विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १० ] * पञ्चम अंश * ३४३
नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षार्दितो जनः।
दृश्यते यत्र दृश्यन्ते वृष्टिमन्तो बलाहकाः ॥ २२
भौममेतत्पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः।
पर्जन्यस्सर्वलोकस्योद्भवाय भुवि वर्षति ॥ २३
तस्मात्प्रावृषि राजानस्सर्वे शक्रं मुदा युताः।
मखैस्सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ २४
श्रीपराशर उवाच
नन्दगोपस्य वचनं श्रुत्वेत्थं शक्रपूजने।
रोषाय त्रिदशेन्द्रस्य प्राह दामोदरस्तदा ॥ २५
न वयं कृषिकर्त्तारो वाणिज्याजीविनो न च।
गावोऽस्मद्दैवतं तात वयं वनचरा यतः ॥ २६
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिस्तथा परा।
विद्या चतुष्टयं चैतद्वार्त्तामात्रं शृणुष्व मे ॥ २७
कृषिर्वणिज्या तद्वच्च तृतीयं पशुपालनम्।
विद्या ह्येका महाभाग वार्त्ता वृत्तित्रयाश्रया ॥ २८
कर्षकाणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम्।
अस्माकं गौः परा वृत्तिर्वार्त्ताभेदैरियं त्रिभिः ॥ २९
विद्यया यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं महत्।
सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिका ॥ ३०
यो यस्य फलमश्नन्वै पूजयत्यपरं नरः।
इह च प्रेत्य चैवासौ न तदाप्नोति शोभनम् ॥ ३१
कृष्यान्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं च पुनर्व्वनम्।
वनान्ता गिरयस्सर्वे ते चास्माकं परा गतिः ॥ ३२
न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा।
सुखिनस्त्वखिले लोके यथा वै चक्रचारिणः ॥ ३३
श्रूयन्ते गिरयश्चैव वनेऽस्मिन्कामरूपिणः।
तत्तद्रूपं समास्थाय रमन्ते स्वेषु सानुषु ॥ ३४
पुष्ट होकर वत्सवती एवं दूध देनेवाली होती हैं॥ २१॥ जिस भूमिपर बरसनेवाले मेघ दिखायी देते हैं, उसपर कभी अन्न और तृणका अभाव नहीं होता और न कभी वहाँके लोग भूखे रहते ही देखे जाते हैं॥ २२॥ यह पर्जन्यदेव (इन्द्र) पृथिवीके जलको सूर्यकिरणोंद्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धिके लिये उसे मेघोंद्वारा पृथिवीपर बरसा देते हैं। इसलिये वर्षा ऋतुमें समस्त राजालोग, हम और अन्य मनुष्यगण देवराज इन्द्रकी यज्ञोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक पूजा किया करते हैं॥ २३-२४॥
श्रीपराशरजी बोले— इन्द्रकी पूजाके विषयमें नन्दजीके ऐसे वचन सुनकर श्रीदामोदर देवराजको कुपित करनेके लिये ही इस प्रकार कहने लगे—॥ २५॥ ‘‘हे तात! हम न तो कृषक हैं और न व्यापारी, हमारे देवता तो गौएँ ही हैं; क्योंकि हमलोग वनचर हैं॥ २६॥ आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र), त्रयी (कर्मकाण्ड), दण्डनीति और वार्ता—ये चार विद्याएँ हैं, इनमेंसे केवल वार्ताका विवरण सुनो॥ २७॥ हे महाभाग! वार्ता नामकी विद्या कृषि, वाणिज्य और पशुपालन इन तीन वृत्तियोंकी आश्रयभूता है॥ २८॥ वार्ताके इन तीनों भेदोंमेंसे कृषि किसानोंकी, वाणिज्य व्यापारियोंकी और गोपालन हमलोगोंकी उत्तम वृत्ति है॥ २९॥ जो व्यक्ति जिस विद्यासे युक्त है उसकी वही इष्टदेवता है, वही पूजा-अर्चाके योग्य है और वही परम उपकारिणी है॥ ३०॥ जो पुरुष एक व्यक्तिसे फल-लाभ करके अन्यकी पूजा करता है, उसका इहलोक अथवा परलोकमें कहीं भी शुभ नहीं होता॥ ३१॥ खेतोंके अन्तमें सीमा है तथा सीमाके अन्तमें वन हैं और वनोंके अन्तमें समस्त पर्वत हैं; वे पर्वत ही हमारी परमगति हैं॥ ३२॥ हमलोग न तो किंवाड़ें तथा भित्तिके अन्दर रहनेवाले हैं और न निश्चित गृह अथवा खेतवाले किसान ही हैं, बल्कि [वन-पर्वतादिमें स्वच्छन्द विचरनेवाले] हमलोग चक्रचारी* मुनियोंकी भाँति समस्त जनसमुदायमें सुखी हैं [अतः गृहस्थ किसानोंकी भाँति हमें इन्द्रकी पूजा करनेका कोई काम नहीं]’’॥ ३३॥
‘‘सुना जाता है कि इस वनके पर्वतगण कामरूपी (इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले) हैं। वे मनोवांछित रूप धारण करके अपने-अपने शिखरोंपर विहार किया करते हैं॥ ३४॥
* चक्रचारी मुनि वे हैं जो शकट आदिसे सर्वत्र भ्रमण किया करते हैं और जिनका कोई खास निवास नहीं होता। जहाँ शाम हो जाती है वहीं रह जाते हैं। अतः उन्हें ‘सायंगृह’ भी कहते हैं।