भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 367, कुल 558 में से

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पृष्ठ 367

३५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


कंस उवाचकंस बोला—हे दानपते! मेरी प्रसन्नताके लिये आप मेरी एक बात स्वीकार कर लीजिये। यहाँसे रथपर चढ़कर आप नन्दके गोकुलको जाइये॥ १३॥ वहाँ वसुदेवके विष्णुअंशसे उत्पन्न दो पुत्र हैं। मेरे नाशके लिये उत्पन्न हुए वे दुष्ट बालक वहाँ पोषित हो रहे हैं॥ १४॥ मेरे यहाँ चतुर्दशीको धनुषयज्ञ होनेवाला है; अतः आप वहाँ जाकर उन्हें मल्लयुद्धके लिये ले आइये॥ १५॥ मेरे चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल युग्म-युद्धमें अति कुशल हैं, [उस धनुर्यज्ञके दिन] उन दोनोंके साथ मेरे इन पहलवानोंका द्वन्द्वयुद्ध यहाँ सब लोग देखें॥ १६॥ अथवा महावतसे प्रेरित हुआ कुवलयापीड नामक गजराज उन दोनों दुष्ट वसुदेव-पुत्र बालकोंको नष्ट कर देगा॥ १७॥ इस प्रकार उन्हें मारकर मैं दुर्मति वसुदेव, नन्दगोप और इस अपने मन्दमति पिता उग्रसेनको भी मार डालूँगा॥ १८॥ तदनन्तर, मेरे वधकी इच्छावाले इन समस्त दुष्ट गोपोंके सम्पूर्ण गोधन तथा धनको मैं छीन लूँगा॥ १९॥ हे दानपते! आपके अतिरिक्त ये सभी यादवगण मुझसे द्वेष करते हैं, अतः मैं क्रमशः इन सभीको नष्ट करनेका प्रयत्न करूँगा॥ २०॥ फिर मैं आपके साथ मिलकर इस यादवहीन राज्यको निर्विघ्नतापूर्वक भोगूँगा, अतः हे वीर! मेरी प्रसन्नताके लिये आप शीघ्र ही जाइये॥ २१॥ आप गोकुलमें पहुँचकर गोपगणोंसे इस प्रकार कहें जिससे वे माहिष्य (भैंसके) घृत और दधि आदि उपहारोंके सहित शीघ्र ही यहाँ आ जायँ॥ २२॥
भो भो दानपते वाक्यं क्रियतां प्रीतये मम।<br>इतः स्यन्दनमारुह्य गम्यतां नन्दगोकुलम्॥ १३<br>वसुदेवसुतौ तत्र विष्णोरंशसमुद्भवौ।<br>नाशाय किल सम्भूतौ मम दुष्टौ प्रवर्द्धतः॥ १४<br>धनुर्महो ममाप्यत्र चतुर्दश्यां भविष्यति।<br>आनेयौ भवता गत्वा मल्लयुद्धाय तत्र तौ॥ १५<br>चाणूरमुष्टिकौ मल्लौ नियुद्धकुशलौ मम।<br>ताभ्यां सहानयोर्युद्धं सर्वलोकोऽत्र पश्यतु॥ १६<br>गजः कुवलयापीडो महामात्रप्रचोदितः।<br>स वा हनिष्यते पापौ वसुदेवात्मजौ शिशू॥ १७<br>तौ हत्वा वसुदेवं च नन्दगोपं च दुर्मतिम्।<br>हनिष्ये पितरं चैनमुग्रसेनं सुदुर्मतिम्॥ १८<br>ततस्समस्तगोपानां गोधनान्यखिलान्यहम्।<br>वित्तं चापहरिष्यामि दुष्टानां मद्बधैषिणाम्॥ १९<br>त्वामृते यादवाश्चैते द्विषो दानपते मम।<br>एतेषां च वधायाहं यतिष्येऽनुक्रमात्ततः॥ २०<br>तदा निष्कण्टकं सर्वं राज्यमेतदयादवम्।<br>प्रसाधिष्ये त्वया तस्मान्मत्प्रीतयै वीर गम्यताम्॥ २१<br>यथा च माहिषं सर्पिर्दधि चाप्युपहार्य वै।<br>गोपास्समानयन्त्वाशु तथा वाच्यास्त्वया च ते॥ २२
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—हे द्विज! कंससे ऐसी आज्ञा पा महाभागवत अक्रूरजी 'कल मैं शीघ्र ही श्रीकृष्णचन्द्रको देखूँगा'—यह सोचकर अति प्रसन्न हुए॥ २३॥ माधव-प्रिय अक्रूरजी राजा कंससे 'जो आज्ञा' कह एक अति सुन्दर रथपर चढ़े और मथुरापुरीसे बाहर निकल आये॥ २४॥
इत्याज्ञप्तस्तदाक्रूरो महाभागवतो द्विज।<br>प्रीतिमानभवत्कृष्णं श्वो द्रक्ष्यामीति सत्वरः॥ २३<br>तथेत्युक्त्वा च राजानं रथमारुह्य शोभनम्।<br>निश्चक्राम ततः पुर्या मथुराया मधुप्रियः॥ २४

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥

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