सुदर्शनचक्र छोड़ा॥ ३७॥ भगवान् अच्युतके द्वारा प्रेरित उस चक्रने दैत्योंके छोड़े हुए अस्त्रसमूहको काटकर क्रमशः बाणासुरकी भुजाओंको काट डाला [केवल दो भुजाएँ छोड़ दीं]॥ ३८॥ तब त्रिपुरशत्रु भगवान् शंकर जान गये कि श्रीमधुसूदन बाणासुरके बाहुवनको काटकर अपने हाथमें आये हुए चक्रको उसका वध करनेके लिये फिर छोड़ना चाहते हैं॥ ३९॥ अतः बाणासुरको अपने खण्डित भुजदण्डोंसे लोहूकी धारा बहाते देख श्रीउमापतिने गोविन्दके पास आकर सामपूर्वक कहा—॥ ४०॥

अ० ३३ ] * पञ्चम अंश * [ ४०७

श्रीशंकर उवाच

कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ जाने त्वां पुरुषोत्तमम्।
परेशं परमात्मानमनादिनिधनं हरिम् ॥ ४१

देवतियर्ङ्मनुष्येषु शरीरग्रहणात्मिका।
लीलेयं सर्वभूतस्य तव चेष्टोपलक्षणा ॥ ४२

तत्प्रसीदाभयं दत्तं बाणस्यास्य मया प्रभो।
तत्त्वया नानृतं कार्यं यन्मया व्याहृतं वचः ॥ ४३

अस्मत्संश्रयदृप्तोऽयं नापराधी तवाव्यय।
मया दत्तवरो दैत्यस्तत्त्वां क्षमयाम्यहम् ॥ ४४

श्रीशंकरजी बोले— हे कृष्ण! हे कृष्ण!! हे जगन्नाथ!! मैं यह जानता हूँ कि आप पुरुषोत्तम परमेश्वर, परमात्मा और आदि-अन्तसे रहित श्रीहरि हैं ॥ ४१ ॥ आप सर्वभूतमय हैं। आप जो देव, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं यह आपकी स्वाधीन चेष्टाकी उपलक्षिका लीला ही है ॥ ४२ ॥ हे प्रभो! आप प्रसन्न होइये। मैंने इस बाणासुरको अभयदान दिया है। हे नाथ! मैंने जो वचन दिया है उसे आप मिथ्या न करें ॥ ४३ ॥ हे अव्यय! यह आपका अपराधी नहीं है; यह तो मेरा आश्रय पानेसे ही इतना गर्वीला हो गया है। इस दैत्यको मैंने ही वर दिया था, इसलिये मैं ही आपसे इसके लिये क्षमा कराता हूँ ॥ ४४ ॥


श्रीपराशर उवाच

इत्युक्तः प्राह गोविन्दः शूलपाणिमुमापतिम्।
प्रसन्नवदनो भूत्वा गतामर्षोऽसुरं प्रति ॥ ४५

श्रीपराशरजी बोले— त्रिशूलपाणि भगवान् उमापतिके इस प्रकार कहनेपर श्रीगोविन्दने बाणासुरके प्रति क्रोधभाव त्याग दिया और प्रसन्नवदन होकर उनसे कहा— ॥ ४५ ॥


श्रीभगवानुवाच

युष्मद्दत्तवरो वाणो जीवतामेष शङ्कर।
त्वद्वाक्यगौरवादेतन्मया चक्रं निवर्तितम् ॥ ४६

त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रष्टुमर्हसि शङ्कर ॥ ४७

योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि ॥ ४८

अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वदन्ति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर ॥ ४९

प्रसन्नोऽहं गमिष्यामि त्वं गच्छ वृषभध्वज ॥ ५०

श्रीभगवान् बोले— हे शंकर! यदि आपने इसे वर दिया है तो यह बाणासुर जीवित रहे। आपके वचनका मान रखनेके लिये मैं इस चक्रको रोके लेता हूँ ॥ ४६ ॥ आपने जो अभय दिया है वह सब मैंने भी दे दिया। हे शंकर! आप अपनेको मुझसे सर्वथा अभिन्न देखें ॥ ४७ ॥ आप यह भली प्रकार समझ लें कि जो मैं हूँ सो आप हैं तथा यह सम्पूर्ण जगत्, देव, असुर और मनुष्य आदि कोई भी मुझसे भिन्न नहीं हैं ॥ ४८ ॥ हे हर! जिन लोगोंका चित्त अविद्यासे मोहित है, वे भिन्नदर्शी पुरुष ही हम दोनोंमें भेद देखते और बतलाते हैं। हे वृषभध्वज! मैं प्रसन्न हूँ, आप पधारिये, मैं भी अब जाऊँगा ॥ ४९-५० ॥


