भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 395
३८४* श्रीविष्णुपुराण *[अ० २५
कच्चित्स्मरति नः कृष्णो गीतानुगमनं कलम्।<br>अप्यसौ मातरं द्रष्टुं सकृदप्यागमिष्यति ॥ १४<br>अथवा किं तदालापैः क्रियन्तामपराः कथाः।<br>यस्यास्माभिर्विना तेन विनास्माकं भविष्यति ॥ १५<br>पिता माता तथा भ्राता भर्ता बन्धुजनश्च किम्।<br>सन्त्यक्तस्तत्कृतेऽस्माभिरकृतज्ञध्वजो हि सः ॥ १६<br>तथापि कच्चिदालापमिहागमनसंश्रयम्।<br>करोति कृष्णो वक्तव्यं भवता राम नानृतम् ॥ १७<br>दामोदरोऽसौ गोविन्दः पुरस्त्रीसक्तमानसः।<br>अपेतप्रीतिरस्मासु दुर्दर्शः प्रतिभाति नः ॥ १८क्या कृष्णचन्द्र कभी हमारे गीतानुयायी मनोहर स्वरका स्मरण करते हैं? क्या वे एक बार अपनी माताको भी देखनेके लिये यहाँ आवेंगे? ॥ १४ ॥ अथवा अब उनकी बात करनेसे हमें क्या प्रयोजन है, कोई और बात करो। जब उनकी हमारे बिना निभ गयी तो हम भी उनके बिना निभा ही लेंगी ॥ १५ ॥ क्या माता, क्या पिता, क्या बन्धु, क्या पति और क्या कुटुम्बके लोग? हमने उनके लिये सभीको छोड़ दिया, किन्तु वे तो अकृतज्ञोंकी ध्वजा ही निकले ॥ १६ ॥ तथापि बलरामजी! सच-सच बतलाइये क्या कृष्ण कभी यहाँ आनेके विषयमें भी कोई बातचीत करते हैं? ॥ १७ ॥ हमें ऐसा प्रतीत होता है कि दामोदर कृष्णका चित्त नागरी-नारियोंमें फँस गया है; हममें अब उनकी प्रीति नहीं है, अतः अब हमें तो उनका दर्शन दुर्लभ ही जान पड़ता है ॥ १८ ॥
श्रीपराशर उवाच<br>आमन्त्रितश्च कृष्णेति पुनर्द्दामोदरेति च।<br>जहसुस्सुस्वरं गोप्यो हरिणा हृतचेतसः ॥ १९<br>सन्देशैस्साममधुरैः प्रेमगर्भैरगर्विर्तैः।<br>रामेणाश्वासिता गोप्यः कृष्णस्यातिमनोहरैः ॥ २०<br>गोपैश्च पूर्ववद्रामः परिहासमनोहराः।<br>कथाश्चकार रेमे च सह तैर्व्रजभूमिषु ॥ २१श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीहरिने जिनका चित्त हर लिया है, वे गोपियाँ बलरामजीको कृष्ण और दामोदर कहकर सम्बोधन करने लगीं और फिर उच्चस्वरसे हँसने लगीं ॥ १९ ॥ तब बलभद्रजीने कृष्णचन्द्रका अति मनोहर और शान्तिमय, प्रेमगर्भित और गर्वहीन सन्देश सुनाकर गोपियोंको सान्त्वना दी ॥ २० ॥ तथा गोपोंके साथ हास्य करते हुए उन्होंने पहलेकी भाँति बहुत-सी मनोहर बातें कीं और उनके साथ व्रजभूमिमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते रहे ॥ २१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


पचीसवाँ अध्याय

बलभद्रजीका व्रज-विहार तथा यमुनाकर्षण

श्रीपराशर उवाच<br>वने विचरतस्तस्य सह गोपैर्महात्मनः।<br>मानुषच्छद्मरूपस्य शेषस्य धरणीधृतः ॥ १<br>निष्पादितोरुकार्यस्य कार्येणोर्वीप्रचारिणः।<br>उपभोगार्थमत्यर्थं वरुणः प्राह वारुणीम् ॥ २<br>अभीष्टा सर्वदा यस्य मदिरे त्वं महौजसः।<br>अनन्तस्योपभोगाय तस्य गच्छ मुदे शुभे ॥ ३<br>इत्युक्ता वारुणी तेन सन्निधानमथाकरोत्।<br>वृन्दावनसमुत्पन्नकदम्बतरुकोटरे ॥ ४श्रीपराशरजी बोले— अपने कार्योंसे पृथिवीको विचलित करनेवाले, बड़े विकट कार्य करनेवाले, धरणीधर शेषजीके अवतार माया-मानवरूप महात्मा बलरामजीको गोपोंके साथ वनमें विचरते देख उनके उपभोगके लिये वरुणने वारुणी (मदिरा)-से कहा— ॥ १-२ ॥ "हे मदिरे! जिन महाबलशाली अनन्तदेवको तुम सर्वदा प्रिय हो; हे शुभे! तुम उनके उपभोग और प्रसन्नताके लिये जाओ" ॥ ३ ॥ वरुणकी ऐसी आज्ञा होनेपर वारुणी वृन्दावनमें उत्पन्न हुए कदम्ब-वृक्षके कोटरमें रहने लगी ॥ ४ ॥