भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 50
अ० ९ ]* प्रथम अंश *३९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्यन्ते वचसस्तेषां देवानां ब्रह्मणस्तथा।<br>ऊचुर्देवर्षयस्सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः॥ ६०<br>आद्यो यज्ञपुमानीड्यः पूर्वेषां यश्च पूर्वजः।<br>तन्नताः स्म जगत्स्रष्टुः स्रष्टारमविशेषणम्॥ ६१<br>भगवन्भूतभव्येश यज्ञमूर्त्तिधराव्यय।<br>प्रसीद प्रणतानां त्वं सर्वेषां देहि दर्शनम्॥ ६२<br>एष ब्रह्मा सहास्माभिः सहरुद्रैस्त्रिलोचनः।<br>सर्वादित्यैः समं पूषा पावकोऽयं सहाग्निभिः॥ ६३<br>अश्विनौ वसवश्चेमे सर्वे चैते मरुद्गणाः।<br>साध्या विश्वे तथा देवा देवेन्द्रश्चायमीश्वरः॥ ६४<br>प्रणामप्रवणा नाथ दैत्यसैन्यैः पराजिताः।<br>शरणं त्वामनुप्राप्ताः समस्ता देवतागणाः॥ ६५<br>श्रीपराशर उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु भगवाञ्छङ्खचक्रधृक्।<br>जगाम दर्शनं तेषां मैत्रेय परमेश्वरः॥ ६६<br>तं दृष्ट्वा ते तदा देवाः शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>अपूर्व्वरूपसंस्थानं तेजसां राशिमूर्जितम्॥ ६७<br>प्रणम्य प्रणताः सर्वे संक्षोभस्तिमितेक्षणाः।<br>तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षं पितामहपुरोगमाः॥ ६८<br>देवा ऊचुः<br>नमो नमोऽविशेषस्त्वं त्वं ब्रह्मा त्वं पिनाकधृक्।<br>इन्द्रस्त्वमग्निः पवनो वरुणः सविता यमः॥ ६९<br>वसवो मरुतः साध्या विश्वेदेवगणाः भवान्।<br>योऽयं तवाग्रतो देव समीपं देवतागणः।<br>स त्वमेव जगत्स्रष्टा यतः सर्वगतो भवान्॥ ७०<br>त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः प्रजापतिः।<br>विद्या वेद्यं च सर्वात्मंस्त्वन्मयं चाखिलं जगत्॥ ७१<br>त्वामार्त्ताः शरणं विष्णो प्रयाता दैत्यनिर्जिताः।<br>वयं प्रसीद सर्वात्मंस्तेजसाप्याययस्व नः॥ ७२<br>तावदार्त्तिस्तथा वाञ्छा तावन्मोहस्तथाऽसुखम्।<br>यावन्न याति शरणं त्वामशेषाघनाशनम्॥ ७३<br>त्वं प्रसादं प्रसन्नात्मन् प्रपन्नानां कुरुष्व नः।<br>तेजसां नाथ सर्वेषां स्वशक्त्याप्यायनं कुरु॥ ७४तदनन्तर ब्रह्मा और देवगणोंके बोल चुकनेपर बृहस्पति आदि समस्त देवर्षिगण कहने लगे— ॥ ६० ॥<br>'जो परम स्तवनीय आद्य यज्ञ-पुरुष हैं और पूर्वजोंके भी पूर्वपुरुष हैं उन जगत्के रचयिता निर्विशेष परमात्माको हम नमस्कार करते हैं॥ ६१ ॥ हे भूत-भव्येश यज्ञमूर्तिधर भगवन्! हे अव्यय! हम सब शरणागतोंपर आप प्रसन्न होइये और दर्शन दीजिये ॥ ६२ ॥ हे नाथ! हमारे सहित ये ब्रह्माजी, रुद्रोंके सहित भगवान् शंकर, बारहों आदित्योंके सहित भगवान् पूषा, अग्नियोंके सहित पावक और ये दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, समस्त मरुद्गण, साध्यगण, विश्वेदेव तथा देवराज इन्द्र ये सभी देवगण दैत्य-सेनासे पराजित होकर अति प्रणत हो आपकी शरणमें आये हैं' ॥ ६३—६५ ॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! इस प्रकार स्तुति किये जानेपर शंख-चक्रधारी भगवान् परमेश्वर उनके सम्मुख प्रकट हुए॥ ६६ ॥ तब उस शंख-चक्रगदाधारी उत्कृष्ट तेजोराशिमय अपूर्व दिव्य मूर्तिको देखकर पितामह आदि समस्त देवगण अति विनयपूर्वक प्रणामकर क्षोभवश चकित-नयन हो उन कमलनयन भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ६६—६८ ॥<br>देवगण बोले—हे प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप निर्विशेष हैं तथापि आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही शंकर हैं तथा आप ही इन्द्र, अग्नि, पवन, वरुण, सूर्य और यमराज हैं॥ ६९ ॥ हे देव! वसुगण, मरुद्गण, साध्यगण और विश्वेदेवगण भी आप ही हैं तथा आपके सम्मुख जो यह देवसमुदाय है, हे जगत्स्रष्टा! वह भी आप ही हैं क्योंकि आप सर्वत्र परिपूर्ण हैं॥ ७० ॥ आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं तथा आप ही ओंकार और प्रजापति हैं। हे सर्वात्मन्! विद्या, वेद्य और सम्पूर्ण जगत् आपकीका स्वरूप तो है॥ ७१ ॥ हे विष्णो! दैत्योंसे परास्त हुए हम आतुर होकर आपकी शरणमें आये हैं; हे सर्वस्वरूप! आप हमपर प्रसन्न होइये और अपने तेजसे हमें सशक्त कीजिये॥ ७२ ॥ हे प्रभो! जबतक जीव सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले आपकी शरणमें नहीं जाता तभीतक उसमें दीनता, इच्छा, मोह और दुःख आदि रहते हैं॥ ७३ ॥ हे प्रसन्नात्मन्! हम शरणागतोंपर आप प्रसन्न होइये और हे नाथ! अपनी शक्तिसे हम सब देवताओंके [खोये हुए] तेजको फिर बढ़ाइये॥ ७४ ॥

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