विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ११] * पञ्चम अंश * ३४५
ग्यारहवाँ अध्याय
इन्द्रका कोप और श्रीकृष्णका गोवर्धन-धारण
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! अपने यज्ञके रुक जानेसे इन्द्रने अत्यन्त रोषपूर्वक संवर्तक नामक मेघोंके दलसे इस प्रकार कहा—॥ १॥ “अरे मेघो! मेरा यह वचन सुनो और मैं जो कुछ कहूँ उसे मेरी आज्ञा सुनते ही, बिना कुछ सोचे-विचारे तुरन्त पूरा करो॥ २॥ देखो अन्य गोपोंके सहित दुर्बुद्धि नन्दगोपने कृष्णकी सहायताके बलसे अन्धा होकर मेरा यज्ञ भंग कर दिया है॥ ३॥ अतः जो उनकी परम जीविका और उनके गोपत्वका कारण है, उन गौओंको तुम मेरी आज्ञासे वर्षा और वायुके द्वारा पीडित कर दो॥ ४॥ मैं भी पर्वत शिखरके समान अत्यन्त ऊँचे अपने ऐरावत हाथीपर चढ़कर वायु और जल छोड़नेके समय तुम्हारी सहायता करूँगा”॥ ५॥ |
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| मखे प्रतिहते शक्रो मैत्रेयातिरुषान्वितः।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत्॥ १ | |
| भो भो मेघा निशम्यैतद्वचनं गदतो मम।<br>आज्ञानन्तरमेवाशु क्रियतामविचारितम्॥ २ | |
| नन्दगोपस्सुदुर्बुद्धिर्गोपैरन्यैस्सहायवान्।<br>कृष्णाश्रयबलाध्मातो मखभङ्गमचीकरत्॥ ३ | |
| आजीवो याः परस्तेषां गावस्तस्य च कारणम्।<br>ता गावो वृष्टिवातेन पीड्यन्तां वचनान्मम॥ ४ | |
| अहमप्यद्रिशृङ्गाभं तुङ्गमारुह्य वारणम्।<br>साहाय्यं वः करिष्यामि वाय्वम्बूत्सर्गयोजितम्॥ ५ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! इन्द्रकी ऐसी आज्ञा होनेपर गौओंको नष्ट करनेके लिये मेघोंने अति प्रचण्ड वायु और वर्षा छोड़ दी॥ ६॥ हे मुने! उस समय एक क्षणमें ही मेघोंकी छोड़ी हुई महान् जलधाराओंसे पृथिवी, दिशाएँ और आकाश एकरूप हो गये॥ ७॥ मेघगण मानो विद्युल्लतारूप दण्डाघातसे भयभीत होकर महान् शब्दसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए मूसलाधार पानी बरसाने लगे॥ ८॥ इस प्रकार मेघोंके अहर्निश बरसनेसे संसारके अन्धकारपूर्ण हो जानेपर ऊपर-नीचे और सब ओरसे समस्त लोक जलमय-सा हो गया॥ ९॥ |
| इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन मुमुचुस्ते बलाहकाः।<br>वातवर्षं महाभीममभावाय गवां द्विज॥ ६ | |
| ततः क्षणेन पृथिवी ककुभोऽम्बरमेव च।<br>एकं धारामहासारपूरणेनाभवन्मुने॥ ७ | |
| विद्युल्लताकशाघातत्रस्तैरिव घनैर्घनम्।<br>नादापूरितदिक्चक्रैर्धारासारमपात्यत॥ ८ | |
| अन्धकारीकृते लोके वर्षद्भिरनिशं घनैः।<br>अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च जगदाप्यमिवाभवत्॥ ९ | |
| गावस्तु तेन पतता वर्षवातेन वेगिना।<br>धूताः प्राणाञ्जहुस्सन्नत्रिकसक्थिशिरोधराः॥ १० | वर्षा और वायुके वेगपूर्वक चलते रहनेसे गौओंके कटि, जंघा और ग्रीवा आदि सुन्न हो गये और काँपते-काँपते अपने प्राण छोड़ने लगीं [अर्थात् मूर्च्छित हो गयीं]॥ १०॥ हे महामुने! कोई गौएँ तो अपने बछड़ोंको अपने नीचे छिपाये खड़ी रहीं और कोई जलके वेगसे वत्सहीना हो गयीं॥ ११॥ वायुसे काँपते हुए दीनवदन बछड़े मानो व्याकुल होकर मन्द-स्वरसे कृष्णचन्द्रसे 'रक्षा करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगे॥ १२॥ |
| क्रोडेन वत्सानाक्रम्य तस्थुरन्या महामुने।<br>गावो विवत्साश्च कृता वारिपूरेण चापराः॥ ११ | |
| वत्साश्च दीनवदना वातकम्पितकन्धराः।<br>त्राहि त्राहीत्यल्पशब्दाः कृष्णमूचुरिवातुराः॥ १२ |
| ३४६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ११ |
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ततस्तद्गोकुलं सर्वं गोगोपीगोपसङ्कुलम्।
अतीवार्त्तं हरिर्दृष्ट्वा मैत्रेयाचिन्तयत्तदा॥ १३
एतत्कृतं महेन्द्रेण मखभंगविरोधिना।
तदेतदखिलं गोष्ठं त्रातव्यमधुना मया॥ १४
इममद्रिमहं धैर्यादुत्पाट्योरुशिलाघनम्।
धारयिष्यामि गोष्ठस्य पृथुच्छत्रमिवोपरि॥ १५
श्रीपराशर उवाच
इति कृत्वा मतिं कृष्णो गोवर्धनमहीधरम्।
उत्पाट्यैककरेणैव धारयामास लीलया॥ १६
गोपांश्चाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधरः।
विशध्वमत्र त्वरिताः कृतं वर्षनिवारणम्॥ १७
सुनिवातेषु देशेषु यथा जोषमिहास्यताम्।
प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच्च निर्भयैः॥ १८
इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्गोधनैस्सह।
शकटारोपितैर्भाण्डैर्गोप्यश्चासारपीडिताः॥ १९
कृष्णोऽपि तं दधारैव शैलमत्यन्तनिश्चलम्।
व्रजैकवासिभिर्हर्षविस्मिताक्षैर्निरीक्षितः॥ २०
गोपगोपीजनैर्हृष्टैः प्रीतिविस्तारितेक्षणैः।
संस्तूयमानचरितः कृष्णश्शैलमधारयत्॥ २१
सप्तरात्रं महामेघा ववर्षुर्नन्दगोकुले।
इन्द्रेण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा॥ २२
ततो धृते महाशैले परित्राते च गोकुले।
मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्घनान्॥ २३
व्यभ्रे नभसि देवेन्द्रे वितथात्मवचस्यथ।
निष्क्रम्य गोकुलं हृष्टं स्वस्थानं पुनरागमत्॥ २४
मुमोच कृष्णोऽपि तदा गोवर्धनमहाचलम्।
स्वस्थाने विस्मितमुखैर्दृष्टस्तैस्तु व्रजौकसैः॥ २५
हे मैत्रेय! उस समय गो, गोपी और गोपगणके सहित सम्पूर्ण गोकुलको अत्यन्त व्याकुल देखकर श्रीहरिने विचारा॥ १३॥ यज्ञ-भंगके कारण विरोध मानकर यह सब करतूत इन्द्र ही कर रहा है; अतः अब मुझे सम्पूर्ण व्रजकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ अब मैं धैर्यपूर्वक बड़ी-बड़ी शिलाओंसे घनीभूत इस पर्वतको उखाड़कर इसे एक बड़े छत्रके समान व्रजके ऊपर धारण करूँगा॥ १५॥
**श्रीपराशरजी बोले—**श्रीकृष्णचन्द्रने ऐसा विचारकर गोवर्धनपर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलासे ही अपने एक हाथपर उठा लिया॥ १६॥ पर्वतको उखाड़ लेनेपर शूरनन्दन श्रीश्यामसुन्दरने गोपोंसे हँसकर कहा—
"आओ, शीघ्र ही इस पर्वतके नीचे आ जाओ, मैंने वर्षासे बचनेका प्रबन्ध कर दिया है॥ १७॥ यहाँ वायुहीन स्थानोंमें आकर सुखपूर्वक बैठ जाओ; निर्भय होकर प्रवेश करो, पर्वतके गिरने आदिका भय मत करो"॥ १८॥
श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जलकी धाराओंसे पीडित गोप और गोपी अपने बर्तन-भाँड़ोंको छकड़ोंमें रखकर गौओंके साथ पर्वतके नीचे चले गये॥ १९॥ व्रज वासियोंद्वारा हर्ष और विस्मयपूर्वक टकटकी लगाकर देखे जाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र भी गिरिराजको अत्यन्त निश्चलतापूर्वक धारण किये रहे॥ २०॥ जो प्रीतिपूर्वक आँखें फाड़कर देख रहे थे उन हर्षितचित्त गोप और गोपियोंसे अपने चरितोंका स्तवन होते हुए श्रीकृष्णचन्द्र पर्वतको धारण किये रहे॥ २१॥
हे विप्र! गोपोंके नाशकर्ता इन्द्रकी प्रेरणासे नन्दजीके गोकुलमें सात रात्रितक महाभयंकर मेघ बरसते रहे॥ २२॥ किंतु जब श्रीकृष्णचन्द्रने पर्वत धारणकर गोकुलकी रक्षा की तो अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ हो जानेसे इन्द्रने मेघोंको रोक दिया॥ २३॥ आकाशके मेघहीन हो जानेसे इन्द्रकी प्रतिज्ञा भंग हो जानेपर समस्त गोकुलवासी वहाँसे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक फिर अपने-अपने स्थानोंपर आ गये॥ २४॥ और कृष्णचन्द्रने भी उन व्रजवासियोंके विस्मयपूर्वक देखते-देखते गिरिराज गोवर्धनको अपने स्थानपर रख दिया॥ २५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥
अ० १२] * पञ्चम अंश * ३४७
बारहवाँ अध्याय
शक्र-कृष्ण-संवाद, कृष्ण-स्तुति
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोवर्धनपर्वतका धारण और गोकुलकी रक्षा हो जानेपर देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन करनेकी इच्छा हुई॥ १॥ अतः शत्रुजित् देवराज गजराज ऐरावतपर चढ़कर गोवर्धनपर्वतपर आये और वहाँ सम्पूर्ण जगत्के रक्षक गोपवेषधारी महाबलवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते देखा॥ २-३॥ हे द्विज! उन्होंने यह भी देखा कि पक्षिश्रेष्ठ गरुड अदृश्यभावसे उनके ऊपर रहकर अपने पंखोंसे उनकी छाया कर रहे हैं॥ ४॥ तब वे ऐरावतसे उतर पड़े और एकान्तमें श्रीमधुसूदनकी ओर प्रीतिपूर्वक दृष्टि फैलाते हुए मुसकाकर बोले॥ ५॥ |
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| धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले।<br>रोचयामास कृष्णस्य दर्शनं पाकशासनः॥ १<br>सोऽधिरुह्य महानागमैरावतममित्रजित्।<br>गोवर्धनगिरौ कृष्णं ददर्श त्रिदशेश्वरः॥ २<br>चारयन्तं महावीर्यं गास्तु गोपवपुर्धरम्।<br>कृत्स्नस्य जगतो गोपं वृतं गोपकुमारकैः॥ ३<br>गरुडं च ददर्शोच्चैरन्तर्द्धानगतं द्विज।<br>कृतच्छायं हरेर्मूर्ध्नि पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवम्॥ ४<br>अवरुह्य स नागेन्द्रादेकान्ते मधुसूदनम्।<br>शक्रस्सस्मितमाहेदं प्रीतिविस्तारितेक्षणः॥ ५ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्रने कहा— हे श्रीकृष्णचन्द्र! मैं जिसलिये आपके पास आया हूँ, वह सुनिये—हे महाबाहो! आप इसे अन्यथा न समझें॥ ६॥ हे अखिलाधार परमेश्वर! आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है॥ ७॥ यज्ञभंगसे विरोध मानकर ही मैंने गोकुलको नष्ट करनेके लिये महामेघोंको आज्ञा दी थी, उन्होंने यह संहार मचाया था॥ ८॥ किन्तु आपने पर्वतको उखाड़कर गौओंको बचा लिया। हे वीर! आपके इस अद्भुत कर्मसे मैं अति प्रसन्न हूँ॥ ९॥ |
