भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 558 में से

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अ० २८ ] * पञ्चम अंश * ३८९

विहाराद्युपभोगेषु रूपं मायामयं शुभम्।
दर्शयामास दैत्यस्य तस्येयं मदिरेक्षणा ॥ २९

कामोऽवतीर्णः पुत्रस्ते तस्येयं दयिता रतिः।
विशङ्का नात्र कर्तव्या स्नुषेयं तव शोभने ॥ ३०

ततो हर्षसमाविष्टौ रुक्मिणीकेशवौ तदा।
नगरी च समस्ता सा साधुसाध्वित्यभाषत ॥ ३१

चिरं नष्टेन पुत्रेण सङ्गतां प्रेक्ष्य रुक्मिणीम्।
अवाप विस्मयं सर्वो द्वारवत्यां तदा जनः ॥ ३२

यह मत्तविलोचना उस दैत्यको विहारादि उपभोगोंके समय अपने अति सुन्दर मायामय रूप दिखलाती रहती थी॥ २९॥ कामदेवने ही तेरे पुत्ररूपसे जन्म लिया है और यह सुन्दरी उसकी प्रिया रति ही है। हे शोभने! यह तेरी पुत्रवधू है, इसमें तू किसी प्रकारकी विपरीत शंका न कर'॥ ३०॥

यह सुनकर रुक्मिणी और कृष्णको अतिशय आनन्द हुआ तथा समस्त द्वारकापुरी भी 'साधु-साधु' कहने लगी॥ ३१॥ उस समय चिरकालसे खोये हुए पुत्रके साथ रुक्मिणीका समागम हुआ देख द्वारकापुरीके सभी नागरिकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ३२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥


अट्ठाईसवाँ अध्याय

रुक्मीका वध

श्रीपराशर उवाच

चारुदेष्णं सुदेष्णं च चारुदेहं च वीर्यवान्।
सुषेणं चारुगुप्तं च भद्रचारुं तथा परम् ॥ १

चारुविन्दं सुचारुं च चारुं च बलिनां वरम्।
रुक्मिण्यजनयत्पुत्रान्कन्यां चारुमतीं तथा ॥ २

अन्याश्च भार्याः कृष्णस्य बभूवुः सप्त शोभनाः।
कालिन्दी मित्रविन्दा च सत्या नाग्नजिती तथा ॥ ३

देवी जाम्बवती चापि रोहिणी कामरूपिणी।
मद्रराजसुता चान्या सुशीला शीलमण्डना ॥ ४

सात्राजिती सत्यभामा लक्ष्मणा चारुहासिनी।
षोडशासन् सहस्राणि स्त्रीणामन्यानि चक्रिणः ॥ ५

प्रद्युम्नोऽपि महावीर्यो रुक्मिणस्तनयां शुभाम्।
स्वयंवर तां जग्राह सा च तं तनयं हरेः ॥ ६

तस्यामस्याभवत्पुत्रो महाबलपराक्रमः।
अनिरुद्धो रणेऽरुद्धवीर्योदधिररिन्दमः ॥ ७

तस्यापि रुक्मिणः पौत्रीं वरयामास केशवः।
दौहित्राय ददौ रुक्मी तां स्पर्द्धन्नपि चक्रिणा ॥ ८

श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! रुक्मिणीके [प्रद्युम्नके अतिरिक्त] चारुदेष्ण, सुदेष्ण, वीर्यवान्, चारुदेह, सुषेण, चारुगुप्त, भद्रचारु, चारुविन्द, सुचारु और बलवानोंमें श्रेष्ठ चारु नामक पुत्र तथा चारुमती नामकी एक कन्या हुई॥ १-२॥ रुक्मिणीके अतिरिक्त श्रीकृष्णचन्द्रके कालिन्दी, मित्रविन्दा, नग्नजित्की पुत्री सत्या, जाम्बवान्‌की पुत्री कामरूपिणी रोहिणी, अति-शीलवती मद्रराजसुता सुशीला भद्रा, सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा और चारुहासिनी लक्ष्मणा—ये अति सुन्दरी सात स्त्रियाँ और थीं, इनके सिवा उनके सोलह हजार स्त्रियाँ और भी थीं॥ ३-५॥

महावीर प्रद्युम्नने रुक्मीकी सुन्दरी कन्याको और उस कन्याने भी भगवान्‌के पुत्र प्रद्युम्नजीको स्वयंवरमें ग्रहण किया॥ ६॥ उससे प्रद्युम्नजीके अनिरुद्ध नामक एक महाबलपराक्रमसम्पन्न पुत्र हुआ जो युद्धमें रुद्ध (प्रतिहत) न होनेवाला, बलका समुद्र तथा शत्रुओंका दमन करनेवाला था॥ ७॥ कृष्णचन्द्रने उस (अनिरुद्ध)-के लिये भी रुक्मीकी पौत्रीका वरण किया और रुक्मीने कृष्णचन्द्रसे ईर्ष्या रखते हुए भी अपने दौहित्रको अपनी पौत्री देना स्वीकार कर लिया॥ ८॥

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