भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

अ० १६ ] * पञ्चम अंश * ३५७

सोलहवाँ अध्याय

केशि-वध

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय ! इधर कंसके दूतद्वारा भेजा हुआ महाबली केशी भी कृष्णचन्द्रके वधकी इच्छासे [घोड़ेका रूप धारण कर] वृन्दावनमें आया ॥ १ ॥ वह अपने खुरोंसे पृथ्वीतलको खोदता, ग्रीवाके बालोंसे बादलोंको छिन्न-भिन्न करता तथा वेगसे चन्द्रमा और सूर्यके मार्गको भी पार करता गोपोंकी ओर दौड़ा ॥ २ ॥ उस अश्वरूप दैत्यके हिनहिनानेके शब्दसे भयभीत होकर समस्त गोप और गोपियाँ श्रीगोविन्दकी शरणमें आये ॥ ३ ॥ तब उनके त्राहि-त्राहि शब्दको सुनकर भगवान् कृष्णचन्द्र सजल मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर वाणीसे बोले— ॥ ४ ॥ “हे गोपालगण ! आपलोग केशी (केशधारी अश्व)-से न डरें, आप तो गोप-जातिके हैं, फिर इस प्रकार भयभीत होकर आप अपने वीरोचित पुरुषार्थका लोप क्यों करते हैं? ॥ ५ ॥ यह अल्पवीर्य, हिनहिनानेसे आतंक फैलानेवाला और नाचनेवाला दुष्ट अश्व जिसपर राक्षसगण बलपूर्वक चढ़ा करते हैं, आपलोगोंका क्या बिगाड़ सकता है?” ॥ ६ ॥
केशी चापि बलोदग्रः कंसदूतप्रचोदितः ।<br>कृष्णस्य निधनाकाङ्क्षी वृन्दावनमुपागमत् ॥ १<br>स खुरक्षतभूपृष्ठस्सटाक्षेपधुताम्बुदः ।<br>द्रुतविक्रान्तचन्द्रार्कमार्गो गोपानुपाद्रवत् ॥ २<br>तस्य हेषितशब्देन गोपाला दैत्यवाजिनः ।<br>गोप्यश्च भयसंविग्ना गोविन्दं शरणं ययुः ॥ ३<br>त्राहि त्राहीति गोविन्दः श्रुत्वा तेषां ततो वचः ।<br>सतोयजलदध्वानगम्भीरमिदमुक्तवान् ॥ ४<br>अलं त्रासेन गोपालाः केशिनः किं भयातुरैः ।<br>भवद्भिर्गोपजातीयैर्वीरवीर्यं विलोप्यते ॥ ५<br>किमनेनाल्पसारेण हेषिताटोपकारिणा ।<br>दैतेयबलवाह्येन वल्गता दुष्टवाजिना ॥ ६
एह्येहि दुष्ट कृष्णोऽहं पूष्णस्तिव्व पिनाकधृक् ।<br>पातयिष्यामि दशनान्वदनादखिलांस्तव ॥ ७<br>इत्युक्त्वास्फोट्य गोविन्दः केशिनस्समुखं ययौ ।<br>विवृतास्यश्च सोऽप्येनं दैतेयाश्व उपाद्रवत् ॥ ८<br>बाहुमाभोगिनं कृत्वा मुखे तस्य जनार्दनः ।<br>प्रवेशयामास तदा केशिनो दुष्टवाजिनः ॥ ९<br>केशिनो वदने तेन विशता कृष्णबाहुना ।<br>शातिता दशनाः पेतुः सिताभ्रावयवा इव ॥ १०<br>कृष्णस्य ववृधे बाहुः केशिदेहगतो द्विज ।<br>विनाशाय यथा व्याधिरासम्भूतैरुपेक्षितः ॥ ११<br>विपाटितोष्ठो बहुलं सफेनं रुधिरं वमन् ।<br>सोऽक्षिणी विवृते चक्रे विशिष्टे मुक्तबन्धने ॥ १२<br>जघान धरणीं पादैश्शकृन्मूत्रं समुत्सृजन् ।<br>स्वेदार्द्रगात्रश्शान्तश्च निर्यत्नस्सोऽभवत्तदा ॥ १३[इस प्रकार गोपोंको धैर्य बाँधकर वे केशीसे कहने लगे—] “अरे दुष्ट ! इधर आ, पिनाकधारी वीरभद्रने जिस प्रकार पूषाके दाँत उखाड़े थे, उसी प्रकार मैं कृष्ण तेरे मुखसे सारे दाँत गिरा दूँगा” ॥ ७ ॥ ऐसा कहकर श्रीगोविन्द उछलकर केशीके सामने आये और वह अश्वरूपधारी दैत्य भी मुँह खोलकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ८ ॥ तब जनार्दनने अपनी बाँह फैलाकर उस अश्वरूपधारी दुष्ट दैत्यके मुखमें डाल दी ॥ ९ ॥ केशीके मुखमें घुसी हुई भगवान् कृष्णकी बाहुसे टकराकर उसके समस्त दाँत शुभ्र मेघखण्डोंके समान टूटकर बाहर गिर पड़े ॥ १० ॥<br><br>हे द्विज! उत्पत्तिके समयसे ही उपेक्षा की गयी व्याधि जिस प्रकार नाश करनेके लिये बढ़ने लगती है, उसी प्रकार केशीके देहमें प्रविष्ट हुई कृष्णचन्द्रकी भुजा बढ़ने लगी ॥ ११ ॥ अन्तमें ओठोंके फट जानेसे वह फेनसहित रुधिर वमन करने लगा और उसकी आँखें स्नायुबन्धनके ढीले हो जानेसे फूट गयीं ॥ १२ ॥ तब वह मल-मूत्र छोड़ता हुआ पृथ्वीपर पैर पटकने लगा, उसका शरीर पसीनेसे भरकर ठण्डा पड़ गया और वह निश्चेष्ट हो गया ॥ १३ ॥