भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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३८८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २७

मायावती ददौ तस्मै मायास्सर्वा महामुने। प्रद्युम्नायानुरागान्धा तन्न्यस्तहृदयेक्षणा ॥ १४ प्रसज्जन्तीं तु तां प्राह स कार्ष्णिः कमलेक्षणाम्। मातृत्वमपहायाद्य किमेवं वर्तसेऽन्यथा ॥ १५ सा तस्मै कथयामास न पुत्रस्त्वं ममेति वै। तनयं त्वामयं विष्णोर्हृतवान्कालशम्बरः ॥ १६ क्षिप्तः समुद्रे मत्स्यस्य सम्प्राप्तो जठरान्मया। सा हि रोदिति ते माता कान्ताद्याप्यतिवत्सला ॥ १७ श्रीपराशर उवाच इत्युक्तश्शम्बरं युद्धे प्रद्युम्नः स समाह्वयत्। क्रोधाकुलीकृतमना युयुधे च महाबलः ॥ १८ हत्वा सैन्यमशेषं तु तस्य दैत्यस्य यादवः। सप्त माया व्यतिक्रम्य मायां प्रयुयुजेऽष्टमीम् ॥ १९ तया जघान तं दैत्यं मायया कालशम्बरम्। उत्पत्य च तया सार्धमाजगाम पितुः पुरम् ॥ २० अन्तःपुरे निपतितं मायावत्या समन्वितम्। तं दृष्ट्वा कृष्णसङ्कल्पा बभूवुः कृष्णयोषितः ॥ २१ रुक्मिणी साभवत्प्रेम्णा सास्रदृष्टिरनिन्दिता। धन्यायाः खल्वयं पुत्रो वर्तते नवयौवने ॥ २२ अस्मिन्वयसि पुत्रो मे प्रद्युम्नो यदि जीवति। सभाshortlyत्या जननी वत्स सा त्वया का विभूषिता ॥ २३ अथवा यादृशः स्नेहो मम यादृग्वपुस्तव। हरेरपत्यं सुव्यक्तं भवान्वत्स भविष्यति ॥ २४ श्रीपराशर उवाच एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तस्सह कृष्णेन नारदः। अन्तःपुरचरां देवीं रुक्मिणीं प्राह हर्षयन् ॥ २५ एष ते तनयः सुभ्रु हत्वा शम्बरमागतः। हृतो येनाभवद्वालो भवत्यास्सूतिकागृहात् ॥ २६ इयं मायावती भार्या तनयस्यास्य ते सती। शम्बरस्य न भार्येयं श्रूयतामत्र कारणम् ॥ २७ मन्मथे तु गते नाशं तदुद्भवपरायणा। शम्बरं मोहयामास मायारूपेण रूपिणी ॥ २८

हे महामुने! जो अपना हृदय और नेत्र प्रद्युम्नमें अर्पित कर चुकी थी उस मायावतीने अनुरागसे अन्धी होकर उसे सब प्रकारकी माया सिखा दी ॥ १४॥ इस प्रकार अपने ऊपर आसक्त हुई उस कमललोचनासे कृष्णनन्दन प्रद्युम्नने कहा—"आज तुम मातृभावको छोड़कर यह अन्य प्रकारका भाव क्यों प्रकट करती हो?" ॥ १५॥ तब मायावतीने कहा—"तुम मेरे पुत्र नहीं हो, तुम भगवान् विष्णुके तनय हो। तुम्हें कालशम्बरने हरकर समुद्रमें फेंक दिया था; तुम मुझे एक मत्स्यके उदरमें मिले हो। हे कान्त! आपकी पुत्रवत्सला जननी आज भी रोती होगी" ॥ १६-१७॥

श्रीपराशरजी बोले—मायावतीके इस प्रकार कहनेपर महाबलवान् प्रद्युम्नजीने क्रोधसे विह्वल हो शम्बरासुरको युद्धके लिये ललकारा और उससे युद्ध करने लगे ॥ १८॥ यादवश्रेष्ठ प्रद्युम्नजीने उस दैत्यकी सम्पूर्ण सेना मार डाली और उसकी सात मायाओंको जीतकर स्वयं आठवीं मायाका प्रयोग किया ॥ १९॥ उस मायासे उन्होंने दैत्यराज कालशम्बरको मार डाला और मायावतीके साथ [विमानद्वारा] उड़कर आकाशमार्गसे अपने पिताके नगरमें आ गये ॥ २०॥

मायावतीके सहित अन्तःपुरमें उतरनेपर श्रीकृष्णचन्द्रकी रानियोंने उन्हें देखकर कृष्ण ही समझा ॥ २१॥ किन्तु अनिन्दिता रुक्मिणीके नेत्रोंमें प्रेमवश आँसू भर आये और वे कहने लगीं—"अवश्य ही यह नवयौवनको प्राप्त हुआ किसी बड़भागिनीका पुत्र है ॥ २२॥ यदि मेरा पुत्र प्रद्युम्न जीवित होगा तो उसकी भी यही आयु होगी। हे वत्स! तू ठीक-ठीक बता तूने किस भाग्यवती जननीको विभूषित किया है? ॥ २३॥ अथवा, बेटा! जैसा मुझे तेरे प्रति स्नेह हो रहा है और जैसा तेरा स्वरूप है, उससे मुझे ऐसा भी प्रतीत होता है कि तू श्रीहरिका ही पुत्र है" ॥ २४॥

श्रीपराशरजी बोले—इसी समय श्रीकृष्णचन्द्रके साथ वहाँ नारदजी आ गये। उन्होंने अन्तःपुरनिवासिनी देवी रुक्मिणीको आनन्दित करते हुए कहा— ॥ २५॥ "हे सुभ्रु! यह तेरा ही पुत्र है। यह शम्बरासुरको मारकर आ रहा है, जिसने कि इसे बाल्यावस्थामें सूतिकागृहसे हर लिया था ॥ २६॥ यह सती मायावती भी तेरे पुत्रकी ही स्त्री है; यह शम्बरासुरकी पत्नी नहीं है। इसका कारण सुन ॥ २७॥ पूर्वकालमें कामदेवके भस्म हो जानेपर उसके पुनर्जन्मकी प्रतीक्षा करती हुई इसने अपने मायामयरूपसे शम्बरासुरको मोहित किया था ॥ २८॥