भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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३४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०

निभृतोऽभवदत्यर्थं समुद्रः स्तिमितोदकः। क्रमावाप्तमहायोगो निश्चलात्मा यथा यतिः॥ १०

सर्वत्रातिप्रसन्नानि सलिलानि तथाभवन्। ज्ञाते सर्वगते विष्णौ मनांसीव सुमेधसाम्॥ ११

बभूव निर्मलं व्योम शरदा ध्वस्ततोयदम्। योगाग्निदग्धक्लेशौघं योगिनामिव मानसम्॥ १२

सूर्यांशुजनितं तापं निन्ये तारापतिः शमम्। अहंमानोद्भवं दुःखं विवेकः सुमहानीव॥ १३

नभसोऽब्दं भुवः पङ्कं कालुष्यं चाम्भसश्शरत्। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रत्याहार इवाहरत्॥ १४

प्राणायाम इवाम्भोभिस्सरसां कृतपूरकैः। अभ्यस्यतेऽनुदिवसं रेचकाकुम्भकादिभिः॥ १५

विमलाम्बरनक्षत्रे काले चाभ्यागते व्रजे। ददर्शेन्द्रमहारम्भायोद्यतांस्तान्व्रजौकसः॥ १६

कृष्णस्तानत्सुकान्दृष्ट्वा गोपानुत्सवलालसान्। कौतूहलादिदं वाक्यं प्राह वृद्धान्महामतिः॥ १७

कोऽयं शक्रमखो नाम येन वो हर्ष आगतः। प्राह तं नन्दगोपश्च पृच्छन्तमतिसादरम्॥ १८

नन्दगोप उवाच मेघानां पयसां चेशो देवराजश्शतक्रतुः। तेन सञ्चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बुमयं रसम्॥ १९

तद्वृष्टिजनितं सस्यं वयमन्ये च देहिनः। वर्त्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्च देवताः॥ २०

क्षीरवत्य इमा गावो वत्सवत्यश्च निर्वृताः। तेन संवर्द्धितैस्सस्यैस्तुष्टाः पुष्टा भवन्ति वै॥ २१

क्लेशों से पुनः संयोग हो* जाता है उसी प्रकार पहले छोड़े हुए सरोवरके जलसे हंसका पुनः संयोग हो गया॥ ९॥ क्रमशः महायोग (सम्प्रज्ञातसमाधि) प्राप्त कर लेनेपर जैसे यति निश्चलात्मा हो जाता है, वैसे ही जलके स्थिर हो जानेसे समुद्र निश्चल हो गया॥ १०॥ जिस प्रकार सर्वगत भगवान् विष्णुको जान लेनेपर मेधावी पुरुषोंके चित्त शान्त हो जाते हैं वैसे ही समस्त जलाशयोंका जल स्वच्छ हो गया॥ ११॥

योगाग्निद्वारा क्लेशसमूहके नष्ट हो जानेपर जैसे योगियोंके चित्त स्वच्छ हो जाते हैं उसी प्रकार शीतके कारण मेघोंके लीन हो जानेसे आकाश निर्मल हो गया॥ १२॥ जिस प्रकार अहंकारजनित महान् दुःखको विवेक शान्त कर देता है, उसी प्रकार सूर्यकिरणोंसे उत्पन्न हुए तापको चन्द्रमाने शान्त कर दिया॥ १३॥ प्रत्याहार जैसे इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे खींच लेता है वैसे ही शरत्कालने आकाशसे मेघोंको, पृथिवीसे धूलिको और जलसे मलको दूर कर दिया॥ १४॥ [पानीसे भर जानेके कारण] मानो तालाबोंके जल पूरक कर चुकनेपर अब [स्थिर रहने और सूखनेसे] रात-दिन कुम्भक एवं रेचक क्रियाद्वारा प्राणायामका अभ्यास कर रहे हैं॥ १५॥

इस प्रकार व्रजमण्डलमें निर्मल आकाश और नक्षत्रमय शरत्कालके आनेपर श्रीकृष्णचन्द्रने समस्त व्रजवासियोंको इन्द्रका उत्सव मनानेके लिये तैयारी करते देखा॥ १६॥ महामति कृष्णने उन गोपोंको उत्सवकी उमंगसे अत्यन्त उत्साहपूर्ण देखकर कुतूहलवश अपने बड़े-बूढ़ोंसे पूछा-॥ १७॥ "आपलोग जिसके लिये फूले नहीं समाते वह इन्द्रयज्ञ क्या है?" इस प्रकार अत्यन्त आदरपूर्वक पूछनेपर उनसे नन्दगोपने कहा-॥ १८॥

नन्दगोप बोले- मेघ और जलका स्वामी देवराज इन्द्र है। उसकी प्रेरणासे ही मेघगण जलरूप रसकी वर्षा करते हैं॥ १९॥ हम और अन्य समस्त देहधारी उस वर्षासे उत्पन्न हुए अन्नको ही बर्तते हैं तथा उसीको उपयोगमें लाते हुए देवताओंको भी तृप्त करते हैं॥ २०॥ उस (वर्षा)-से बढ़े हुए अन्नसे ही तृप्त होकर ये गौएँ तुष्ट और


अर्थात् व्याधि, स्त्यान (साधनमें अप्रवृत्ति), संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति (वैराग्यहीनता), भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व (लक्ष्यकी उपलब्धि न होना) और अनवस्थितत्व (लक्ष्यमें स्थिर न होना) ये नौ अन्तराय हैं।

* क्लेश पाँच हैं; जैसे— अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (यो० द० २।३) अर्थात् अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और अभिनिवेश (मरणत्रास) ये पाँच क्लेश हैं।