श्रीपराशर उवाच

इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्णः प्राद्युम्निर्यत्र तिष्ठति।
तद्बन्धफणिनो नेशुर्गरुडानिलपोथिताः ॥ ५१

ततोऽनिरुद्धमारोप्य सपत्नीकं गरुत्मति।
आजग्मुर्द्वारिकां रामकार्ष्णिदामोदराः पुरीम् ॥ ५२

पुत्रपौत्रैः परिवृतस्तत्र रेमे जनार्दनः।
देवीभिस्सततं विप्र भूभारतरणेच्छया ॥ ५३

श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार कहकर भगवान् कृष्ण जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध थे वहाँ गये। उनके पहुँचते ही अनिरुद्धके बन्धनरूप समस्त नागगण गरुडके वेगसे उत्पन्न हुए वायुके प्रहारसे नष्ट हो गये ॥ ५१ ॥ तदनन्तर सपत्नीक अनिरुद्धको गरुडपर चढ़ाकर बलराम, प्रद्युम्न और कृष्णचन्द्र द्वाराकापुरीमें लौट आये ॥ ५२ ॥ हे विप्र! वहाँ भू-भार-हरणकी इच्छासे रहते हुए श्रीजनार्दन अपने पुत्र-पौत्रादिसे घिरे रहकर अपनी रानियोंके साथ रमण करने लगे ॥ ५३ ॥


इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

४०८ॐ श्रीविष्णुपुराण ॐ[ अ० ३४

चौंतीसवाँ अध्याय

पौण्ड्रक-वध तथा काशीदहन

संस्कृतहिन्दी
श्रीमैत्रेय उवाच<br>चक्रे कर्म महच्छौरिर्बिभ्राणो मानुषीं तनुम्।<br>जिगाय शक्रं शर्वं च सर्वान्देवांश्च लीलया॥ १<br>यच्चान्यदकरोत्कर्म दिव्यचेष्टाविघातकृत्।<br>तत्कथ्यतां महाभाग परं कौतूहलं हि मे॥ २<br>श्रीपराशर उवाच<br>गदतो मम विप्रर्षे श्रूयतामिदमादरात्।<br>नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा॥ ३<br>पौण्ड्रको वासुदेवस्तु वासुदेवोऽभवद्भुवि।<br>अवतीर्णस्त्वमित्युक्तो जनैरज्ञानमोहितैः॥ ४<br>स मेने वासुदेवोऽहमवतीर्णो महीतले।<br>नष्टस्मृतिस्ततस्सर्वं विष्णुचिह्नमचीकरत्॥ ५<br>दूतं च प्रेषयामास कृष्णाय सुमहात्मने।<br>त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम चात्मनः॥ ६<br>वासुदेवात्मकं मूढ त्यक्त्वा सर्वमशेषतः।<br>आत्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रणतिं व्रज॥ ७<br>इत्युक्तस्सम्प्रहस्यैनं दूतं प्राह जनार्दनः।<br>निजचिह्नममं चक्रं समुत्स्रक्ष्ये त्वयीति वै॥ ८<br>वाच्यश्च पौण्ड्रको गत्वा त्वया दूत वचो मम।<br>ज्ञातस्तद्वाक्यसद्भावो यत्कार्यं तद्विधीयताम्॥ ९<br>गृहीतचिह्नवेषोऽहमागमिष्यामि ते पुरम्।<br>उत्स्रक्ष्यामि च तच्चक्रं निजचिह्नमसंशयम्॥ १०<br>आज्ञापूर्वं च यदिदमागच्छेति त्वयोदितम्।<br>सम्पादयिष्ये श्वस्तुभ्यं समागम्याविलम्बितम्॥ ११<br>शरणं ते समभ्येत्य कर्तास्मि नृपते तथा।<br>यथा त्वत्तो भयं भूयो न मे किञ्चिद्भविष्यति॥ १२<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तेऽपगते दूते संस्मृत्याभ्यागतं हरिः।<br>गरुत्मन्तमथारुह्य त्वरितस्तत्पुरं ययौ॥ १३श्रीमैत्रेयजी बोले—हे गुरो! श्रीविष्णुभगवान्ने मनुष्य-शरीर धारणकर जो लीलासे ही इन्द्र, शंकर और सम्पूर्ण देवगणको जीतकर महान् कर्म किये थे [वह मैं सुन चुका ]॥ १॥ इनके सिवा देवताओंकी चेष्टाओंका विघात करनेवाले उन्होंने और भी जो कर्म किये थे, हे महाभाग! वे सब मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है॥ २॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे ब्रह्मर्षे! भगवान्ने मनुष्यावतार लेकर जिस प्रकार काशीपुरी जलायी थी वह मैं सुनाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो॥ ३॥ पौण्ड्रकवंशीय वासुदेव नामक एक राजाको अज्ञानमोहित पुरुष 'आप वासुदेवरूपसे पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं' ऐसा कहकर स्तुति किया करते थे॥ ४॥ अन्तमें वह भी यही मानने लगा कि 'मैं वासुदेवरूपसे पृथिवीमें अवतीर्ण हुआ हूँ!' इस प्रकार आत्मविस्मृत हो जानेसे उसने विष्णुभगवान्के समस्त चिह्न धारण कर लिये॥ ५॥ और महात्मा कृष्णचन्द्रके पास यह सन्देश लेकर दूत भेजा कि “हे मूढ़! अपने वासुदेव नामको छोड़कर मेरे चक्र आदि सम्पूर्ण चिह्नोंको छोड़ दे और यदि तुझे जीवनकी इच्छा है तो मेरी शरणमें आ”॥ ६-७॥<br>दूतने जब इसी प्रकार कहा तो श्रीजनार्दन उससे हँसकर बोले—“ठीक है, मैं अपने चिह्न चक्रको तेरे प्रति छोड़ूँगा। हे दूत! मेरी ओरसे तू पौण्ड्रकसे जाकर यह कहना कि मैंने तेरे वाक्यका वास्तविक भाव समझ लिया है, तुझे जो करना हो सो कर॥ ८-९॥ मैं अपने चिह्न और वेष धारणकर तेरे नगरमें आऊँगा और निस्सन्देह अपने चिह्न चक्रको तेरे ऊपर छोड़ूँगा॥ १०॥ ‘और तूने जो आज्ञा करते हुए ‘आ’ ऐसा कहा है, सो मैं उसे भी अवश्य पालन करूँगा और कल शीघ्र ही तेरे पास पहुँचूँगा॥ ११॥ हे राजन्! तेरी शरणमें आकर मैं वही उपाय करूँगा जिससे फिर तुझसे मुझे कोई भय न रहे॥ १२॥<br>श्रीपराशरजी बोले—श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जब दूत चला गया तो भगवान् स्मरण करते ही उपस्थित हुए गरुडपर चढ़कर तुरंत उसकी राजधानीको चले॥ १३॥

अ० ३४ ] * पञ्चम अंश * ४०९


ततस्तु केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपत्तिस्तदा।
सर्वसैन्यपरीवारः पार्ष्णिग्राह उपाययौ॥ १४

ततो बलेन महता काशिराजबलेन च।
पौण्ड्रको वासुदेवोऽसौ केशवाभिमुखो ययौ॥ १५

तं ददर्श हरिर्दूरादुदारस्यन्दने स्थितम्।
चक्रहस्तं गदाशार्ङ्गबाहुं पाणिगताम्बुजम्॥ १६

स्रग्धरं पीतवसनं सुपर्णरचितध्वजम्।
वक्षःस्थले कृतं चास्य श्रीवत्सं ददृशे हरिः॥ १७

किरीटकुण्डलधरं नानारत्नोपशोभितम्।
तं दृष्ट्वा भावगम्भीरं जहास गरुडध्वजः॥ १८

युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वबलिना द्विज।
निस्त्रिंशासिगदाशूलशक्तिकार्मुकशालिना॥ १९

क्षणेन शार्ङ्गनिर्मुक्तैश्शरैररिविदारणैः।
गदाचक्रनिपातैश्च सूदयामास तद्बलम्॥ २०

काशिराजबलं चैवं क्षयं नीत्वा जनार्दनः।
उवाच पौण्ड्रकं मूढमात्मचिह्नोपलक्षितम्॥ २१

श्रीभगवानुवाच
पौण्ड्रकोक्तं त्वया यत्तु दूतवक्त्रेण मां प्रति।
समुत्सृजेति चिह्नानि तत्ते सम्पादयाम्यहम्॥ २२