|---|---|
| कृष्ण कृष्ण शृणुष्वेदं यदर्थमहमागतः।<br>त्वत्समीपं महाबाहो नैतच्चिन्त्यं त्वयान्यथा॥ ६<br>भारावतारणार्थाय पृथिव्याः पृथिवीतले।<br>अवतीर्णोऽखिलाधार त्वमेव परमेश्वर॥ ७<br>मखभंगविरोधेन मया गोकुलनाशकाः।<br>समादिष्टा महामेघास्तैश्चेदं कदनं कृतम्॥ ८ |
| हे कृष्ण! आपने जो अपने एक हाथपर गोवर्धन धारण किया है, इससे मैं देवताओंका प्रयोजन [आपके द्वारा] सिद्ध हुआ ही समझता हूँ॥ १०॥ [गोवंशकी रक्षाद्वारा] आपसे रक्षित [कामधेनु आदि] गौओंसे प्रेरित होकर ही मैं आपका विशेष सत्कार करनेके लिये यहाँ आपके पास आया हूँ॥ ११॥ हे कृष्ण! अब मैं गौओंके वक्यानुसार ही आपका उपेन्द्र-पदपर अभिषेक करूँगा तथा आप गौओंके इन्द्र (स्वामी) हैं इसलिये आपका नाम 'गोविन्द' भी होगा॥ १२॥ | |
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| त्रातास्ताश्च त्वया गावस्समुत्पाट्य महीधरम्।<br>तेनाहं तोषितो वीरकर्मणात्यद्भुतेन ते॥ ९<br>साधितं कृष्ण देवानामहं मन्ये प्रयोजनम्।<br>त्वयायमद्रिप्रवरः करेणैकेन यद्धृतः॥ १०<br>गोभिश्च चोदितः कृष्ण त्वत्सकाशमिहागतः।<br>त्वया त्राताभिरत्यर्थं युष्मत्सत्कारकारणात्॥ ११<br>स त्वां कृष्णाभिषेक्ष्यामि गवां वाक्यप्रचोदितः।<br>उपेन्द्रत्वे गवामिन्द्रो गोविन्दस्त्वं भविष्यसि॥ १२ |
३४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर इन्द्रने अपने वाहन गजराज ऐरावतका घण्टा लिया और उसमें पवित्र जल भरकर उससे कृष्णचन्द्रका अभिषेक किया॥ १३॥ श्रीकृष्णचन्द्रका अभिषेक होते समय गौओंने तुरन्त ही अपने स्तनोंसे टपकते हुए दुग्धसे पृथिवीको भिगो दिया॥ १४॥ |
| अथोपवाह्यादादाथ घण्टामैरावताद्गजात्।<br>अभिषेकं तया चक्रे पवित्रजलपूर्णया॥ १३ | |
| क्रियमाणेऽभिषेके तु गावः कृष्णस्य तत्क्षणात्।<br>प्रस्रवोद्भूतदुग्धाद्रां सद्यश्चक्रुर्वसुन्धराम्॥ १४ | |
| अभिषिच्य गवां वाक्यादुपेन्द्रं वै जनार्दनम्।<br>प्रीत्या सप्रश्रयं वाक्यं पुनराह शचीपतिः॥ १५ | इस प्रकार गौओंके कथनानुसार श्रीजनार्दनको उपेन्द्र-पदपर अभिषिक्त कर शचीपति इन्द्रने पुनः प्रीति और विनयपूर्वक कहा—॥ १५॥ “हे महाभाग! यह तो मैंने गौओंका वचन पूरा किया, अब पृथिवीके भार उतारनेकी इच्छासे मैं आपसे जो कुछ और निवेदन करता हूँ वह भी सुनिये॥ १६॥ हे पृथिवीधर! हे पुरुषसिंह! अर्जुन नामक मेरे अंशने पृथिवीपर अवतार लिया है; आप कृपा करके उसकी सर्वदा रक्षा करें॥ १७॥ हे मधुसूदन! वह वीर पृथिवीका भार उतारनेमें आपका साथ देगा, अतः आप उसकी अपने शरीरके समान ही रक्षा करें”॥ १८॥ |
| गवामेतत्कृतं वाक्यं तथान्यदपि मे शृणु।<br>यद्ब्रवीमि महाभाग भारावतरणेच्छया॥ १६ | |
| ममांशः पुरुषव्याघ्र पृथिव्यां पृथिवीधर।<br>अवतीर्णोऽर्जुनो नाम संरक्ष्यो भवता सदा॥ १७ | |
| भारावतरणे साह्यं स ते वीरः करिष्यति।<br>संरक्षणीयो भवता यथात्मा मधुसूदन॥ १८ | |
| श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान् बोले—**भरतवंशमें पृथाके पुत्र अर्जुनने तुम्हारे अंशसे अवतार लिया है—यह मैं जानता हूँ। मैं जबतक पृथिवीपर रहूँगा, उसकी रक्षा करूँगा॥ १९॥ हे शत्रुसूदन देवेन्द्र! मैं जबतक महीतलपर रहूँगा तबतक अर्जुनको युद्धमें कोई भी न जीत सकेगा॥ २०॥ हे देवेन्द्र! विशाल भुजाओंवाला कंस नामक दैत्य, अरिष्टासुर, केशी, कुवलयापीड और नरकासुर आदि अन्यान्य दैत्योंका नाश होनेपर यहाँ महाभारत-युद्ध होगा। हे सहस्राक्ष! उसी समय पृथिवीका भार उतरा हुआ समझना॥ २१-२२॥ अब तुम प्रसन्नतापूर्वक जाओ, अपने पुत्र अर्जुनके लिये तुम किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो; मेरे रहते हुए अर्जुनका कोई भी शत्रु सफल न हो सकेगा॥ २३॥ अर्जुनके लिये ही मैं महाभारतके अन्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंको अक्षत-शरीरसे कुन्तीको दूँगा॥ २४॥ |
| जानामि भारते वंशे जातं पार्थं तवांशतः।<br>तमहं पालयिष्यामि यावत्स्थास्यामि भूतले॥ १९ | |
| यावन्महीतले शक्र स्थास्याम्यहमरिन्दम।<br>न तावदर्जुनं कश्चिद्देवेन्द्र युधि जेष्यति॥ २० | |
| कंसो नाम महाबाहुर्दैत्योऽरिष्टस्तथासुरः।<br>केशी कुवलयापीडो नरकाद्यास्तथा परे॥ २१ | |
| हतेषु तेषु देवेन्द्र भविष्यति महाहवः।<br>तत्र विद्धि सहस्राक्ष भारावतरणं कृतम्॥ २२ | |
| स त्वं गच्छ न सन्तापं पुत्रार्थे कर्तुमर्हसि।<br>नार्जुनस्य रिपुः कश्चिन्ममाग्रे प्रबविष्यति॥ २३ | |
| अर्जुनार्थे त्वहं सर्वान्युधिष्ठिरपुरोगमान्।<br>निवृत्ते भारते युद्धे कुन्त्यै दास्याम्यविक्षतान्॥ २४ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्र उनका आलिंगन कर ऐरावत हाथीपर आरूढ हो स्वर्गको चले गये॥ २५॥ तदनन्तर कृष्णचन्द्र भी गोपियोंके दृष्टिपातसे पवित्र हुए मार्गद्वारा गोपकुमारों और गौओंके साथ व्रजको लौट आये॥ २६॥ |
| इत्युक्तः सम्परिष्वज्य देवराजो जनार्दनम्।<br>आरुह्यैरावतं नागं पुनरेव दिवं ययौ॥ २५ | |
| कृष्णो हि सहितो गोभिर्गोपालैश्च पुनर्व्रजम्।<br>आजगामाथ गोपीनां दृष्टिपूतेन वर्त्मना॥ २६ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अ० १३ ] * पञ्चम अंश * ३४९
तेरहवाँ अध्याय
गोपोंद्वारा भगवान्का प्रभाववर्णन तथा भगवान्का गोपियोंके साथ रासक्रीडा करना
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—इन्द्रके चले जानेपर लीलाविहारी श्रीकृष्णचन्द्रको बिना प्रयास ही गोवर्धन-पर्वत धारण करते देख गोपगण उनसे प्रीतिपूर्वक बोले—॥ १॥ हे भगवन्! हे महाभाग! आपने गिरिराजको धारण कर हमारी और गौओंकी इस महान् भयसे रक्षा की है॥ २॥ हे तात! कहाँ आपकी यह अनुपम बाललीला, कहाँ निन्दित गोपजाति और कहाँ ये दिव्य कर्म? यह सब क्या है, कृपया हमें बतलाइये॥ ३॥ आपने यमुनाजलमें कालियनागका दमन किया, धेनुकासुरको मारा और फिर यह गोवर्धनपर्वत धारण किया; आपके इन अद्भुत कर्मोंसे हमारे चित्तमें बड़ी शंका हो रही है॥ ४॥ हे अमितविक्रम! हम भगवान् हरिके चरणोंकी शपथ करके आपसे सच-सच कहते हैं कि आपके ऐसे बल-वीर्यको देखकर हम आपको मनुष्य नहीं मान सकते॥ ५॥ हे केशव! स्त्री और बालकोंके सहित सभी व्रजवासियोंकी आपपर अत्यन्त प्रीति है। आपका यह कर्म तो देवताओंके लिये भी दुष्कर है॥ ६॥ हे कृष्ण! आपकी यह बाल्यावस्था, विचित्र बल-वीर्य और हम-जैसे नीच पुरुषोंमें जन्म लेना—हे अमेयात्मन्! ये सब बातें विचार करनेपर हमें शंकामें डाल देती हैं॥ ७॥ आप देवता हों, दानव हों, यक्ष हों अथवा गन्धर्व हों; इन बातोंका विचार करनेसे हमें क्या प्रयोजन है? हमारे तो आप बन्धु ही हैं, अतः आपको नमस्कार है॥ ८॥ |
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| गते शक्रे तु गोपालाः कृष्णमक्लिष्टकारिणम्।<br>ऊचुः प्रीत्या धृतं दृष्ट्वा तेन गोवर्धनाचलम्॥ १ | |
| वयम्स्मान्महाभाग भगवन्महतो भयात्।<br>गावश्च भवता त्राता गिरिधारणकर्मणा॥ २ | |
| बालक्रीडेयमतुला गोपालत्वं जुगुप्सितम्।<br>दिव्यं च भवतः कर्म किमेतत्तात कथ्यताम्॥ ३ | |
| कालियो दमितस्तोये धेनुको विनिपातितः।<br>धृतो गोवर्धनश्चायं शङ्कितानि मनांसि नः॥ ४ | |
| सत्यं सत्यं हरेः पादौ शपामोऽमितविक्रम।<br>यथावद्वीर्यमालोक्य न त्वां मन्यामहे नरम्॥ ५ | |
| प्रीतिः सस्त्रीकुमारस्य व्रजस्य त्वयि केशव।<br>कर्म चेदमशक्यं यत्समस्तैस्त्रिदशैरपि॥ ६ | |
| बालत्वं चातिवीर्यत्वं जन्म चास्मास्वशोभनम्।<br>चिन्त्यमानममेयात्मञ्छङ्कां कृष्ण प्रयच्छति॥ ७ | |
| देवो वा दानवो वा त्वं यक्षो गन्धर्व एव वा।<br>किमस्माकं विचारेण बान्धवोऽसि नमोऽस्तु ते॥ ८ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—गोपगणके ऐसा कहनेपर महामति कृष्णचन्द्र कुछ देरतक चुप रहे और फिर कुछ प्रणयजन्य कोपपूर्वक इस प्रकार कहने लगे— ॥ ९॥ |
| क्षणं भूत्वा त्वसौ तूष्णीं किञ्चित्प्रणयकोपवान्।<br>इत्येवमुक्तस्तैर्गोपैः कृष्णोऽप्याह महामतिः॥ ९ | |
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा—हे गोपगण! यदि आपलोगोंको मेरे सम्बन्धसे किसी प्रकारकी लज्जा न हो तो मैं आपलोगोंसे प्रशंसनीय हूँ इस बातका विचार करनेकी भी क्या आवश्यकता है?॥ १०॥ यदि मुझमें आपकी प्रीति है और यदि मैं आपकी प्रशंसाका पात्र हूँ तो आपलोग मुझमें बान्धव-बुद्धि ही करें॥ ११॥ |
| मत्सम्बन्धेन वो गोपा यदि लज्जा न जायते।<br>श्लाघ्यो वाहं ततः किं वो विचारेण प्रयोजनम्॥ १० | |
| यदि वोऽस्ति मयि प्रीतिः श्लाघ्योऽहं भवतां यदि।<br>तदात्मबन्धुसदृशी बुद्धिर्वः क्रियतां मयि॥ ११ |
३५० * श्रीविष्णुपुराण * अ० १३ ]
नाहं देवो न गन्धर्वो न यक्षो न च दानवः।
अहं वो बान्धवो जातो नैतच्चिन्त्यमितोऽन्यथा॥ १२
श्रीपराशर उवाच
इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं बद्धमौनास्ततो वनम्।
