भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० ९] * प्रथम अंश * ४१

उपर्याक्रान्तवाञ्छैलं बृहद्रूपेण केशवः।<br>तथापरेण मैत्रेय यन्न दृष्टं सुरासुरैः ॥ ९०तथा हे मैत्रेय ! एक अन्य विशाल रूपसे जो देवता और दैत्योंको दिखायी नहीं देता था श्रीकेशवने ऊपरसे पर्वतको दबा रखा था ॥ ९० ॥
तेजसा नागराजानं तथाप्यायितवान्हरिः ।<br>अन्येन तेजसा देवानुपबृंहितवान्प्रभुः ॥ ९१भगवान् श्रीहरि अपने तेजसे नागराज वासुकिमें बलका संचार करते थे और अपने अन्य तेजसे वे देवताओंका बल बढ़ा रहे थे ॥ ९१ ॥
मथ्यमाने ततस्तस्मिन्क्षीराब्धौ देवदानवैः ।<br>हविर्धामाऽभवत्पूर्वं सुरभिः सुरपूजिता ॥ ९२इस प्रकार, देवता और दानवोंद्वारा क्षीर-समुद्रके मथे जानेपर पहले हवि (यज्ञ-सामग्री)-की आश्रयरूपा सुरपूजिता कामधेनु उत्पन्न हुई ॥ ९२ ॥
जग्मुर्मुदं ततो देवा दानवाश्च महामुने ।<br>व्याक्षिप्तचेतसश्चैव बभूवुः स्तिमितेक्षणाः ॥ ९३हे महामुने ! उस समय देव और दानवगण अति आनन्दित हुए और उसकी ओर चित्त खिंच जानेसे उनकी टकटकी बँध गयी ॥ ९३ ॥
किमेतदिति सिद्धानां दिवि चिन्तयतां ततः ।<br>बभूव वारुणी देवी मदाघूर्णितलोचना ॥ ९४फिर स्वर्गलोकमें 'यह क्या है ? यह क्या है ?' इस प्रकार चिन्ता करते हुए सिद्धोंके समक्ष मदसे घूमते हुए नेत्रोंवाली वारुणीदेवी प्रकट हुई ॥ ९४ ॥
कृतावर्त्तात्ततस्तस्मात्क्षीरोदाद्वासयञ्जगत् ।<br>गन्धेन पारिजातोऽभूद्देवस्त्रीनन्दनस्तरुः ॥ ९५और पुनः मन्थन करनेपर उस क्षीर-सागरसे, अपनी गन्धसे त्रिलोकीको सुगन्धित करनेवाला तथा सुर-सुन्दरियोंका आनन्दवर्धक कल्पवृक्ष उत्पन्न हुआ ॥ ९५ ॥
रूपौदार्यगुणोपेतस्तथा चाप्सरसां गणः ।<br>क्षीरोदधेः समुत्पन्नो मैत्रेय परमाद्भुतः ॥ ९६हे मैत्रेय ! तत्पश्चात् क्षीर-सागरसे रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त अति अद्भुत अप्सराएँ प्रकट हुईं ॥ ९६ ॥
ततः शीतांशुर्भवज्जगृहे तं महेश्वरः ।<br>जगृहुश्च विषं नागाः क्षीरोदाब्धिसमुत्थितम् ॥ ९७फिर चन्द्रमा प्रकट हुआ जिसे महादेवजीने ग्रहण कर लिया। इसी प्रकार क्षीर-सागरसे उत्पन्न हुए विषको नागोंने ग्रहण किया ॥ ९७ ॥
ततो धन्वन्तरिर्देवः श्वेताम्बरधरस्स्वयम् ।<br>बिभ्रत्कमण्डलुं पूर्णममृतस्य समुत्थितः ॥ ९८फिर श्वेतवस्त्रधारी साक्षात् भगवान् धन्वन्तरिजी अमृतसे भरा कमण्डलु लिये प्रकट हुए ॥ ९८ ॥
ततः स्वस्थमनस्कास्ते सर्वे दैतेयदानवाः ।<br>बभूवुर्मुदिताः सर्वे मैत्रेय मुनिभिः सह ॥ ९९हे मैत्रेय ! उस समय मुनिगणके सहित समस्त दैत्य और दानवगण स्वस्थ-चित्त होकर अति प्रसन्न हुए ॥ ९९ ॥
ततः स्फुरत्कान्तिमती विकासिकमले स्थिता ।<br>श्रीर्देवी पयसस्तस्मादुद्भूता धृतपङ्कजा ॥ १००उसके पश्चात् विकसित कमलपर विराजमान स्फुटकान्तिमयी श्रीलक्ष्मीदेवी हाथोंमें कमल-पुष्प धारण किये क्षीर-समुद्रसे प्रकट हुईं ॥ १०० ॥
तां तुष्टुवुर्मुदा युक्ताः श्रीसूक्तेन महर्षयः ॥ १०१उस समय महर्षिगण अति प्रसन्नतापूर्वक श्रीसूक्तद्वारा उनकी स्तुति करने लगे तथा
विश्वावसुमुखास्तस्या गन्धर्वाः पुरतो जगुः ।<br>घृताचीप्रमुखास्तत्र ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १०२विश्वावसु आदि गन्धर्वगण उनके सम्मुख गान और घृताची आदि अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १०१-१०२ ॥
गङ्गाद्याः सरितस्तोयैः स्नानार्थमुपतस्थिरे ।<br>दिग्गजा हेमपात्रस्थमादाय विमलं जलम् ।<br>स्नापयाञ्चक्रिरे देवीं सर्वलोकमहेश्वरीम् ॥ १०३उन्हें अपने जलसे स्नान करानेके लिये गंगा आदि नदियाँ स्वयं उपस्थित हुईं और दिग्गजोंने सुवर्ण-कलशोंमें भरे हुए उनके निर्मल जलसे सर्वलोक-महेश्वरी श्रीलक्ष्मीदेवीको स्नान कराया ॥ १०३ ॥
क्षीरोदो रूपधृक्तस्यै मालाम्म्लानपङ्कजाम् ।<br>ददौ विभूषणान्यङ्गे विश्वकर्मा चकार ह ॥ १०४क्षीर-सागरने मूर्तिमान् होकर उन्हें विकसित कमल-पुष्पोंकी माला दी तथा विश्वकर्माने उनके अंग-प्रत्यंगमें विविध आभूषण पहनाये ॥ १०४ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरा स्नाता भूषणभूषिता ।<br>पश्यतां सर्वदेवानां ययौ वक्षःस्थलं हरेः ॥ १०५इस प्रकार दिव्य माला और वस्त्र धारण कर, दिव्य जलसे स्नान कर, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो श्रीलक्ष्मीजी सम्पूर्ण देवताओंके देखते-देखते श्रीविष्णुभगवान्‌के वक्षःस्थलमें विराजमान हुईं ॥ १०५ ॥