विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 396, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 396
अ० २५ ] * पञ्चम अंश * ३८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विचरन् बलदेवोऽपि मदिरागन्धमुत्तमम्।<br/>आघ्राय मदिरार्षमवापाथ वराननः॥ ५<br/>ततः कदम्बात्सहसा मद्यधारां स लाङ्गली।<br/>पतन्तीं वीक्ष्य मैत्रेय प्रययौ परमां मुदम्॥ ६<br/>पपौ च गोपगोपीभिस्समुपेतो मुदान्वितः।<br/>प्रगीयमानो ललितं गीतवाद्यविशारदैः॥ ७ | तब मनोहर मुखवाले बलदेवजीको वनमें विचरते हुए मदिराकी अति उत्तम गन्ध सूँघनेसे उसे पीनेकी इच्छा हुई॥५॥ हे मैत्रेय! उसी समय कदम्बसे मद्यकी धारा गिरती देख हलधारी बलरामजी बड़े प्रसन्न हुए॥६॥ तथा गाने-बजानेमें कुशल गोप और गोपियोंके मधुर स्वरसे गाते हुए उन्होंने उनके साथ प्रसन्नतापूर्वक मद्यपान किया॥७॥ |
| स मत्तोऽत्यन्तघर्माम्भः कणिकामौक्तिकोज्ज्वलः।<br/>आगच्छ यमुने स्नातुमिच्छामीत्याह विह्वलः॥ ८<br/>तस्य वाचं नदी सा तु मत्तोक्तामवमत्य वै।<br/>नाजगाम ततः क्रुद्धो हलं जग्राह लाङ्गली॥ ९<br/>गृहीत्वा तां हलान्तेन चकर्ष मदविह्वलः।<br/>पापे नायासि नायासि गम्यतामिच्छयान्यतः॥ १०<br/>साकृष्टा सहसा तेन मार्गं सन्त्यज्य निम्नगा।<br/>यत्रास्ते बलभद्रोऽसौ प्लावयामास तद्वनम्॥ ११<br/>शरीरिणी तदाभ्येत्य त्रासविह्वललोचना।<br/>प्रसीदेत्यब्रवीद्रामं मुञ्च मां मुसलायुध॥ १२<br/>ततस्तस्याः सुवचनमाकर्ण्य स हलायुधः।<br/>सोऽब्रवीदवजानासि मम शौर्यंबले नदि।<br/>सोऽहं त्वां हलपातेन नयिष्यामि सहस्रधा॥ १३ | तदनन्तर अत्यन्त घामके कारण स्वेद-बिन्दुरूप मोतियोंसे सुशोभित मदोन्मत्त बलरामजीने विह्वल होकर कहा—"यमुने! आ, मैं स्नान करना चाहता हूँ"॥८॥ उनके वाक्यको उन्मत्तका प्रलाप समझकर यमुनाने उसपर कुछ भी ध्यान न दिया और वह वहाँ न आयी। इसपर हलधरने क्रोधित होकर अपना हल उठाया॥९॥ और मदसे विह्वल होकर यमुनाको हलकी नोकसे पकड़कर खींचते हुए कहा—"अरी पापिनि! तू नहीं आती थी! अच्छा अब [यदि शक्ति हो तो] इच्छानुसार अन्यत्र जा तो सही॥१०॥" इस प्रकार बलरामजीके खींचनेपर यमुनाने अकस्मात् अपना मार्ग छोड़ दिया और जिस वनमें बलरामजी खड़े थे उसे आप्लावित कर दिया॥११॥<br/>तब वह शरीर धारणकर बलरामजीके पास आयी और भयवश डबडबाती आँखोंसे कहने लगी—"हे मुसलायुध! आप प्रसन्न होइये और मुझे छोड़ दीजिये"॥१२॥ उसके उन मधुर वचनोंको सुनकर हलायुध बलभद्रजीने कहा—"अरी नदि! क्या तू मेरे बल-वीर्यकी अवज्ञा करती है? देख, इस हलसे मैं अभी तेरे हजारों टुकड़े कर डालूँगा"॥१३॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br/>इत्युक्त्यातिसन्त्रान्तात्तया नद्या प्रसादितः।<br/>भूभागे प्लाविते तस्मिन्मुमोच यमुनां बलः॥ १४<br/>ततस्नातस्य वै कान्तिरजायत महात्मनः॥ १५<br/>अवतंसोत्पलं चारु गृहीत्वैकं च कुण्डलम्।<br/>वरुणप्रहितां चास्मै मालाम्लानपङ्कजाम्।<br/>समुद्राभे तथा वस्त्रे नीले लक्ष्मीरयच्छत॥ १६<br/>कृतावतंसस्स तदा चारुकुण्डलभूषितः।<br/>नीलाम्बरधरस्रग्वी शुशुभे कान्तिसंयुतः॥ १७<br/>इत्थं विभूषितो रेमे तत्र रामस्तथा व्रजे।<br/>मासद्वयेन यातश्च स पुनर्द्वारकां पुरीम्॥ १८<br/>रेवतीं नाम तनयां रैवतस्य महीपतेः।<br/>उपयेमे बलस्तस्यां जज्ञाते निशठोल्मुकौ॥ १९ | श्रीपराशरजी बोले—बलरामजीद्वारा इस प्रकार कही जानेसे भयभीत हुई यमुनाके उस भू-भागमें बहने लगनेपर उन्होंने प्रसन्न होकर उसे छोड़ दिया॥१४॥ उस समय स्नान करनेपर महात्मा बलरामजीकी अत्यन्त शोभा हुई। तब लक्ष्मीजीने [सशरीर प्रकट होकर] उन्हें एक सुन्दर कर्णफूल, एक कुण्डल, एक वरुणकी भेजी हुई कभी न कुम्हलानेवाले कमल-पुष्पोंकी माला और दो समुद्रके समान कान्तिवाले नीलवर्ण वस्त्र दिये॥१५-१६॥ उन कर्णफूल, सुन्दर कुण्डल, नीलाम्बर और पुष्प-मालाको धारणकर श्रीबलरामजी अतिशय कान्तियुक्त हो सुशोभित होने लगे॥१७॥ इस प्रकार विभूषित होकर श्रीबलभद्रजीने व्रजमें अनेकों लीलाएँ कीं और फिर दो मास पश्चात् द्वारकापुरीको चले आये॥१८॥ वहाँ आकर बलदेवजीने राजा रैवतकी पुत्री रेवतीसे विवाह किया; उससे उनके निशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए॥१९॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