ययुर्गोपा महाभाग तस्मिन्प्रणयकोपिनि॥ १३
कृष्णस्तु विमलं व्योम शरच्चन्द्रस्य चन्द्रिकाम्।
तदा कुमुदिनीं फुल्लामामोदितदिगन्तराम्॥ १४
वनराजिं तथा कूजद्भृङ्गमालाममनोहराम्।
विलोक्य सह गोपीभीर्मनश्चक्रे रतिं प्रति॥ १५
विना रामेण मधुरमतीव वनिताप्रियम्।
जगाै कलपदं शौरिस्तारमन्द्रकृतक्रमम्॥ १६
रम्यं गीतध्वनिं श्रुत्वा सन्त्यज्यावसथांस्तदा।
आजग्मुस्त्वरिता गोप्यो यत्रास्ते मधुसूदनः॥ १७
शनैश्शनैर्जगौ गोपी काचित्तस्य लयानुगम्।
दत्तावधाना काचिच्च तमेव मनसास्मरत्॥ १८
काचित्कृष्णेति कृष्णेति प्रोच्य लज्जामुपाययौ।
ययौ च काचित्प्रेमान्धा तत्पार्श्वमविलम्बितम्॥ १९
काचिच्चावसथस्यान्ते स्थित्वा दृष्ट्वा बहिर्गुरूम्।
तन्मयत्वेन गोविन्दं दध्यौ मीलितलोचना॥ २०
तच्चित्तविमलाह्लादक्षीणपुण्यचया तथा।
तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेषपातका ॥ २१
चिन्तयन्ती जगत्सूतिं परब्रह्मस्वरूपिणम्।
निरुच्छ्वासतया मुक्तिं गतान्या गोपकन्यका॥ २२
गोपीपरिवृतो रात्रिं शरच्चन्द्रमनोरमाम्।
मानयामास गोविन्दो रासारम्भरसोत्सुकः॥ २३
गोप्यश्च वृन्दशः कृष्णचेष्टास्वायत्त मूर्तयः।
अन्यदेशं गते कृष्णे चेरूर्वृन्दावनन्तरम्॥ २४
कृष्णे निबद्धहृदया इदमूचुः परस्परम्॥ २५
मैं न देव हूँ, न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव हूँ। मैं तो आपके बान्धवरूपसे ही उत्पन्न हुआ हूँ; आपलोगोंको इस विषयमें और कुछ विचार न करना चाहिये ॥ १२ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे महाभाग! श्रीहरिके प्रणयकोपयुक्त होकर कहे हुए इन वाक्योंको सुनकर वे समस्त गोपगण चुपचाप वनको चले गये ॥ १३॥
तब श्रीकृष्णचन्द्रने निर्मल आकाश, शरच्चन्द्रकी चन्द्रिका और दिशाओंको सुरभित करनेवाली विकसित कुमुदिनी तथा वन-खण्डको मुखर मधुकरोंसे मनोहर देखकर गोपियोंके साथ रमण करनेकी इच्छा की ॥ १४-१५ ॥ उस समय बलरामजीके बिना ही श्रीमुरलीमनोहर स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाला अत्यन्त मधुर, अस्फुट एवं मृदुल पद ऊँचे और धीमे स्वरसे गाने लगे ॥ १६ ॥ उनकी उस सुरम्य गीतध्वनिको सुनकर गोपियाँ अपने-अपने घरोंको छोड़कर तत्काल जहाँ श्रीमधुसूदन थे वहाँ चली आयीं ॥ १७॥
वहाँ आकर कोई गोपी तो उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर धीरे-धीरे गाने लगी और कोई मन-ही-मन उन्हींका स्मरण करने लगी ॥ १८ ॥ कोई 'हे कृष्ण, हे कृष्ण' ऐसा कहती हुई लज्जावश संकुचित हो गयी और कोई प्रेमोन्मादिनी होकर तुरन्त उनके पास जा खड़ी हुई ॥ १९ ॥ कोई गोपी बाहर गुरुजनोंको देखकर अपने घरमें ही रहकर आँख मूँदकर तन्मयभावसे श्रीगोविन्दका ध्यान करने लगी ॥ २० ॥ तथा कोई गोपकुमारी जगत्के कारण परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रका चिन्तन करते-करते [मूर्च्छावस्थामें] प्राणापानके रुक जानेसे मुक्त हो गयी, क्योंकि भगवद्ध्यानके विमल आह्लादसे उसकी समस्त पुण्यराशि क्षीण हो गयी और भगवान्की अप्राप्तिके महान् दुःखसे उसके समस्त पाप लीन हो गये थे ॥ २१-२२ ॥ गोपियोंसे घिरे हुए रासारम्भरूप रसके लिये उत्कण्ठित श्रीगोविन्दने उस शरच्चन्द्रसुशोभिता रात्रिको [रास करके] सम्मानित किया ॥ २३ ॥
उस समय भगवान् कृष्णके अन्यत्र चले जानेपर कृष्णचेष्टाके अधीन हुईं गोपियाँ यूथ बनाकर वृन्दावनके अन्दर विचरने लगीं ॥ २४ ॥ कृष्णमें निबद्धचित्त हुई वे व्रजाङ्गनाएँ परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगीं—[उसमेंसे एक गोपी कहती थी—] “मैं ही कृष्ण हूँ; देखो, कैसी सुन्दर चालसे चलता हूँ; तनिक मेरी
अ० १३] * पञ्चम अंश * ३५१
कृष्णोऽहमेष ललितं व्रजाम्यालोक्यतां गतिः।
अन्या ब्रवीति कृष्णस्य मम गीतिर्निशम्यताम्॥ २६
गति तो देखो।'' दूसरी कहती—''कृष्ण तो मैं हूँ, अहा! मेरा गाना तो सुनो''॥ २५-२६॥
दुष्टकालिय तिष्ठात्र कृष्णोऽहमिति चापरा।
बाहुमास्फोट्य कृष्णस्य लीलया सर्वमाददे॥ २७
कोई अन्य गोपी भुजाएँ ठोंककर बोल उठती—''अरे दुष्ट कालिय! मैं कृष्ण हूँ, तनिक ठहर तो जा'' ऐसा कहकर वह कृष्णके सारे चरित्रोंका लीलापूर्वक अनुकरण करने लगती॥ २७॥
अन्या ब्रवीति भो गोपा निश्शंकैः स्थीयतामिति।
अलं वृष्टिभयेनात्र धृतो गोवर्धनो मया॥ २८
कोई और गोपी कहने लगती—''अरे गोपगण! मैंने गोवर्धन धारण कर लिया है, तुम वर्षासे मत डरो, निश्शंक होकर इसके नीचे आकर बैठ जाओ''॥ २८॥
धेनुकोऽयं मया क्षिप्तो विचरन्तु यथेच्छया।
गावो ब्रवीति चैवान्या कृष्णलीलानुसारिणी॥ २९
कोई दूसरी गोपी कृष्णलीलाओंका अनुकरण करती हुई बोलने लगती—''मैंने धेनुकासुरको मार दिया है, अब यहाँ गौएँ स्वच्छन्द होकर विचरें''॥ २९॥
एवं नानाप्रकारासु कृष्णचेष्टासु तास्तदा।
गोप्यो व्यग्राः समं चेरू रम्यं वृन्दावनान्तरम्॥ ३०
इस प्रकार समस्त गोपियाँ श्रीकृष्णचन्द्रकी नाना प्रकारकी चेष्टाओंमें व्यग्र होकर साथ-साथ अति सुरम्य वृन्दावनके अन्दर विचरने लगीं॥ ३०॥
विलोक्यैका भुवं प्राह गोपी गोपवराङ्गना।
पुलकाञ्चितसर्वाङ्गी विकासिनयनोत्पला॥ ३१
खिले हुए कमल-जैसे नेत्रोंवाली एक सुन्दरी गोपांगना सर्वांग पुलकित हो पृथिवीकी ओर देखकर कहने लगी—॥ ३१॥
ध्वजवज्राङ्कुशाब्जाङ्करेखावन्त्यालि पश्यत।
पदान्येतानि कृष्णस्य लीलाललितगामिनः॥ ३२
अरी आली! ये लीलाललितगामी कृष्णचन्द्रके ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल आदिकी रेखाओंसे सुशोभित पदचिह्न तो देखो॥ ३२॥
कापि तेन समायाता कृतपुण्या मदालसा।
पदानि तस्याश्चैतानि घनान्यल्पतनूनि च॥ ३३
और देखो, उनके साथ कोई पुण्यवती मदमाती युवती भी आ गयी है, उसके ये घने छोटे-छोटे और पतले चरणचिह्न दिखायी दे रहे हैं॥ ३३॥
पुष्पापचयमत्रोच्चैश्चक्रे दामोदरो ध्रुवम्।
येनाग्राक्रान्तमात्राणि पदान्यत्र महात्मनः॥ ३४
यहाँ निश्चय ही दामोदरने ऊँचे होकर पुष्पचयन किये हैं; इसी कारण यहाँ उन महात्माके चरणोंके केवल अग्रभाग ही अंकित हुए हैं॥ ३४॥
अत्रोपविश्य वै तेन काचित्पुष्पैरलंकृता।
अन्यजन्मनि सर्वात्मा विष्णुरभ्यर्चितस्तया॥ ३५
यहाँ बैठकर उन्होंने निश्चय ही किसी बड़भागिनीका पुष्पोंसे श्रृंगार किया है; अवश्य ही उसने अपने पूर्वजन्ममें सर्वात्मा श्रीविष्णुभगवान्की उपासना की होगी॥ ३५॥
पुष्पबन्धनसम्मानकृतमानामपास्य ताम्।
नन्दगोपसुतो यातो मार्गेणानेन पश्यत॥ ३६
और यह देखो, पुष्पबन्धनके सम्मानसे गर्विता होकर उसके मान करनेपर श्रीनन्दनन्दन उसे छोड़कर इस मार्गसे चले गये हैं॥ ३६॥
अनुयातैनमत्रान्या नितम्बभरमन्थरा।
या गन्तव्ये द्रुतं याति निम्नपादाग्रसंस्थितिः॥ ३७
अरी सखियो! देखो,यहाँ कोई नितम्बभारके कारण मन्दगामिनी गोपी कृष्णचन्द्रके पीछे-पीछे गयी है। वह अपने गन्तव्य स्थानको तीव्रगतिसे गयी है, इसीसे उसके चरणचिह्नोंके अग्रभाग कुछ नीचे दिखायी देते हैं॥ ३७॥
हस्तन्यस्ताग्रहस्तेयं तेन याति तथा सखी।
अनायत्तपदन्यासा लक्ष्यते पदपद्धतिः॥ ३८
यहाँ वह सखी उनके हाथमें अपना पाणिपल्लव देकर चली है, इसीसे उसके चरणचिह्न पराधीन-से दिखलायी देते हैं॥ ३८॥
हस्तसंस्पर्शमात्रेण धूर्तेनैषा विमानिता।
नैराश्यान्मन्दगामिन्या निवृत्तं लक्ष्यते पदम्॥ ३९
देखो, यहाँसे उस मन्दगामिनीके निराश होकर लौटनेके चरणचिह्न दीख रहे हैं, मालूम होता है उस धूर्तने [उसकी अन्य आन्तरिक अभिलाषाओंको पूर्ण किये बिना ही] केवल कर-स्पर्श करके उसका अपमान किया है॥ ३९॥
३५२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १३
नूनमुक्ता त्वरामीति पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम्। तेन कृष्णेन येनैषा त्वरिता पदपद्धतिः ॥ ४०
प्रविष्टो गहनं कृष्णः पदमत्र न लक्ष्यते। निवर्तध्वं शशाङ्कस्य नैतद्दीधितिगोचरे ॥ ४१
निवृत्तास्तास्तदा गोप्यो निराशाः कृष्णदर्शने। यमुनातीरमासाद्य जगुस्तच्चरितं तथा॥ ४२
ततो ददृशुरायान्तं विकासिमुखपंकजम्। गोप्यस्त्रैलोक्यगोप्तारं कृष्णमक्लिष्टचेष्टितम्॥ ४३
काचिदालोक्य गोविन्दमायान्तमतिहर्षिता। कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति प्राह नान्यदुदीरयत्॥ ४४
काचिद्भ्रूभङ्गुरं कृत्वा ललाटफलकं हरिम्। विलोक्य नेत्रभृङ्गाभ्यां पपौ तन्मुखपंकजम्॥ ४५
काचिदालोक्य गोविन्दं निमीलितविलोचना। तस्यैव रूपं ध्यायन्ती योगारूढेव सा बभौ॥ ४६
ततः काश्चित्प्रियालापैः काश्चिद्भ्रूभङ्गवीक्षितैः। निन्येऽनुनयमन्यां च करस्पर्शेन माधवः॥ ४७
ताभिः प्रसन्नचित्ताभिर्गोपीभिस्सह सादरम्। ररास रासगोष्ठीभिरुदारचरितो हरिः॥ ४८
रासमण्डलबन्धोऽपि कृष्णपार्श्वमनुज्झता। गोपीजनेन नैवाभूदेकस्थानस्थिरात्मना॥ ४९
हस्तेन गृह्य चैकैकां गोपीनां रासमण्डलम्। चकार तत्करस्पर्शानिमीलितदृशं हरिः॥ ५०
ततः प्रवृत्ते रासश्चलद्वलयनिस्वनः। अनुयातशरत्काव्यगेयगीतिरनुक्रमात् ॥५१
कृष्णश्शरच्चन्द्रमसं कौमुदीं कुमुदाकरम्। जगौ गोपीजनस्त्वेकं कृष्णनाम पुनः पुनः॥ ५२
परिवृत्तिश्रमेणैका चलद्वलयलापिनीम्। ददौ बाहुलतां स्कन्धे गोपी मधुनिघातिनः॥ ५३
