भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३४६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ११

ततस्तद्गोकुलं सर्वं गोगोपीगोपसङ्कुलम्।
अतीवार्त्तं हरिर्दृष्ट्वा मैत्रेयाचिन्तयत्तदा॥ १३

एतत्कृतं महेन्द्रेण मखभंगविरोधिना।
तदेतदखिलं गोष्ठं त्रातव्यमधुना मया॥ १४

इममद्रिमहं धैर्यादुत्पाट्योरुशिलाघनम्।
धारयिष्यामि गोष्ठस्य पृथुच्छत्रमिवोपरि॥ १५

श्रीपराशर उवाच
इति कृत्वा मतिं कृष्णो गोवर्धनमहीधरम्।
उत्पाट्यैककरेणैव धारयामास लीलया॥ १६

गोपांश्चाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधरः।
विशध्वमत्र त्वरिताः कृतं वर्षनिवारणम्॥ १७

सुनिवातेषु देशेषु यथा जोषमिहास्यताम्।
प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच्च निर्भयैः॥ १८

इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्गोधनैस्सह।
शकटारोपितैर्भाण्डैर्गोप्यश्चासारपीडिताः॥ १९

कृष्णोऽपि तं दधारैव शैलमत्यन्तनिश्चलम्।
व्रजैकवासिभिर्हर्षविस्मिताक्षैर्निरीक्षितः॥ २०

गोपगोपीजनैर्हृष्टैः प्रीतिविस्तारितेक्षणैः।
संस्तूयमानचरितः कृष्णश्शैलमधारयत्॥ २१

सप्तरात्रं महामेघा ववर्षुर्नन्दगोकुले।
इन्द्रेण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा॥ २२

ततो धृते महाशैले परित्राते च गोकुले।
मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्घनान्॥ २३

व्यभ्रे नभसि देवेन्द्रे वितथात्मवचस्यथ।
निष्क्रम्य गोकुलं हृष्टं स्वस्थानं पुनरागमत्॥ २४

मुमोच कृष्णोऽपि तदा गोवर्धनमहाचलम्।
स्वस्थाने विस्मितमुखैर्दृष्टस्तैस्तु व्रजौकसैः॥ २५

हे मैत्रेय! उस समय गो, गोपी और गोपगणके सहित सम्पूर्ण गोकुलको अत्यन्त व्याकुल देखकर श्रीहरिने विचारा॥ १३॥ यज्ञ-भंगके कारण विरोध मानकर यह सब करतूत इन्द्र ही कर रहा है; अतः अब मुझे सम्पूर्ण व्रजकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ अब मैं धैर्यपूर्वक बड़ी-बड़ी शिलाओंसे घनीभूत इस पर्वतको उखाड़कर इसे एक बड़े छत्रके समान व्रजके ऊपर धारण करूँगा॥ १५॥

**श्रीपराशरजी बोले—**श्रीकृष्णचन्द्रने ऐसा विचारकर गोवर्धनपर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलासे ही अपने एक हाथपर उठा लिया॥ १६॥ पर्वतको उखाड़ लेनेपर शूरनन्दन श्रीश्यामसुन्दरने गोपोंसे हँसकर कहा—
"आओ, शीघ्र ही इस पर्वतके नीचे आ जाओ, मैंने वर्षासे बचनेका प्रबन्ध कर दिया है॥ १७॥ यहाँ वायुहीन स्थानोंमें आकर सुखपूर्वक बैठ जाओ; निर्भय होकर प्रवेश करो, पर्वतके गिरने आदिका भय मत करो"॥ १८॥

श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जलकी धाराओंसे पीडित गोप और गोपी अपने बर्तन-भाँड़ोंको छकड़ोंमें रखकर गौओंके साथ पर्वतके नीचे चले गये॥ १९॥ व्रज वासियोंद्वारा हर्ष और विस्मयपूर्वक टकटकी लगाकर देखे जाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र भी गिरिराजको अत्यन्त निश्चलतापूर्वक धारण किये रहे॥ २०॥ जो प्रीतिपूर्वक आँखें फाड़कर देख रहे थे उन हर्षितचित्त गोप और गोपियोंसे अपने चरितोंका स्तवन होते हुए श्रीकृष्णचन्द्र पर्वतको धारण किये रहे॥ २१॥

हे विप्र! गोपोंके नाशकर्ता इन्द्रकी प्रेरणासे नन्दजीके गोकुलमें सात रात्रितक महाभयंकर मेघ बरसते रहे॥ २२॥ किंतु जब श्रीकृष्णचन्द्रने पर्वत धारणकर गोकुलकी रक्षा की तो अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ हो जानेसे इन्द्रने मेघोंको रोक दिया॥ २३॥ आकाशके मेघहीन हो जानेसे इन्द्रकी प्रतिज्ञा भंग हो जानेपर समस्त गोकुलवासी वहाँसे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक फिर अपने-अपने स्थानोंपर आ गये॥ २४॥ और कृष्णचन्द्रने भी उन व्रजवासियोंके विस्मयपूर्वक देखते-देखते गिरिराज गोवर्धनको अपने स्थानपर रख दिया॥ २५॥


इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