भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 394

अ० २४] * पञ्चम अंश * ३८३

चौबीसवाँ अध्याय

मुचुकुन्दका तपस्याके लिये प्रस्थान और बलरामजीकी व्रजयात्रा

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रीपराशर उवाच<br>इत्थं स्तुतस्तदा तेन मुचुकुन्देन धीमता।<br>प्राहेशः सर्वभूतानामनादिनिधनो हरिः॥ १<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>यथाभिवाञ्छितान्दिव्यान्गच्छ लोकान्नराधिप।<br>अव्याहतपरैश्वर्यो मत्प्रसादोपबृंहितः॥ २<br>भुक्त्वा दिव्यान्महाभोगान्भविष्यसि महाकुले।<br>जातिस्मरो मत्प्रसादात्ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ३<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः प्रणिपत्येशं जगतामच्युतं नृपः।<br>गुहामुखाद्विनिष्क्रान्तस्स ददर्शाल्पकान्नरान्॥ ४<br>ततः कलियुगं मत्वा प्राप्तं तप्तुं नृपस्तपः।<br>नरनारायणस्थानं प्रययौ गन्धमादनम्॥ ५<br>कृष्णोऽपि घातयित्वारिमुपायेन हि तद्बलम्।<br>जग्राह मथुरामेत्य हस्त्यश्वस्यन्दनोज्ज्वलम्॥ ६<br>आनीय चोग्रसेनाय द्वारवत्यां न्यवेदयत्।<br>पराभवनिश्शङ्कं बभूव च यदोः कुलम्॥ ७<br>बलदेवोऽपि मैत्रेय प्रशान्ताखिलविग्रहः।<br>ज्ञातिदर्शनसोत्कण्ठः प्रययौ नन्दगोकुलम्॥ ८<br>ततो गोपांश्च गोपीश्च यथा पूर्वममित्रजित्।<br>तथैवाभ्यवदत्प्रेम्णा बहुमानपुरस्सरम्॥ ९<br>स कैश्चित्सम्परिष्वक्तः कांश्चिच्च परिषस्वजे।<br>हास्यं चक्रे समं कैश्चिद्गोपैर्गोपीजनैस्तथा॥ १०<br>प्रियाण्यनेकान्यवदन् गोपास्तत्र हलायुधम्।<br>गोप्यश्च प्रेमकुपिताः प्रोचुस्सेर्ष्यमथापराः॥ ११<br>गोप्यः पप्रच्छुरपरा नागरीजनवल्लभः।<br>कच्चिदास्ते सुखं कृष्णश्चलप्रेमल्वात्मकः॥ १२<br>अस्मच्चेष्टामपहसन्न कच्चित्पुरयोषिताम्।<br>सौभाग्यमानमधिकं करोति क्षणसौहृदः॥ १३श्रीपराशरजी बोले— परम बुद्धिमान् राजा मुचुकुन्दके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वभूतोंके ईश्वर अनादिनिधन भगवान् हरि बोले॥ १॥<br><br>श्रीभगवान्ने कहा— हे नरेश्वर! तुम अपने अभिमत दिव्य लोकोंको जाओ; मेरी कृपासे तुम्हें अव्याहत परम ऐश्वर्य प्राप्त होगा॥ २॥ वहाँ अत्यन्त दिव्य भोगोंको भोगकर तुम अन्तमें एक महान् कुलमें जन्म लोगे, उस समय तुम्हें अपने पूर्वजन्मका स्मरण रहेगा और फिर मेरी कृपासे तुम मोक्षपद प्राप्त करोगे॥ ३॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले— भगवान्के इस प्रकार कहनेपर राजा मुचुकुन्दने जगदीश्वर श्रीअच्युतको प्रणाम किया और गुफासे निकलकर देखा कि लोग बहुत छोटे-छोटे हो गये हैं॥ ४॥ उस समय कलियुगको वर्तमान समझकर राजा तपस्या करनेके लिये श्रीनरनारायणके स्थान गन्धमादनपर्वतपर चले गये॥ ५॥ इस प्रकार कृष्णचन्द्रने उपायपूर्वक शत्रुको नष्टकर फिर मथुरामें आ उसकी हाथी, घोड़े और रथादिसे सुशोभित सेनाको अपने वशीभूत किया और उसे द्वारकामें लाकर राजा उग्रसेनको अर्पण कर दिया। तबसे यदुवंश शत्रुओंके दमनसे निःशंक हो गया॥ ६-७॥<br><br>हे मैत्रेय! इस सम्पूर्ण विग्रहके शान्त हो जानेपर बलदेवजी अपने बान्धवोंके दर्शनकी उत्कण्ठासे नन्दजीके गोकुलको गये॥ ८॥ वहाँ पहुँचकर शत्रुजित् बलभद्रजीने गोप और गोपियोंका पहलेहीकी भाँति अति आदर और प्रेमके साथ अभिवादन किया॥ ९॥ किसीने उनका आलिंगन किया और किसीको उन्होंने गले लगाया तथा किन्हीं गोप और गोपियोंके साथ उन्होंने हास-परिहास किया॥ १०॥ गोपोंने बलरामजीसे अनेकों प्रिय वचन कहे तथा गोपियोंमेंसे कोई प्रणयकुपित होकर बोलीं और किन्हींने उपालम्भयुक्त बातें की॥ ११॥<br><br>किन्हीं अन्य गोपियोंने पूछा—चंचल एवं अल्प प्रेम करना ही जिनका स्वभाव है, वे नगर-नारियोंके प्राणाधार कृष्ण तो आनन्दमें हैं न?॥ १२॥ वे क्षणिक स्नेहवाले नन्दनन्दन हमारी चेष्टाओंका उपहास करते हुए क्या नगरकी महिलाओंके सौभाग्यका मान नहीं बढ़ाया करते?॥ १३॥
विष्णु पुराण · पृष्ठ 394, कुल 558 में से · BharatKosha