यहाँ कृष्णने अवश्य उस गोपीसे कहा है '[तू यहाँ बैठ] मैं शीघ्र ही जाता हूँ [इस वनमें रहनेवाले राक्षसको मारकर] पुनः तेरे पास लौट आऊँगा। इसीलिये यहाँ उनके चरणोंके चिह्न शीघ्र गतिके-से दीख रहे हैं'॥ ४०॥ यहाँसे कृष्णचन्द्र गहन वनमें चले गये हैं, इसीसे उनके चरण-चिह्न दिखलायी नहीं देते; अब सब लौट चलो; इस स्थानपर चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच सकतीं॥ ४१॥
तदनन्तर वे गोपियाँ कृष्ण-दर्शनसे निराश होकर लौट आयीं और यमुनातटपर आकर उनके चरितोंको गाने लगीं॥ ४२॥ तब गोपियोंने प्रसन्नमुखारविन्द त्रिभुवनरक्षक लीलाविहारी श्रीकृष्णचन्द्रको वहाँ आते देखा॥ ४३॥ उस समय कोई गोपी तो श्रीगोविन्दको आते देखकर अति हर्षित हो केवल 'कृष्ण! कृष्ण!! कृष्ण!!!' इतना ही कहती रह गयी और कुछ न बोल सकी॥ ४४॥ कोई [प्रणयकोपवश] अपनी भ्रूभंगीसे ललाट सिकोड़कर श्रीहरिको देखते हुए अपने नेत्ररूप भ्रमरोंद्वारा उनके मुखकमलका मकरन्द पान करने लगी॥ ४५॥ कोई गोपी गोविन्दको देख नेत्र मूंदकर उन्हींके रूपका ध्यान करती हुई योगारूढ-सी भासित होने लगी॥ ४६॥
तब श्रीमाधव किसीसे प्रिय भाषण करके, किसीकी ओर भ्रूभंगीसे देखकर और किसीका हाथ पकड़कर उन्हें मनाने लगे॥ ४७॥ फिर उदारचरित श्रीहरिने उन प्रसन्नचित्त गोपियोंके साथ रासमण्डल बनाकर आदरपूर्वक रमण किया॥ ४८॥ किन्तु उस समय कोई भी गोपी कृष्णचन्द्रकी सन्निधिको न छोड़ना चाहती थी; इसलिये एक ही स्थानपर स्थिर रहनेके कारण रासोचित मण्डल न बन सका॥ ४९॥ तब उन गोपियोंमेंसे एक-एकका हाथ पकड़कर श्रीहरिने रासमण्डलकी रचना की। उस समय उनके करस्पर्शसे प्रत्येक गोपीकी आँखें आनन्दसे मुँद जाती थीं॥ ५०॥
तदनन्तर रासक्रीडा आरम्भ हुई। उसमें गोपियोंके चंचल कंकणोंकी झनकार होने लगी और फिर क्रमशः शरद्वर्णन-सम्बन्धी गीत होने लगे॥ ५१॥ उस समय कृष्णचन्द्र चन्द्रमा, चन्द्रिका और कुमुदवन-सम्बन्धी गान करने लगे; किन्तु गोपियोंने तो बारम्बार केवल कृष्णनामका ही गान किया॥ ५२॥ फिर एक गोपीने नृत्य करते-करते थककर चंचल कंकणकी झनकारसे युक्त अपनी बाहुलता श्रीमधुसूदनके गलेमें डाल दी॥ ५३॥
अ० १४ ] * पञ्चम अंश * ३५३
| काचित्प्रविलसद्बाहुः परिरभ्य चुचुम्ब तम्।<br>गोपी गीतस्तुतिव्याजान्निपुणा मधुसूदनम् ॥ ५४ | किसी निपुण गोपीने भगवान्के गानकी प्रशंसा करनेके बहाने भुजा फैलाकर श्रीमधुसूदनको आलिंगन करके चूम लिया॥ ५४॥ |
| गोपीकपोलसंश्लेषमभिगम्य हरेर्भुजौ।<br>पुलकोद्गमसस्याय स्वेदाम्बुघनतां गतौ ॥ ५५ | श्रीहरिकी भुजाएँ गोपियोंके कपोलोंका चुम्बन पाकर उन (कपोलों)-में पुलकावलिरूप धान्यकी उत्पत्तिके लिये स्वेदरूप जलके मेघ बन गयीं॥ ५५ ॥ |
| रासगेयं जगौ कृष्णो यावत्तारतरध्वनिः।<br>साधु कृष्णेति कृष्णेति तावत्ता द्विगुणं जगुः ॥ ५६ | कृष्णचन्द्र जितने उच्चस्वरसे रासोचित गान गाते थे उससे दूने शब्दसे गोपियाँ "धन्य कृष्ण! धन्य कृष्ण!!" की ही ध्वनि लगा रही थीं॥ ५६ ॥ |
| गतेऽनुगमनं चक्रुर्वलने सम्मुखं ययुः।<br>प्रतिलोमानुलोमाभ्यां भेजुर्गोपाङ्गना हरिम् ॥ ५७ | भगवान्के आगे जानेपर गोपियाँ उनके पीछे जातीं और लौटनेपर सामने चलतीं, इस प्रकार वे अनुलोम और प्रतिलोम-गतिसे श्रीहरिका साथ देती थीं॥ ५७॥ |
| स तथा सह गोपीभी ररास मधुसूदनः।<br>यथाब्दकोटिप्रतिमः क्षणस्तेन विनाभवत् ॥ ५८ | श्रीमधुसूदन भी गोपियोंके साथ इस प्रकार रासक्रीडा कर रहे थे कि उनके बिना एक क्षण भी गोपियोंको करोड़ों वर्षोंके समान बीतता था॥ ५८॥ |
| ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृभिस्तथा।<br>कृष्णं गोपाङ्गना रात्रौ रमयन्ति रतिप्रियाः ॥ ५९ | वे रास-रसिक गोपांगनाएँ पति, माता-पिता और भ्राता आदिके रोकनेपर भी रात्रिमें श्रीश्यामसुन्दरके साथ विहार करती थीं॥ ५९ ॥ |
| सोऽपि कैशोरकवयो मानयन्मधुसूदनः।<br>रेमे ताभिरमेयात्मा क्षपासु क्षपिताहितः ॥ ६० | शत्रुहन्ता अमेयात्मा श्रीमधुसूदन भी अपनी किशोरावस्थाका मान करते हुए रात्रिके समय उनके साथ रमण करते थे॥ ६०॥ |
| तद्भर्तृषु तथा तासु सर्वभूतेषु चेश्वरः।<br>आत्मस्वरूपरूपोऽसौ व्यापी वायुरिव स्थितः ॥ ६१ | वे सर्वव्यापी ईश्वर श्रीकृष्णचन्द्र गोपियोंमें, उनके पतियोंमें तथा समस्त प्राणियोंमें आत्मस्वरूपसे वायुके समान व्याप्त थे॥ ६१॥ |
| यथा समस्तभूतेषु नभोऽग्निः पृथिवी जलम्।<br>वायुश्चात्मा तथैवासौ व्याप्य सर्वमवस्थितः ॥ ६२ | जिस प्रकार आकाश, अग्नि, पृथिवी, जल, वायु और आत्मा समस्त प्राणियोंमें व्याप्त हैं उसी प्रकार वे भी सब पदार्थोंमें व्यापक हैं॥ ६२॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
वृषाभासुर-वध
| श्रीपराशर उवाच<br>प्रदोषाग्रे कदाचित्तु रासासक्ते जनार्दने।<br>त्रासयन्समदो गोष्ठमरिष्टस्समुपागमत् ॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**एक दिन सायंकालके समय जब श्रीकृष्णचन्द्र रासक्रीडामें आसक्त थे, अरिष्ट नामक एक मदोन्मत्त असुर [वृषभरूप धारणकर] सबको भयभीत करता ब्रजमें आया ॥ १ ॥ |
| सतोयतोयदच्छायास्तीक्ष्णशृङ्गोऽर्कलोचनः।<br>खुराग्रपातैरत्यर्थं दारयन्धरणीतलम् ॥ २ | इस अरिष्टासुरकी कान्ति सजल जलधरके समान कृष्णवर्ण थी, सींग अत्यन्त तीक्ष्ण थे, नेत्र सूर्यके समान तेजस्वी थे और अपने खुरोंकी चोटसे वह मानो पृथिवीको फाड़े डालता था ॥ २ ॥ |
| लेलिहानस्सनिष्पेषं जिह्वयोष्ठौ पुनः पुनः।<br>संरम्भाविद्धलाङ्गूलः कठिनस्कन्धबन्धनः ॥ ३ | वह दाँत पीसता हुआ पुनः-पुनः अपनी जिह्वासे ओठोंको चाट रहा था, उसने क्रोधवश अपनी पूँछ उठा रखी थी तथा उसके स्कन्धबन्धन कठोर थे ॥ ३ ॥ |
३५४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४
| उदग्रककुदाभोगप्रमाणो दुरतिक्रमः।<br>विण्मूत्रलिप्तपृष्ठाङ्गो गवामुद्वेगकारकः॥ ४ | उसके ककुद (कुहान) और शरीरका प्रमाण अत्यन्त ऊँचा एवं दुर्लङ्घ्य था, पृष्ठभाग गोबर और मूत्रसे लिथड़ा हुआ था। तथा वह समस्त गौओंको भयभीत कर रहा था॥ ४॥ |
| प्रलम्बकण्ठोऽतिमुखस्तरुखाताङ्किताननः।<br>पातयन्स गवां गर्भान्दैत्यो वृषभरूपधृक्॥ ५<br>सूदयंस्तापसानुग्रो वनानटति यस्सदा॥ ६ | उसकी ग्रीवा अत्यन्त लम्बी और मुख वृक्षके खोंखलेके समान अति गम्भीर था। वह वृषभरूपधारी दैत्य गौओंके गर्भोंको गिराता हुआ और तपस्वियोंको मारता हुआ सदा वनमें विचरा करता था॥ ५-६॥ |
| ततस्तमतिघोराक्षमवेक्ष्यातिभयातुराः ।<br>गोपा गोपस्त्रियश्चैव कृष्ण कृष्णेति चुक्रुशुः॥ ७ | तब उस अति भयानक नेत्रोंवाले दैत्यको देखकर गोप और गोपांगनाएँ भयभीत होकर 'कृष्ण, कृष्ण' पुकारने लगीं॥ ७॥ |
| सिंहनादं ततश्चक्रे तलशब्दं च केशवः।<br>तच्छब्दश्रवणाच्चासौ दामोदरमुपाययौ॥ ८ | उनका शब्द सुनकर श्रीकेशवने घोर सिंहनाद किया और ताली बजायी। उसे सुनते ही वह श्रीदामोदरकी ओर फिरा॥ ८॥ |
| अग्रन्यस्तविषाणाग्रः कृष्णकुक्षिकृतेक्षणः।<br>अभ्यधावत दुष्टात्मा कृष्णं वृषभदानवः॥ ९ | दुरात्मा वृषभासुर आगेको सींग करके तथा कृष्णचन्द्रकी कुक्षिमं दृष्टि लगाकर उनकी ओर दौड़ा॥ ९॥ |
| आयान्तं दैत्यवृषभं दृष्ट्वा कृष्णो महाबलः।<br>न चचाल तदा स्थानादवज्ञास्मितलीलया॥ १० | किन्तु महाबली कृष्ण वृषाभासुरको अपनी ओर आता देख अवहेलनासे लीलापूर्वक मुसकराते हुए उस स्थानसे विचलित न हुए॥ १०॥ |
| आसन्नं चैव जग्राह ग्राहवन्मधुसूदनः।<br>जघान जानुना कुक्षौ विषाणग्रहणाचलम्॥ ११ | निकट आनेपर श्रीमधुसूदनने उसे इस प्रकार पकड़ लिया जैसे ग्राह किसी क्षुद्र जीवको पकड़ लेता है; तथा सींग पकड़नेसे अचल हुए उस दैत्यकी कोखमें घुटनेसे प्रहार किया॥ ११॥ |
| तस्य दर्पबलं भङ्क्त्वा गृहीतस्य विषाणयोः।<br>अपीडयदरिष्टस्य कण्ठं क्लिन्नमिवाम्बरम्॥ १२ | इस प्रकार सींग पकड़े हुए उस दैत्यका दर्प भंगकर भगवान्ने अरिष्टासुरकी ग्रीवाको गीले वस्त्रके समान मरोड़ दिया॥ १२॥ |
| उत्पाट्य शृङ्गमेकं तु तेनैवाताडयत्ततः।<br>ममार स महादैत्यो मुखाच्छोणितमुद्वमन्॥ १३ | तदनन्तर उसका एक सींग उखाड़कर उसीसे उसपर आघात किया, जिससे वह महादैत्य मुखसे रक्त वमन करता हुआ मर गया॥ १३॥ |
| तुष्टुवुर्निहते तस्मिन्दैत्ये गोपा जनार्दनम्।<br>जम्भे हते सहस्राक्षं पुरा देवगणा यथा॥ १४ | जम्भके मरनेपर जैसे देवताओंने इन्द्रकी स्तुति की थी उसी प्रकार अरिष्टासुरके मरनेपर गोपगण श्रीजनार्दनकी प्रशंसा करने लगे॥ १४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
अ० १५ ] * पञ्चम अंश * ३५५
पन्द्रहवाँ अध्याय
कंसका श्रीकृष्णको बुलानेके लिये अक्रूरको भेजना
श्रीपराशर उवाच
ककुद्मति हतेऽरिष्टे धेनुके विनिपातिते।
प्रलम्बे निधनं नीते धृते गोवर्धनाचले॥ १
दमिते कालिये नागे भग्ने तुङ्गद्रुमद्वये।
हतायां पूतनायां च शकटे परिवर्तिते॥ २
कंसाय नारदः प्राह यथावृत्तमनुक्रमात्।
यशोदादेवकीगर्भपरिवृत्त्याद्यशेषतः ॥ ३
श्रीपराशरजी बोले— वृषभरूपधारी अरिष्टासुर, धेनुक और प्रलम्ब आदिका वध, गोवर्धनपर्वतका धारण करना, कालियनागका दमन, दो विशाल वृक्षोंका उखाड़ना, पूतनावध तथा शकटका उलट देना आदि अनेक लीलाएँ हो जानेपर एक दिन नारदजीने कंसको, यशोदा और देवकीके गर्भ-परिवर्तनसे लेकर जैसा-जैसा हुआ था, वह सब वृत्तान्त क्रमशः सुना दिया॥ १—३॥
