भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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अ० १० ] * पञ्चम अंश * ३४१


स निष्कासितमस्तिष्को मुखाच्छोणितमुद्वमन्। निपपात महीपृष्ठे दैत्यवर्यो ममार च॥ ३६

प्रलम्बं निहतं दृष्ट्वा बलेनाद्भुतकर्मणा। प्रहृष्टास्तुष्टुवुर्गोपास्साधुसाध्विति चाब्रुवन्॥ ३७

संस्तूयमानो गोपैस्तु रामो दैत्ये निपातिते। प्रलम्बे सह कृष्णेन पुनर्गोकुलमाययौ॥ ३८

तदनन्तर वह दैत्यश्रेष्ठ मगज (मस्तिष्क) फट जानेपर मुखसे रक्त वमन करता हुआ पृथिवीपर गिर पड़ा और मर गया॥ ३६॥ अद्भुतकर्मा बलरामजीद्वारा प्रलम्बासुरको मरा हुआ देखकर गोपगण प्रसन्न होकर 'साधु, साधु' कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ३७॥ प्रलम्बासुरके मारे जानेपर बलरामजी गोपोंद्वारा प्रशंसित होते हुए कृष्णचन्द्रके साथ गोकुलमें लौट आये॥ ३८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥


दसवाँ अध्याय

शरद्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा

श्रीपराशर उवाच

तयोर्विहरतोरेवं रामकेशवयोजें। प्रावृड् व्यतीता विकसत्सरोजा चाभवच्छरत्॥ १

अवापुस्तापमत्यर्थं शफर्यः पल्वलोदके। पुत्रक्षेत्रादिसक्तेन ममत्वेन यथा गृही॥ २

मयूरा मौनमातस्थुः परित्यक्तमदा वने। असारतां परिज्ञाय संसारस्येव योगिनः॥ ३

उत्सृज्य जलसर्वस्वं विमलास्सितमूर्त्तयः। तत्यजुश्चाम्बरं मेघा गृहं विज्ञानिनो यथा॥ ४

शरत्सूर्यांशुतप्तानि ययुश्शोषं सरांसि च। बह्वालम्बममत्वेन हृदयानीव देहिनाम्॥ ५

कुमुदैश्शरदम्भांसि योग्यतालक्षणं ययुः। अवबोधैर्मनांसीव समत्वममलात्मनाम्॥ ६

तारकाविमले व्योम्नि रराजाखण्डमण्डलः। चन्द्रश्चरमदेहात्मा योगी साधुकुले यथा॥ ७

शनकैश्शनकैस्तीरं तत्यजुश्च जलाशयाः। ममत्वं क्षेत्रपुत्रादिरूढमुच्चैर्यथा बुधाः॥ ८

पूर्वं त्यक्तैस्सरोऽम्भोभिर्हंसा योगं पुनर्ययुः। क्लेशैः कुयोगिनोऽशेषैरन्तरायहता इव॥ ९

श्रीपराशरजी बोले- इस प्रकार उन राम और कृष्णके व्रजमें विहार करते-करते वर्षाकाल बीत गया और प्रफुल्लित कमलोंसे युक्त शरद्-ऋतु आ गयी॥ १॥ जैसे गृहस्थ पुरुष पुत्र और क्षेत्र आदिमें लगी हुई ममतासे सन्ताप पाते हैं, उसी प्रकार मछलियाँ गड्ढोंके जलमें अत्यन्त ताप पाने लगीं॥ २॥ संसारकी असारताको जानकर जिस प्रकार योगिजन शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मयूरगण मदहीन होकर मौन हो गये॥ ३॥ ज्ञानिगण [सब प्रकारकी ममता छोड़कर] जैसे घरका त्याग कर देते हैं, वैसे ही निर्मल श्वेत मेघोंने अपना जलरूप सर्वस्व छोड़कर आकाशमण्डलका परित्याग कर दिया॥ ४॥ विविध पदार्थोंमें ममता करनेसे जैसे देहधारियोंके हृदय सारहीन हो जाते हैं वैसे ही शरत्कालीन सूर्यके तापसे सरोवर सूख गये॥ ५॥ निर्मलचित्त पुरुषोंके मन जिस प्रकार ज्ञानद्वारा समता प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार शरत्कालीन जलोंको [स्वच्छताके कारण] कुमुदोंसे योग्य सम्बन्ध प्राप्त हो गया॥ ६॥ जिस प्रकार साधु-कुलमें चरम-देह-धारी योगी सुशोभित होता है, उसी प्रकार तारका-मण्डल-मण्डित निर्मल आकाशमें पूर्णचन्द्र विराजमान हुआ॥ ७॥

जिस प्रकार क्षेत्र और पुत्र आदिमें बढ़ी हुई ममताको विवेकीजन शनैः-शनैः त्याग देते हैं, वैसे ही जलाशयोंका जल धीरे-धीरे अपने तटको छोड़ने लगा॥ ८॥ जिस प्रकार अन्तरायों* (विघ्नों)-से विचलित हुए कुयोगियोंका


* अन्तराय नौ हैं- 'व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। (यो० द० १। ३०)