चक्रमेतत्त्समुत्सृष्टं गदेयं ते विसर्जिता।
गरुत्मानेष चोत्सृष्टस्समारोहतु ते ध्वजम्॥ २३

श्रीपराशर उवाच
इत्युच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ विदारितः।
पातितो गदया भग्नोध्वजश्चास्य गरुत्मता॥ २४

ततो हाहाकृते लोके काशिपुर्य्यधिपो बली।
युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः॥ २५

ततश्शार्ङ्गधनुर्मुक्तैश्छित्त्वा तस्य शिरश्शरैः।
काशिपुर्य्यां स चिक्षेप कुर्वँल्लोकस्य विस्मयम्॥ २६

हत्वा तं पौण्ड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम्।
पुनर्द्वारवतीं प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा॥ २७

तच्छिरः पतितं तत्र दृष्ट्वा काशिपतेः पुरे।
जनः किमेतदित्याहच्छिन्नं केनेति विस्मितः॥ २८


भगवान्‌के आक्रमणका समाचार सुनकर काशीनरेश भी उसका पृष्ठपोषक (सहायक) होकर अपनी सम्पूर्ण सेना ले उपस्थित हुआ॥ १४॥ तदनन्तर अपनी महान् सेनाके सहित काशीनरेशकी सेना लेकर पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णचन्द्रके सम्मुख आया॥ १५॥ भगवान्‌ने दूरसे ही उसे हाथमें चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और पद्म लिये एक उत्तम रथपर बैठे देखा॥ १६॥ श्रीहरिने देखा कि उसके कण्ठमें वैजयन्तीमाला है, शरीरमें पीताम्बर है, गरुडरचित ध्वजा है और वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न हैं॥ १७॥ उसे नाना प्रकारके रत्नोंसे सुसज्जित किरीट और कुण्डल धारण किये देखकर श्रीगरुडध्वज भगवान् गम्भीरभावसे हँसने लगे॥ १८॥ और हे द्विज! उसकी हाथी-घोड़ोंसे बलिष्ठ तथा निस्त्रिंश खड्ग, गदा, शूल, शक्ति और धनुष आदिसे सुसज्जित सेनासे युद्ध करने लगे॥ १९॥ श्रीभगवान्‌ने एक क्षणमें ही अपने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले तीक्ष्ण बाणों तथा गदा और चक्रसे उसकी सम्पूर्ण सेनाको नष्ट कर डाला॥ २०॥ इसी प्रकार काशिराजकी सेनाको भी नष्ट करके श्रीजनार्दनने अपने चिह्नोंसे युक्त मूढ़मति पौण्ड्रकसे कहा॥ २१॥

**श्रीभगवान् बोले—**हे पौण्ड्रक! मेरे प्रति तूने जो दूतके मुखसे यह कहलाया था कि मेरे चिह्नोंको छोड़ दे सो मैं तेरे सम्मुख उस आज्ञाको सम्पन्न करता हूँ॥ २२॥ देख, यह मैंने चक्र छोड़ दिया, यह तेरे ऊपर गदा भी छोड़ दी और यह गरुड भी छोड़े देता हूँ, यह तेरी ध्वजापर आरूढ़ हों॥ २३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर छोड़े हुए चक्रने पौण्ड्रकको विदीर्ण कर डाला, गदाने नीचे गिरा दिया और गरुडने उसकी ध्वजा तोड़ डाली॥ २४॥ तदनन्तर सम्पूर्ण सेनामें हाहाकार मच जानेपर अपने मित्रका बदला चुकानेके लिये खड़ा हुआ काशीनरेश श्रीवासुदेवसे लड़ने लगा॥ २५॥ तब भगवान्‌ने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए एक बाणसे उसका सिर काटकर सम्पूर्ण लोगोंको विस्मित करते हुए काशीपुरीमें फेंक दिया॥ २६॥ इस प्रकार पौण्ड्रक और काशीनरेशको अनुचरों-सहित मारकर भगवान् फिर द्वारकाको लौट आये और वहाँ स्वर्ग सदृश सुखका अनुभव करते हुए रमण करने लगे॥ २७॥

इधर काशीपुरीमें काशिराजका सिर गिरा देख सम्पूर्ण नगरनिवासी विस्मयपूर्वक कहने लगे—'यह क्या हुआ? इसे किसने काट डाला?'॥ २८॥