श्रुत्वा तत्सकलं कंसो नारदाद्देवदर्शनात्।
वसुदेवं प्रति तदा कोपं चक्रे सुदुर्मतिः॥ ४
सोऽतिकोपादुपालभ्य सर्वयादवसंसदि।
जगर्ह यादवांश्चैव कार्यं चैतदचिन्तयत्॥ ५
देवदर्शन नारदजीसे ये सब बातें सुनकर दुर्बुद्धि कंसने वसुदेवजीके प्रति अत्यन्त क्रोध प्रकट किया॥ ४॥ उसने अत्यन्त कोपसे वसुदेवजीको सम्पूर्ण यादवोंकी सभामें डाँटा तथा समस्त यादवोंकी भी निन्दा की और यह कार्य विचारने लगा—
यावन्न बलमारूढौ रामकृष्णौ सुबालकौ।
तावदेव मया वध्यावसाध्यौ रूढयौवनौ॥ ६
'ये अत्यन्त बालक राम और कृष्ण जबतक पूर्ण बल प्राप्त नहीं करते हैं तभीतक मुझे इन्हें मार देना चाहिये; क्योंकि युवावस्था प्राप्त होनेपर तो ये अजेय हो जायँगे॥ ५-६॥
चाणूरोऽत्र महावीर्यो मुष्टिकश्च महाबलः।
एताभ्यां मल्लयुद्धेन मारयिष्यामि दुर्मती॥ ७
मेरे यहाँ महावीर्यशाली चाणूर और महाबली मुष्टिक-जैसे मल्ल हैं। मैं इनके साथ मल्लयुद्ध कराकर उन दोनों दुर्बुद्धियोंको मरवा डालूँगा॥ ७॥
धनुर्महमहायोगव्याजेनानीय तौ व्रजात्।
तथा तथा यतिष्यामि यास्येते सङ्क्षयं यथा॥ ८
उन्हें महान् धनुर्यज्ञके मिससे व्रजसे बुलाकर ऐसे-ऐसे उपाय करूँगा, जिससे वे नष्ट हो जायँ॥ ८॥
श्वफल्कतनयं शूरमक्रूरं यदुपुङ्गवम्।
तयोरानयनार्थाय प्रेषयिष्यामि गोकुलम्॥ ९
उन्हें लानेके लिये मैं श्वफल्कके पुत्र यादवश्रेष्ठ शूरवीर अक्रूरको गोकुल भेजूँगा॥ ९॥
वृन्दावनचरं घोरमादेश्यामि च केशिनम्।
तत्रैवासावतिबलस्तावभौ घातयिष्यति॥ १०
साथ ही वृन्दावनमें विचरनेवाले घोर असुर केशीको भी आज्ञा दूँगा, जिससे वह महाबली दैत्य उन्हें वहीं नष्ट कर देगा॥ १०॥
गजः कुवलयापीडो मत्सकाशमिहागतौ।
घातयिष्यति वा गोपौ वसुदेवसुतावुभौ॥ ११
अथवा [यदि किसी प्रकार बचकर] वे दोनों वसुदेवपुत्र गोप मेरे पास आ भी गये तो उन्हें मेरा कुवलयापीड हाथी मार डालेगा'॥ ११॥
श्रीपराशर उवाच
इत्यालोच्य स दुष्टात्मा कंसो रामजनार्दनौ।
हन्तुं कृतमतिर्वीरावक्रूरं वाक्यमब्रवीत्॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— ऐसा सोचकर उस दुष्टात्मा कंसने वीरवर राम और कृष्णको मारनेका निश्चय कर अक्रूरजीसे कहा॥ १२॥
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३५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| कंस उवाच | कंस बोला—हे दानपते! मेरी प्रसन्नताके लिये आप मेरी एक बात स्वीकार कर लीजिये। यहाँसे रथपर चढ़कर आप नन्दके गोकुलको जाइये॥ १३॥ वहाँ वसुदेवके विष्णुअंशसे उत्पन्न दो पुत्र हैं। मेरे नाशके लिये उत्पन्न हुए वे दुष्ट बालक वहाँ पोषित हो रहे हैं॥ १४॥ मेरे यहाँ चतुर्दशीको धनुषयज्ञ होनेवाला है; अतः आप वहाँ जाकर उन्हें मल्लयुद्धके लिये ले आइये॥ १५॥ मेरे चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल युग्म-युद्धमें अति कुशल हैं, [उस धनुर्यज्ञके दिन] उन दोनोंके साथ मेरे इन पहलवानोंका द्वन्द्वयुद्ध यहाँ सब लोग देखें॥ १६॥ अथवा महावतसे प्रेरित हुआ कुवलयापीड नामक गजराज उन दोनों दुष्ट वसुदेव-पुत्र बालकोंको नष्ट कर देगा॥ १७॥ इस प्रकार उन्हें मारकर मैं दुर्मति वसुदेव, नन्दगोप और इस अपने मन्दमति पिता उग्रसेनको भी मार डालूँगा॥ १८॥ तदनन्तर, मेरे वधकी इच्छावाले इन समस्त दुष्ट गोपोंके सम्पूर्ण गोधन तथा धनको मैं छीन लूँगा॥ १९॥ हे दानपते! आपके अतिरिक्त ये सभी यादवगण मुझसे द्वेष करते हैं, अतः मैं क्रमशः इन सभीको नष्ट करनेका प्रयत्न करूँगा॥ २०॥ फिर मैं आपके साथ मिलकर इस यादवहीन राज्यको निर्विघ्नतापूर्वक भोगूँगा, अतः हे वीर! मेरी प्रसन्नताके लिये आप शीघ्र ही जाइये॥ २१॥ आप गोकुलमें पहुँचकर गोपगणोंसे इस प्रकार कहें जिससे वे माहिष्य (भैंसके) घृत और दधि आदि उपहारोंके सहित शीघ्र ही यहाँ आ जायँ॥ २२॥ |
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| भो भो दानपते वाक्यं क्रियतां प्रीतये मम।<br>इतः स्यन्दनमारुह्य गम्यतां नन्दगोकुलम्॥ १३<br>वसुदेवसुतौ तत्र विष्णोरंशसमुद्भवौ।<br>नाशाय किल सम्भूतौ मम दुष्टौ प्रवर्द्धतः॥ १४<br>धनुर्महो ममाप्यत्र चतुर्दश्यां भविष्यति।<br>आनेयौ भवता गत्वा मल्लयुद्धाय तत्र तौ॥ १५<br>चाणूरमुष्टिकौ मल्लौ नियुद्धकुशलौ मम।<br>ताभ्यां सहानयोर्युद्धं सर्वलोकोऽत्र पश्यतु॥ १६<br>गजः कुवलयापीडो महामात्रप्रचोदितः।<br>स वा हनिष्यते पापौ वसुदेवात्मजौ शिशू॥ १७<br>तौ हत्वा वसुदेवं च नन्दगोपं च दुर्मतिम्।<br>हनिष्ये पितरं चैनमुग्रसेनं सुदुर्मतिम्॥ १८<br>ततस्समस्तगोपानां गोधनान्यखिलान्यहम्।<br>वित्तं चापहरिष्यामि दुष्टानां मद्बधैषिणाम्॥ १९<br>त्वामृते यादवाश्चैते द्विषो दानपते मम।<br>एतेषां च वधायाहं यतिष्येऽनुक्रमात्ततः॥ २०<br>तदा निष्कण्टकं सर्वं राज्यमेतदयादवम्।<br>प्रसाधिष्ये त्वया तस्मान्मत्प्रीतयै वीर गम्यताम्॥ २१<br>यथा च माहिषं सर्पिर्दधि चाप्युपहार्य वै।<br>गोपास्समानयन्त्वाशु तथा वाच्यास्त्वया च ते॥ २२ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज! कंससे ऐसी आज्ञा पा महाभागवत अक्रूरजी 'कल मैं शीघ्र ही श्रीकृष्णचन्द्रको देखूँगा'—यह सोचकर अति प्रसन्न हुए॥ २३॥ माधव-प्रिय अक्रूरजी राजा कंससे 'जो आज्ञा' कह एक अति सुन्दर रथपर चढ़े और मथुरापुरीसे बाहर निकल आये॥ २४॥ |
| इत्याज्ञप्तस्तदाक्रूरो महाभागवतो द्विज।<br>प्रीतिमानभवत्कृष्णं श्वो द्रक्ष्यामीति सत्वरः॥ २३<br>तथेत्युक्त्वा च राजानं रथमारुह्य शोभनम्।<br>निश्चक्राम ततः पुर्या मथुराया मधुप्रियः॥ २४ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अ० १६ ] * पञ्चम अंश * ३५७
सोलहवाँ अध्याय
केशि-वध
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय ! इधर कंसके दूतद्वारा भेजा हुआ महाबली केशी भी कृष्णचन्द्रके वधकी इच्छासे [घोड़ेका रूप धारण कर] वृन्दावनमें आया ॥ १ ॥ वह अपने खुरोंसे पृथ्वीतलको खोदता, ग्रीवाके बालोंसे बादलोंको छिन्न-भिन्न करता तथा वेगसे चन्द्रमा और सूर्यके मार्गको भी पार करता गोपोंकी ओर दौड़ा ॥ २ ॥ उस अश्वरूप दैत्यके हिनहिनानेके शब्दसे भयभीत होकर समस्त गोप और गोपियाँ श्रीगोविन्दकी शरणमें आये ॥ ३ ॥ तब उनके त्राहि-त्राहि शब्दको सुनकर भगवान् कृष्णचन्द्र सजल मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर वाणीसे बोले— ॥ ४ ॥ “हे गोपालगण ! आपलोग केशी (केशधारी अश्व)-से न डरें, आप तो गोप-जातिके हैं, फिर इस प्रकार भयभीत होकर आप अपने वीरोचित पुरुषार्थका लोप क्यों करते हैं? ॥ ५ ॥ यह अल्पवीर्य, हिनहिनानेसे आतंक फैलानेवाला और नाचनेवाला दुष्ट अश्व जिसपर राक्षसगण बलपूर्वक चढ़ा करते हैं, आपलोगोंका क्या बिगाड़ सकता है?” ॥ ६ ॥ |
|---|---|
| केशी चापि बलोदग्रः कंसदूतप्रचोदितः ।<br>कृष्णस्य निधनाकाङ्क्षी वृन्दावनमुपागमत् ॥ १<br>स खुरक्षतभूपृष्ठस्सटाक्षेपधुताम्बुदः ।<br>द्रुतविक्रान्तचन्द्रार्कमार्गो गोपानुपाद्रवत् ॥ २<br>तस्य हेषितशब्देन गोपाला दैत्यवाजिनः ।<br>गोप्यश्च भयसंविग्ना गोविन्दं शरणं ययुः ॥ ३<br>त्राहि त्राहीति गोविन्दः श्रुत्वा तेषां ततो वचः ।<br>सतोयजलदध्वानगम्भीरमिदमुक्तवान् ॥ ४<br>अलं त्रासेन गोपालाः केशिनः किं भयातुरैः ।<br>भवद्भिर्गोपजातीयैर्वीरवीर्यं विलोप्यते ॥ ५<br>किमनेनाल्पसारेण हेषिताटोपकारिणा ।<br>दैतेयबलवाह्येन वल्गता दुष्टवाजिना ॥ ६ | |
| एह्येहि दुष्ट कृष्णोऽहं पूष्णस्तिव्व पिनाकधृक् ।<br>पातयिष्यामि दशनान्वदनादखिलांस्तव ॥ ७<br>इत्युक्त्वास्फोट्य गोविन्दः केशिनस्समुखं ययौ ।<br>विवृतास्यश्च सोऽप्येनं दैतेयाश्व उपाद्रवत् ॥ ८<br>बाहुमाभोगिनं कृत्वा मुखे तस्य जनार्दनः ।<br>प्रवेशयामास तदा केशिनो दुष्टवाजिनः ॥ ९<br>केशिनो वदने तेन विशता कृष्णबाहुना ।<br>शातिता दशनाः पेतुः सिताभ्रावयवा इव ॥ १०<br>कृष्णस्य ववृधे बाहुः केशिदेहगतो द्विज ।<br>विनाशाय यथा व्याधिरासम्भूतैरुपेक्षितः ॥ ११<br>विपाटितोष्ठो बहुलं सफेनं रुधिरं वमन् ।<br>सोऽक्षिणी विवृते चक्रे विशिष्टे मुक्तबन्धने ॥ १२<br>जघान धरणीं पादैश्शकृन्मूत्रं समुत्सृजन् ।<br>स्वेदार्द्रगात्रश्शान्तश्च निर्यत्नस्सोऽभवत्तदा ॥ १३ | [इस प्रकार गोपोंको धैर्य बाँधकर वे केशीसे कहने लगे—] “अरे दुष्ट ! इधर आ, पिनाकधारी वीरभद्रने जिस प्रकार पूषाके दाँत उखाड़े थे, उसी प्रकार मैं कृष्ण तेरे मुखसे सारे दाँत गिरा दूँगा” ॥ ७ ॥ ऐसा कहकर श्रीगोविन्द उछलकर केशीके सामने आये और वह अश्वरूपधारी दैत्य भी मुँह खोलकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ८ ॥ तब जनार्दनने अपनी बाँह फैलाकर उस अश्वरूपधारी दुष्ट दैत्यके मुखमें डाल दी ॥ ९ ॥ केशीके मुखमें घुसी हुई भगवान् कृष्णकी बाहुसे टकराकर उसके समस्त दाँत शुभ्र मेघखण्डोंके समान टूटकर बाहर गिर पड़े ॥ १० ॥<br><br>हे द्विज! उत्पत्तिके समयसे ही उपेक्षा की गयी व्याधि जिस प्रकार नाश करनेके लिये बढ़ने लगती है, उसी प्रकार केशीके देहमें प्रविष्ट हुई कृष्णचन्द्रकी भुजा बढ़ने लगी ॥ ११ ॥ अन्तमें ओठोंके फट जानेसे वह फेनसहित रुधिर वमन करने लगा और उसकी आँखें स्नायुबन्धनके ढीले हो जानेसे फूट गयीं ॥ १२ ॥ तब वह मल-मूत्र छोड़ता हुआ पृथ्वीपर पैर पटकने लगा, उसका शरीर पसीनेसे भरकर ठण्डा पड़ गया और वह निश्चेष्ट हो गया ॥ १३ ॥ |
