भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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४० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९


श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—विनीत देवताओंद्धारा
एवं संस्तूयमानस्तु प्रणतैरमरैर्हरिः।इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विश्वकर्ता भगवान्
प्रसन्नदृष्टिर्भगवानिदमाह स विश्वकृत् ॥ ७५हरि प्रसन्न होकर इस प्रकार बोले—॥ ७५ ॥ हे
तेजसो भवतां देवाः करिष्याम्युपबृंहणम्।देवगण! मैं तुम्हारे तेजको फिर बढ़ाऊँगा; तुम इस
वदाम्यहं यत्क्रियतां भवद्भिस्तदिदं सुराः ॥ ७६समय मैं जो कुछ कहता हूँ वह करो ॥ ७६ ॥ तुम
आनीय सहिता दैत्यैः क्षीराब्धौ सकलौषधीः।दैत्योंके साथ सम्पूर्ण ओषधियाँ लाकर अमृतके
प्रक्षिप्यात्रामृतार्थं ताः सकला दैत्यदानवैः।लिये क्षीर-सागरमें डालो और मन्दराचलको मथानी
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम् ॥ ७७तथा वासुकि नागको नेती बनाकर उसे दैत्य और
मथ्यताममृतं देवाः सहाये मय्यवस्थिते ॥ ७८दानवोंके सहित मेरी सहायतासे मथकर अमृत
सामपूर्वं च दैतेयास्तत्र साहाय्यकर्मणि।निकालो ॥ ७७-७८ ॥ तुमलोग सामनीतिका अवलम्बन
सामान्यफलभोक्तारो यूयं वाच्या भविष्यथ ॥ ७९कर दैत्योंसे कहो कि 'इस काममें सहायता करनेसे
मथ्यमाने च तत्राब्धौ यत्समूत्पत्स्यतेऽमृतम्।आपलोग भी इसके फलमें समान भाग पायेंगे' ॥ ७९ ॥
तत्पानाद्बलिनो यूयममराश्च भविष्यथ ॥ ८०समुद्रके मथनेपर उससे जो अमृत निकलेगा उसका
तथा चाहं करिष्यामि ते यथा त्रिदशद्विषः।पान करनेसे तुम सबल और अमर हो जाओगे ॥ ८० ॥
न प्राप्स्यन्त्यमृतं देवाः केवलं क्लेशभागिनः ॥ ८१हे देवगण! तुम्हारे लिये मैं ऐसी युक्ति करूँगा
श्रीपराशर उवाचजिससे तुम्हारे द्वेषी दैत्योंको अमृत न मिल सकेगा
इत्युक्ता देवदेवेन सर्व एव तदा सुराः।और उनके हिस्सेमें केवल समुद्र-मन्थनका क्लेश
सन्धानमसुरैः कृत्वा यत्नवन्तोऽमृतेऽभवन् ॥ ८२ही आयेगा ॥ ८१ ॥
नानौषधीः समानीय देवदैतेयदानवाः।श्रीपराशरजी बोले—तब देवदेव भगवान्
क्षिप्त्वा क्षीराब्धिपयसि शरदभ्रामलत्विषि ॥ ८३विष्णुके ऐसा कहनेपर सभी देवगण दैत्योंसे
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्।सन्धि करके अमृतप्राप्तिके लिये यत्न करने लगे ॥ ८२ ॥
ततो मथितुमारब्धा मैत्रेय तरसामृतम् ॥ ८४हे मैत्रेय! देव, दानव और दैत्योंने नाना प्रकारकी
विबुधाः सहिताः सर्वे यतः पुच्छं ततः कृताः।ओषधियाँ लाकर उन्हें शरद्-ऋतुके आकाशकी-सी
कृष्णेन वासुकेर्दैत्याः पूर्वकाये निवेशिताः ॥ ८५निर्मल कान्तिवाले क्षीर-सागरके जलमें डाला और
ते तस्य मुखनिश्वासवह्निनापहतत्विषः।मन्दराचलको मथानी तथा वासुकि नागको नेती बनाकर
निस्तेजसोऽसुराः सर्वे बभूवुरमितौजसः ॥ ८६बड़े वेगसे अमृत मथना आरम्भ किया ॥ ८३-८४ ॥
तेनैव मुखनिश्वासवायुनास्तबलाहकैः।भगवान्ने जिस ओर वासुकिकी पूँछ थी उस ओर
पुच्छप्रदेशे वर्षद्भिस्तदा चाप्यायिताः सुराः ॥ ८७देवताओंको तथा जिस ओर मुख था उधर दैत्योंको
क्षीरोदमध्ये भगवान्कूर्मरूपी स्वयं हरिः।नियुक्त किया ॥ ८५ ॥ महातेजस्वी वासुकिके मुखसे
मन्थनाद्रेरधिष्ठानं भ्रमतोऽभून्महामुने ॥ ८८निकलते हुए निःश्वासाग्निसे झुलसकर सभी दैत्यगण
रूपेणान्येन देवानां मध्ये चक्रगदाधरः।निस्तेज हो गये ॥ ८६ ॥ और उसी श्वास-वायुसे विक्षिप्त
चकर्ष नागराजानं दैत्यमध्येऽपरेण च ॥ ८९हुए मेघोंके पूँछकी ओर बरसते रहनेसे देवताओंकी
शक्ति बढ़ती गयी ॥ ८७ ॥
हे महामुने! भगवान् स्वयं कूर्मरूप धारण कर
क्षीर-सागरमें घूमते हुए मन्दराचलके आधार हुए ॥ ८८ ॥
और वे ही चक्र-गदाधर भगवान् अपने एक अन्य
रूपसे देवताओंमें और एक रूपसे दैत्योंमें मिलकर
नागराजको खींचने लगे थे ॥ ८९ ॥