भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 398

अ० २७ ] * पञ्चम अंश * ३८७

सत्ताईसवाँ अध्याय

प्रद्युम्न-हरण तथा शम्बर-वध

श्रीमैत्रेय उवाच**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुने! वीरवर प्रद्युम्नको शम्बरासुरने कैसे हरण किया था? और फिर उस महाबली शम्बरको प्रद्युम्नने कैसे मारा?॥१॥ जिसको पहले उसने हरण किया था उसीने पीछे उसे किस प्रकार मार डाला? हे गुरो! मैं यह सम्पूर्ण प्रसंग विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥२॥
शम्बरेण हृतो वीरः प्रद्युम्नः स कथं मुने।<br>शम्बरः स महावीर्यः प्रद्युम्नेन कथं हतः॥ १
यस्तेनापहृतः पूर्वं स कथं विजघान तम्।<br>एतद्विस्तरतः श्रोतुमिच्छामि सकलं गुरो॥ २
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे मुने! कालके समान विकराल शम्बरासुरने प्रद्युम्नको, जन्म लेनेके छठे ही दिन 'यह मेरा मारनेवाला है' ऐसा जानकर सूतिकागृहसे हर लिया॥३॥ उसको हरण करके शम्बरासुरने लवणसमुद्रमें डाल दिया, जो तरंगमालाजनित आवर्तोंसे पूर्ण और बड़े भयानक मकरोंका घर है॥४॥ वहाँ फेंके हुए उस बालकको एक मत्स्यने निगल लिया, किन्तु वह उसकी जठराग्निसे जलकर भी न मरा॥५॥<br>कालान्तरमें कुछ मछेरोंने उसे अन्य मछलियोंके साथ अपने जालमें फँसाया और असुरश्रेष्ठ शम्बरको निवेदन किया॥६॥ उसकी नाममात्रकी पत्नी मायावती सम्पूर्ण अन्तःपुरकी स्वामिनी थी और वह सुलक्षणा सम्पूर्ण सूदों (रसोइयों)-का आधिपत्य करती थी॥७॥ उस मछलीका पेट चीरते ही उसमें एक अति सुन्दर बालक दिखायी दिया जो दग्ध हुए कामवृक्षका प्रथम अंकुर था॥८॥ 'तब यह कौन है और किस प्रकार इस मछलीके पेटमें डाला गया' इस प्रकार अत्यन्त आश्चर्यचकित हुई उस सुन्दरीसे देवर्षि नारदने आकर कहा—॥९॥ "हे सुन्दर भुकुटिवाली! यह सम्पूर्ण जगत्के स्थिति और संहारकर्ता भगवान् विष्णुका पुत्र है; इसे शम्बरासुरने सूतिकागृहसे चुराकर समुद्रमें फेंक दिया था। वहाँ इसे यह मत्स्य निगल गया और अब इसीके द्वारा यह तेरे घर आ गया है। तू इस नररत्नका विश्वस्त होकर पालन कर"॥१०-११॥
षष्ठेऽह्नि जातमात्रं तु प्रद्युम्नं सूतिकागृहात्।<br>ममैष हन्तेति मुने हतवान्कालशम्बरः॥ ३
हृत्वा चिक्षेप चैवैनं ग्राहोग्रे लवणार्णवे।<br>कल्लोलजनितावर्ते सुघोरे मकरालये॥ ४
पातितं तत्र चैवैको मत्स्यो जग्राह बालकम्।<br>न ममार च तस्यापि जठराग्निप्रदीपितः॥ ५
मत्स्यबन्धैश्च मत्स्योऽसौ मत्स्यैरन्यैस्सह द्विज।<br>घातितोऽसुरवर्याय शम्बराय निवेदितः॥ ६
तस्य मायावती नामपत्नी सर्वगृहेश्वरी।<br>कारयामास सूदानामाधिपत्यमनिन्दिता॥ ७
दारिते मत्स्यजठरे सा ददर्शातिशोभनम्।<br>कुमारं मन्मथतरोर्दग्धस्य प्रथमाङ्कुरम्॥ ८
कोऽयं कथमयं मत्स्यजठरे प्रिविवेशितः।<br>इत्येवं कौतुकाविष्टां तन्वीं प्राहार्थ नारदः॥ ९
अयं समस्तजगतः स्थितिसंहारकारिणः।<br>शम्बरेण हृतो विष्णोस्तनयः सूतिकागृहात्॥ १०
क्षिप्तस्समुद्रे मत्स्येन निगीर्णस्ते गृहं गतः।<br>नररत्नमिदं सुभ्रु विस्रब्धा परिपालय॥ ११
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**नारदजीके ऐसा कहनेपर मायावतीने उस बालककी अतिशय सुन्दरतासे मोहित हो बाल्यावस्थासे ही उसका अति अनुरागपूर्वक पालन किया॥१२॥ हे महामते! जिस समय वह नवयौवनके समागमसे सुशोभित हुआ तब वह गजगामिनी उसके प्रति कामनायुक्त अनुराग प्रकट करने लगी॥१३॥
नारदेनैवमुक्ता सा पालयामास तं शिशुम्।<br>बाल्यादेवातिरागेण रूपातिशयमोहिता॥ १२
स यदा यौवनाभोगभूषितोऽभून्महामते।<br>साभिलाषा तदा सापि बभूव गजगामिनी॥ १३