३५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६
व्यादितास्यमहारन्ध्रस्सोऽसुरः कृष्णबाहुना । निपातितो द्विधा भूमौ वैद्युतेन यथा द्रुमः ॥ १४
द्विपादे पृष्ठपुच्छाद्धे श्रवणैकाक्षिनासिके । केशिनस्ते द्विधाभूते शकले द्वे विरेजतुः ॥ १५
हत्वा तु केशिनं कृष्णो गोपालैर्मुदितैर्वृतः । अनायस्ततनुस्स्वस्थो हसंस्तत्रैव तस्थिवान् ॥ १६
ततो गोप्यश्च गोपाश्च हते केशिनि विस्मिताः । तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमनुरागमनोरमम् ॥ १७
अथाहान्तर्हितो विप्र नारदो जलदे स्थितः । केशिनं निहतं दृष्ट्वा हर्षनिर्भरमानसः ॥ १८
साधु साधु जगन्नाथ लीलयैव यदच्युत । निहतोऽयं त्वया केशी क्लेशदस्तत्रिदिवौकसाम् ॥ १९
युद्धोत्सुकोऽहमत्यर्थं नरवाजिमहाहवम् । अभूतपूर्वमन्यत्र द्रष्टुं स्वर्गादिहागतः ॥ २०
कर्माण्यत्रावतारे ते कृतानि मधुसूदन । यानि तैर्विस्मितं चेतस्तोषमेतेन मे गतम् ॥ २१
तुरङ्गस्यास्य शक्रोऽपि कृष्ण देवाश्च बिभ्यति । धुतकेसरजालस्य हेषतोऽभ्रावलोकिनः ॥ २२
यस्मात्त्वयैष दुष्टात्मा हतः केशी जनार्दन । तस्मात्केशवनाम्ना त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि ॥ २३
स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि कंसयुद्धेऽधुना पुनः । परश्वोऽहं समेष्यामि त्वया केशिनिषूदन ॥ २४
उग्रसेनसुते कंसे सानुगे विनिपातिते । भारावतारकर्ता त्वं पृथिव्याः पृथिवीधर ॥ २५
तत्रानेकप्रकाराणि युद्धानि पृथिवीक्षिताम् । द्रष्टव्यानि मयायुष्मत्प्रणीतानि जनार्दन ॥ २६
सोऽहं यास्यामि गोविन्द देवकार्यं महत्कृतम् । त्वयैव विदितं सर्वं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ २७
नारदे तु गते कृष्णस्सह गोपैस्सभाजितः । विवेश गोकुलं गोपीनेत्रपानैकभाजनम् ॥ २८
इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रकी भुजासे जिसके मुखका विशाल रन्ध्र फैलाया गया है वह महान् असुर मरकर वज्रपातसे गिरे हुए वृक्षके समान दो खण्ड होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १४ ॥
केशीके शरीरके वे दोनों खण्ड दो पाँव, आधी पीठ, आधी मूँछ तथा एक-एक कान-आँख और नासिकारन्ध्रके सहित सुशोभित हुए ॥ १५ ॥
इस प्रकार केशीको मारकर प्रसन्नचित्त ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णचन्द्र बिना श्रमके स्वस्थचित्तसे हँसते हुए वहीं खड़े रहे ॥ १६ ॥
केशीके मारे जानेसे विस्मित हुए गोप और गोपियोंने अनुरागवश अत्यन्त मनोहर लगनेवाले कमलनयन श्रीश्यामसुन्दरकी स्तुति की ॥ १७ ॥
हे विप्र ! उसे मरा देख मेघपटलमें छिपे हुए श्रीनारदजी हर्षितचित्तसे कहने लगे— ॥ १८ ॥
‘‘हे जगन्नाथ ! हे अच्युत !! आप धन्य हैं, धन्य हैं। अहा ! आपने देवताओंको दुःख देनेवाले इस केशीको लीलासे ही मार डाला ॥ १९ ॥
मैं मनुष्य और अश्वके इस पहले और कहीं न होनेवाले युद्धको देखनेके लिये ही अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वर्गसे यहाँ आया था ॥ २० ॥
हे मधुसूदन ! आपने अपने इस अवतारमें जो-जो कर्म किये हैं उनसे मेरा चित्त अत्यन्त विस्मित और सन्तुष्ट हो रहा है ॥ २१ ॥
हे कृष्ण ! जिस समय यह अश्व अपनी सटाओंको हिलाता और हींसता हुआ आकाशकी ओर देखता था तो इससे सम्पूर्ण देवगण और इन्द्र भी डर जाते थे ॥ २२ ॥
हे जनार्दन ! आपने इस दुष्टात्मा केशीको मारा है; इसलिये आप लोकमें ‘केशव’ नामसे विख्यात होंगे ॥ २३ ॥
हे केशिनिषूदन ! आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। परसों कंसके साथ आपका युद्ध होनेके समय मैं फिर आऊँगा ॥ २४ ॥
हे पृथिवीधर ! अनुगामियों सहित उग्रसेनके पुत्र कंसके मारे जानेपर आप पृथिवीका भार उतार देंगे ॥ २५ ॥
हे जनार्दन ! उस समय मैं अनेक राजाओंके साथ आप आयुष्मान् पुरुषके किये हुए अनेक प्रकारके युद्ध देखूँगा ॥ २६ ॥
हे गोविन्द ! अब मैं जाना चाहता हूँ। आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य किया है। आप सभी कुछ जानते हैं [मैं अधिक क्या कहूँ?] आपका मंगल हो, मैं जाता हूँ’’ ॥ २७ ॥
तदनन्तर नारदजीके चले जानेपर गोपगणसे सम्मानित गोपियोंके नेत्रोंके एकमात्र दृश्य श्रीकृष्णचन्द्रने ग्वालबालोंके साथ गोकुलमें प्रवेश किया ॥ २८ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अ० १७ ] * पञ्चम अंश * ३५९
सत्रहवाँ अध्याय
अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा
श्रीपराशर उवाच अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य स्यन्दनेनाशुगामिना । कृष्णसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ १
चिन्तयामास चाक्रूरो नास्ति धन्यतरो मया । योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिणः ॥ २
अद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाताभवन्निशा । यदुन्निद्राभपत्राक्षं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ३
पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं सङ्कल्पनामयम् । तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ४
विनिर्जग्मुर्यतो वेदा वेदाङ्गानrendered्यखिलानि च । द्रक्ष्यामि तत्परं धाम धाम्नां भगवतो मुखम् ॥ ५
यज्ञेषु यज्ञपुरुषः पुरुषैः पुरुषोत्तमः । इज्यते योऽखिलाधारस्तं द्रक्ष्यामि जगत्पतिम् ॥ ६
इष्ट्वा यमिन्द्रो यज्ञानां शतेनामरराजताम् । अवाप तमनन्तादिमहं द्रक्ष्यामि केशवम् ॥ ७
न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्विवस्वादित्यमरुद्गणाः । यस्य स्वरूपं जानन्ति प्रत्यक्षं याति मे हरिः ॥ ८
सर्वात्मा सर्ववित्सर्वस्सर्वभूतेष्ववस्थितः । यो ह्यचिन्त्योऽव्ययो व्यापी स वक्ष्यति मया सह ॥ ९
मत्स्यकूर्मवराहाश्वसिंह्रूपादिभिः स्थितिम् । चकार जगतो योऽजः सोऽद्य मां प्रलपिष्यति ॥ १०
साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम् । कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तस्स्वेच्छादेहधृगव्ययः ॥ ११
योऽनन्तः पृथिवीं धत्ते शेखरस्थितिसंस्थिताम् । सोऽवतीर्णो जगत्यर्थे मामक्रूरेति वक्ष्यति ॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— अक्रूरजी भी तुरंत ही मथुरापुरीसे निकलकर श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे एक शीघ्रगामी रथद्वारा नन्दजीके गोकुलको चले ॥ १ ॥ अक्रूरजी सोचने लगे 'आज मुझ-जैसा बड़भागी और कोई नहीं है; क्योंकि अपने अंशसे अवतीर्ण चक्रधारी श्रीविष्णुभगवान्का मुख मैं अपने नेत्रोंसे देखूँगा ॥ २ ॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया; आजकी रात्रि [अवश्य] सुन्दर प्रभातवाली थी, जिससे कि मैं आज खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले श्रीविष्णुभगवान्के मुखका दर्शन करूँगा ॥ ३ ॥ प्रभुका जो संकल्पमय मुखारविन्द स्मरणमात्रसे पुरुषोंके पापोंको दूर कर देता है, आज मैं विष्णुभगवान्के उसी कमलनयन मुखको देखूँगा ॥ ४ ॥ जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदांगोंकी उत्पत्ति हुई है, आज मैं सम्पूर्ण तेजस्वियोंके परम आश्रय उसी भगवत्-मुखारविन्दका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥ समस्त पुरुषोंके द्वारा यज्ञोंमें जिन अखिल विश्वके आधारभूत पुरुषोत्तमका यज्ञपुरुषरूपसे यजन (पूजन) किया जाता है, आज मैं उन्हीं जगत्पतिका दर्शन करूँगा ॥ ६ ॥ जिनका सौ यज्ञोंसे यजन करके इन्द्रने देवराज-पदवी प्राप्त की है, आज मैं उन्हीं अनादि और अनन्त केशवका दर्शन करूँगा ॥ ७ ॥ जिनके स्वरूपको ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसुगण, आदित्य और मरुद्गण आदि कोई भी नहीं जानते आज वे ही हरि मेरे नेत्रोंके विषय होंगे ॥ ८ ॥ जो सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वस्वरूप और सब भूतोंमें अवस्थित हैं तथा जो अचिन्त्य, अव्यय और सर्वव्यापक हैं, अहो! आज स्वयं वे ही मेरे साथ बातें करेंगे ॥ ९ ॥ जिन अजन्माने मत्स्य, कूर्म, वराह, हयग्रीव और नृसिंह आदि रूप धारणकर जगत्की रक्षा की है, आज वे ही मुझसे वार्तालाप करेंगे ॥ १० ॥
'इस समय उन अव्ययात्मा जगत्प्रभुने अपने मनमें सोचा हुआ कार्य करनेके लिये अपनी ही इच्छासे मनुष्य-देह धारण किया है ॥ ११ ॥ जो अनन्त (शेषजी) अपने मस्तकपर रखी हुई पृथिवीको धारण करते हैं, संसारके हितके लिये अवतीर्ण हुए वे ही आज मुझसे 'अक्रूर' कहकर बोलेंगे ॥ १२ ॥
३६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७
