विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३८२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वत्तोऽमरास्सपितरो यक्षगन्धर्वकिन्नराः।<br>सिद्धाश्चाप्सरसस्त्वत्तो मनुष्याः पशवः खगाः॥ ३५<br>सरीसृपा मृगास्सर्वे त्वत्तस्सर्वे महीरुहाः।<br>यच्च भूतं भविष्यं च किञ्चिदत्र चराचरम्॥ ३६ | आपहीसे देवता, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध और अप्सरागण उत्पन्न हुए हैं। आपहीसे मनुष्य, पशु, पक्षी, सरीसृप और मृग आदि हुए हैं तथा आपहीसे सम्पूर्ण वृक्ष और जो कुछ भी भूत-भविष्यत् चराचर जगत् है वह सब हुआ है॥ ३५-३६॥ |
| मूर्त्तामूर्त्तं तथा चापि स्थूलं सूक्ष्मतरं तथा।<br>तत्सर्वं त्वं जगत्कर्ता नास्ति किञ्चित्त्वया विना॥ ३७ | हे प्रभो! मूर्त्त-अमूर्त्त, स्थूल-सूक्ष्म तथा और भी जो कुछ है वह सब आप जगत्कर्ता ही हैं,आपसे भिन्न और कुछ भी नहीं है॥ ३७॥ |
| मया संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमता भगवन् सदा।<br>तापत्रयाभिभूतेन न प्राप्ता निर्वृतिः क्वचित्॥ ३८ | हे भगवन्! तापत्रयसे अभिभूत होकर सर्वदा इस संसार-चक्रमें भ्रमण करते हुए मुझे कभी शान्ति प्राप्त नहीं हुई॥ ३८॥ |
| दुःखान्येव सुखानीति मृगतृष्णा जलाशया।<br>मया नाथ गृहीतानि तानि तापाय मेऽभवन्॥ ३९ | हे नाथ! जलकी आशासे मृगतृष्णाके समान मैंने दुःखोंको ही सुख समझकर ग्रहण किया था; परन्तु वे मेरे सन्तापके ही कारण हुए॥ ३९॥ |
| राज्यमुर्वी बलं कोशो मित्रपक्षस्तथात्मजाः।<br>भार्या भृत्यजनो ये च शब्दाद्या विषयाः प्रभो॥ ४०<br>सुखबुद्ध्या मया सर्वं गृहीतमिदमव्ययम्।<br>परिणामे तदेवेश तापात्मकमभून्मम॥ ४१ | हे प्रभो! राज्य, पृथिवी, सेना, कोश, मित्रपक्ष, पुत्रगण, स्त्री तथा सेवक आदि और शब्दादि विषय इन सबको मैंने अविनाशी तथा सुख-बुद्धिसे ही अपनाया था; किन्तु हे ईश! परिणाममें वे ही दुःखरूप सिद्ध हुए॥ ४०-४१॥ |
| देवलोकगतिं प्राप्तो नाथ देवगणोऽपि हि।<br>मत्तस्साहाय्यकामोऽभूच्छाश्वती कुत्र निर्वृतिः॥ ४२ | हे नाथ! जब देवलोक प्राप्त करके भी देवताओंको मेरी सहायताकी इच्छा हुई तो उस (स्वर्गलोक)-में भी नित्य-शान्ति कहाँ है?॥ ४२॥ |
| त्वामनाराध्य जगतां सर्वेषां प्रभवास्पदम्।<br>शाश्वती प्राप्यते केन परमेश्वर निर्वृतिः॥ ४३ | हे परमेश्वर! सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके आदि-स्थान आपकी आराधना किये बिना कौन शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है?॥ ४३॥ |
| त्वन्मायामूढमनसो जन्ममृत्युजरादिकान्।<br>अवाप्य तापानपश्यन्ति प्रेतराजमनन्तरम्॥ ४४ | हे प्रभो! आपकी मायासे मूढ़ हुए पुरुष जन्म, मृत्यु और जरा आदि सन्तापोंको भोगते हुए अन्तमें यमराजका दर्शन करते हैं॥ ४४॥ |
| ततो निजक्रियासूतिं नरकेष्वतिदारुणम्।<br>प्राप्नुवन्ति नरा दुःखमस्वरूपविदस्तव॥ ४५ | आपके स्वरूपको न जाननेवाले पुरुष नरकोंमें पड़कर अपने कर्मोंके फलस्वरूप नाना प्रकारके दारुण क्लेश पाते हैं॥ ४५॥ |
| अहमत्यन्तविषयी मोहितस्तव मायया।<br>ममत्वगर्वगर्त्तान्तर्भ्रमामि परमेश्वर॥ ४६ | हे परमेश्वर! मैं अत्यन्त विषयी हूँ और आपकी मायासे मोहित होकर ममत्वाभिमानके गड्ढेमें भटकता रहा हूँ॥ ४६॥ |
| सोऽहं त्वां शरणमपारमप्रमेयं<br>सम्प्राप्तः परमपदं यतो न किञ्चित्।<br>संसारभ्रमपरितापतप्तचेता<br>निर्वाणे परिणतधाम्नि साभिलाषः॥ ४७ | वही मैं आज अपार और अप्रमेय परमपदरूप आप परमेश्वरकी शरणमें आया हूँ जिससे भिन्न दूसरा कुछ भी नहीं है और संसारभ्रमणके खेदसे खिन्न-चित्त होकर मैं निरतिशय तेजोमय निर्वाणस्वरूप आपका ही अभिलाषी हूँ"॥ ४७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