विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९
| संस्कृत | हिन्दी |
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| तया विलोकिता देवा हरिवक्षःस्थलस्थया।<br>लक्ष्म्या मैत्रेय सहसा परां निर्वृतिमागताः॥ १०६<br>उद्वेगं परमं जग्मुर्दैत्या विष्णुपरानिमुखाः।<br>त्यक्ता लक्ष्म्या महाभाग विप्रचित्तिपुरोगमाः॥ १०७ | हे मैत्रेय! श्रीहरिके वक्षःस्थलमें विराजमान श्रीलक्ष्मीजीका दर्शन कर देवताओंको अकस्मात् अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई॥ १०६॥ और हे महाभाग! लक्ष्मीजीसे परित्यक्त होनेके कारण भगवान् विष्णुके विरोधी विप्रचित्ति आदि दैत्यगण परम उद्विग्न (व्याकुल) हुए॥ १०७॥ तब |
| ततस्ते जगृहुर्दैत्या धन्वन्तरिकरस्थितम्।<br>कमण्डलुं महावीर्या यत्रास्तेऽमृतमुत्तमम्॥ १०८ | उन महाबलवान् दैत्योंने श्रीधन्वन्तरिजीके हाथसे वह कमण्डलु छीन लिया जिसमें अति उत्तम अमृत भरा हुआ था॥ १०८॥ अतः |
| मायया मोहयित्वा तान्विष्णुः स्त्रीरूपसंस्थितः।<br>दानवेभ्यस्तदादाय देवेभ्यः प्रददौ प्रभुः॥ १०९ | स्त्री (मोहिनी) रूपधारी भगवान् विष्णुने अपनी मायासे दानवोंको मोहित कर उनसे वह कमण्डलु लेकर देवताओंको दे दिया॥ १०९॥ |
| ततः पपुः सुरगणाः शक्राद्यास्तत्तदामृतम्।<br>उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दैत्यास्तांश्च समभ्ययुः॥ ११० | तब इन्द्र आदि देवगण उस अमृतको पी गये; इससे दैत्यलोग अति तीखे खड्ग आदि शस्त्रोंसे सुसज्जित हो उनके ऊपर टूट पड़े॥ ११०॥ किन्तु |
| पीतेऽमृते च बलिभिर्देवैर्दैत्यचमूस्तदा।<br>बध्यमाना दिशो भेजे पातालं च विवेश वै॥ १११ | अमृत-पानके कारण बलवान् हुए देवताओंद्धारा मारी-काटी जाकर दैत्योंकी सम्पूर्ण सेना दिशा-विदिशाओंमें भाग गयी और कुछ पाताललोकमें भी चली गयी॥ १११॥ |
| ततो देवा मुदा युक्ताः शङ्खचक्रगदाभृतम्।<br>प्रणिपत्य यथापूर्वमाशासन्तत्रिविष्टपम्॥ ११२ | फिर देवगण प्रसन्नतापूर्वक शंख-चक्र-गदा-धारी भगवान्को प्रणाम कर पहलेहीके समान स्वर्गका शासन करने लगे॥ ११२॥ |
| ततः प्रसन्नभाः सूर्यः प्रययौ स्वेन वर्त्मना।<br>ज्योतींषि च यथामार्गं प्रययुर्मुरिसत्तम॥ ११३ | हे मुनिश्रेष्ठ! उस समयसे प्रखर तेजायुक्त भगवान् सूर्य अपने मार्गसे तथा अन्य तारागण भी अपने-अपने मार्गसे चलने लगे॥ ११३॥ |
| जज्वाल भगवांश्चोच्चैश्चारुदीप्तिर्विभावसुः।<br>धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत॥ ११४ | सुन्दर दीप्तिशाली भगवान् अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे और उसी समयसे समस्त प्राणियोंकी धर्ममें प्रवृत्ति हो गयी॥ ११४॥ |
| त्रैलोक्यं च श्रिया जुष्टं बभूव द्विजसत्तम।<br>शक्रश्च त्रिदशश्रेष्ठः पुनः श्रीमानजायत॥ ११५ | हे द्विजोत्तम! त्रिलोकी श्रीसम्पन्न हो गयी और देवताओंमें श्रेष्ठ इन्द्र भी पुनः श्रीमान् हो गये॥ ११५॥ तदनन्तर |
| सिंहासनगतः शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुनः।<br>देवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां ततः॥ ११६ | इन्द्रने स्वर्गलोकमें जाकर फिरसे देवराज्यपर अधिकार पाया और राजसिंहासनपर आरूढ़ हो पद्मस्ता श्रीलक्ष्मीजीकी इस प्रकार स्तुति की॥ ११६॥ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्र बोले- |
| नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्।<br>श्रियमित्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्॥ ११७ | सम्पूर्ण लोकोंकी जननी, विकसित कमलके सदृश नेत्रोंवाली, भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान कमलोद्भवा श्रीलक्ष्मीदेवीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ११७॥ |
| पद्मालयां पद्मपद्मपत्रासनिभेक्षणाम्।<br>वन्दे पद्ममुखीं देवीं पद्मनाभप्रियामहम्॥ ११८ | कमल ही जिनका निवासस्थान है, कमल ही जिनके कर-कमलोंमें सुशोभित है, तथा कमल-दलके समान ही जिनके नेत्र हैं उन कमलमुखी कमलनाभ-प्रिया श्रीकमलादेवीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ११८॥ |
| त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनी।<br>सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती॥ ११९ | हे देवि! तुम सिद्धि हो, स्वधा हो, स्वाहा हो, सुधा हो और त्रिलोकीको पवित्र करनेवाली हो तथा तुम ही सन्ध्या, रात्रि, प्रभा, विभूति, मेधा, श्रद्धा और सरस्वती हो॥ ११९॥ |