पितृपुत्रसुहृद्भ्रातृमातृबन्धुमयीमिमाम् । यन्मायां नालमुत्तुर्तुं जगत्तस्मै नमो नमः ॥ १३ तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगमायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥ १४ यज्वभिर्यज्ञपुरुषो वासुदेवश्च सात्वतैः । वेदान्तवेदिभिर्विष्णुः प्रोच्यते यो नतोऽस्मि तम् ॥ १५ यथा यत्र जगद्धाग्नि धातर्येतत्प्रतिष्ठितम् । सदसत्तेन सत्येन मय्यसौ यातु सौम्यताम् ॥ १६ स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ १७ श्रीपराशर उवाच इत्थं सञ्चिन्तयन्विष्णुं भक्तिनम्रात्ममानसः । अक्रूरो गोकुलं प्राप्तः किञ्चित्सूर्ये विराजति ॥ १८ स ददर्श तदा कृष्णमादावादोहने गवाम् । वत्समध्यगतं फुल्लनीलोत्पलदलच्छविम् ॥ १९ प्रफुल्लपद्मपत्राक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् । प्रलम्बबाहुमायामतुङ्गोरःस्थलमुन्नसम् ॥ २० सविलासस्मिताधारं बिभ्राणं मुखपङ्कजम् । तुङ्गरक्तनखं पद्भ्यां धरण्यां सुप्रतिष्ठितम् ॥ २१ बिभ्राणं वाससी पीते वन्यपुष्पविभूषितम् । सेन्दुनीलाचलाभं तं सिताम्भोजावतंसकम् ॥ २२ हंसकुन्देन्दुधवलं नीलाम्बरधरं द्विज । तस्यानु बलभद्रं च ददर्श यदुनन्दनम् ॥ २३ प्रांशुमुत्तुङ्गबाहुंसं विकासिमुखपङ्कजम् । मेघमालापरिवृतं कैलासाद्रिमिवापरम् ॥ २४ तौ दृष्ट्वा विकसद्वक्त्रसरोजः स महामतिः । पुलकाञ्चितसर्वाङ्गस्तदाक्रूरोऽभवन्मुने ॥ २५ तदेतत्परमं धाम तदेतत्परमं पदम् । भगवद्वासुदेवांशो द्विधा योऽयं व्यवस्थितः ॥ २६ साफल्यमक्ष्णोर्युगमेतदत्र दृष्टे जगद्धातरि यातमुच्चैः ।
'जिनकी इस पिता, पुत्र, सुहृद्, भ्राता, माता और बन्धुरूपिणी मायाको पार करनेमें संसार सर्वथा असमर्थ है, उन मायापतिको बारम्बार नमस्कार है॥ १३॥ जिनमें हृदयको लगा देनेसे पुरुष इस योगमायारूप विस्तृत अविद्याको पार कर जाता है, उन विद्यास्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है॥ १४॥ जिन्हें याज्ञिकलोग 'यज्ञपुरुष', सात्वत (यादव अथवा भगवद्भक्त)-गण 'वासुदेव' और वेदान्तवेत्ता 'विष्णु' कहते हैं उन्हें बारम्बार नमस्कार है॥ १५॥ जिस (सत्य)-से यह सदसद्रूप जगत् उस जगदाधार विधातामें ही स्थित है उस सत्यबलसे ही वे प्रभु मुझपर प्रसन्न हों॥ १६॥ जिनके स्मरणमात्रसे पुरुष सर्वथा कल्याणपात्र हो जाता है, मैं सर्वदा उन अजन्मा हरिकी शरणमें प्राप्त होता हूँ' ॥ १७ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय ! भक्तिविनम्रचित्त अक्रूरजी इस प्रकार श्रीविष्णुभगवान्का चिन्तन करते कुछ-कुछ सूर्य रहते ही गोकुलमें पहुँच गये ॥ १८॥ वहाँ पहुँचनेपर पहले उन्होंने खिले हुए नीलकमलकी-सी कान्तिवाले श्रीकृष्णचन्द्रको गौओंके दोहनस्थानमें बछड़ोंके बीच विराजमान देखा ॥ १९॥ जिनके नेत्र खिले हुए कमलके समान थे, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्न सुशोभित था, भुजाएँ लम्बी-लम्बी थीं, वक्षःस्थल विशाल और ऊँचा था तथा नासिका उन्नत थी ॥ २०॥ जो सविलास हास्ययुक्त मनोहर मुखारविन्दसे सुशोभित थे तथा उन्नत और रक्तनखयुक्त चरणोंसे पृथिवीपर विराजमान थे ॥ २१॥ जो दो पीताम्बर धारण किये थे, वन्यपुष्पोंसे विभूषित थे तथा जिनका श्वेत कमलके आभूषणोंसे युक्त श्याम शरीर सचन्द्र नीलाचलके समान सुशोभित था ॥ २२ ॥
हे द्विज ! श्रीब्रजचन्द्रके पीछे उन्होंने हंस, कुन्द और चन्द्रमाके समान गौरवर्ण नीलाम्बरधारी यदुनन्दन श्रीबलभद्रजीको देखा ॥ २३ ॥ विशाल भुजदण्ड, उन्नत स्कन्ध और विकसित मुखारविन्द श्रीबलभद्रजी मेघमालासे घिरे हुए दूसरे कैलासपर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ २४ ॥
हे मुने ! उन दोनों बालकोंको देखकर महामति अक्रूरजीका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया तथा उनके सर्वाङ्गमें पुलकावली छा गयी ॥ २५ ॥ [और वे मन-ही-मन कहने लगे-] इन दो रूपोंमें जो यह भगवान् वासुदेवका अंश स्थित है वही परमधाम है और वही परमपद है ॥ २६॥ इन जगद्विधाताके दर्शन पाकर आज मेरे नेत्रयुगल तो सफल हो गये; किंतु क्या अब
| अ० १७ ] | * पञ्चम अंश * | ३६१ |
|---|---|---|
| अप्यङ्गमेतद्भगवत्प्रसादा- | भगवत्कृपासे इनका अंगसंग पाकर मेरा शरीर भी | |
| त्तदङ्गसङ्गे फलवन्मम स्यात्॥ २७ | कृतकृत्य हो सकेगा?॥ २७॥ जिनकी अंगुलीके | |
| अप्येष पृष्ठे मम हस्तपद्मं | स्पर्शमात्रसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हुए पुरुष | |
| करिष्यति श्रीमदनन्तमूर्तिः। | निर्दोषसिद्धि (कैवल्यमोक्ष) प्राप्त कर लेते हैं क्या | |
| यस्याङ्गुलिस्पर्शहताखिलाघै- | वे अनन्तमूर्ति श्रीमान् हरि मेरी पीठपर अपना | |
| रवाप्यते सिद्धिरपास्तदोषा॥ २८ | करकमल रखेंगे?॥ २८॥ | |
| येनाग्निविद्युद्रविरश्मिमाला- | जिन्होंने अग्नि, विद्युत् और सूर्यकी किरणमालाके | |
| करालमत्युग्रमपेतचक्रम् । | समान अपने उग्र चक्रका प्रहार कर दैत्यपतिकी | |
| चक्रं घ्नता दैत्यपतेर्हतानि | सेनाको नष्ट करते हुए असुर-सुन्दरियोंकी आँखोंके | |
| दैत्याङ्गनानां नयनाञ्जनानि॥ २९ | अंजन धो डाले थे॥ २९॥ जिनको एक जलबिन्दु | |
| यत्राम्बु विन्यस्य बलिर्मनोज्ञा- | प्रदान करनेसे राजा बलिने पृथिवीतलमें अति मनोज्ञ | |
| नवाप भोगान्वसुधातळस्थः। | भोग और एक मन्वन्तरतक देवत्वलाभपूर्वक शत्रुविहीन | |
| तथामरत्वं त्रिदशाधिपत्वं | इन्द्रपद प्राप्त किया था॥ ३०॥ | |
| मन्वन्तरं पूर्णमपेतशत्रुम्॥ ३० | ||
| अप्येष मां कंसपरिग्रहेण | वे ही विष्णुभगवान् मुझ निर्दोषको भी कंसके | |
| दोषास्पदीभूतमदोषदुष्टम् । | संसर्गसे दोषी ठहराकर क्या मेरी अवज्ञा कर | |
| कर्तावमानोपहतं धिगस्तु | देंगे? मेरे ऐसे साधुजनबहिष्कृत पुरुषके जन्मको | |
| तज्जन्म यत्साधुबहिष्कृतस्य॥ ३१ | धिक्कार है॥ ३१॥ अथवा संसारमें ऐसी कौन वस्तु | |
| ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे- | है जो उन ज्ञानस्वरूप, शुद्धसत्त्वराशि, दोषहीन, | |
| रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य। | नित्य-प्रकाश और समस्त भूतोंके हृदयस्थित प्रभुको | |
| किं वा जगत्यत्र समस्तपुंसा- | विदित न हो?॥ ३२॥ | |
| मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य॥ ३२ | ||
| तस्मादहं भक्तिविनम्रचेता | अतः मैं उन ईश्वरोंके ईश्वर, आदि, | |
| व्रजामि सर्वेश्वरमीश्वराणाम्। | मध्य और अन्तरहित पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुके | |
| अंशावतारं पुरुषोत्तमस्य | अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके पास भक्ति-विनम्रचित्तसे | |
| ह्यनादिमध्यान्तमजस्य विष्णोः॥ ३३ | जाता हूँ। [मुझे पूर्ण आशा है, वे मेरी कभी अवज्ञा न करेंगे]॥ ३३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
३६२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १८
अठारहवाँ अध्याय भगवान्का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! यदुवंशी अक्रूरजीने |
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| चिन्तयन्निति गोविन्दमुपगम्य स यादवः।<br>अक्रूरोऽस्मीति चरणौ ननाम शिरसा हरेः॥ १ | इस प्रकार चिन्तन करते श्रीगोविन्दके पास पहुँचकर उनके चरणोंमें सिर झुकाते हुए 'मैं अक्रूर हूँ' ऐसा कहकर प्रणाम किया॥ १॥ |
| सोऽप्येनं ध्वजवज्राब्जकृतचिह्नेन पाणिना।<br>संस्पृश्याकृष्य च प्रीत्या सुगाढं परिषस्वजे॥ २ | भगवान्ने भी अपने ध्वजा-वज्र-पद्मांकित करकमलोंसे उन्हें स्पर्शकर और प्रीतिपूर्वक अपनी ओर खींचकर गाढ़ आलिंगन किया॥ २॥ |
| कृतसंवन्दनौ तेन यथावद्दलकेशवौ।<br>ततः प्रविष्टौ संहृष्टौ तमादायात्ममन्दिरम्॥ ३ | तदनन्तर अक्रूरजीके यथायोग्य प्रणामादि कर चुकनेपर श्रीबलरामजी और कृष्णचन्द्र अति आनन्दित हो उन्हें साथ लेकर अपने घर आये॥ ३॥ |
| सह ताभ्यां तदाक्रूरः कृतसंवन्दनादिकः।<br>भुक्तभोज्यो यथान्यायमाचचक्षे ततस्तयोः॥ ४ | फिर उनके द्वारा सत्कृत होकर यथायोग्य भोजनादि कर चुकनेपर अक्रूरने उनसे वह सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना आरम्भ किया |
| यथा निर्भर्त्सिस्रस्तेन कंसेनानकदुन्दुभिः।<br>यथा च देवकी देवी दानवेन दुरात्मना॥ ५ | जैसे कि दुरात्मा दानव कंसने आनकदुन्दुभि वसुदेव और देवी देवकीको डाँटा था तथा जिस प्रकार वह दुरात्मा अपने पिता उग्रसेनसे दुर्व्यवहार कर रहा है और जिसलिये उसने उन्हें (अक्रूरजीको) वृन्दावन भेजा है॥ ४-६॥ |
| उग्रसेने यथा कंसस्स दुरात्मा च वर्तते।<br>यं चैवार्थं समुद्दिश्य कंसेन तु विसर्जितः॥ ६ | |
| तत्सर्वं विस्तराच्छ्रुत्वा भगवान्देवकीसुतः।<br>उवाचाखिलमप्येतज्ज्ञातं दानपते मया॥ ७ | भगवान् देवकीनन्दनने यह सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनकर कहा—'हे दानपते! ये सब बातें मुझे मालूम हो गयीं॥ ७॥ |
| करिष्ये तन्महाभाग यदत्रौपयिकं मतम्।<br>विचिन्त्यं नान्यथैतत्ते विद्धि कंसं हतं मया॥ ८ | हे महाभाग! इस विषयमें मुझे जो उपयुक्त जान पड़ेगा वही करूँगा। अब तुम कंसको मेरेद्वारा मरा हुआ ही समझो, इसमें किसी और तरहका विचार न करो॥ ८॥ |
| अहंरामश्च मथुरां श्वो यास्यावस्सह त्वया।<br>गोपवृद्धाश्च यास्यन्ति ह्यादायोपायनं बहु॥ ९ | भैया बलराम और मैं दोनों ही कल तुम्हारे साथ मथुरा चलेंगे, हमारे साथ ही दूसरे बड़े-बूढ़े गोप भी बहुत-सा उपहार लेकर जायँगे॥ ९॥ |
