भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 358

अ० १२] * पञ्चम अंश * ३४७


बारहवाँ अध्याय

शक्र-कृष्ण-संवाद, कृष्ण-स्तुति

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोवर्धनपर्वतका धारण और गोकुलकी रक्षा हो जानेपर देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन करनेकी इच्छा हुई॥ १॥ अतः शत्रुजित् देवराज गजराज ऐरावतपर चढ़कर गोवर्धनपर्वतपर आये और वहाँ सम्पूर्ण जगत्के रक्षक गोपवेषधारी महाबलवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते देखा॥ २-३॥ हे द्विज! उन्होंने यह भी देखा कि पक्षिश्रेष्ठ गरुड अदृश्यभावसे उनके ऊपर रहकर अपने पंखोंसे उनकी छाया कर रहे हैं॥ ४॥ तब वे ऐरावतसे उतर पड़े और एकान्तमें श्रीमधुसूदनकी ओर प्रीतिपूर्वक दृष्टि फैलाते हुए मुसकाकर बोले॥ ५॥
धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले।<br>रोचयामास कृष्णस्य दर्शनं पाकशासनः॥ १<br>सोऽधिरुह्य महानागमैरावतममित्रजित्।<br>गोवर्धनगिरौ कृष्णं ददर्श त्रिदशेश्वरः॥ २<br>चारयन्तं महावीर्यं गास्तु गोपवपुर्धरम्।<br>कृत्स्नस्य जगतो गोपं वृतं गोपकुमारकैः॥ ३<br>गरुडं च ददर्शोच्चैरन्तर्द्धानगतं द्विज।<br>कृतच्छायं हरेर्मूर्ध्नि पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवम्॥ ४<br>अवरुह्य स नागेन्द्रादेकान्ते मधुसूदनम्।<br>शक्रस्सस्मितमाहेदं प्रीतिविस्तारितेक्षणः॥ ५
इन्द्र उवाचइन्द्रने कहा— हे श्रीकृष्णचन्द्र! मैं जिसलिये आपके पास आया हूँ, वह सुनिये—हे महाबाहो! आप इसे अन्यथा न समझें॥ ६॥ हे अखिलाधार परमेश्वर! आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है॥ ७॥ यज्ञभंगसे विरोध मानकर ही मैंने गोकुलको नष्ट करनेके लिये महामेघोंको आज्ञा दी थी, उन्होंने यह संहार मचाया था॥ ८॥ किन्तु आपने पर्वतको उखाड़कर गौओंको बचा लिया। हे वीर! आपके इस अद्भुत कर्मसे मैं अति प्रसन्न हूँ॥ ९॥
कृष्ण कृष्ण शृणुष्वेदं यदर्थमहमागतः।<br>त्वत्समीपं महाबाहो नैतच्चिन्त्यं त्वयान्यथा॥ ६<br>भारावतारणार्थाय पृथिव्याः पृथिवीतले।<br>अवतीर्णोऽखिलाधार त्वमेव परमेश्वर॥ ७<br>मखभंगविरोधेन मया गोकुलनाशकाः।<br>समादिष्टा महामेघास्तैश्चेदं कदनं कृतम्॥ ८
हे कृष्ण! आपने जो अपने एक हाथपर गोवर्धन धारण किया है, इससे मैं देवताओंका प्रयोजन [आपके द्वारा] सिद्ध हुआ ही समझता हूँ॥ १०॥ [गोवंशकी रक्षाद्वारा] आपसे रक्षित [कामधेनु आदि] गौओंसे प्रेरित होकर ही मैं आपका विशेष सत्कार करनेके लिये यहाँ आपके पास आया हूँ॥ ११॥ हे कृष्ण! अब मैं गौओंके वक्यानुसार ही आपका उपेन्द्र-पदपर अभिषेक करूँगा तथा आप गौओंके इन्द्र (स्वामी) हैं इसलिये आपका नाम 'गोविन्द' भी होगा॥ १२॥
त्रातास्ताश्च त्वया गावस्समुत्पाट्य महीधरम्।<br>तेनाहं तोषितो वीरकर्मणात्यद्भुतेन ते॥ ९<br>साधितं कृष्ण देवानामहं मन्ये प्रयोजनम्।<br>त्वयायमद्रिप्रवरः करेणैकेन यद्धृतः॥ १०<br>गोभिश्च चोदितः कृष्ण त्वत्सकाशमिहागतः।<br>त्वया त्राताभिरत्यर्थं युष्मत्सत्कारकारणात्॥ ११<br>स त्वां कृष्णाभिषेक्ष्यामि गवां वाक्यप्रचोदितः।<br>उपेन्द्रत्वे गवामिन्द्रो गोविन्दस्त्वं भविष्यसि॥ १२