विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ११] * पञ्चम अंश * ३४५
ग्यारहवाँ अध्याय
इन्द्रका कोप और श्रीकृष्णका गोवर्धन-धारण
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! अपने यज्ञके रुक जानेसे इन्द्रने अत्यन्त रोषपूर्वक संवर्तक नामक मेघोंके दलसे इस प्रकार कहा—॥ १॥ “अरे मेघो! मेरा यह वचन सुनो और मैं जो कुछ कहूँ उसे मेरी आज्ञा सुनते ही, बिना कुछ सोचे-विचारे तुरन्त पूरा करो॥ २॥ देखो अन्य गोपोंके सहित दुर्बुद्धि नन्दगोपने कृष्णकी सहायताके बलसे अन्धा होकर मेरा यज्ञ भंग कर दिया है॥ ३॥ अतः जो उनकी परम जीविका और उनके गोपत्वका कारण है, उन गौओंको तुम मेरी आज्ञासे वर्षा और वायुके द्वारा पीडित कर दो॥ ४॥ मैं भी पर्वत शिखरके समान अत्यन्त ऊँचे अपने ऐरावत हाथीपर चढ़कर वायु और जल छोड़नेके समय तुम्हारी सहायता करूँगा”॥ ५॥ |
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| मखे प्रतिहते शक्रो मैत्रेयातिरुषान्वितः।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत्॥ १ | |
| भो भो मेघा निशम्यैतद्वचनं गदतो मम।<br>आज्ञानन्तरमेवाशु क्रियतामविचारितम्॥ २ | |
| नन्दगोपस्सुदुर्बुद्धिर्गोपैरन्यैस्सहायवान्।<br>कृष्णाश्रयबलाध्मातो मखभङ्गमचीकरत्॥ ३ | |
| आजीवो याः परस्तेषां गावस्तस्य च कारणम्।<br>ता गावो वृष्टिवातेन पीड्यन्तां वचनान्मम॥ ४ | |
| अहमप्यद्रिशृङ्गाभं तुङ्गमारुह्य वारणम्।<br>साहाय्यं वः करिष्यामि वाय्वम्बूत्सर्गयोजितम्॥ ५ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! इन्द्रकी ऐसी आज्ञा होनेपर गौओंको नष्ट करनेके लिये मेघोंने अति प्रचण्ड वायु और वर्षा छोड़ दी॥ ६॥ हे मुने! उस समय एक क्षणमें ही मेघोंकी छोड़ी हुई महान् जलधाराओंसे पृथिवी, दिशाएँ और आकाश एकरूप हो गये॥ ७॥ मेघगण मानो विद्युल्लतारूप दण्डाघातसे भयभीत होकर महान् शब्दसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए मूसलाधार पानी बरसाने लगे॥ ८॥ इस प्रकार मेघोंके अहर्निश बरसनेसे संसारके अन्धकारपूर्ण हो जानेपर ऊपर-नीचे और सब ओरसे समस्त लोक जलमय-सा हो गया॥ ९॥ |
| इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन मुमुचुस्ते बलाहकाः।<br>वातवर्षं महाभीममभावाय गवां द्विज॥ ६ | |
| ततः क्षणेन पृथिवी ककुभोऽम्बरमेव च।<br>एकं धारामहासारपूरणेनाभवन्मुने॥ ७ | |
| विद्युल्लताकशाघातत्रस्तैरिव घनैर्घनम्।<br>नादापूरितदिक्चक्रैर्धारासारमपात्यत॥ ८ | |
| अन्धकारीकृते लोके वर्षद्भिरनिशं घनैः।<br>अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च जगदाप्यमिवाभवत्॥ ९ | |
| गावस्तु तेन पतता वर्षवातेन वेगिना।<br>धूताः प्राणाञ्जहुस्सन्नत्रिकसक्थिशिरोधराः॥ १० | वर्षा और वायुके वेगपूर्वक चलते रहनेसे गौओंके कटि, जंघा और ग्रीवा आदि सुन्न हो गये और काँपते-काँपते अपने प्राण छोड़ने लगीं [अर्थात् मूर्च्छित हो गयीं]॥ १०॥ हे महामुने! कोई गौएँ तो अपने बछड़ोंको अपने नीचे छिपाये खड़ी रहीं और कोई जलके वेगसे वत्सहीना हो गयीं॥ ११॥ वायुसे काँपते हुए दीनवदन बछड़े मानो व्याकुल होकर मन्द-स्वरसे कृष्णचन्द्रसे 'रक्षा करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगे॥ १२॥ |
| क्रोडेन वत्सानाक्रम्य तस्थुरन्या महामुने।<br>गावो विवत्साश्च कृता वारिपूरेण चापराः॥ ११ | |
| वत्साश्च दीनवदना वातकम्पितकन्धराः।<br>त्राहि त्राहीत्यल्पशब्दाः कृष्णमूचुरिवातुराः॥ १२ |