| निशेयं नीयतां वीर न चिन्तां कर्तुमर्हसि।<br>त्रिरात्राभ्यन्तरे कंसं निहनिष्यामि सानुगम्॥ १० | हे वीर! आप यह रात्रि सुखपूर्वक बिताइये, किसी प्रकारकी चिन्ता न कीजिये। तीन रात्रिके भीतर मैं कंसको उसके अनुचरोंसहित अवश्य मार डालूँगा'॥ १०॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर अक्रूरजी, श्रीकृष्णचन्द्र और बलरामजी सम्पूर्ण गोपोंको कंसकी आज्ञा सुना नन्दगोपके घर सो गये॥ ११॥ |
| समादिश्य ततो गोपानक्रूरोऽपि च केशवः।<br>सुष्वाप बलभद्रश्च नन्दगोपगृहे ततः॥ ११ | |
| ततः प्रभाते विमले कृष्णरामौ महाद्युती।<br>अक्रूरेण समं गन्तुमुद्यतौ मथुरां पुरीम्॥ १२ | दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल होते ही महातेजस्वी राम और कृष्णको अक्रूरके साथ मथुरा चलनेकी तैयारी करते देख जिनकी भुजाओंके कंकण ढीले हो गये हैं वे गोपियाँ नेत्रोंमें आँसू भरकर तथा दुःखार्त्त होकर दीर्घ निश्वास छोड़ती हुई परस्पर कहने लगीं—॥ १२-१३॥ |
| दृष्ट्वा गोपीजनस्सास्त्रः श्लथद्वलयबाहुकः।<br>निःश्ववासातिदुःखार्त्तः प्राह चेदं परस्परम्॥ १३ | |
| मथुरां प्राप्य गोविन्दः कथं गोकुलमेष्यति।<br>नगरस्त्रीकलालापमधु श्रोत्रेण पास्यति॥ १४ | "अब मथुरापुरी जाकर श्रीकृष्णचन्द्र फिर गोकुलमें क्यों आने लगे? क्योंकि वहाँ तो ये अपने कानोंसे नगरनारियोंके मधुर आलापरूप मधुका ही पान करेंगे॥ १४॥ |
अ० १८ ] * पञ्चम अंश * ३६३
| विलासवाक्यपानेषु नागरीणां कृतास्पदम् ।<br>चित्तमस्य कथं भूयो ग्राम्यगोपीषु यास्यति ॥ १५<br>सारं समस्तगोष्ठस्य विधिना हरता हरिम् ।<br>प्रहृतं गोपयोषित्सु निर्घृणेन दुरात्मना ॥ १६<br>भावगर्भस्मितं वाक्यं विलासवलिता गतिः ।<br>नागरीणामतीवैतत्कटाक्षेक्षितमेव च ॥ १७<br>ग्राम्यो हरिरयं तासां विलासनिगडैर्युतः ।<br>भवतीनां पुनः पार्श्वं कया युक्त्या समेष्यति ॥ १८<br>एषैष रथमारुह्य मथुरां याति केशवः ।<br>क्रूरेणाक्रूरकेणात्र निर्घृणेन प्रतारितः ॥ १९<br>किं न वेत्ति नृशंसोऽयमनुरागपरं जनम् ।<br>येनैवमक्ष्णोराह्लादं नयत्यन्यत्र नो हरिम् ॥ २०<br>एष रामेण सहितः प्रयातत्यन्तनिर्घृणः ।<br>रथमारुह्य गोविन्दस्त्वर्यतामस्य वारणे ॥ २१<br>गुरूणामग्रतो वक्तुं किं ब्रवीषि न नः क्षमम् ।<br>गुरवः किं करिष्यन्ति दग्धानां विरहाग्निना ॥ २२<br>नन्दगोपमुखा गोपा गन्तुमेते समुद्यताः ।<br>नोद्यमं कुरुते कश्चिद्गोविन्दविनिवर्तने ॥ २३<br>सुप्रभाताद्य रजनी मथुरावासियोषिताम् ।<br>पास्यन्त्यच्युतवक्त्राब्जं यासां नेत्रालिपङ्क्तयः ॥ २४<br>धन्यास्ते पथि ये कृष्णमितो यान्त्यनिवारिताः ।<br>उद्वहिष्यन्ति पश्यन्तस्स्वदेहं पुलकाञ्चितम् ॥ २५<br>मथुरानगरीपौरनयनानां महोत्सवः ।<br>गोविन्दावयवैर्दृष्टैरतीवाद्य भविष्यति ॥ २६<br>को नु स्वप्नस्सभाग्याभिर्दृष्टस्ताभिरधोक्षजम् ।<br>विस्तारिकान्तिनयना या द्रक्ष्यन्त्यनिवारिताः ॥ २७<br>अहो गोपीजनस्यास्य दर्शयित्वा महानिधिम् ।<br>उत्कृत्तान्यद्य नेत्राणि विधिनाकरुणात्मना ॥ २८<br>अनुरागेण शैथिल्यमस्मासु व्रजिते हरौ ।<br>शैथिल्यमुपयान्त्याशु करेषु वलयान्यपि ॥ २९ | नगरकी [ विदग्ध ] वनिताओंके विलासयुक्त वचनोंके रसपानमें आसक्त होकर फिर इनका चित्त गँवारी गोपियोंकी ओर क्यों जाने लगा ? ॥ १५ ॥ आज निर्दयी दुरात्मा विधाताने समस्त व्रजके सारभूत (सर्वस्वस्वरूप) श्रीहरिको हरकर हम गोपनारियोंपर घोर आघात किया है ॥ १६ ॥ नगरकी नारियोंमें भावपूर्ण मुस्कानमयी बोली, विलासवलित गति और कटाक्षपूर्ण चितवनकी स्वभावसे ही अधिकता होती है। उनके विलास-बन्धनोंसे बँधकर यह ग्राम्य हरि फिर किस युक्तिसे तुम्हारे [हमारे] पास आवेगा ? ॥ १७-१८ ॥ देखो, देखो, क्रूर एवं निर्दयी अक्रूरके बहकावेमें आकर ये कृष्णचन्द्र रथपर चढ़े हुए मथुरा जा रहे हैं ॥ १९ ॥ यह नृशंस अक्रूर क्या अनुरागीजनॉके हृदयका भाव तनिक भी नहीं जानता ? जो यह इस प्रकार हमारे नयनानन्दवर्धन नन्दनन्दनको अन्यत्र लिये जाता है ॥ २० ॥ देखो, यह अत्यन्त निष्ठुर गोविन्द रामके साथ रथपर चढ़कर जा रहे हैं; अरी ! इन्हें रोकनेमें शीघ्रता करो'' ॥ २१ ॥<br>[इसपर गुरुजनोंके सामने ऐसा करनेमें असमर्थता प्रकट करनेवाली किसी गोपीको लक्ष्य करके उसने फिर कहा-] “अरी! तू क्या कह रही है कि अपने गुरुजनोंके सामने हम ऐसा नहीं कर सकतीं ?'' भला अब विरहाग्निसे भस्मीभूत हुई हमलोगोंका गुरुजन क्या करेंगे ? ॥ २२ ॥ देखो, यह नन्दगोप आदि गोपगण भी उन्हींके साथ जानेकी तैयारी कर रहे हैं। इनमेंसे भी कोई गोविन्दको लौटानेका प्रयत्न नहीं करता ॥ २३ ॥ आजकी रात्रि मथुरावासिनी स्त्रियोंके लिये सुन्दर प्रभातवाली हुई है; क्योंकि आज उनके नयन-भृंग श्रीअच्युतके मुखारविन्दका मकरन्द पान करेंगे ॥ २४ ॥ जो लोग इधरसे बिना रोक-टोक श्रीकृष्णचन्द्रका अनुगमन कर रहे हैं वे धन्य हैं; क्योंकि वे उनका दर्शन करते हुए अपने रोमांचयुक्त शरीरका वहन करेंगे ॥ २५ ॥ 'आज श्रीगोविन्दके अंग-प्रत्यंगोंको देखकर मथुरावासियोंके नेत्रोंको अत्यन्त महोत्सव होगा ॥ २६ ॥ आज न जाने उन भाग्यशालिनियोंने ऐसा कौन शुभ स्वप्न देखा है जो वे कान्तिमय विशाल नयनोंवाली (मथुरापुरीकी स्त्रियाँ) स्वच्छन्दतापूर्वक श्रीअधोक्षजको निहारेंगी ? ॥ २७ ॥ अहो ! निष्ठुर विधाताने गोपियोंको महानिधि दिखलाकर आज उनके नेत्र निकाल लिये ॥ २८ ॥ देखो ! हमारे प्रति श्रीहरिके अनुरागमें शिथिलता आ जानेसे हमारे हाथोंके कंकण भी तुरंत ही ढीले पड़ गये हैं ॥ २९ ॥ |
३६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८
अक्रूरः क्रूरहृदयश्शीघ्रं प्रेरयते हयान्।
एवमार्त्तासु योषित्सु कृपा कस्य न जायते ॥ ३०
एष कृष्णरथस्योच्चैश्चक्ररेणुर्निरीक्ष्यताम्।
दूरीभूतो हरियेन सोऽपि रेणुर्न लक्ष्यते ॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
इत्येवमतिहार्द्देन गोपीजननिरीक्षितः।
तत्याज व्रजभूभागं सह रामेण केशवः ॥ ३२
गच्छन्तो जवनाश्वेन रथेन यमुनाटटम्।
प्राप्ता मध्याह्नसमये रामाक्रूरजनार्दनाः ॥ ३३
अथाह कृष्णमक्रूरो भवद्भ्यां तावदास्यताम्।
यावत्करोमि कालिन्द्यां आह्निकार्णमम्भसि ॥ ३४
श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्तस्ततस्स्नातस्स्वाचान्तस्स महामतिः।
दध्यौ ब्रह्म परं विप्र प्रविष्टो यमुनाजले ॥ ३५
फणासहस्रमालाढ्यं बलभद्रं ददर्श सः।
कुन्दमालाङ्गमुन्निद्रपद्मपत्रायतेक्षणम् ॥ ३६
वृतं वासुकिरम्भाद्यैर्महद्भिः पवनाशिभिः।
संस्तूयमानमुद्गन्धिवनमालाविभूषितम् ॥ ३७
दधानमसिते वस्त्रे चारुरूपवतंसकम्।
चारुकुण्डलिनं भान्तमन्तर्जंलतले स्थितम् ॥ ३८
तस्योत्संगे घनश्याममाताम्रायतलोचनम्।
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं चक्राद्यायुधभूषणम् ॥ ३९
पीते वसानं वसने चित्रमाल्योपशोभितम्।
शक्रचापत्तडिन्मालाविचित्रमिव तोयदम् ॥ ४०
श्रीवत्सवक्षसं चारु स्फुरन्मकरकुण्डलम्।
ददर्श कृष्णमक्लिष्टं पुण्डरीकावतंसकम् ॥ ४१
सनन्दनाद्यैर्मुनिभिस्सिद्धयोगैरकल्मषैः।
सञ्चिन्त्यमानं तत्रस्थैर्नासाग्रन्यस्तलोचनैः ॥ ४२
भला हम-जैसी दुःखिनी अबलाओंपर किसे दया न आवेगी? परन्तु देखो, यह क्रूर-हृदय अक्रूर तो बड़ी शीघ्रतासे घोड़ोंको हाँक रहा है!॥ ३०॥
देखो, यह कृष्णचन्द्रके रथकी धूलि दिखलायी दे रही है; किन्तु हा! अब तो श्रीहरि इतनी दूर चले गये कि वह धूलि भी नहीं दीखती'॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोपियोंके अति अनुरागसहित देखते-देखते श्रीकृष्णचन्द्रने बलरामजीके सहित व्रजभूमिको त्याग दिया॥ ३२॥ तब वे राम, कृष्ण और अक्रूर शीघ्रगामी घोड़ोंवाले रथसे चलते-चलते मध्याह्नके समय यमुना तटपर आ गये॥ ३३॥
वहाँ पहुँचनेपर अक्रूरने श्रीकृष्णचन्द्रसे कहा—"जबतक मैं यमुनाजलमें मध्याह्नकालीन उपासनासे निवृत्त होऊँ तबतक आप दोनों यहीं विराजें"॥ ३४॥
श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र ! तब भगवान्के 'बहुत अच्छा' कहनेपर महामति अक्रूरजी यमुनाजलमें घुसकर स्नान और आचमन आदिके अनन्तर परब्रह्मका ध्यान करने लगे॥ ३५॥ उस समय उन्होंने देखा कि बलभद्रजी सहस्रफणावलिसे सुशोभित हैं, उनका शरीर कुन्दमालाओंके समान [शुभ्रवर्ण] है तथा नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं॥ ३६॥ वे वासुकि और रम्भ आदि महासर्पोंसे घिरकर उनसे प्रशंसित हो रहे हैं तथा अत्यन्त सुगन्धित वनमालाओंसे विभूषित हैं॥ ३७॥ वे दो श्याम वस्त्र धारण किये, सुन्दर कर्णभूषण पहने तथा मनोहर कुण्डली (गँडुली) मारे जलके भीतर विराजमान हैं॥ ३८॥
उनकी गोदमें उन्होंने आनन्दमय कमलभूषण श्रीकृष्णचन्द्रको देखा, जो मेघके समान श्यामवर्ण, कुछ लाल-लाल विशाल नयनोंवाले, चतुर्भुज, मनोहर अंगोपांगोंवाले तथा शंख-चक्रादि आयुधोंसे सुशोभित हैं; जो पीताम्बर पहने हुए हैं और विचित्र वनमालासे विभूषित हैं, तथा [उनके कारण] इन्द्रधनुष और विद्युन्मालामण्डित सजल मेघके समान जान पड़ते हैं तथा जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न और कानोंमें देदीप्यमान मकराकृत कुण्डल विराजमान हैं॥ ३९-४१॥ [अक्रूरजीने यह भी देखा कि] सनकादि मुनिजन और निष्पाप सिद्ध तथा योगिजन उस जलमें ही स्थित होकर नासिकाग्र दृष्टिसे उन (श्रीकृष्णचन्द्र)-का ही चिन्तन कर रहे हैं॥ ४२॥